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फसह के बलिदान का अर्थ

जैसा वचन है, ‘विश्वास तो आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय है।’, सिय्योन के परिवार ने, जो भविष्यवाणी पर सम्पूर्ण विश्वास करता और परमेश्वर के राज्य की अभिलाषा करता है, सारे संसार में यरूशलेम माता की महिमा दिखाई है, जिसके परिणाम-स्वरूप अनेक आत्माएं सिय्योन में वापस आ रही हैं।

यदि हम पिता और माता पर गर्व महसूस करते और उनकी महिमा प्रकट करते हैं, तब पिता और माता हमें बहुतायत में आशीषित नतीजा देंगे। इस बार हम फसह के बलिदान का अर्थ हमारे दिल को लगाते हुए, परमेश्वर के मांस और लहू के विषय में साथ विचार करने का समय लेंगे।

माँ जिसने अपने मांस और लहू से बच्चे को बचाया


यह घटना तब हुई जब रूस में बड़े भूकंप से पूरा गांव मिट्टी में गाड़ा गया था। भूकंप से उजड़े गांव में एक माँ और बच्चा छोड़ दिए गए थे, और उनकी जान कई दिनों तक मुश्किल से बची रही। इमारत के गिर जाने पर माँ घायल होकर बेहोश हुई थी। लेकिन अपने बच्चे के रोने की आवाज़ से वह मुश्किल से होश में आ सकी। जब उसने जाग कर देखा, चारों ओर सभी जगह मृतकों से भरी हुई थी और वे मलबों के नीचे दब गए थे। उसने अपने पास रो रहे बच्चे को अपना दूध पिलाना चाहा। लेकिन उसने कई दिन एक घूंट पानी भी नहीं पिया था और बहुत थकी-मांदी हुई थी। इसलिए कुछ दूध भी उससे नहीं आ सका। यदि वे ऐसे ही छोड़ दिए जाते, तो माँ की जान भी और बच्चे की जान भी चली जाती।

राहत दल के आने तक, माँ ने पूरी कोशिश से, बच्चे को बचाने का अटल निर्णय किया। आसपास से एक तीखा पत्थर लेकर माँ ने अपनी उंगली को काट दिया, और इससे बहता हुआ लहू अपने बच्चे को पिलाया।

थोड़े समय के बाद, राहत दल पहुंचा। जब उन्होंने माँ और बच्चे को, जो मलबों के अन्दर बन्द हो गए थे, बचाने के लिए हाथ बढ़ाया, माँ तो पहले से मर चुकी थी। लेकिन बच्चा जो उंगली से बहे लहू को पीकर जीवित था, बचाया गया।

बच्चे को बचाने के लिए, माँ ने अपना मांस चीरा, और उससे बहता हुआ लहू बच्चे को पिलाया। माँ ने बच्चे से इतना गहरा प्रेम किया कि उसने अपना बच्चा बचाने के लिए अपना मांस भी चीर कर लहू पिलाया।

इस असल कहानी के द्वारा, हम परमेश्वर का मन समझ सकते हैं। परमेश्वर ने हमें, जिन्हें मृत्यु की सजा मिली, अपना मांस खिलाया और अपना लहू पिलाया, जिसके द्वारा हम पापों की क्षमा पाकर अनन्त जीवन और उद्धार के मार्ग पर आ सके। जब हम फसह की रोटी खाते हैं, जो मसीह का मांस दर्शाता है, और फसह का दाखमधु पीते हैं, जो मसीह का लहू दर्शाता है, तब हमें अनन्त जीवन पाने से सिर्फ खुश नहीं रहना है। हमें स्वर्गीय पिता और माता के पवित्र प्रेम को, जिससे हम बचाए गए, नहीं भूलना चाहिए।

फसह और उस परमेश्वर का प्रेम जिसने सन्तानों के लिए मांस और लहू दिया


पिछले समय, यदि हम लोग उस मूर्ख बच्चे के समान थे, जो माँ की उंगली के छोर से बहे लहू यह न जानते हुए सिर्फ अपनी भूख को मिटाने के लिए पीता था कि ये माँ का बलिदान हैं, तो अब से हम फसह के पर्व में रखा गया परमेश्वर का बलिदान और प्रेम सोचेंगे।

