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माता परमेश्वर का प्रेम

पिछले समय को देखते हुए, हम महसूस कर सकते हैं कि जैसे हम ने शारीरिक माता से प्रचुर प्रेम पाया है, वैसे ही हम ने आत्मिक माता से अगम्य प्रेम पाया है। चाहे हमारी शक्ति कमी हो और हमारे पास कुछ भी नहीं हो, तो भी स्वर्गीय माता हमें चुन कर अनन्त स्वर्ग के राज्य में हमारी अगुवाई करती है। हम इस अनुग्रह के लिए सच्चे दिल से धन्यवाद देते हैं।

प्रेम के साथ अनुकूल स्थिति व जरूरी चीजों को देते हुए, माता हमेशा हमारे साथ रहती है। अब इस क्षण भी, माता हम पर, जिन्हें बहुत चीजों में कमी होती है, विश्वास करते हुए और हमें सांत्वना देते हुए, अनन्त स्वर्ग तक हमें ले जा रही है। इस समय, आइए हम फिर से माता के प्रेम को बाइबल के द्वारा समझें।

परमेश्वर प्रेम है


आज तक, परमेश्वर ने हमें असीमित प्रेम बिना शर्त के देते हुए मार्ग दिखाया और हमारी रक्षा की। बहुत बच्चों के साथ, पिता और माता को एक भी शांतिपूर्ण दिन नहीं मिलता। पर स्वर्गीय पिता और माता के अनुग्रह के कारण, सिय्योन की बहुतेरी सन्तान शांति पा सकी, और स्वर्ग की आशा व उद्धार के सुख में जी सकी। इसलिए बाइबल कहती है कि परमेश्वर प्रेम है।

1यूह 4:7-9, 16-19 “प्रियो, हम आपस में प्रेम करें, क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है। प्रत्येक जो प्रेम करता है, परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है और परमेश्वर को जानता है। वह जो प्रेम नहीं करता परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। परमेश्वर का प्रेम हम में इसी से प्रकट हुआ कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेज दिया कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं। ... जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है, और परमेश्वर उसमें। इसी से प्रेम हम में सिद्ध होता है कि न्याय के दिन हमें साहस हो; क्योंकि जैसा वह है, वैसे ही हम भी संसार में हैं। प्रेम में भय नहीं होता; परन्तु सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है ... हम इसलिए प्रेम करते हैं, क्योंकि उसने पहिले हम से प्रेम किया।”

हम ने पहिले परमेश्वर से प्रेम नहीं किया, परन्तु परमेश्वर ने पहिले हम से प्रेम किया। परमेश्वर ने हम से इतना प्रेम किया कि वह सन्तान की आत्माओं को, जो पाप के कारण विनाश होने वाली थीं, बचाने के लिए स्वयं शरीर का वस्त्र पहन कर संसार में आया, जिससे हमें परमेश्वर का प्रेम पता चलता है।

यूह 3:16-17 “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, कि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। क्योंकि परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत को दोषी ठहराए, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाएं।”

यीशु मसीह पुत्र की दशा में आया, लेकिन वास्तव में, वह हमारा परमेश्वर था। बच्चे शरीर में सहभागी हैं, इसलिए वह भी उसी प्रकार शरीर में सहभागी हो गया, और उसने अपना बलिदान करके, हमें पाप और मृत्यु से छुड़ा लिया।(इब्र 2:14-15 संदर्भ)

परमेश्वर के इस धरती पर आकर क्रूस पर कुर्बानी देने का मक़सद यह था कि पापियों को, जिन्हें सदा तक मरना पड़ा, बचा कर अपने राज्य में सदा–सर्वदा अनन्त जीवन और आशीष दे। जब हम परमेश्वर के प्रेम को याद करते हैं, तब परमेश्वर की इच्छा, ‘प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद दे’ महसूस कर सकते हैं और स्वर्गीय पिता और माता को सहृदय धन्यवाद दे सकते हैं।

शारीरिक पिता और आत्मिक पिता, शारीरिक माता और आत्मिक माता


परमेश्वर के प्रेम की तुलना मनुष्य के प्रेम से नहीं की जा सकती। संसार में अनमोल अस्तित्व हैं जो हमें परमेश्वर का प्रेम सिखाते हैं, वे शारीरिक पिता और माता हैं।

