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परमेश्वर के चुने हुए लोग

परमेश्वर ने हमें नाश की ओर भाग रहे लोगों की अगुआई स्वर्ग की ओर करने के उद्धार के कार्य में अपना सहकर्मी बनने के लिए बुलाया है। जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की है, उसे पाने के लिए हम मूसा की लाठी को हाथ में लिए हुए, संसार की ओर बढ़ते हैं। तब, परमेश्वर के कार्यकर्ता, यानी सत्य के योद्धाओं के लिए उनके मापदंड क्या होंगे?

गिदोन के योद्धाओं को चुनने का परमेश्वर का मापदंड



परमेश्वर के विश्वास के योद्धाओं के लिए रखे मापदंडों को जानने के लिए, सबसे पहले आइए हम बाइबल की उन आयतों को पढ़ें जहां गिदोन के योद्धाओं को चुनने की प्रक्रिया लिखी गई है।

न्या 7:1–8 ... तब यहोवा ने गिदोन से कहा, “जो लोग तेरे संग हैं वे इतने हैं कि मैं मिद्यानियों को उनके हाथ नहीं कर सकता, नहीं तो इस्राएल यह कहकर मेरे विरुद्ध अपनी बड़ाई मारने लगेंगे कि हम अपने ही भुजबल के द्वारा बचे हैं। इसलिये तू जाकर लोगों में यह प्रचार करके सुना दे, ‘जो कोई डर के मारे थरथराता हो, वह गिलाद पहाड़ से लौटकर चला जाए’।” तब बाइस हजार लोग लौट गए, और केवल दस हजार रह गए। फिर यहोवा ने गिदोन से कहा, “अब भी लोग अधिक हैं; उन्हें सोते के पास नीचे ले चल, वहां मैं उन्हें तेरे लिये परखूंगा... तब वह उनको सोते के पास नीचे ले गया; वहां यहोवा ने गिदोन से कहा, “जितने कुत्ते के समान जीभ से पानी चपड़ चपड़ करके पीएं उनको अलग रख; और वैसा ही उन्हें भी जो घुटने टेककर पीएं।” जिन्होंने मुंह में हाथ लगा चपड़ चपड़ करके पानी पिया उनकी तो गिनती तीन सौ ठहरी; और बाकी सब लोगों ने घुटने टेककर पानी पिया। तब यहोवा ने गिदोन से कहा, “इन तीन सौ चपड़ चपड़ करके पीनेवालों के द्वारा मैं तुम को छुड़ाऊंगा, और मिद्यानियों को तेरे हाथ में कर दूंगा; और अन्य सब लोग अपने अपने स्थान को लौट जाएं।”...

उस समय मिद्यानी सैनिकों की संख्या 1,35,000 की थी, जबकि इस्राएली सेना की गिनती केवल 32,000 थी। मिद्यानियों की गिनती इस्राएली सेना से कहीं अधिक थी। हालांकि, परमेश्वर ने कहा कि 32,000 भी बहुत ज्यादा हैं, और जिन्हें डर लगता है उन्हें घर वापस जाने को कह दिया, तो उनमें से 22,000 वापस चले गए। परमेश्वर ने उन्हें जिन्हें डर लगता था, वापस जाने दिया, इसका कारण था कि वे परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते थे। यदि उन्होंने विश्वास किया होता कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर उनके साथ हैं, तो वे कभी भी न डरे होते।
जिनके पास विश्वास नहीं था, परमेश्वर ने उन्हें वापस घर जाने दिया, और 10,000 पुरुष बच गए। तब परमेश्वर ने उनकी परीक्षा की। परीक्षा यह थी कि उन्हें पानी पीना था। परमेश्वर ने इसके आधार पर मिद्यानियों के सामने युद्ध लड़ने वाले सैनिकों को चुना, कि उन्होंने किस रीति से पानी पिया था; जिन्होंने पानी अपने हाथों से लेकर चपड़ चपड़ करके पिया उन्हें उनसे अलग किया गया जिन्होंने पानी पीने के लिए घुटने टेके थे। केवल 300 पुरुष चुने गए जिन्होंने चपड़ चपड़ करके पानी पिया था, और जिन्होंने पानी पीने के लिए घुटने टेके थे उन्हें घर वापस भेज दिया गया।
जीभ से पानी चपड़ चपड़ करके पीने और पानी पीने के लिए घुटने टेकने में कोई विशेष अन्तर नहीं दिखाई देता। हालांकि, उनकी क्रिया परमेश्वर की महिमा प्रकट करने वाले योद्धाओं को चुनने में एक आधार बनी। ऐसी छोटी बातों से जिसे हम नगण्य समझते हैं, परमेश्वर महान निर्णय लेते हैं।

