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हमें परमेश्वर का प्रेम जानने दे

परमेश्वर हमें विविध आज्ञाएं देता है और हमें कहता है कि इसका पालन करें। यह न तो परमेश्वर अपने लिए है और न ही कट्टर तरीके से हमारी आज़ादी को बाधित करने के लिए है।

परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना, भाई और बहनों को प्रेम देना, प्रचार करना ... आदि, इन में कुछ भी नहीं है जो प्रेम के आधारित नहीं है। परमेश्वर के सभी वचन के पीछे परमेश्वर का अदृश्य प्रेम होता है।

परमेश्वर जो पापी सन्तानों को बचाने के लिए आया



परमेश्वर के प्रेम को थोड़ा सा समझने के लिए, सब से पहले हमें आत्मा के विषय में जानना चाहिए। यदि हम आत्मा के सिद्धांत को न समझ लें, तो हम यह नहीं जान सकते कि मानव क्यों इस धरती पर दुख और शोक उठाते हुए रहता है और सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जिसने वचन द्वारा संसार में सारी वस्तुओं को सृजा, क्यों बहुत लंबे समय 6 हज़ार वर्ष तक हमारे उद्धार के लिए बलिदान हो रहा है।

मनुष्य मिट्टी के शरीर और जीवन के श्वास, आत्मा से बनाया गया।(उत 2:7 संदर्भ) मिट्टी पृथ्वी के बनने के बाद सृजी गई, पर जीवन का श्वास पृथ्वी के बनने से पहले परमेश्वर के साथ था। दूसरे शब्दों में हमारी आत्मा, जो परमेश्वर के जीवन के श्वास से बन गई, परमेश्वर के साथ महिमामय स्वर्ग के राज्य में रहने वाली स्वर्गदूत थी।

नीत 8:22-27 “यहोवा ने मुझे अपने कार्य के आरम्भ में वरन् अपने प्राचीन काल के कार्यों से भी पहले उत्पन्न किया। मैं तो सनातन से अर्थात् आदि से वरन् पृथ्वी के आरम्भिक काल से ठहराई गई हूं। जब न तो गहरे सागर थे, न जल से भरे सोते थे, तब ही मैं उत्पन्न हुई। पर्वत और पहाड़ियों के स्थिर किए जाने से पूर्व, मैं उत्पन्न की गई, जब उसने पृथ्वी और मैदानों को नहीं बनाया था, न ही जगत की धूल के प्रथम कण बनाए गए थे। जब उसने आकाश को स्थिर किया, तब मैं वहां थी। जब उसने गहरे सागर के ऊपर आकाशमण्डल ताना,”

नीतिवचन के लेखक, सुलैमान ने साक्षी दी कि परमेश्वर के सृष्टि करने से पहले, वह पैदा हो चुका था और उसने परमेश्वर को सृष्टि करते देखा था। यदि वह पैदा हो चुका था जब पृथ्वी और मैदान और जगत की धूल के प्रथम कण न बनाए गए थे, तो यह स्पष्ट है कि उसने स्वर्गदूतों के जैसा आत्मिक रूप में पैदा होकर परमेश्वर की सृष्टि के कार्य को देख लिया था। अय्यूब भी वैसा ही था;

अय 38:1-7,21 “तब यहोवा ने अय्यूब को बवण्डर में से उत्तर दिया, ... जब मैंने पृथ्वी की नींव डाली तब तू कहां था? यदि तुझे इसका ज्ञान है तो उत्तर दे। किसने उसकी नाप ठहराई? क्या तू जानता है? किसने उस पर सूत खींचा? उसकी नींव किस पर रखी गई! उसके कोने का पत्थर किसने बिठाया, जबकि भोर के तारों ने साथ मिलकर गाया तथा परमेश्वर के सब पुत्रों ने जयजयकार किया था? ... तू तो अवश्य जानता होगा, क्योंकि तू उस समय उत्पन्न हो चुका था, तथा तेरी आयु बहुत अधिक है! ”