पृथ्वी पर की प्रणाली उसका प्रतिरूप और छाया है जो स्वर्ग में है।(इब्र 8:5) बच्चों के प्रति माता–पिता का प्रेम, वास्तव में, हमारे प्रति पिता परमेश्वर और माता परमेश्वर के प्रेम को दिखलाता है। इस अर्थ में, माता-पिता उत्तम शिक्षक हैं जो हमें परमेश्वर का प्रेम सिखाते हैं।

आत्मिक माता-पिता शारीरिक माता-पिता की तरह हमेशा बच्चों को प्रेम देते हैं। बच्चा पिता और माता के कितना भी पराया हो, पर माता-पिता के अनुग्रह को नहीं लौटा सकेगा। लेकिन बहुत आसानी से बच्चे माता-पिता के अनुग्रह को भूल जाते हैं। आत्मिक स्थिति भी वैसी ही है।

जब लोग प्रेम के विषय पर चर्चा करते हैं, पिता का प्रेम भी भले ही बहुत बड़ा हो, पर वे पिता से पहले, माता के प्रेम को व्यक्त करते हैं। परमेश्वर ने संसार में सभी माताओं को ऐसा मन दिया कि वह बच्चों को असीमित व बेहद प्रेम देना चाहे, जिसके द्वारा परमेश्वर हमें ऐसी अदृश्य शिक्षा देता है कि स्वर्गीय माता का मन भी वैसा ही है। इसलिए हमें स्वर्गीय माता का प्रेम समझना चाहिए और प्रेम के अभिलाषा बनना चाहिए।

गल 4:26-31 “परन्तु ऊपर की यरूशलेम स्वतन्त्र है, और वह हमारी माता है। क्योंकि लिखा है, “हे बांझ, तू जो नहीं जनती, प्रभु में आनन्द मना। तू जो प्रसव पीड़ा नहीं जानती, हर्षनाद कर, क्योंकि त्यागी हुई की सन्तान, सुहागिन की सन्तान से अधिक हैं।” और हे भाइयो, तुम इसहाक के समान प्रतिज्ञा की सन्तान हो। ... इसलिए हे भाइयो, हम दासी की नहीं परन्तु स्वतन्त्र स्त्री की सन्तान हैं।”

बाइबल ने कहा है, “ऊपर की यरूशलेम स्वतन्त्र है, और वह हमारी माता है”, यहां पर माता शारीरिक माता नहीं, पर आत्मिक माता है। जैसे हमारा शारीरिक पिता और आत्मिक पिता है(इब्र 12:9), वैसे ही हमारी शारीरिक माता और आत्मिक माता है। आदि से स्वर्गीय माता अपनी सन्तान की रक्षा के लिए चिंता करती आई है। हम स्वर्ग में पाप करके शरण नगर, पृथ्वी पर गिरा दिए गए हैं, इसलिए माता भी इस पृथ्वी पर आकर हमारे साथ रहती है।

हमें माता को, जिसने हमें नया जीवन दिया और हमें परमेश्वर के मांस और लहू में सहभागी होकर स्वर्गीय परिवार के सदस्य बनने दिया, अधिक धन्यवाद देना चाहिए। बाइबल बताती है कि परमेश्वर प्रेम है। यहां, प्रेम उस प्रेम को संकेत करता है जो माता परमेश्वर के पास है।

सांसारिक माता एक छाया है, जिसके द्वारा हम उस बलिदान का मार्ग, जिस पर माता परमेश्वर सन्तान के उद्धार के लिए चली, समझ सकते हैं। जब हम छाया को देखते हैं, तब असलियत को भी समझ सकते हैं, वैसे ही शारीरिक माता के द्वारा हम स्वर्गीय माता को समझ सकते हैं।

संसार में मुझ से सच्चे दिल से प्रेम करने वाली


पिछली बार, मलिकिसिदक साहित्यिक पुरस्कार समारोह किया गया था। समारोह के बीच में मैंने एक लेख पढ़ा जो दिल को छूता है और दिलो-दिमाग में बसा है।