विचार में जरा सा बदलाव परिणाम में बड़ा अन्तर लाता है



ऐसी बहुत सी बातें होती हैं जो हमें नगण्य लगती हैं, लेकिन परमेश्वर को महत्वपूर्ण लगती हैं। फसह के पर्व के दिन में की जाने वाली पैर धोने की विधि उसका एक उदाहरण है।

यूह 13:1–8 फसह के पर्व से पहले, जब यीशु ने जान लिया कि मेरी वह घड़ी आ पहुंची है कि जगत छोड़कर पिता के पास जाऊं, तो अपने लोगों से, जो जगत में थे जैसा प्रेम वह रखता था, अन्त तक वैसा ही प्रेम रखता रहा... भोजन पर से उठकर अपने ऊपर कपड़े उतार दिए, और अंगोछा लेकर अपनी कमर बान्धी। तब बरतन में पानी भरकर चेलों के पांव धोने और जिस अंगोछे से उसकी कमर बन्धी थी उसी से पोंछने लगा। जब वह शमौन पतरस के पास आया, तब पतरस ने उससे कहा, “हे प्रभु, क्या तू मेरे पांव धोता है?” यीशु ने उसको उत्तर दिया, “जो मैं करता हूं, तू अभी नहीं जानता, परन्तु इसके बाद समझेगा।” पतरस ने उससे कहा, “तू मेरे पांव कभी न धोने पाएगा!” यह सुनकर यीशु ने उससे कहा, “यदि मैं तुझे न धोऊं, तो मेरे साथ तेरा कुछ भी साझा नहीं।”

पतरस ने मनुष्य के स्वभाव से सोचा, “मैं कैसे परमेश्वर को अपने पांव धोने दे सकता हूं?” और पहले तो यीशु को अपने पांव न धोने देने वाला था। तब यीशु ने उसे सीधा कह दिया, “यदि मैं तुझे न धोऊं, तो मेरे साथ तेरा कुछ भी साझा नहीं।” पैर धोना शायद हमें नगण्य लग सकता है, लेकिन वास्तव में वह परमेश्वर के द्वारा हमारे उद्धार के लिए स्थापित की गई एक महत्वपूर्ण विधि है।
इस तरह से, जो हमारी आंखों में तुच्छ लगता है वह परमेश्वर की आंखों में छोटा नहीं है; वह उनके अन्तिम चुनाव के लिए एक आधार बनता है। चाहे कोई बात हमें नगण्य लगे, लेकिन यदि वह परमेश्वर की इच्छा है, तो हमें उसे कभी भी तुच्छ नहीं समझना चाहिए। क्योंकि सोचने या कार्य करने में थोड़े से अन्तर से परिणाम में बहुत विशाल अन्तर आता है।

जिन्होंने कनान का भेद लिया उन 12 भेदियों के विचारों में भिन्नता



अब, आइए हम मूसा के समय में दर्ज किए गए परछाई के समान इतिहास के द्वारा यह देखें कि कैसे परमेश्वर स्वर्गीय कनान में प्रवेश करनेवालों को उनसे अलग करते हैं जो प्रवेश नहीं कर सकते।