सन्तान अपने बचपन को याद नहीं करती, लेकिन माँ-बाप उस समय को याद करते हैं। इसी तरह हमरे पिता परमेश्वर ने अय्यूब को ऐसा सवाल पछूा था, “जब मैंने पृथ्वी की नींव डाली तब तू कहां था?” अय्यूब उस समय को भूल गया, पर परमेश्वर ने जाना और कहा, “तू उस समय उत्पन्न हो चुका था।” यदि अय्यूब उस समय उत्पन्न हो चुका जब परमेश्वर ने पृथ्वी की नींव डाली, तो वह पृथ्वी पर नहीं, बल्कि स्वर्ग में था।

सुलैमान और अय्यूब के जैसे, हम भी इस संसार में उत्पन्न होने से पहल स्वर्ग में परमेश्वर के लिए स्तुतिगाना गाते हुए महिमा में रहने वाले स्वर्गदूत थे। लेकिन एक दिन ‘उषाकाल के पुत्र’, यानी शैतान, के बहकावे में आकर हम ने पाप किया और इस धरती पर गिरा दिए गए। बाइबल इसके बारे में व्याख्या कर रही है।(यश 14:12-15, प्रक 12:7-9)

परमेश्वर हमें नरक के दुखों से छुड़ा कर स्वर्ग में लेकर जाता है



हम पापों के कारण इस धरती पर गिरा दिए गए। परमेश्वर को इस पर बहुत दुख हुआ। इसलिए वह स्वर्ग से हमें ढूंढ़ने के लिए सीधा इस धरती पर आया।(मत 9:13, लूक 19:10) वह पापियों को ढूंढ़ने के लिए पापियों के जैसे शारीरिक रूप में आया, और उसने फसह के बलिदान के लहू के द्वारा हमारे पापों से हमें छुड़ाया और अनन्त जीवन दिया। तथा उसने जीवन का सत्य, नई वाचा, स्थापित की और हमें इसे मनाने की आज्ञा दी। इस नई वाचा के द्वारा परमेश्वर हम पापियों को, जो स्वर्ग की याद भूल गए, यह याद दिलाता है कि परमेश्वर का राज्य, स्वर्ग हमारा देश है, और इस नई वाचा में परमेश्वर की इच्छा होती है कि हम स्वर्ग में वापस आएं।

हमारे लिए अनन्त दुनिया तैयार है, और वहां हम जाने वाले हैं। यदि हम परमेश्वर के वचन पर आज्ञाकारी रहें, तो अनन्त निज देश, स्वर्ग में जाएंगे। यदि नहीं तो, सदा तक दुख पाने का स्थान, नरक हमारा इन्तजार करेगा।

मर 9:43-49 “यदि तेरा हाथ तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे काटकर फेंक दे; तेरे लिए यह भला है कि तू अंगहीन होकर जीवन में प्रवेश करे इसकी अपेक्षा कि दो हाथ रहते हुए तू नरक में अर्थात् उस न बुझने वाली आग में डाला जाए। ... यदि तेरी आंख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकाल फेंक। उत्तम यह है कि तू काना होकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करे, अपेक्षा इसके कि तू दो आंखें रखते हुए नरक में डाला जाए, जहां उनका कीड़ा नहीं मरता और न आग ही बुझती है। क्योंकि प्रत्येक जन आग से नमकीन किया जाएगा।”

लूक 16:19-31 “एक धनी पुरुष था जो सदा बैंजनी वस्त्र व मलमल पहिना करता था और प्रतिदिन धूमधाम व बड़े सुख-विलास से रहता था। और लाजर नाम का एक कंगाल व्यक्ति घावों से भरा हुआ उसके फाटक पर छोड़ दिया जाता था, ... ऐसा हुआ कि कंगाल पुरुष मर गया और स्वर्गदूतों ने आकर उसे इब्राहीम की गोद में पहुंचा दिया। वह धनी पुरुष भी मरा और दफ़ना दिया गया। तब अधोलोक में अत्यन्त पीड़ा में पड़े हुए उसने अपनी आंखें उठाईं और दूर से इब्राहीम को देखा जिसकी गोद में लाजर था। तब उसने पुकारकर कहा, ‘हे पिता इब्राहीम, मुझ पर दया कर। लाजर को भेज कि वह अपनी उंगली का सिरा पानी में डुबोकर मेरी जीभ को ठण्डा करे, क्योंकि मैं इस ज्वाला में पड़ा तड़प रहा हूं। ...”