यूह 6:53-57 “यीशु ने उनसे कहा, “मैं तुमसे सच सच कहता हूँ, जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का मांस न खाओ और उसका लहू न पियो, तुम में जीवन नहीं। जो मेरा मांस खाता और मेरा लहू पीता है, अनन्त जीवन उसका है, और मैं अन्तिम दिन में उसे जिला उठाऊँगा। मेरा मांस तो सच्चा भोजन है और मेरा लहू सच्ची पीने की वस्तु है। जो मेरा मांस खाता और मेरा लहू पीता है, वह मुझ में बना रहता है और मैं उसमें। जिस प्रकार जीवित पिता ने मुझे भेजा, और मैं पिता के कारण जीवित हूं, इसी प्रकार वह भी जो मुझे खाता है मेरे कारण जीवित रहेगा।”

परमेश्वर ने हम मानव जाति से पवित्र प्रतिज्ञा की कि यदि कोई यीशु का मांस न खाता और उसका लहू न पीता है, तो उसमें जीवन नहीं है, पर यदि कोई उन्हें खाता और पीता है, तो वह अनन्त जीवन पाएगा। हम स्वर्गीय पापियों को इस प्रतिज्ञा के द्वारा उद्धार देने के लिए, परमेश्वर ने बिना किसी संकोच के क्रूस पर मृत्यु का सामना किया, और किसी भी बलिदान को उठाने से भी इनकार नहीं किया। ऐसे बलिदान के ज़रिए हमने उद्धार और अनन्त जीवन पाया है।

जैसे माँ ने ख़तरनाक क्षण में अपनी उंगली से बहते लहू के द्वारा बच्चे को बचाया, वैसे ही स्वर्गीय पिता और माता ने भी हमें बचाने के लिए अपना मांस खिलाया और अपना लहू पिलाया। क्योंकि पापियों को, जिन्हें मरना नियुक्त किया गया, बचाने का तरीका इसको छोड़ कोई नहीं था। इसलिए परमेश्वर ने अपनी देह स्वेच्छा से सन्तानों के लिए अर्पित की।

मत 26:17-19, 26-28 “ ... ‘गुरु कहता है, “मेरा समय निकट है। मुझे अपने चेलों के साथ तेरे यहां फसह का पर्व मनाना है”’।” तब यीशु की आज्ञा के अनुसार चेलों ने फसह की तैयारी की ... जब वे भोजन कर रहे थे, यीशु ने रोटी ली और आशिष मांगकर तोड़ी और चेलों को देकर कहा, “लो, खाओ; यह मेरी देह है।” फिर उसने प्याला(दाखमधु रखा हुआ) लेकर धन्यवाद दिया और उन्हें देते हुए कहा, “तुम सब इसमें से पियो, क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है जो बहुत लोगों के निमित्त पापों की क्षमा के लिए बहाया जाने को है।”

फसह की रोटी और दाखमधु का अर्थ मसीह का मांस और लहू है। और परमेश्वर ने रोटी और दाखमधु में अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा रख कर उसे मानव जाति को दिया। अत: फसह के द्वारा जो हम खोज सकते हैं वह है, परमेश्वर का बलिदान और प्रेम।

परमेश्वर की वाचा मना कर अनन्त जीवन पाना हमारे लिए खुशी की बात तो है, पर जब हम सोचें कि यह अनन्त जीवन पिता और माता के बलिदान के मध्यम से दिया गया, तब हमें बहुत अफ़सोस होता है। लेकिन इस पर अपराध की भावना से ग्रसित होकर, सिर्फ खेद महसूस करना भी परमेश्वर की इच्छा नहीं होगी। जब जब हम रोटी को खाते और दाखमधु पीते हैं, तब तब सब से पहले हमारे हृदय में यह गहराई से लगाना चाहिए कि पिता और माता ने हमारे उद्धार के लिए कितना ज़्यादा स्वयं को बलिदान और प्रयास किया होगा। और हमेशा उनके अनुग्रह के लिए धन्यवाद देना चाहिए। जैसे पिता और माता ने हमारे उद्धार के लिए स्वयं को बलिदान किया, वैसे ही यदि हम भी पूरे संसार के उद्धार के लिए स्वेच्छापूर्वक स्वयं को अर्पित करेंगे, तब पिता और माता का पवित्र बलिदान अधिक मूल्यवान हो सकेगा।

“मेरे स्मरण के लिए यही किया करो।”