गिन 13:1–14:3 ... यहोवा से यह आज्ञा पाकर मूसा ने ऐसे पुरुषों को पारान जंगल से भेज दिया, जो सब के सब इस्राएलियों के प्रधान थे... चालीस दिन के बाद वे उस देश का भेद लेकर लौट आए...उन्होंने मूसा से यह कहकर वर्णन किया, “जिस देश में तू ने हम को भेजा था उसमें हम गए; उसमें सचमुच दूध और मधु की धाराएं बहती हैं, और उसकी उपज में से यही है। परन्तु उस देश के निवासी बलवान् हैं, और उसके नगर गढ़वाले हैं और बहुत बड़े हैं; और फिर हम ने वहां अनाकवंशियों को भी देखा... समुद्र के किनारे किनारे और यरदन नदी के तट पर कनानी बसे हुए हैं।” पर कालेब ने मूसा के सामने प्रजा के लोगों को चुप कराने की विचार से कहा, “हम अभी चढ़ के उस देश को अपना कर लें; क्योंकि नि:सन्देह हम में ऐसा करने की शक्ति है।” पर जो पुरुष उसके संग गए थे उन्होंने कहा, “उन लोगों पर चढ़ने की शक्ति हम में नहीं है; क्योंकि वे हम से बलवान् हैं।” और उन्होंने इस्राएलियों के सामने उस देश की जिसका भेद उन्होंने लिया था यह कहकर निन्दा भी की, “वह देश जिसका भेद लेने को हम गए थे ऐसा है, जो अपने निवासियों को निगल जाता है; और जितने पुरुष हम ने उसमें देखे वे सब के सब बड़े डील डौल के हैं। फिर हम ने वहां नपीलों को, अर्थात् नपीली जातिवाले अनाकवंशियों को देखा; और हम अपनी दृष्टि में उनके सामने टिड्डे के सामान दिखाई पड़ते थे, और ऐसे ही उनकी दृष्टि में मालूम पड़ते थे।” तब सारी मण्डली चिल्ला उठी; और रात भर वे लोग रोते ही रहे। और सब इस्राएली मूसा और हारून पर बुड़बुड़ाने लगे; और सारी मण्डली उनसे कहने लगी, “भला होता कि हम मिस्र ही में मर जाते! या इस जंगल ही में मर जाते! यहोवा हम को उस देश में ले जाकर क्यों तलवार से मरवाना चाहता है? हमारी स्त्रियां और बालबच्चे तो लूट में चले जाएंगे; क्या हमारे लिये अच्छा नहीं कि हम मिस्र देश को लौट जाएं?

परमेश्वर ने मूसा को आज्ञा दी कि कनान का भेद लेने के लिए, इस्राएल के प्रत्येक गोत्र के अगुवों को, 12 भेदिए बनाकर भेज। जब वे भेदिए कनान का भेद लेकर वापस आए, तो उन्होंने वहां जो देखा था और जो सुना था उसकी जानकारी मूसा को और सभी लोगों को दी।
उन सब ने एक जैसी ही चीजें देखी थीं; पर्वतीय प्रदेश, अनाज के खेत और अंगूर के बगीचे। फिर भी, वे अलग अलग जानकारी लेकर आए; उनमें से दस ने उस देश के बारे में बुरी और प्रतिकूल जानकारी दी, लेकिन यहोशू और कालिब परमेश्वर पर विश्वास के साथ एक अनुकूल जानकारी लेकर आए थे।

गिन 14:4–38 फिर वे आपस में कहने लगे, “आओ, हम किसी को अपना प्रधान बना लें, और मिस्र को लौट चलें।”... और नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालिब, जो देश के भेद लेनेवालों में से थे, अपने अपने वस्त्र फाड़कर, इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे... केवल इतना करो कि तुम यहोवा के विरुद्ध बलवा न करो; और न तो उस देश के लोगों से डरो, क्योंकि वे हमारी रोटी ठहरेंगे; छाया उनके ऊपर से हट गई है, और यहोवा हमारे संग है; उन से न डरो।” तब सारी मण्डली चिल्ला उठी कि इनको पथराव करो। तब यहोवा का तेज मिलापवाले तम्बू में सब इस्राएलियों पर प्रकाशमान हुआ... तुम्हारी शव इसी जंगल में पड़े रहेंगे; और तुम सब में से बीस वर्ष के या उससे अधिक आयु के जितने गिने गए थे, और मुझ पर बुड़बुड़ाते थे, उनमें से यपुन्ने के पुत्र कालिब और नून के पुत्र यहोशू को छोड़ कोई भी उस देश में न जाने पाएगा, जिसके विषय मैं ने शपथ खाई है कि तुम को उसमें बसाऊंगा...