ऊपर का वचन नरक के दुखों के बारे में अच्छी तरह से व्याख्या करता है। नरक इतना दुख से भरा स्थान है कि धनी पुरुष ने ऐसा मांगा, “लाजर को भेज कि वह अपनी उंगली का सिरा पानी में डुबोकर मेरी जीभ को ठण्डा करे, क्योंकि मैं इस ज्वाला में पड़ा तड़प रहा हूं।” और दुख युगानुयुग जारी रहता है। इसलिए परमेश्वर ने हमें उत्सुकता से चेतावनी दी कि नरक की सजा से बच जाएं। और परमेश्वर नरक की सजा से अपनी सन्तानों को बचाने के लिए इस धरती पर आया, और उसने हमारे बजाय दुखों को, जो पापी को लेना था, झेलते हुए नई वाचा स्थापित की। नई वाचा परमेश्वर का अदृश्य प्रेम है, जिससे हम पापों की क्षमा पाते हैं और जिससे परमेश्वर हमारा मार्गदर्शन स्वर्ग में, जहां हम न मृत्यु, न दुख और न शोक पाते हैं, करता है।(प्रक 21:1-4 संदर्भ)

परमेश्वर का अन्तहीन प्रेम



आइए हम सोचें, परमेश्वर ने हमें सत्य में लाने के काम के लिए कितने लोगों का इस्तेमाल किया है? हमारे आसपास ज्य़ादा लोग होते हैं, वास्तव में वे हमारे लिए भेजे गए हैं। वे कभी हमारी परीक्षा करते हैं, कभी हमें अनुशासित करते हैं और कभी हमारे भले साथी या मार्गदर्शक हैं। वे सब अनन्त स्वर्ग के राज्य में हमारी अगुवाई करने के लिए परमेश्वर से भेजे गए लोग हैं। लेकिन हम इसे महसूस न करते हुए जी रहे हैं।

कृपया परमेश्वर के उपकारी हाथ का अनुभव कीजिएगा जो बहुत ज़्यादा लोगों का इस्तेमाल करते हुए स्वर्ग में हमारी अगुवाई करने के लिए कार्य करता है और जो आज भी हार्दिकता से हमें नई सृष्टि के रूप में बना रहा है। सच में परमेश्वरहम पर ध्यान देता है और हम से प्रेम करता है।

रो 5:3-11 “ ... आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है, उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में उंडेला गया है। जब हम निर्बल ही थे तब ठीक समय पर मसीह भक्तिहीनों के लिए मरा। दुर्लभ है कि किसी धर्मी मनुष्य के लिए कोई मरे; पर हो सकता है कि किसी भले मनुष्य के लिए कोई मरने का साहस भी कर ले। परन्तु परमेश्वर अपने प्रेम को हमारे प्रति इस प्रकार प्रदार्शित करता है कि जब हम पापी ही थे मसीह हमारे लिए मरा। ... ”

जब हम प्रिय नहीं, पर पापी थे जिन्हें मरना निश्चय था, तब भी परमेश्वर ने अपरिवर्तनीय प्रेम हमें दिया और हमारे लिए अपने आप को बलिदान किया। हमारा पाप क्षमा नहीं किया जा सकता था, फिर भी हमारे बजाय, उसने कोड़े खाए, वह बेधा गया और कुचला गया कि हमारा पाप क्षमा हो जाए, और उसने क्रूस पर लहू बहाने से अपने प्रेम को हमारे प्रति प्रदर्शित किया।

इस संसार में प्रेम क्षणिक और तात्कालिक है, और लोग सीमित अवस्था में एक दूसरे से प्यार करते हैं। चाहे पती और पत्नी ने दम्पति होने से पहले बहुत प्यार किया हो, समय गुजरते हुए प्रेम बदल जाता है और वे झगड़ने लगते हैं। भाईचारा भी और माँ-बाप का बच्चों के प्रति प्रेम भी समय गुजरते हुए और अवस्था अलग होते हुए, दूर हो जाता है। लेकिन परमेश्वर का प्रेम हर समय पर और हर अवस्था पर बना रहता है।

मत 28:18-20 “तब यीशु ने उनके पास आकर कहा, “स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिए जाओ और सब जातियों के लोगों को चेले बनाओ तथा उन्हें पिता, पुत्र, पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और जो जो आज्ञाएं मैंने तुम्हें दी हैं उनका पालन करना सिखाओ। और देखो, मैं युग के अन्त तक सदैव तुम्हारे साथ हूँ।”

