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जो मुकुट पहनना चाहता है उसे उस मुकुट का भार उठाना चाहिए

स्वर्ग का राज्य जो परमेश्वर ने अपनी संतानों के लिए तैयार किया है, किसी आंख ने नहीं देखा, किसी कान ने नहीं सुना और न ही किसी के चित में चढ़ा है। लेकिन, स्वर्ग जाने का मार्ग समतल नहीं है। अगर हम स्वर्ग बिना किसी कठिनाई के आसानी से जा सकते तो अच्छा होता। लेकिन, इस मार्ग पर हमें रोकने वाली बड़ी रुकावटें हैं और ऐसी बाधाएं भी हैं जो हमारे काबू से बहार हैं।

प्रेरितों सहित जिन्होंने मसीह की आज्ञा के प्रति आज्ञाकारी होकर सुसमाचार प्रचार किया था, प्रथम चर्च के संतों के साथ भी ऐसा ही था। वे कठिनाई और उत्पीड़न में भी विश्वास के मार्ग पर चले, वह समतल अर्थात् सरल मार्ग नहीं था। परमेश्वर ने अपनी प्रिय संतानों को आसान और आरामदायक मार्ग के बदले ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर चलने क्यों दिया? आइए हम वह महिमा देखकर जिसका हम अनंत स्वर्ग में हमेशा के लिए आनंद लेंगे, जीवन के मुकुट को थामे रहें और सिय्योन के संतों के रूप में अंत तक विश्वास की दौड़ को पूरा करें।

अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे हो ले


एक कहावत है कि “जो मुकुट पहनना चाहता है, उसे उस मुकुट का भार उठाना चाहिए।” इसका अर्थ है यदि कोई व्यक्ति राजा बनना चाहता है तो उसे कम से कम उस मुकुट का भार उठाने में सक्षम होना चाहिए। इसी रीति से जो व्यक्ति स्वर्ग का राज्य जाना चाहता है उसे क्रूस का भार उठाने में सक्षम होना चाहिए। यीशु ने कहा, “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आपे से इन्कार करे और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले।”

लूक 9:23 उसने सबसे कहा, “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप से इन्कार करे और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले।”

अनन्त स्वर्ग के राज्य की आशा रखते हुए हम प्रतिदिन मसीह के मार्ग पर चल रहे हैं। विश्वास के इस जंगल में हर किसी के पास अपना क्रूस होता है। दुनिया भर में सिय्योन के लोग भी अपवाद नहीं हैं। वे सब शांति और सुखी दिखते हैं, लेकिन उनके पास अपनी कठिनाइयां हैं। मैं जानता हूं कि वे अपनी मुस्कुराहटों के पीछे अपनी कठिनाइयों को छिपाते हुए स्वर्ग जाने की आशा से धीरज धर रहे हैं। कभी-कभी वे भारी क्रूस को नीचे रखना चाहते होंगे जो उनके कंधों पर बोझिल होता है। लेकिन, क्रूस रहित मार्ग मसीह का मार्ग नहीं है।

2,000 वर्ष पहले, परमेश्वर ने यीशु के नाम से इस पृथ्वी पर आकर क्रूस का बोझ उठाया। यदि उन्होंने एक पल के लिए भी अपनी शक्ति दिखाई होती तो सारे लोग चकित होकर उन्हें मसीह के रूप में विश्वास करते और उनके पीछे पीछे चलते। लेकिन, यीशु हमारे समान एक मनुष्य के रूप में प्रगट हुए और साढ़े तीन साल की अपनी सेवकाई के दौरान उन्हें अपनी ही सृष्टि जीव से हर तरह से निंदित किया गया, ठट्ठों में उड़ाया गया और सारी कठिनाइयों और कष्टों को सहन किया, फिर भी उन्होंने सुसमाचार का प्रचार किया। हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिए उन्होंने कोड़े खाए और उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया, और बरछे से उनका पंजर बेधा गया। अपने महान प्रेम और बलिदान से उन्होंने मानव जाति के लिए उद्धार का द्वार व्यापक रूप से खो दिया और स्वर्ग चले गए।

यीशु ने हमारे लिए नमूना दिखाकर कहा, “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो उसे क्रूस के उस मार्ग पर चलना चाहिए जिस पर मैं चला।” इसका अर्थ है कि केवल वह जो मसीह के दुख में भाग लेता है, मसीह के मार्ग पर चल सकता है।