जब 12 भेदिए कनान देश का भेद लेकर वापस आए, तो उनमें से दस ने वहां जो उन्होंने देखा उसकी प्रतिकूल जानकारी दी। वे भेदिए और जिन्होंने उनकी गलत जानकारी पर विश्वास किया वे सब नष्ट हो गए; उनके शव जंगल में गिर पड़े। लेकिन यहोशू और कालिब का क्या हुआ? उन्होंने उस परिस्थिति को अपने विश्वास के साथ देखा, और वे प्रतिज्ञा की भूमि कनान में प्रवेश कर सके।
कभी–कभी हम विचार में छोटे से अन्तर की उपेक्षा करते हैं। हालांकि, बाइबल हमें दिखाती है कि विचारों में छोटा सा अन्तर भी परिणाम में एक बहुत बड़ा अन्तर लाता है; परमेश्वर की किसी को चुनने की प्रक्रिया उनके दृष्टिकोण पर निर्भर है। कनान देश को देखने के दो अलग अलग दृष्टिकोण थे और दो अलग परिणाम थे; कोई उस देश में प्रवेश कर सका और कोई न कर सका। इस युग में भी, हमारे दृष्टिकोण से यह तय होता है कि हम स्वर्गीय कनान में प्रवेश कर सकेंगे या नहीं। सिर्फ वही जो परमेश्वर के किसी भी वचन को तुच्छ नहीं समझता, परमेश्वर के द्वारा चुने जाने के योग्य होता है।

लूक 16:10 जो थोड़े से थोड़े में सच्चा है, वह बहुत में भी सच्चा है: और जो थोड़े से थोड़े में अधर्मी है, वह बहुत में भी अधर्मी है।

ऊपर के मसीह के वचन हमें सिखाते हैं कि छोटी शुरुआत से बड़ी चीजें. पैदा होती हैं; छोटी बातों में विश्वसनीयता से बड़ी बातों में विश्वसनीयता आती है, और एक छोटे से अन्याय से बड़ा अन्याय होता है। “हजारों कदमों की यात्रा केवल एक कदम से शुरू होती है।” “बहुत सी बूंदें मिलकर बौछार बनती है।” “रोम एक ही दिन में नहीं बनाया गया था।” ये मुहावरे हमें दिखाते हैं कि सभी बड़ी चीजें छोटी चीजों से बनी हैं।
फल पैदा करने में भी वैसा ही है। चाहे हम ज्यादा फल पैदा करना चाहते हैं, लेकिन हम हजारों लोगों के मनों को एक साथ नहीं बदल सकते। “जो एक जीवन बचाता है वह पूरे संसार को बचाता है।” जब हम हर प्रत्येक मनुष्य की आत्मा को मूल्यवान समझें और उसे परमेश्वर की ओर ले आएं, तो हम परमेश्वर को प्रसन्न करनेवाले फल बहुतायत से पैदा करेंगे। हम, स्वर्ग की सन्तानों को, छोटी बातों में विश्वसनीय होकर, अपने पिता और माता की सहायता करनी चाहिए।

मेरोज के लोगों को शाप दिया गया क्योंकि उन्होंने इस्राएल की सहायता नहीं की



न्या 5:23 “यहोवा का दूत कहता है कि मेरोज को शाप दो, उसके निवासियों को भारी शाप दो, क्योंकि वे यहोवा की सहायता करने को, शूरवीरों के विरुद्ध यहोवा की सहायता करने को न आए।