केवल परमेश्वर ही संसार के अन्त तक हमारे साथ रहता है। किसी भी स्थिति में या किसी भी अवस्था में परमेश्वर हमें प्रेम करता है, और जब हम पापी बने, उसने हमें न छोड़ दिया। वह हमारे अनन्त स्वर्ग वापस जाने के समय तक और स्वर्ग में हमारे संग सर्वदा रहेगा।

1यूह 4:7-11 “प्रियो, हम आपस में प्रेम करें, क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है। प्रत्येक जो प्रेम करता है, परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है और परमेश्वर को जानता है। वह जो प्रेम नहीं करता परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। परमेश्वर का प्रेम हम में इसी से प्रकट हुआ कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेज दिया कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं। ... प्रियो, यदि परमेश्वर ने हम से ऐसा प्रेम किया तो हमको भी एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए।”

परमेश्वर प्रेम है। हमें, परमेश्वर की सन्तान भी, अपने भाई-बहनों के साथ और आसपास के सभी लोगों के साथ यह परमेश्वर का अपरिवर्तनीय प्रेम बांटना चाहिए। आप से नम्र निवेदन है कि आप सभी परमेश्वर की सन्तान बनें जो परमेश्वर का प्रेम सीखकर उसे अभ्यास में लाती है।

तुम न कुड़कुड़ाओ



मैंने ‘पैर के चिह्न’ के शीर्षक की एक पुस्तक पढ़ी। एक व्यक्ति सपने में परमेश्वर के साथ समुद्र के किनारे पर चल रहा था। वह मार्ग जिस से वह व्यक्ति गुजरता गया, उसकी पिछली जिंदगी का मार्ग दर्शाता था। समुद्र के बालु पर उसने देखा कि दो व्यक्ति के पैरों के चिह्न लगे हुए हैं। और उसने यह भी देख लिया कि जब वह अपने जीवनकाल में मुश्किल स्थिति में होता था, हर समय सिर्फ एक व्यक्ति के पैर का चिह्न लगा हुआ था। यह देखकर वह परमेश्वर को कुड़कुड़ाने लगा। उसने शिकायत भरे दिल से परमेश्वर को पूछा, “आप क्यों मुश्किल स्थिति में मेरे साथ नहीं रहते थे? मुझे क्यों छोड़ते थे?”

परमेश्वर ने उत्तर में यह कहा, “नहीं, मैं हमेशा तुम्हारे साथ था। जब तुम जिंदगी के सुधार मार्ग पर चलते थे, तब मैं तुम्हारे संग जाता था, लेकिन जब तुम्हारे सामने जिंदगी का तूफ़ानी मार्ग था, तब मैं तुम्हें अपने कंधे पर उठा कर सामने सारी परीक्षाएं पार करते हुए चलता था, इसलिए एक व्यक्ति के पैर का चिह्न रहा है।” एक व्यक्ति के पैर का चिह्न उसका नहीं, लेकिन परमेश्वर के पैर का चिह्न था जो उसे कंधे पर उठा लेकर चलता था।

यह कहानी ‘पैर के चिह्न’ परमेश्वर के प्रेम की उपमा देती है। इंसान मतलबी है, वह अपने लाभ के लिए प्रेम करता है। परन्तु परमेश्वर का प्रेम सम्पूर्ण और सिद्ध है। परमेश्वर हम से बिना कुछ चाहे और बिना शर्त के प्रेम देता है। परीक्षा और मुश्किल के समय में जब हम बहुत दुख उठाते हैं, तब परमेश्वर हमें अपने कंधे पर उठा कर स्वर्ग तक जाता है। वह अपनी गोद में हमें रख कर खुद सभी ख़तरों का सामना करता है और वह ढाल बनता है।

जो भी हो, विश्वास का जीवन जीते हुए, हम कभी-कभी ऊपर की कहानी के व्यक्ति के जैसे, परमेश्वर का प्रेम न समझ कर शिकायत करते हैं। कुड़कुड़ाने की कोई बात नहीं है। सभी घटनाएं स्वर्ग तक हमारा मार्गदर्शन करने के लिए घटित होती हैं।