2तीम 3:12 पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे।

बाइबल कहती है कि लोग जो परमेश्वर में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सताए जाएंगे। दुनिया की प्रणालियां लोगों को विश्वास के मार्ग पर आसानी से चलने नहीं देतीं। इसलिए, हम क्रूस जैसी बहुत सी कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं जो हमें विश्वास का जीवन जीने से रोकती हैं।

जब कभी आप कठिनाई का सामना करते हैं, तो अपने क्रूस के बोझ से बचने की कोशिश करने के बदले, उससे परमेश्वर की इच्छा का एहसास करना चाहिए। उस कठिनाई के अंत में आप स्वर्ग का राज्य देखेंगे। इसे कभी मत भूलिए। जब हम सड़क पर चलते हुए सुरंग में प्रवेश करते हैं, तो पहले बहुत अंधेरा होता है लेकिन बाद में उस सुरंग के अंत में प्रकाश होता है। स्वर्ग के सभी लोगों को जो उद्धार पाना चाहते हैं, अपने क्रूस का बोझ उठाते हुए मसीह के जीवन का अनुसरण करना चाहिए, ताकि वे सब अनन्त स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें।

परमेश्वर के हमें अपना क्रूस उठाने देने का कारण


परमेश्वर की सृष्टि की हर चीज का कारण होता है। कुछ लोग कहते हैं कि यदि मौसम हमेशा साफ और धूपदार हो तो कितना अच्छा होगा। लेकिन, वास्तव में मरुस्थल जहां मौसम पूरे वर्ष धूपदार होता है बहुत निर्जन है। मरुस्थल में न तो बरसात होती है और न ही बर्फ गिरती है जिसके कारण पानी की किल्लत होती है, और इसलिए वहां न तो पौधे बढ़ सकते हैं और न ही शाकाहारी जानवर जीवित रह सकते हैं। यह मरुस्थल को निर्जन स्थान बना देता है। पौधे तभी अच्छी तरह बढ़ सकते हैं जब समय-समय पर बरसात होती या फिर बर्फ गिरती है और हवा चलती है। बिजली भी जो बहुत से लोगों को डराती है, पौधों के लिए नाइट्रोजन प्राप्त करने में बहुत जरूरी है जो उनके विकास के लिए अत्यावश्यक पोषक तत्वों में से एक है।

जीवन भी मौसम से कुछ अलग नहीं है। हमेशा अच्छे दिन नहीं होते; कभी-कभी धुंधले दिन होते हैं, कभी-कभी हवादार दिन होते हैं और कभी-कभी गरजनदार दिन होते हैं। सृष्टि में परमेश्वर के प्रबंध के जरिए हम यह समझ सकते हैं कि हमें भी सत्य में आत्मिक अच्छे गेहूं के रूप में विकसित होने के लिए उसी प्रकार की प्रक्रिया से गुजरना चाहिए।

कभी-कभी हम अपने क्रूस को भारी और दर्द भरा बोझ समझते हैं। फिर भी हमारा क्रूस दर्द भरा बोझ नहीं, लेकिन हमारे उद्धार के लिए आवश्यक चीज है। प्रेरित पौलुस के शरीर में एक कांटा चुभाया गया था यानी वह एक बीमारी से पीड़ित था। उसने बार बार परमेश्वर से विनती की कि उससे यह दूर हो जाए, लेकिन परमेश्वर ने उससे कहा कि उनका अनुग्रह उसके लिए बहुत है।

2कुर 12:7-10 इसलिये कि मैं प्रकाशनों की बहुतायत से फूल न जाऊं, मेरे शरीर में एक कांटा चुभाया गया, अर्थात् शैतान का एक दूत कि मुझे घूंसे मारे ताकि मैं फूल न जाऊं। इसके विषय में मैं ने प्रभु से तीन बार विनती की कि मुझ से यह दूर हो जाए। पर उसने मुझ से कहा, “मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।” इसलिये मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूंगा कि मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया करती रहे। इस कारण मैं मसीह के लिये निर्बलताओं में, और निन्दाओं में, और दरिद्रता में, और उपद्रवों में, और संकटों में प्रसन्न हूं; क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूं, तभी बलवन्त होता हूं।

पौलुस को एहसास हुआ कि परमेश्वर ने उससे इतना प्रेम किया कि उन्होंने उसे शारीरिक बीमारी दी। उस शारीरिक असुविधा ने उसके लिए एक ब्रेक सिस्टम के रूप काम किया जो उसे अंहकारी होने और गलत मार्ग पर जाने से रोकता है।