एक माता बालवाड़ी माता-पिता के बैठक में शामिल हुई थी। उसने बालवाड़ी शिक्षक से यह सुना, “आपका बेटा हद से ज़्यादा चंचल व शरारती है। एक काम में कुर्सी पर तीन मिनट तक भी नहीं बैठ सकता। मनोचिकित्सक से मिलना बेहतर होगा।” लेकिन माता ने बेटे से ऐसा कहा, “शिक्षक ने तुम्हारी तारीफ की, क्योंकि तुम पहले धैर्य से एक मिनट तक भी नहीं बैठ पाए थे, लेकिन आज तीन मिनट तक बैठ सकते हो।”

प्राथमिक स्कूल में प्रवेश करने के बाद भी, माता ने शिक्षक से यह सुना, “वह पढ़ाई में पीछे रह जाता है, और इस बार परीक्षा में बहुत कम अंक पाया है। शायद उसकी बुद्धि में कमी होगी, अस्पताल में उसकी बुद्धि की जांच करवाना बेहतर रहेगा।” यह सुन कर, माता की आंखें भर आई, और आंसू बहाने लगी। लेकिन घर वापस जाकर, माता ने बेटे को कहा, “शिक्षक विश्वास करता है कि तुम मोटी समझ का बच्चा नहीं हो।” और यदि तुम और कोशिश करोगे, तो अपने मित्रों से और अच्छी तरह से पढ़ाई कर सकोगे।”

उसके बाद, बेटा आश्चर्य रूप से परिवर्तित हुआ। उसने माता से निरंतर तारीफ और प्रोत्साहन पाते हुए पढ़ने की बहुत कोशिश की। अत: शिक्षकों की उम्मीद से बाहर, ख्याति प्राप्त माध्यमिक स्कूल में प्रवेश किया। और वहां अच्छे अंकों में गे्रजुएट करने बाद, उसने प्रतिष्ठा विश्वविद्यालय की प्रवेश–परीक्षा में सफल होने की उपाधि पाई। उसने उस उपाधि को माता के हाथ में रख कर, आंसू बहाते हुए कहा,

“माता, मैं जानता हूं कि मैं होशियार और तेज नहीं हूं। लेकिन संसार में जिसने मुझ से सच्चे दिल से प्रेम किया है, वह सिर्फ आप है।”

बालवाड़ी शिक्षक ने तो बच्चे को, जो तीन मिनट तक भी नहीं बैठ सकता था, डांट कर बातें की थीं, लेकिन माता बच्चे को तारीफ देते और प्रोत्साहित करते हुए धैर्य बांधती थी, जिससे वह अच्छा बच्चा बन सका। यदि माता ने ऐसा डांटा होता, “आज, शिक्षक के सामने, तुम्हारे कारण मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया। तुम्हारी शरारती किससे मिलती है?” तो वह ख्याति प्राप्त स्कूल में न प्रवेश कर सका होता और न पढ़ने की रुचि हुई होती।

इस लेख के आख़िरी हिस्से में मैं समझ सका कि बच्चा पहले से जानता था कि माता उससे बहुत प्रेम करती है और उसे प्रोत्साहन व शांति देती आई है। बच्चा बालवाड़ी में भी और प्राथमिक स्कूल में होते समय भी, माता का मन जानता था जो बेटे की हित में सोचता है। जब बच्चे ने समझा कि वह माता से प्रेम और शांति पा रहा है, तब वह बड़ा समर्थन पा सका और असम्भव काम भी सम्भव कर सका।

माता दुर्बल बच्चों को शांति देती है


कहानी में माता का मन हमारी स्वर्गीय माता से बहुत मिलता है। परमेश्वर ने हमें इसलिए नहीं चुन लिया कि हम होशियार व प्रतिभाशाली थे या संसार में बड़े अधिकारी थे। कहानी में बच्चे की तरह, हम कमज़ोर और दुर्बल थे। लेकिन परमेश्वर ने हम पर दया की और अगम्य स्नेह और धैर्य से हमारे पाप और अपराधों को क्षमा किया।

