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एक व्यक्ति की भूमिका

प्रत्येक व्यक्ति एक निश्चित कार्यभार के साथ जन्म लेता है। इसलिए इस पृथ्वी परजन्मा कोई भी व्यक्ति निकम्मा नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति छोटे या बड़े पैमाने पर, दूसरे लोगों के जीवन को प्रभावित करते हुए मानव इतिहास में एक भूमिका नीभा रहा है।

मैं ने एक बार “पेड़ लगाने वाला मनुष्य” नामक कहानी पढ़ी थी। एक सुनसान और उजाड़ पहाड़ी इलाके में, कहानी का कथावाचक एक दिन एक मनुष्य से मिला जो प्रतिदिन 100 शाहबलूत के बीज बोता था। कुछ साल बीत गए, और जब वह कथावाचक फिर से उसी जगह पर गया, तो आश्चर्यजनक रूप से वह उजाड़ भूमि सुंदर और उपजाऊ बन गई थी।

उस एक मनुष्य के कारण जिसने यह न सोचते हुए कि लोग उसको समझेंगे कि नहीं, प्रतिदिन शाहबलूत के पेड़ लगाए थे, एक उजाड़ जगह एक घने जंगल और एक उपजाऊ भूमि में बदल गई थी जहां फूल खिलते हैं और झरने बहते हैं। यह कहानी हमें दिखाती है कि एक मनुष्य का अदृश्य प्रयास किस प्रकार से संसार को बदल सकता है।

एक व्यक्ति जो पूरी मानव जाति के भाग्य को प्रभावित करता है


संसार के 6 अरब लोगों की तुलना में, एक व्यक्ति शायद बिना किसी मूल्य का या बिना किसी महत्व का समझा जा सकता है। लेकिन वास्तव में, एक अकेला व्यक्ति उल्लेखनीय ढंग से दूसरे बहुत से लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकता है।

रोमियों की पुस्तक वर्णन करती है कि जैसा एक मनुष्य के द्वारा हम सब के पास मृत्यु आई, वैसा ही एक मनुष्य के द्वारा हमारे पास जीवन आया।

रो 5:17–19 क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कारण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्मरूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात् यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे। इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित्त धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ। क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।

एक मनुष्य, यानी आदम के द्वारा सभी मनुष्यों में मृत्यु आई, और एक मनुष्य, यानी यीशु के द्वारा सब ने जीवन पाया। पहले वाले और बाद वाले मनुष्य के बीच के अन्तर के बारे में सोचिए; एक मनुष्य के आज्ञाभंग के कारण पाप और मृत्यु आई, और एक मनुष्य के आज्ञापालन के कारण क्षमा और जीवन आया।

एक मनुष्य के कारण सब मर गए, और एक मनुष्य के कारण सब ने जीवन पाया। जैसे मृत्यु की शुरुआत एक मनुष्य के द्वारा हुई, जीवन भी एक मनुष्य के द्वारा शुरू हुआ। सभी मानव जाति का भाग्य एक मनुष्य के द्वारा नियंत्रित किया गया। इस तरह से, एक मनुष्य की भूमिका या प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण है।

सुसमाचार के कार्य में भी वैसा ही है। 1,44,000 संतों में से यदि एक व्यक्ति भी अपना कार्य पूरा न करे, तो सुसमाचार का महान कार्य पूरा नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है।

पहरेदार का कार्य है कि संसार को चेतावनी दे


हम में से प्रत्येक जन के पास एक महान कार्यभार है जो पूरी मानव जाति को प्रभावित करता है। प्रत्येक जन की कोई भी भूमिका छोटी या अमहत्वपूर्ण नहीं समझी जानी चाहिए। हम में से प्रत्येक जन को पृथ्वी की छोर तक सुसमाचार का प्रचार करने में अपनी भूमिका अदा करनी ही चाहिए। सिर्फ एक मनुष्य की भूमिका के कारण, उजाड़ भूमि सुसमाचार के लिए एक उपजाऊ खेत में बदल सकेगी और अनन्त स्वर्ग का राज्य उतना ही निकट आ सकेगा।

यहेज 3:16–19 ... यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचा, “हे मनुष्य के सन्तान, मैं ने तुझे इस्राएल के घराने के लिये पहरुआ नियुक्त किया है; तू मेरे मुंह की बात सुनकर, उन्हें मेरी ओर से चिताना...”