जैसे मसीह का मार्ग क्रूस का मार्ग था, वैसे ही ईसाइयों का मार्ग भी क्रूस का मार्ग है। प्रथम चर्च के संतों पर भी जिन्होंने यीशु मसीह पर सच्चे परमेश्वर के रूप में विश्वास करके उनका अनुसरण किया था, उन धार्मिक नेताओं ने अत्याचार किया जिन्होंने यीशु को विधर्मी मानकर उन्हें उत्पीड़ित किया था। न्यायालय में पौलुस पर नासरियों के कुंपथ के मुखिया होने का आरोप लगाया गया था। हालांकि ठीक गंधरस की तरह जो काट जाने पर और अधिक खुशबू बिखरता है, सुसमाचार भी दिन प्रति दिन व्यापक रूप से फैलता गया। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे अनेक मुश्किलें और उत्पीड़न सुसमाचार में बाधाएं डाल रहे हों, लेकिन जितना अधिक सुसमाचार में बाधाएं डाली गईं उतनी ही अधिक शक्तिशाली पवित्र आत्मा ने कार्य किया। और सामरिया और पृथ्वी की छोर तक अर्थात् एशिया को पार करके यूरोप के सारे हिस्सों में आश्चर्यजनक रूप से परमेश्वर के वचन का प्रचार किया गया।

यह क्रूस में समाई हुई परमेश्वर की इच्छा है। शब्द क्रूस सुनने पर हम केवल दुख के बारे में सोचते हैं। लेकिन, इसके पीछे जीत, महिमा और उद्धार हैं।

राज-पदधारी याजक जो स्वर्गीय मुकुट का भार उठाएंगे


परमेश्वर ऊबड़-खाबड़ मार्ग को चौरस कर सकते हैं, और कठिन चीजों को आसान बना सकते हैं। उन्होंने प्रथम चर्च के उत्पीड़न के समय में भी सुसमाचार का प्रचार किया जाने दिया। आज भी, परमेश्वर अपने लोगों को उनका क्रूस उठाकर मसीह का अनुसरण करने देते हैं, इसमें परमेश्वर की इच्छा शामिल है। यह इसलिए क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो स्वर्ग में राज-पदधारी याजक बनेंगे(1पत 2:9)।

प्रक 22:1-5 फिर उसने मुझे बिल्लौर की सी झलकती हुई, जीवन के जल की नदी दिखाई, जो परमेश्वर और मेम्ने के सिंहासन से निकलकर उस नगर की सड़क के बीचों बीच बहती थी। नदी के इस पार और उस पार जीवन का वृक्ष था; उसमें बारह प्रकार के फल लगते थे, और वह हर महीने फलता था; और उस वृक्ष के पत्तों से जाति-जाति के लोग चंगे होते थे। फिर स्राप न होगा, और परमेश्वर और मेम्ने का सिंहासन उस नगर में होगा और उसके दास उसकी सेवा करेंगे। वे उसका मुंह देखेंगे, और उसका नाम उनके माथों पर लिखा हुआ होगा। फिर रात न होगी, और उन्हें दीपक और सूर्य के उजियाले की अवश्यकता न होगी, क्योंकि प्रभु परमेश्वर उन्हें उजियाला देगा, और वे युगानुयुग राज्य करेंगे।

हम परमेश्वर से जो ब्रह्मांड के शासक और राजाओं के राजा हैं स्वर्ग के राज्य को विरासत में पाएंगे और राजाओं के रूप में युगानुयुग राज्य करेंगे। राजा बनने वालों के लिए परिस्थिति के अनुसार शिक्षा और अनुभव की जरूरत है। अगर हम साधारण लोग होते जिन्हें स्वर्ग में किसी के कहीं भी जाने पर उसके पीछे पीछे चलना चाहिए, तो हमें अब कष्ट और पीड़ा से गुजरने की आवश्यकता न होती।

चूंकि बाइबल कहती है कि हम स्वर्ग में युगानुयुग राज्य करेंगे, इसलिए हमारे पास सिर पर पहनने के लिए मुकुट है, है न? हमारे लिए परमेश्वर के तैयार किए हुए धार्मिकता का मुकुट और जीवन का मुकुट हैं(2तीम 4:8; याक 1:12)। केवल वही राजा बन सकता है जो उस मुकुट के भार को उठा सकता है।