इस कारण से, सत्य जो स्वर्गीय परिवार को निश्चय ही मानना चाहिए, वह फसह का पर्व है। प्रेरित पौलुस ने इस पर ज़ोर दिया कि जब तक प्रभु न आ जाए तब तक हमें फसह न भूल कर मनाना है और इसका प्रचार करना है।

1कुर 11:23-26 “जो बात मैंने तुम्हें सौंपी है वह मुझे प्रभु से मिली थी, कि प्रभु यीशु ने जिस रात वह पकड़वाया गया, रोटी ली, और उसने धन्यवाद देकर रोटी तोड़ी और कहा, “यह मेरी देह है जो तुम्हारे लिए है: मेरे स्मरण के लिए यही किया करो।” इसी प्रकार भोजन के पश्चात् उसने यह कहते हुए कटोरा भी लिया, “यह मेरे लहू में नई वाचा का कटोरा है। जब जब तुम इसमें से पीओ तब तब मेरे स्मरण के लिए यही किया करो।” क्योंकि जब जब तुम इस रोटी को खाते और इस कटोरे में से पीते हो तो जब तक प्रभु न आ जाए उसकी मृत्यु का प्रचार करते हो।”

मसीह सन्तानों से आशा करता था कि जब जब वे फसह की रोटी खाएं और दाखमधु पीएं, तब तब पिता और माता के बलिदन का स्मरण करें। उसने सन्तानों से अपने आने के दिन तक अपनी मृत्यु का प्रचार करने का निवेदन किया और स्वर्ग चला गया। नई वाचा के फसह के अन्दर परमेश्वर का, जिसने छ: हज़ार वर्ष तक सन्तानों को बचाने और उद्धार देने का प्रयास किया, असीमित प्रेम और बलिदान छिपा हुआ है। इसलिए परमेश्वर ने फसह को नई वाचा कही।(लूक 22:20) बाइबल कहती है कि नई वाचा के द्वारा हम स्वर्ग के वारिस हो सकते हैं, यानी पिता और माता के पवित्र बलिदान और प्रेम महसूस करने वाले ही परमेश्वर के राज्य में उत्तराधिकार पाने की सन्तान होंगे।

नई वाचा की यह सुन्दर कहानी केवल आत्मिक स्वर्ग के परिवार की कहानी है। यह किसी और की कहानी नहीं है। इसलिए आत्मिक बेबीलोन में फसह का पर्व नहीं होता। फसह से जुड़ी यह कहानी बेबीलोन के लोगों की नहीं है। उनके लिए फसह बेकार और अर्थहीन दिन है, इसलिए उन्होंने फसह को मिटा दिया। फसह का पर्व पिता और माता के, जिन्होंने सन्तानों के जीवन के लिए स्वयं को बलिदान किया, प्रेम का स्मरण करने का दिन है और इसे सनातन वाचा के रूप में स्थापित किया गया। अगर उनके लिए फसह का पर्व जरूरी नहीं है, तो वे खुद प्रमाणित करते हैं कि वे स्वर्गीय परिवार के नहीं हैं।

लेकिन हमारे स्वर्गीय परिवार के लिए फसह अति बहुमूल्य दिन है। इसलिए सिय्योन के लोग फसह का पर्व पिता और माता का प्रेम व बलिदान सोचते हुए पवित्रता से मना रहे हैं।

जैसे परमेश्वर ने हम से प्रेम किया


परमेश्वर प्रेम है। परमेश्वर का हर कार्य, हर इच्छा और हर उद्देश्य, सब परमेश्वर के प्रेम से शुरू होता है। परमेश्वर जो हमें बचाना चाहता है, उसके प्रेम के कारण फसह का पर्व भी स्थापित किया गया।

इसलिए यीशु ने फसह के दिन यह कहा, “जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा है, वैसे ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो।” असल कहानी में जैसा माँ ने अपना लहू बहाकर अपने बच्चे को बचाया, वैसे ही परमेश्वर ने हमें बचाने के लिए अपना मांस और लहू दिया। हम भी ऐसे मन से प्रेम का अभ्यास करेंगे।

1यूह 4:7-11 “प्रियो, हम आपस में प्रेम करें, क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है। प्रत्येक जो प्रेम करता है, परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है और परमेश्वर को जानता है। वह जो प्रेम नहीं करता परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। परमेश्वर का प्रेम हम में इसी से प्रकट हुआ कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेज दिया कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं। ... प्रियो, यदि परमेश्वर ने हम से ऐसा प्रेम किया तो हमको भी एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए।”

