13 अप्रैल को जब वंसत की बारिश ने सूखी जमीन को भिगोया और सभी धूल–मिट्टी को धो–पोंछ दिया, कोरिया का दौरा करने के लिए कुछ लोग आए, जिनका स्वागत लंबे सूखे के बाद आई बारिश से ज्यादा बढ़कर किया गया। वे 62वें विदेशी मुलाकाती दल में स्वर्गीय परिवार के सदस्य हैं जो दूर देशों से बादल के समान, कबूतरों के समान अपने घोंसले की ओर उड़े चले आए।
62वें विदेशी मुलाकाती दल में उत्तरी अमेरिका, कनाडा, इंग्लैड, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया, चेक गणराज्य, फिनलैंड, स्वीडन, रूस, यूक्रेन, लातविया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, तुर्की इत्यादि जैसे उत्तर अमेरिका, यूरोप और ओशिनिया के 16 देशों में 95 स्थानीय चर्चों के 211 सदस्य शामिल हुए थे। उनमें से 98 प्रतिशत के सदस्य कोरिया में पहली बार आए, और 90 प्रतिशत से अधिक सदस्य 20 या 30 वर्ष की उम्र के युवा वयस्क थे जिन्हें सत्य में आए हुए एक से पांच साल ही हुए थे। उनमें से ज्यादातर भोर की ओस के समान परमेश्वर के जवान थे जिन्होंने एक मजबूत विश्वास के साथ एलोहीम परमेश्वर को स्वीकार किया। वे माता को देखने और उनके प्रेम को सीखने के द्वारा अपने आप को सुसमाचार के प्रति समर्पित करना चाहते थे।
माता ने दूर देशों से आई अपनी सन्तानों का स्नेहमय स्वागत किया और अपना आनंद एवं आभार व्यक्त किया। सदस्यों ने माता की बांहों में लिपटकर आंसू बहाए और उनके हृदय में भावनाओं का ज्वार उठा। माता ने अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं में यह बोलते हुए उनका स्वागत किया कि, “आपके साथ रहते हुए मैं खुश हूं,” और “कृपया अन्य भाइयों और बहनों से जो इस बार नहीं आ सके, यह कहना कि मैं उन्हें याद करती हूं और उनसे प्रेम करती हूं।” उन्होंने भाइयों और बहनों से यह भी कहा कि, “चूंकि हम सभी स्वर्गीय परिवार के सदस्य हैं, इसलिए कोरिया में रहने के दौरान कोई भी असुविधा होने पर सूचित करें।” साथ ही माता ने प्रत्येक सदस्य के लिए प्रार्थना की कि वह बहुतायत से पवित्र आत्मा को प्राप्त करे और महान नबी बने जो पूरे संसार में बिखरे सभी स्वर्गीय परिवार वालों को ढूंढ़ेगा।
विदेशी सदस्यों ने प्रधान कार्यालय में और प्रशिक्षण संस्थानों में सत्य का अध्ययन किया। उन्होंने सियोल, ग्यंगि और छुंगछंग प्रांत में स्थित स्थानीय चर्चों में मुलाकत की और कोरियाई सदस्यों के साथ स्वर्गीय परिवार का प्रेम साझा किया। एलोहीम प्रशिक्षण संस्थान में जो पूरी तरह से खिले हुए चेरी के फूलों से घिरा हुआ, उन्होंने प्रकृति के सौंदर्य और परमेश्वर की शक्ति की प्रशंसा की। उन्होंने सुवन में ह्वासङ किला, ग्वांगह्वा गेट और सिय्योल मिनार के चारों ओर घूमने के द्वारा कोरिया के विकास का एहसास किया और चर्च ऑफ गॉड के इतिहास संग्रहालय में चर्च ऑफ गॉड के इतिहास के साथ मसीह का बलिदान महसूस किया।
पूरी यात्रा के दौरान माता उनके साथ रहीं, उनकी देखभाल की, उनके उपदेश प्रचार को सुना, और उन्हें परामर्श देती रहीं। माता के प्रेम में सदस्यों का विश्वास, आशा एवं प्रेम और अधिक परिपक्व बन गया। माता के उदाहरण और शिक्षाओं के द्वारा, उन्होंने अधिक गहराई से स्वर्ग के राज्य के मूल्य और बलिदान व प्रेम के अर्थ का एहसास किया और कहा कि, “मैंने सच में माता के बेशर्त और अनंत प्रेम को महसूस किया है,” “मैंने कोरियाई भाइयों और बहनों के हार्दिक स्वागत और सेवा के द्वारा कई चीजें सीखी हैं,” “माता के साथ बिताया गया पूरा समय एक सपने जैसा लगता है,” “मुझे ऐसा लगा जैसा कि मैं स्वर्ग में हूं।” भले ही उन्हें माता से बिछुड़ने का दुख था, लेकिन वे सभी माता के प्रेम का यत्न से प्रचार करने के लिए दृढ़ संकल्पी थे ताकि वे सभी खोए हुए भाइयों और बहनों को ढूंढ़ सकें और स्वर्ग में सदा–सर्वदा के लिए एक साथ रह सकें।

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