याक 5:7-9 “इसलिए हे भाइयो, प्रभु के आगमन तक धैर्य रखो। देखो, कृषक भूमि की मूल्यवान उपज के लिए प्रथम और अन्तिम वर्षा होने तक धैर्य बांधे ठहरा रहता है। तुम भी धैर्य बांधे रहो। अपने हृदयों को दृढ़ करो, क्योंकि प्रभु का आगमन निकट है। भाइयो, एक दूसरे के प्रति दोष न लगाओ, जिससे कि तुम पर भी दोष न लगाया जाए। देखो, न्यायी द्वार ही पर खड़ा है।”

1कुर 10:5-12 “परन्तु फिर भी उनमें से अधिकांश से परमेश्वर प्रसन्न नहीं हुआ-वे जंगल में मर कर ढेर हो गए। ... न तुम कुड़कुड़ाओ, जैसे कि उनमें से बहुतों ने किया-और नाश करने वाले के द्वारा नाश किए गए। ये बातें उन पर उदाहरणस्वरूप हुर्इं, और ये हमारी चेतावनी के लिए लिखी गईं जिन पर इस युग का अन्त आ पहुंचा है। ... ”


शिकायत के बाद उसका न्याय होता है, और न्याय के बाद हमारा नाश होता है। बाइबल हमें शिक्षा देती है कि शिकायत करना बहुत बड़ा पाप है जिससे हमारा न्याय किया जाएगा और हम नष्ट होंगे। पुराने समय, इस्राएली परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करते और अगुवे मूसा व हारून को कुड़कुड़ाते थे, इससे वे सब जगंल में नष्ट किए गए थे।

जब हमें परमेश्वर के सहायक हाथ का अहसास नहीं होता, तब हमारे मन में शारीरिक लालच और शिकायत भर जाती है। जब हम शारीरिक लालच पर प्रतिबंध लगाते हैं और आत्मिक लालसा रखते हैं, तब हम आत्मिक दृष्टि से परमेश्वर के प्रेम को महसूस कर सकते हैं और खुशी से स्वर्ग की ओर दौड़ सकते हैं।

परमेश्वर का भय मानना और उस पर विश्वास करना शारीरिक जिंदगी के कल्याण के लिए नहीं है। यदि ऐसा होता तो, यीशु ने इस संसार पर शरीर धारण किए आकर सांसारिक प्रतिष्ठा पाई होती। यह संसार आत्माओं का बंदीगृह, यानी शरण नगर है। यहां कोई भी आराम नहीं ले सकता। सभी लोगों को अपनी समस्याएं लेते हुए जीवन व्यतीत करना पड़ता है।

जो भी हो, हमें अपने परिश्रम के प्रति प्रतिफल मिलेगा जो स्वर्ग, अनन्त जीवन, राजकीय याजक का पद और परमेश्वर के सदा का प्रेम है। जैसा यीशु ने कहा, “मेरा राज्य इस संसार का नहीं।”(यूह 18:36) आइए हम यीशु के वचन को दिल में बसने दें और अनन्त स्वर्ग के प्रति और अधिक आशा रखें।

प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद दो और प्रेम में चलो



यदि हम परमेश्वर के प्रेम को महसूस नहीं करते हैं, तब हमारी जिंदगी में थकान आ जाती है और हम शिकायत करने लगते हैं। लेकिन जब हम परमेश्वर के प्रेम को महसूस करते हैं, तब दिन प्रतिदिन धन्यवाद का मन आ जाता है। इसलिए बाइबल कहती है, “सर्वदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना करो, प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद दो।” आइए हम इस वचन पर आज्ञाकारी होकर सुन्दर विश्वास रखें।

1थिस 5:16-18 “सर्वदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना करो, प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद दो, क्योंकि मसीह यीशु में तुम्हारे लिए परमेश्वर की यही इच्छा है।”

हम इससे दिन प्रतिदिन खुश रह सकते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता और माता है, और अनन्त स्वर्ग का राज्य हमारा है। संसार के लोग बूढ़े होने से बहुत दुखी होते हैं और वे मृत्यु से भयभीत होते हैं। लेकिन हम नहीं डरते, क्योंकि परमेश्वर ने नई वाचा के सत्य से हमें अनन्त शांति, खुशी और आनन्द दिया है। हम क्यों खुश न होंगे? क्यों धन्यवाद न देंगे?