एक नबी का जन्म परमेश्वर के वचन का प्रचार करने के जीवन–ध्येय के साथ ही होता है। इसलिए एक नबी को पहरेदार भी कहा गया है जो लोगों को चेतावनी देने के लिए तुरही फूंकता है, ताकि लोग आने वाली विपत्तियों के सामने अपने आपको तैयार कर सकें।
परमेश्वर ने हम में से प्रत्येक को एक पहरेदार और सुसमाचार का नबी बनने के लिए बुलाया है। बहुत से लोगों का जीवन इस पर निर्भर करता है कि एक पहरेदार उन्हें चेतावनी देकर अपनी भूमिका अदा करता है या नहीं। उसी तरह से, अनगिनत आत्माओं का उद्धार भी इसी बात पर निर्भर है कि एक नबी उन्हें परमेश्वर के वचनों का प्रचार करके अपने कार्य को पूरा कर रहा है या नहीं।

मत 28:18–20 यीशु ने उनके पास आकर कहा, “स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिये तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ; और उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूं।”

मसीह के अंतिम वचन आज हमारे समय में संपूर्ण रूप से पूरे हो रहे हैं; क्योंकि हम पिता और पुत्र के नाम के साथ पवित्र आत्मा का नाम भी जानते हैं। परमेश्वर की सभी भविष्यवाणियां तो पूरी हो चुकी हैं या फिर इस समय पूरी होने की प्रक्रिया में हैं।

ठीक ऐसे ही समय में हमें बुलाया गया है। उद्धार का अनुग्रह हम में से प्रत्येक को दिया गया है। लेकिन केवल अनुग्रह को प्राप्त करना ही काफी नहीं है। हम में से हर एक को आत्मिक पहरेदार के रूप में, सुसमाचार की तुरही को जोर से फूंकना चाहिए और संसार के सभी लोगों की उद्धार की ओर अगुआई करनी चाहिए।

परमेश्वर की योजना में एक छोटा जन एक हजार जन बन जाते हैं


तब, सभी जातियों के लोगों को चेले बनाने के लिए और उन्हें सब बातें जो मसीह ने आज्ञा दी है, मानना सिखाने के लिए हमें क्या करना चाहिए?

हमारे पास जीवन–शक्ति है। परमेश्वर के द्वारा हमें दिए गए इस जीवन में न केवल हमारी अपनी आत्मा को बल्कि दूसरी बहुत सी आत्माओं को भी बचाने की असीम सामर्थ्य है। यीशु ने कहा था कि जब परमेश्वर के वचन का बीज एक अच्छी भूमि पर गिरता है, तो वह जो बोया गया था उसके अनुसार सौ गुना, साठ गुना या तीस गुना फल पैदा करता है।(मत 13:3–9; 1पत 1:23–25) जब परमेश्वर के वचन का बीज हमारे अच्छे हृदय की भूमि में बोया जाता है, तब वह हम में जड़ पकड़ता है और बहुतायत से जीवन के फल पैदा करने के लिए बढ़ता है।

परमेश्वर ने हमें जीवन दिया है। यदि हम में से प्रत्येक जन हर वर्ष एक व्यक्ति को परमेश्वर की ओर ले आए, तो 10 वर्षों तक प्रत्येक जन कितनी आत्माओं को बचा सकेगा? क्या 10 लोगों को? नहीं, 1,024 लोग बच सकते हैं।

जब हम में से प्रत्येक जन एक व्यक्ति को प्रकाश में ले आता है, तो वह भी किसी दूसरे को प्रकाश में ले आएगा। एक वर्ष के बाद, दो व्यक्ति होंगे जो प्रकाश में हैं। और यदि उनमें से प्रत्येक जन एक व्यक्ति की अगुआई करता है, तो दो वर्षों के बाद प्रकाश में आए व्यक्तियों की संख्या चार हो जाएगी। इस तरह से उनकी संख्या बढ़ जाएगी: तीन वर्षों के बाद 8 होगी, चार वर्षों के बाद 16 होगी, और वर्ष बीतने पर 32, 64, 128, 256, 512 होगी, और दस वर्षों के बाद संख्या बढ़कर 1,024 होगी। यदि एक व्यक्ति जो प्रकाश में है, प्रतिवर्ष किसी दूसरे को पूर्ण रूप से जागृत करे, तो 10 वर्षों में हजार से भी ज्यादा लोग बच सकते हैं। क्या यही परमेश्वर की योजना नहीं? क्योंकि वह छोटे से छोटे को एक हजार और सबसे दुर्बल को एक सामर्थी जाति बनाते हैं।