रो 8:16-17 आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं; और यदि सन्तान हैं तो वारिस भी, वरन् परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, कि जब हम उसके साथ दु:ख उठाएं तो उसके साथ महिमा भी पाएं।

जो मुकुट परमेश्वर के वारिस पाएंगे वह भारी-भरकम है। प्रथम चर्च के समय से आज तक सुसमाचार का कार्य बिना परेशानी के नहीं चल रहा है। इस युग में अनेक मुश्किलों में भी स्वर्गीय पिता ने हमारे चर्च का नेतृत्व किया, और स्वर्गीय माता खुद को बलिदान करने और मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं ताकि दुनिया भर में सारे लोगों को सत्य का प्रचार किया जा सके। उन्होंने हमें वह बनाया है जो आज हम हैं।

स्वर्ग के वारिस अर्थात् मसीह के संगी वारिस के रूप में हमें उनके साथ दु:ख उठाना चाहिए, ताकि हम उनके साथ महिमा भी पाएं। कभी-कभी, हमें दर्द, शोक और दु:ख होता है, लेकिन ऐसे कठिन समय में परमेश्वर हमें खुशी और आशा भी देते हैं। हमें इस तथ्य से भी सांत्वना मिलती है कि हम अनन्त स्वर्ग के राज्य को विरासत में पाएंगे। जब कभी हम कठिनाई से गुजरते हैं, आइए हम यह विश्वास करें कि परमेश्वर हमें निर्मल कर रहे हैं, और स्वर्ग के वारिस के रूप में और अधिक मेहनत से सुसमाचार प्रचार करें।

बाइबल केवल नई वाचा के सत्य में होने वाले लोगों को परमेश्वर के वारिस के रूप मान्यता देती है जो अनन्त स्वर्ग के राज्य में युगानुयुग राज्य करेंगे।

इब्र 9:15 इसी कारण वह नई वाचा का मध्यस्थ है, ताकि उसकी मृत्यु के द्वारा जो पहली वाचा के समय के अपराधों से छुटकारा पाने के लिये हुई है, बुलाए हुए लोग प्रतिज्ञा के अनुसार अनन्त मीरास को प्राप्त करें।

यहां ‘वह’ यीशु को दर्शाता है। नई वाचा के मध्यस्थ, यीशु ने कहा कि वह नई वाचा के द्वारा हमें प्रतिज्ञा के अनुसार अनन्त मीरास अर्थात् अनन्त स्वर्ग का राज्य देंगे। जो नई वाचा में बने नहीं रहता वह परमेश्वर की प्रतिज्ञा की हुई स्वर्ग की विरासत नहीं पा सकता।

आज हम नई वाचा का पालन करते हैं। परमेश्वर के वारिस के रूप में, हमें अपने क्रूस का भार उठाना चाहिए, ताकि हम वह महिमा पा सकें जिसकी तैयारी परमेश्वर ने हमारे लिए की है। हर कोई इस मार्ग पर नहीं चल सकता क्योंकि यह सकेत मार्ग है और थोड़े ही हैं जो इसे पाते हैं(मत 7:14)। इस मार्ग पर केवल वे ही चल सकते हैं जो परमेश्वर की इच्छा के प्रति आज्ञाकारी होने वाला विश्वास रखते हैं। हमें स्वर्गीय पिता और माता के साथ नई वाचा के सत्य के मार्ग पर अंत तक चलना चाहिए।

प्रचार करने का मिशन जिसे हमें राज-पदधारी याजकों के रूप में पूरा करना चाहिए


राजा को संकीर्ण दृष्टिकोण त्यागना चाहिए। उसे केवल अपने परिवेश को देखने के बदले पूरे राज्य पर नजर रखना चाहिए, ताकि वह यह विचार कर सकें कि उसे अपने लोगों को सुखी रखने के लिए क्या करना चाहिए। परमेश्वर पल भर में ही विश्व सुसमाचार पूरा कर सकते हैं। लेकिन, उन्होंने हमें यह महान मिशन सौंपा है जिनमें क्षमता और बुद्धि की कमी है। इसका निश्चित कारण है।

मत 28:18-20 यीशु ने उनके पास आकर कहा, “स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिये तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ; और उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ : और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूं।”