पिता और माता पर विश्वास करना खुशी की और आनन्दित बात है। उनकी आज्ञाएं हमें बोझ देने के लिए नहीं हैं। वास्तव में उनमें परमेश्वर का अपार प्रेम छिपा हुआ है।

कुल 3:13-17 “ ... इन सब के ऊपर प्रेम को, जो एकता का सिद्ध बन्ध है, धारण कर लो ... और धन्यवादी बने रहो। मसीह के वचन को अपने हृदयों में बहुतायत से बसने दो, समस्त ज्ञान सहित एक दूसरे को शिक्षा और चेतावनी दो, अपने हृदयों में धन्यवाद के साथ परमेश्वर के लिए भजन और स्तुतिगाना और आत्मिक गीत गाओ। ... परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।”

कुल 2:6-7 “इसलिए जैसे तुमने मसीह यीशु को प्रभु मान कर ग्रहण कर लिया है, वैसे ही उसमें चलते रहो, तथा दृढ़ता से जड़ पकड़ते और उसमें बढ़ते हुए, जैसे तुम सिखाए गए थे वैसे ही अपने विश्वास में स्थिर होकर अत्यन्त धन्यवाद करते रहो।”


परमेश्वर ने नई वाचा का सत्य हमें दिया और स्वर्ग के राज्य में जाने दिया; परमेश्वर हमारा पिता और माता है; हम आपस में भाई-बहन बन गए हैं; हम संसार के सही रास्ते पर मार्गदर्शन करते हैं और संसार में सुसमाचार का राज्य स्थापित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। ये सभी चीजें धन्यवादी बातें हैं। शारीरिक लालच के द्वारा शिकायत न करें, पर स्वर्गीय पिता और माता को हमेशा धन्यवाद दें।

परमेश्वर का प्रेम समझे बिना, हम बाइबल को नहीं समझ सकते। परमेश्वर का प्रेम समझने से हम सचमुच बाइबल और परमेश्वर को जान सकते हैं। परिवार में भी और चर्च में भी परमेश्वर के प्रेम से परिपूर्ण होना है। आइए हम परमेश्वर के सदृश होंगे जो प्रेम है, और एक दूसरे के हित में कार्य करेंगे। तो हमारी जिंदगी धन्यवाद से भर जाएगी।

इफ 5:1-4 “इसलिए प्रिय बालकों के सदृश परमेश्वर का अनुकरण करने वाले बनो, और प्रेम में चलो जैसे मसीह ने भी हम से प्रेम किया और सुखदायक सुगन्धित भेंट बनकर हमारे लिए अपने आपको परमेश्वर के सम्मुख बलिदान कर दिया। ... न तो घृणित कार्य, न मूर्खतापूर्ण बातें, न ठट्ठे की बातें जो शोभा नहीं देती हैं पाई जाएं, वरन् धन्यवाद ही दिया जाए।”

धन्यवाद इसका प्रमाण है कि हमने परमेश्वर के प्रेम को समझ लिया है। प्रकाशितवाक्य अध्याय 4 में क्यों चौबीस प्राचीन अपने मुकुट सिंहासन के सामने डालते हुए परमेश्वर को स्तुति देते हैं? यदि हम परमेश्वर के प्रेम को महसूस करें, तो धन्यवाद का मन दिल में बैठता है। हम आशा के बिना रहते थे, पर परमेश्वर ने हमें अनन्त स्वर्ग की आशा और अनन्त जीवन की आशीष दी। चाहे हम परमेश्वर को स्तुति और महिमा युगानुयुग दें, तो भी यह पर्याप्त न होगा।

जब हम हर परिस्थिति में परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं, तब परमेश्वर हमें बहुतायत से धन्यवाद करने की बातें देता है। सब स्वर्गीय भाई और बहनें ढूंढ़ने तक, आइए हम हमेशा खुश रहें, धन्यवाद दें और स्वर्गीय पिता और माता का अद्भुत कार्य निरन्तर सुनाते रहें। परमेश्वर आंखों के तारे के जैसे हमारी रक्षा करता है और हम से अन्तहीन प्रेम करता है। आप सभी सिय्योन के सदस्यों से आशा है कि हमेशा उस प्रेम को याद करते हुए संसार के सभी लोगों को परमेश्वर के प्रेम की साक्षी दें और सुनाएं।