अब, हमें अपने आपको जांचना चाहिए कि जिस समय से हमें बुलाया गया है, उसी समय से क्या हम ने ऐसे जागृति के सुंदर फल पैदा करने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए हैं या नहीं। यदि हम में से प्रत्येक जन ने दस वर्षों तक हर वर्ष कम से कम एक आत्मा को जागृत किया हो, तो हमारे साथ अब तक 1,024 आत्माएं इकट्ठी होती हैं।

परमेश्वर ने हमें पहरेदार, यानी सुसमाचार के सेवक बनने के लिए बुलाया है। यदि हम ने बहुत वर्षों से परमेश्वर के लिए एक भी फल उत्पन्न नहीं किया, तो हम उनके बुलावे के लायक नहीं हैं। आइए हम इस बात पर विचार करने और अपने आपको सवाल करने का समय लें कि, जैसे परमेश्वर ने आज्ञा दी है कि, “उन्हें मेरी ओर से चेतावनी दो,” क्या हम ने लोगों को उत्सुकता से परमेश्वर के वचनों का प्रचार किया है या नहीं।

परमेश्वर के द्वारा बुलाए जाने के बाद जितने वर्ष बीते हैं, उतनी ज्यादा आत्माओं को क्या आपने अब तक जागृत नहीं किया? तो चिंता न कीजिए। आप इस समय से शुरुआत कर सकते हैं। क्या आप पहरेदार के रूप में अपनी भूमिका को ईमानदारी से अदा करने के लिए तैयार हैं? परमेश्वर आप में से प्रत्येक को सौ गुना और यहां तक कि हजार गुना फल उत्पन्न करने के लिए सहायता करेंगे।

उम्र या परिस्थिति से परे हर कोई सुसमाचार का प्रचार कर सकता है


हम पृथ्वी की सब जातियों में पहरेदार के रूप में नियुक्त किए गए हैं। ‘मेरी जगह पर कोई और जाएगा’ ऐसा सोचने के बजाय, हमें ऐसा सकारात्मक विचार करना चाहिए कि, “मुझे भेजिए!” एक अकेला व्यक्ति की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है।

क्या आपने अपनी उम्र या परिस्थितियों के कारण अपनी पहरेदार की भूमिका छोड़ नहीं दी? सुसमाचार के प्रचार की भूमिका उम्र या परिस्थितियों की सीमाओं से परे सब निभा सकते हैं। जब मूसा फिरौन के पास यहोवा का संदेश लेकर गया, तब वह 80 वर्ष का था। उसे 80 वर्ष की उम्र में परमेश्वर की इच्छा का पालन करने के लिए बुलाया गया, और उसने 40 वर्षों तक अपने लोगों में परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने का कार्य जारी रखा। मूसा के उदाहरण को सोचें, तो अभी तो हम बहुत युवा और ऊर्जा से भरपूर हैं।

हमारे सिय्योन के सभी भाई और बहनें परमेश्वर के नियुक्त किए गए पहरेदार हैं जिन्हें संसार को चेतावनी देनी है। परमेश्वर ने 80 की उम्र वाले मूसा को नबी का कार्य सौंपा था। हालांकि, हम में से प्रत्येक को युवा उम्र में बुलाया गया है। हम पूरे संसार को जगाने के कार्य का नेतृत्व करने के लिए काफी युवा और सशक्त हैं। परमेश्वर ने हमें पहले से उनके वचनों का अच्छे से प्रचार करने की बुद्धि दी है।

आइए हम अभी से शुरू करें। आइए हम परमेश्वर की शिक्षाओं में कम से कम एक को तो अपने आसपास के उन लोगों को सिखाएं जो अभी भी पिता और माता को नहीं जानते हैं और सिय्योन के बारे में भी नहीं जानते हैं जहां परमेश्वर रहते हैं। बाइबल कहती है कि विश्वास संदेश को सुनने से आता है। जब हम उन्हें परमेश्वर के वचनों का प्रचार करेंगे, वे विश्वास धारण करेंगे, और विश्वास के द्वारा बहुत से लोग उद्धार के पास आएंगे। हमें शीघ्रता से लोगों को स्वर्गीय पिता और माता के और स्वर्गीय परिवार के बारे में सुसमाचार बता कर, संसार को जागृत करना चाहिए और सब लोगों को परमेश्वर के पास ले आना चाहिए।