लोगों को वे सारी बातें सिखाना आसान नहीं है जो यीशु ने हमें आज्ञा दी है। लेकिन, इससे हमें परमेश्वर के द्वारा तैयार की गई आशीषें मिलती हैं।

परमेश्वर चाहते हैं कि हम स्वर्ग में युगानुयुग राज्य करने से पहले बहुत सी चीजों का अनुभव करें। प्रचार के जरिए हम ऐसे लोगों से मिलकर जिनके पास अलग-अलग भाषाएं, प्रथाएं और संस्कृतियां हैं, उन्हें समझ सकते हैं। दुनिया में परमेश्वर की आज्ञाएं न माननेवाले लोग हैं क्योंकि वे उन्हें नहीं जानते, और ऐसे लोग भी हैं जो जानने पर भी उन्हें नहीं मानते। कोमल और उदार स्वभाव के लोग और कठोर स्वभाव के लोग होते हैं, और ऐसे लोग हैं जिनके विचार हमारे विचारों से मेल खाते हैं और ऐसे लोग भी हैं जिनके विचार हमारे विचारों से मेल नहीं खाते। लेकिन, परमेश्वर ने हमें जाकर सभी लोगों को वचन का प्रचार करने की आज्ञा दी है।

चूंकि हम अलग-अलग स्वभाव के लोगों को परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हैं, इसलिए हम बहुत सी चीजें सीख सकते हैं। पश्चाताप और उद्धार की ओर सारे लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए एक बात जो हमें मन में रखनी है, वह यह है कि हममें परमेश्वर का वह प्रेम होना चाहिए जो उन्होंने हमें दिखाया है। यदि हम अपने व्यक्तित्व और विचारों से प्रचार करें, तो कई समस्याएं उठ खड़ी होती हैं। लेकिन, यदि हम मसीह के प्रेम से परमेश्वर के वचन का प्रचार करें, तो हम पूरी दुनिया को एकजुट करने और अच्छे परिणाम हासिल करने में मदद कर सकते हैं।

अब 175 देशों में सिय्योन के सदस्य परमेश्वर के प्रेम से एक दूसरे के लिए अपना त्याग करके और एक दूसरे का ख्याल रखकर एकजुट हो रहे हैं, और सुसमाचार प्रचार करने का हर प्रयास कर रहे हैं। इसलिए प्रतिदिन मुझे यह खुशखबरी मिलती है कि अनेक आत्माएं परमेश्वर की बांहों में वापस आ रही हैं। एक आत्मा को नए जीवन के साथ जन्म लेने में और स्वर्गीय व्यक्ति के रूप में बदलने में सहायता करने के लिए सिय्योन के भाइयों और बहनों के अधिक बलिदान की जरूरत है। इसी कारण प्रेरित पौलुस ने प्रचार करने के परिश्रम की तुलना जच्चा की पीड़ा से की।

मुकुट के बिना कोई राजा नहीं है। जो मुकुट पहनना चाहता है उसे उस मुकुट का भार उठाना चाहिए। उन स्वर्गीय लोगों को जो स्वर्ग जाना चाहते हैं अपने क्रूस का भार उठाना चाहिए। हम ऐसे लोग हैं जो स्वर्ग में युगानुयुग राज्य करेंगे। हमें मसीह के प्रेम से एक दूसरे की परिस्थिति के प्रति विचारशील होकर किसी से भी मिलने पर एकजुट रहना चाहिए। स्वर्ग प्रेम से भरी हुई जगह है, है न? हम प्रचार करके अनुभव बटोरते हैं, ताकि हम सुंदर रूप में बदल सकें। यह ऐसी प्रक्रिया है जिसका हमें स्वर्ग जाने के लिए अनुभव करना चाहिए और यह ऐसा कुछ है जिससे हमें अपने मुकुट का भार उठाने में मदद मिलती है।

परमेश्वर उन संतानों को जो स्वर्ग की आशा से अपने क्रूस का भार उठाती हैं, अनन्त जीवन की आशीष और धार्मिकता का मुकुट देते हैं। मुझे आशा है कि आप और अधिक मेहनत से प्रचार, प्रार्थना और परमेश्वर का वचन अध्ययन करें ताकि आप स्वर्गीय पिता और माता के इच्छानुसार जी सकें। उस मुकुट का भार उठाइए जो आप पहनेंगे, और स्वर्ग में प्रवेश करके एलोहीम परमेश्वर को अनन्त महिमा और प्रशंसा दीजिए।