1यूह 4:16-21 “जो प्रेम परमेश्वर हमसे रखता है, उसे हम जान गए हैं और हमने उस पर विश्वास किया है। परमेश्वर प्रेम है; जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है, और परमेश्वर उसमें। ... यदि कोई कहे, “मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूं,” और अपने भाई से घृणा करे तो वह झूठा है; क्योंकि जो अपने भाई से जिसे उसने देखा है, प्रेम नहीं करता तो वह परमेश्वर से जिसे उसने नहीं देखा, प्रेम नहीं कर सकता। हमें उस से यह आज्ञा मिली है कि जो परमेश्वर से प्रेम करता है, वह अपने भाई से भी प्रेम करे।”


प्रेम पिता परमेश्वर और माता परमेश्वर से है। सभी कार्य जो परमेश्वर करता है, उनकी शुरुआत प्रेम से है। परमेश्वर हम से बहुत प्रेम करता है, इस कारण, वह कभी हमारी ताड़ना भी करता है और कभी हमारे लिए आंसू भी बहाता है, और वह इस पर चिंता करते हुए बहुत बेचैन रहता है कि हम शैतान से भरमाए जाकर अनन्त स्वर्ग जाने का मौका खोएं। वह कभी कराहते हुए और कभी खुश रहते हुए हमारे भट्ठी में शुद्ध किए गए सोने या चांदी के समान शुद्ध होकर स्वर्ग जाने का इन्तजार करता आया।

उसने हमें आज्ञा दी कि हम परमेश्वर का मन लेकर एक दूसरे से प्रेम रखें। यदि हम एक दूसरे से प्रेम नहीं कर पाते, तो इससे यह प्रमाणित होता है कि हम फसह के पर्व को मात्र रोटी खाने और मात्र दाखमधु पीने का दिन समझते हैं। शायद परमेश्वर हमें ऐसा कहता होगा, “मैंने तुम्हारे लिए मांस और लहू दिया, तब फिर मेरे मांस और मेरे लहू से जीवन पाकर तुम क्यों भाई–बहनों के हित में अपने को बलिदान नहीं करते हो?”

अनन्त स्वर्ग की अभिलाषा करते हुए, हमें इस धरती से लेकर पिता और माता की शिक्षा का अच्छी तरह से पालन करना चाहिए। न आपस में शिकायत करना है और न कुड़कुड़ाना है, और न ईर्ष्या करना है, यदि कोई किसी काम में सफलता प्राप्त करता है, साथ खुशी बांटना है, और यदि किसी को मुश्किल समस्या है जिसका हल न निकला हो, उसे प्रोत्साहन व ढाढ़स देना है। जहां मेल-मिलाप नहीं चलता, वहां सुसमाचार का कार्य सफल नहीं होता। यदि हम पवित्र बलिदान और प्रेम के द्वारा, जिसे परमेश्वर ने हमें दिखाया, सुसमाचार प्रचार करें, तब परमेश्वर का महिमामय कार्य तेज़ी से पूरा होगा।

विश्वास जो पिता और माता को मानता और उन पर गर्व करता है


परमेश्वर जिसने हमें पवित्र बलिदान का नमूना दिखाया, उसे हम कैसे छिपा सकेंगे? हम बहुत बढ़िया पिता और माता का प्रचार करने में क्यों हिचकेंगे? आइए हम लोगों को बताएं कि हमारे पिता और माता के बलिदान के लहू में सहभागी होकर पापों की क्षमा और उद्धार पाएं। हमें उनका बलिदान और प्रेम संसार के सारे लोगों को सुनाना चाहिए।

हमें पिता और माता पर, जिसने प्रेम से हमें जीवन दिया, अधिक गर्वित होकर उनकी साक्षी देनी चाहिए। माता के प्रति बाइबल में लिखी साक्षी को मात्र देख कर, हम विश्वास नहीं करते। यदि संतान पापों की क्षमा पा सके, माता अपना मांस और लहू भी खिलाती है। हम इसे समझ कर माता के बलिदान और प्रेम के अभिलाषी बने हैं और कहीं भी जा सकते हैं जहां माता हमारी अगुवाई करती है। क्या यह सही है न?