मसीह के जैसा स्वभाव वाला व्यक्ति बहुत सी आत्माओं को बचा सकता है


‘मैं बहुत ही निर्बल और कमजोर हूं। मैं कैसे इतने महान कार्य को कर सकता हूं?’ कृपया ऐसा बिल्कुल न सोचिए। हम में से प्रत्येक यह कार्य कर सकता है। यीशु ने हम से अपना क्रूस उठाकर उनके पीछे चलने के लिए कहा है, क्योंकि हम वह कर सकते हैं।

हमारे आसपास की बहुत सी आत्माओं का उद्धार या नाश हम में से प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर करता है। इस बात को याद रखते हुए, हमें ईमानदारी से मसीह के उदाहरण का पालन करना चाहिए जो मृत्यु तक आज्ञाकारी रहे थे।

फिलि 2:5–11 जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली...

हमारे लिए जो सभी लोगों के उद्धार की आशा करते हैं और उन्हें बचाने के लिए मेहनत करते हैं, मसीह का जीवन एक सबसे अच्छा आदर्श है। बाइबल कहती है कि एक मनुष्य, यानी मसीह के आज्ञापालन के कारण स्वर्ग का मार्ग खुल गया है, कि सभी मानव जाति मृत्यु से बच सकें और अनन्त स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें।

हमें मसीह की सभी शिक्षाओं का पालन करना चाहिए। छोटी चीजों से शुरुआत करके, हम एक महान कार्य को पूरा कर सकेंगे और बहुत से अच्छे फलों से परमेश्वर को गौरवान्वित कर सकेंगे। अब, हमें अपने आपसे सवाल करना चाहिए कि क्या हमने अपने सभी विचारों को क्रूस पर चढ़ाया है और यीशु मसीह के जैसा रवैया अपनाया है, या फिर क्या हम अभी भी इतने हठीले और घमंडी हैं कि मसीह हम में स्थिर न रह सकें। जैसे यीशु ने किया था वैसे ही यदि हम अपने आपको दीन बनाएं और मृत्यु तक आज्ञापालन करें, तो हम में से प्रत्येक मानव जाति को बचाने के कार्य को पूरा कर सकेगा।

आइए हम पहले एक व्यक्ति की परमेश्वर की ओर अगुआई करें। एक व्यक्ति से शुरुआत करते हुए, आइए हम सभी जातियों के लोगों को चेले बनाएं, और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दें, और उन्हें वो सब बातें जिनकी उन्होंने हमें आज्ञा दी है, मानना सिखाएं। ऐसे आज्ञाकारी जीवन जीने के द्वारा, आइए हम संसार के उन सभी लोगों को जिन्होंने अभी तक उद्धार नहीं पाया है, यह खुश समाचार सुनाएं कि हमारे स्वर्गीय पिता इस पृथ्वी पर आ चुके हैं और हमारी स्वर्गीय माता इस समय शरीर में हमारे साथ हैं, और उन्हें उद्धार के सुसमाचार की घोषणा करें।

एक गेहूं का दाना यदि मर जाए तो बहुत से फल पैदा करता है


जिस प्रकार एक गेहूं का दाना जब तक मर नहीं जाता तब तक फल उत्पन्न नहीं करता, यदि अभी भी हम ही हमारे अंदर जीवित हैं और परमेश्वर के वचनों का पूर्ण रूप से पालन न करते, तो जीवन का सामर्थ्य हम में कार्य नहीं कर सकता, और हम कभी भी फल उत्पन्न नहीं कर सकते।
जैसे बहुत से फल उत्पन्न करने के लिए एक गेहूं के दाने को मर जाना पड़ता है, हमें भी बहुत से फल उत्पन्न करने के लिए, बहुत सी तकलीफों को सहन करते हुए, अपने आपको मारना चाहिए। यदि एक दाना मर जाता है, तो वह अंकुरित हो सकता और फल उत्पन्न कर सकता है। जब तक एक दाना मर नहीं जाता, वह न तो जीवन उत्पन्न कर सकता है और न ही अपनी पैदावार को बढ़ा सकता है। यह परमेश्वर की पूर्व योजना है।

यिर्म 20:7–13 हे यहोवा, तू ने मुझे धोखा दिया, और मैं ने धोखा खाया; तू मुझ से बलवन्त
है, इस कारण तू मुझ पर प्रबल हो गया। दिन भर मेरी हंसी उड़ाई जाती है; सब कोई मुझ से ठट्ठा करते हैं। क्योंकि जब मैं बातें करता हूं, तब मैं जोर से पुकार पुकारकर ललकारता हूं, “उपद्रव और उत्पात हुआ, हां उत्पात!” क्योंकि यहोवा का वचन दिन भर मेरे लिये निन्दा और ठट्ठा का कारण होता रहता है। यदि मैं कहूं, “मैं उसकी चर्चा न करूंगा न उसके नाम से बोलूंगा,” तो मेरे हृदय की ऐसी दशा होगी मानो मेरी हड्डियों में धधकती हुई आग हो, और मैं अपने को रोकते रोकते थक गया पर मुझ से रहा नहीं जाना...