परमेश्वर हमारा सब कुछ जानता है, और यह भी कि हम कमज़ोर हैं। उसने यह जानते हुए भी संदेशवाहकों के रूप में हमें चुन कर बुलाया जो परमेश्वर के उद्धार का संदेश पूरे विश्व में पहुंचाते हैं। संसार में तो बहुत हैं जो हम से और ज़्यादा बढ़िया, होशियार और बुद्धिमान हैं, लेकिन ऐसे लोगों का प्रयोग नहीं किया और कमज़ोर लोगों को मौका दिया।

आइए हम परमेश्वर के प्रेम पर विचार करें, जब हम बारह चेलों के हर पहलू को देखें, तो मछुवे पतरस, चुंगी लेने वाले मत्ती जैसे सभी चेलों पर अनेक कमियां थीं, फिर भी परमेश्वर ने ऐसे लोगों को चेले बनाकर सुसमाचार का प्रेरित होने दिया।

आज, पवित्र आत्मा के युग में भी, स्वर्गीय माता उत्तम संदेशवाहक के रूप में हमारा पालन-पोषण करके सामरिया और पृथ्वी के छोर तक हमें भेजती है। मैं इस पर विश्वास करता हूं कि माता इसलिए हमें नहीं भेजती कि हम दूसरों से हर पहलू में उत्तम हैं, पर इसलिए कि हम पिता और माता के बच्चे हैं। जैसे बालवाड़ी के शिक्षक ने उस बच्चे को छोड़ दिया था, लेकिन माता ने प्रेम व धैर्य से बेटे की अगुवाई की, वैसे ही हम पापी थे, लेकिन स्वर्गीय माता अंतहीन प्रेम व धैर्य से परमेश्वर की संतान के रूप में हमारा पालन-पोषण कर रही है, और हमारे पाप पछताने तक प्रेम से देखभाल कर रही है और हमारी बदसूरत छवि को सुन्दर छवि में परिवर्तित कर रही है, जिससे कि हम अनन्त स्वर्ग में जा सकें।

कथित कहानी में माता उत्तम आदमी होने तक बेटे का पालन-पोषण करती थी और आखिर में उसे परिवर्तित कर लिया था। यह उस बेटे की क्षमता के द्वारा नहीं, पर माता के बेहद धैर्य व प्रोत्साहन के द्वारा था जो सामाजिक आदमी की योग्यता प्राप्त करने के लिए उसे समर्थन देता था। माता परमेश्वर का प्रेम भी इस प्रकार है। चाहे हम दुर्बल बच्चे हो, तो भी वह हम से प्रेम करती है, और हमेशा प्रोत्साहन और तारीफ देती है, जिससे आज तक विदेशों से सिय्योन के अनेक सदस्य आ सके, और हमारी आत्मिक सामर्थ्य बढ़ सकी।

संतान जो माता के प्रेम का अनुकरण करते हुए उसे कार्य में लाती है


माता के ऐसे धैर्य और प्रेम के द्वारा आज हम ऐसे बने हैं। तो आइए हम फिर से सोचें कि हम माता को कितनी महिमा और कितना धन्यवाद दे रहे हैं, और हम प्रेम को, जिसे माता से लिया, आसपास के लोगों के साथ कितना बांट रहे हैं।

निवेदन है कि पत्नी दुबारा सोचे कि पिछले दिनों में, मैंने माता के मन से पती और बच्चों की देखभाल की है या नहीं, और पती दुबारा सोचे कि जैसे माता ने प्रेम किया, वैसे मैंने पत्नी और परिवार की देखरेख की है या नहीं। आइए हम महसूस करें कि हम ने पिता और माता परमेश्वर से कितना ज़्यादा प्रेम और आशीष पाई है, और हम ने परिवार के सदस्यों से कितना ज़्यादा प्रेम और समर्थन पाया है।

निवेदन है कि पत्नी सोचे कि पती परिवार के लिए नौकरी पर कितना प्रयास कर रहा है, और पती सोचे कि पत्नी परिवार के लिए अदृश्य रूप से कितना मेहनत कर रही है, और सिय्योन में भी आसपास के संतों की हर मेहनत को याद करते हुए एक दूसरे की देखभाल कीजिए। यह उस प्रेम को, जो पिता और माता ने हमें दिया, सीखने का क्रम है। परमेश्वर की आज्ञा में से, जिसका पालन हमें करना है, जो सबसे प्रमुख है और श्रेष्ठ है, वह प्रेम है।