यदि हम सन्तान हैं जो पिता और माता का बलिदन महसूस करती हैं, तो हमें पिता और माता का पवित्र नाम दूर तक फैलाना चाहिए। पिता उत्सुकता से इच्छा करता है कि हम यरूशलेम माता के बारे में संसार में सारे लोगों को सुनाएं ताकि वे पापों से पश्चात्ताप करके यरूशलेम माता की बांहों में वापस आएं।

1यूह 4:13-15 “ ... जो कोई यह मान लेता है कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र है तो परमेश्वर उसमें और वह परमेश्वर में बन रहता है।”

2 हज़ार वर्ष पहले, पुत्र के युग में, यीशु को मानना विश्वास का सब से महत्वपूर्ण मुद्दा था। इस तरह आज, सारे लोगों को स्वेच्छापूर्वक पवित्र आत्मा और दुल्हिन की साक्षी देने का विश्वास इस युग में भी आवश्यक है। हमारे पिता और माता ने हमें उद्धार देने के लिए अपनी जान का ख्याल ज़रा भी नहीं किया और अपना बलिदान किया। सन्तान, जिन्होंने उस प्रेम को महसूस किया, पिता और माता पर गर्वित होकर पूरे विश्व में उनका अनुग्रह सुना रही हैं।

यदि सन्तान माता-पिता से लज्जित होती हैं और उन्हें छिपाना चाहती हैं, तो चाहे माता-पिता उन्हें न डांटते या दोष न लगाते हो, फिर भी वे खेदित और दुखी होंगे। लेकिन यदि सन्तान कहें, ‘मैं मेरी माता–पिता को सब से बढ़िया मानता हूं।” और उन पर गर्व करती हैं, तब माता-पिता का मन कितना खुश रहेगा? यदि हम पृथ्वी पर माता-पिता का मान सोचते तब हम स्वाभाविक रूप से परमेश्वर माता-पिता का मन भी समझ सकते हैं।

स्वर्गीय पिता और माता पर गर्व करके, हमने साहसपूर्वक उनका प्रचार किया, जिससे परमेश्वर की महिमा की ज्योति पूरे विश्व में अनेक लोगों पर चमकी, और इस ज्योति से वे स्वर्गीय पिता और माता को ढूंढ़ कर भविष्यवाणी के अनुसार सिय्योन में आ रहे हैं। सुसमाचार के कार्य में जब हम आश्चर्यजनक घटनाएं, जो पहले घटित नहीं हुर्इं, लगातार घटते हुए देखते हैं, तब हमें एहसास होता है कि स्वर्गीय पिता हम से खुश होकर प्रचार का द्वार चारों ओर खोल रहा है।

परमेश्वर प्रेम है। उसने सन्तान को बचाने के लिए, फसह की नई वाचा स्थापित की। जब हम प्रतिवर्ष फसह मनाते समय, रोटी व दाखमधु लेते हैं, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह रोटी परमेश्वर का मांस है जो सन्तान को बचाने के लिए परमेश्वर ने चीरा, और यह दाखमधु परमेश्वर का लहू है जो सन्तान को बचाने के लिए परमेश्वर ने बहाया। हम फसह के साथ पिता और माता के बलिदान को फिर से मन में लगाएंगे और उस अनुग्रह के प्रति धन्यवाद देते हुए परमेश्वर का प्रेम अभ्यास में लाएंगे जिससे कि पिता और माता की महिमा प्रकट हो जाए।

कहीं ऐसा न हो कि स्वर्ग का दरवाज़ा बन्द होने के बाद हम परमेश्वर से पुकारें, ‘हे प्रभु! दरवाज़ा खोल दे।’ मैं आप से उत्सुकता से विनती करता हूं कि जब दरवाज़ा खुला है, इस समय से लेकर, नई वाचा का प्रचार पूरी कोशिश से करें और यरूशलेम माता के बारे में, जो नई वाचा की असलियत है, और उंच्चे स्वर से साहसपूर्वक सुनाएं, तो पिता और माता बहुत प्रसन्न होंगे और हमारे बाकी जीवनकाल में हर दिन महिमामय दिन हो जाएगा। आशा है कि सिय्योन के सब परिवार सुन्दर फल पैदा कर लें और स्वर्गीय पिता और माता से बड़ी आशीष पाएं।