यिर्मयाह के 20वें अध्याय में, हम नबी को यह कहकर विलाप करते हुए देख सकते हैं कि, “ मैं क्यों उत्पात और शोक भोगने के लिये जन्मा और कि अपने जीवन में परिश्रम और दुख देखूं, और अपने दिन नामधराई में व्यतीत करूं?” जब यिर्मयाह नबी ने परमेश्वर के वचनों की घोषणा की, तो उसने लोगों से सत्कार पाने के बजाय उपहास और अत्याचार सहा।

इसलिए उसने यह निर्णय लिया कि अब से वह प्रचार नहीं करेगा, लेकिन वह समाचार उसके भीतर भड़कती ज्वाला सी हो जाती थी जो उसकी हड्डियों को जलाती थी, और अन्तत: वह सहन नहीं कर सकता था। ‘यदि मैं इस समाचार का उन्हें प्रचार न करूं, तो वे आनेवाली मुसीबतों और विनाश से नहीं बचेंगे। यदि मैं उपहास किए जाने के भय से चुप रहूं तो क्या मैं परमेश्वर की नजर में सही हूं?’ यिर्मयाह के हृदय में ऐसे विचार थे, जिन्होंने उसे परेशान और बेचैन कर दिया था।

यह एक सच्चे नबी की मनोस्थिति है। हमें संसार को परमेश्वर के वचन, यानी सुसमाचार का प्रचार करके जागृत करने में सबसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है। इसका कारण है कि हम नबी हैं।

जब हम संसार को जागृत करने के लिए सुसमाचार का प्रचार करें, तो हम भी यिर्मयाह की तरह अत्याचार और उपहास का सामना कर सकते हैं। सुसमाचार का मार्ग बहुत ही संकरा और कठोर है; कुछ लोग आधे रास्ते में ही हार मानकर इस दौड़ को पूरा करना छोड़ सकते हैं। हालांकि, हमें और अधिक मेहनत करते हुए इस दौड़ के समाप्त होने तक धीरज से दौड़ना चाहिए, ताकि हम परमेश्वर से और बड़ा इनाम पाने के लिए योग्य माने जाएं।

एक व्यक्ति की भूमिका सिर्फ उसी व्यक्ति पर नहीं, लेकिन बहुत से लोगों पर प्रभाव डालती है। याद रखिए कि परमेश्वर ने उस दास को, जिसने अपना एक तोड़ा रख छोड़ा था, बाहर के अंधेरे में डाले जाने की आज्ञा दी थी। जैसे मसीह ने एक गेहूं के दाने के समान अपना बलिदान किया, हमें भी अपनी शारीरिक इच्छाओं को क्रूस पर चढ़ा देना चाहिए और मसीह में एक नया मनुष्यत्व धारण करना चाहिए, ताकि हम में से प्रत्येक जन जीवन के फल के रूप में बहुत से फल उत्पन्न कर सके।

परमेश्वर ने एक महान कार्य हमें दिया है। हमारा कार्य है कि हम एक पहरेदार की तरह संसार के लोगों को चेतावनी देते रहें, फिर चाहे वे सुनें या न सुनें। यदि हम में से प्रत्येक जन अपने पूरे हृदय से एक व्यक्ति को जागृत करे, तो क्या हम बहुत ही जल्द पृथ्वी के सभी लोगों को जागृत नहीं कर सकेंगे?

संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो जीवन के जल के लिए प्यासे हैं। एक व्यक्ति की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, इस बात का एहसास करते हुए, आइए हम जाएं और सभी जातियों के लोगों को चेले बनाएं, और उन्हें वो सब बातें जिनकी मसीह ने हमें आज्ञा दी है, मानना सिखाएं। ऐसा करते हुए, आइए हम बहुत सी आत्माओं की धार्मिकता की ओर अगुआई करें।