रो 13:8-10 “पारस्परिक प्रेम के अतिरिक्त अन्य किसी विषय में किसी के ऋणी न बनो; क्योंकि जो पड़ोसी से प्रेम करता है, उसने व्यवस्था को पूर्ण किया है। इस कारण, “न तो व्यभिचार करना, न हत्या करना, न चोरी करना, न ही लालच करना,” और इनके अतिरिक्त यदि अन्य और कोई आज्ञा हो, तो सब का सारांश इस कथन में पाया जाता है, “अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।” प्रेम पड़ोसी की बुराई नहीं करता, इसलिए प्रेम करना व्यवस्था को पूर्ण करना है।”

परमेश्वर प्रेम है। वह हमें अपने लाभ के लिए नहीं, पर माँ-बाप की तरह प्रेम देता आया जो बच्चों के लाभ व कुशल की आशा करता है। अब तक यदि हम परमेश्वर का प्रेम सिर्फ पाते आए हों, तो अब से स्वर्गीय पिता और माता को प्रेम वापस देना चाहिए।

अवश्य ही, यह भी न भूलें कि शारीरिक माता-पिता के, जिन्होंने इस धरती पर हमें जन्म दिया और हमारा पालन-पोषण किया, अनुग्रह को लौटा दें। जो माता-पिता की देखरेख करते और उन पर आज्ञाकारी रहते हैं, उनकी वर्तमान स्थिति कैसी भी हो, वे भविष्य में किसी दिन सफल हो सकते हैं। क्योंकि वे स्वर्गीय पिता और माता का प्रेम भी अच्छी तरह से समझते हैं। संसार के लोगों में से कई माता-पिता के अनुग्रह को भूल जाते हैं। लेकिन हम ने परमेश्वर से यह आज्ञा ली है, “तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना।”(निर्ग 20:12, इफ 6:2) हमें माता-पिता को अक्सर फोन करके सादर प्रणाम कहना चाहिए और देखने जाना चाहिए, और आइए हम माता-पिता को धन्यवाद दें कि हमें जन्म देकर भली भांति पालन-पोषण किया है, और परमेश्वर से माता–पिता की आत्मिक आशीष और उद्धार मांगें।

नई वाचा की व्यवस्था सिर्फ सुनना नहीं, पर हमें उसे सुन कर कार्य में लाना है। हम ने माता परमेश्वर से प्रेम सीख लिया है। तो आइए हम उस प्रेम को अपने आसपास के लोगों से शुरू करके पूरे विश्व में सारे लोगों के दिल में लगाएं। आशा है कि आप यह ज्ञान, जिसे अपने श्रेष्ठ शिक्षक, परमेश्वर से सीखा है, सिर्फ चर्च में नहीं, पर परिवार में भी कार्य में लाते हुए और पड़ोसियों के साथ बांटते हुए परमेश्वर की सुन्दर सन्तान बनें। जब हम उस नमूने के अनुसार, जो माता परमेश्वर ने हमें दिखाया, अभ्यास करें, तब ही हम जीवित विश्वास रख सकेंगे।

और मैं आशा करता हूं कि सिय्योन के सभी परिवार प्रेम को हमेशा दूसरों के साथ बांटें। यदि आप इतना प्रचुर प्रेम लेते जो गांव में बूढ़े माँ-बाप के साथ, पती या पत्नी के साथ जो आप के साथ रहते हैं, और बच्चों या पड़ोसियों के साथ बांटते हैं, तब स्वर्गीय माता का प्रेम, न केवल हमारे चर्च में भर जाएगा, हमारे पड़ोस में, समाज और देश में, यहां तक कि पूरे विश्व में भी भर जाएगा। परमेश्वर प्रेम है। मैं उम्मीद करता हूं कि आप पे्रम के द्वारा सुसमाचार का कार्य पूरा करें और संसार में ज्योति व नमक बन कर परमेश्वर से प्रचुर आशीष पाएं।