जब न्यायी इस्राएल पर शासन करते थे, उन दिनों में इस्राएलियों ने दबोरा नबिया के मार्गदर्शन में विजय प्राप्त की थी। जब वे विजय का जयगान कर रहे थे, परमेश्वर के दूत ने कहा, “मेरोज को शाप दो।” क्योंकि जब परमेश्वर अपने शत्रुओं से लड़ाई करते थे, तो उन्होंने उनकी सहायता नहीं की थी।
उनकी सहायता के बिना, परमेश्वर युद्ध जीत सके। हालांकि, परमेश्वर ने उन्हें सिर्फ इसलिए शाप दिया कि वे परमेश्वर की उनके कार्य में सहायता करने के लिए नहीं आए।
एक बहुत तुच्छ वस्तु भी परमेश्वर के दृष्टिकोण में बहुत बड़ी हो सकती है, और एक बड़ी वस्तु छोटी हो सकती है। परमेश्वर हमें उनके कार्य में सहायता करते हुए, छोटे कार्यों में भी विश्वसनीय होने के लिए कहते हैं। यह इसलिए नहीं है कि वह उस कार्य को स्वयं नहीं कर सकते। चाहे संसार के सभी छह अरब लोग परमेश्वर की सहायता करें, तो भी उनकी सहायता ‘डोल में की एक बून्द’ और ‘पलड़ों पर की धूल’ के तुल्य होगी। वह परमेश्वर के सामने शून्य से भी घट ठहरेगी।(यश 40:15–17)
परमेश्वर सामर्थ्यवान हैं। हमारी सहायता के बिना, वह स्वयं ही सब कुछ कर सकते हैं। परमेश्वर ने उन्हें आशीर्वाद दिया जिन्होंने छोटी बातों में भी विश्वसनीय होकर उनकी सहायता की, और उन्हें शाप दिया जिन्होंने छोटी बातों में भी उनकी सहायता नहीं की।
हमारी सहायता परमेश्वर के लिए तो कुछ भी नहीं है। फिर भी, परमेश्वर हमें सुसमाचार का प्रचार करने की आज्ञा देते हैं। वह अपनी महान सामर्थ्य के द्वारा एक ही दिन में अपनी सभी 1,44,000 सन्तानों को ढूंढ़ सकते हैं। यह हमारे लिए ही अच्छा है कि परमेश्वर अपने महान कार्य में अपने सहकर्मियों के रूप में हमें सहायता करने के लिए पूछें। परमेश्वर जो छोटे कार्य हमने किए हैं उन्हें बड़ा समझते हैं और हमें भरपूर आशीर्वाद देते हैं। वह छोटी बातों में हमारी विश्वसनीयता के लिए हमें अनन्त ईनाम देते हैं।

आज, बहुत से लोग कहते हैं कि दुनिया का अन्त आ रहा है। यदि परमेश्वर कल न्यायी के रूप में आएं, तो हम, जिन्हें अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा दी गई है, आज तक जो हमने किए उन सभी कार्यों के बदले में परमेश्वर से ईनाम पाएंगे।
जैसे हमारे कार्य होंगे, उसके अनुसार हम में से कुछ स्वर्ग में अनन्त काल के लिए दो शहरों का अधिकार प्राप्त करेंगे, और कुछ दस शहरों का अधिकार प्राप्त करेंगे। हम जिस अनन्त स्वर्ग के राज्य में जा रहे हैं वहां न कोई मृत्यु है या न कोई पीड़ा है या न कोई दु:ख है; और वहां दूसरा कोई मौका भी नहीं है।
हमारे लिए इस पृथ्वी पर मौके अभी भी मौजूद हैं। जब हम सब स्वर्ग में उठाए जाएंगे, तो ईनाम पाने के योग्य किसी प्रकार की तकलीफ या पीड़ा नहीं होगी।
परमेश्वर ने हमें सुसमाचार का कार्य सौंपा है, ताकि हम उनकी महिमा में सहभागी हो सकें। चाहे हम प्रचार न करें तो भी परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा। हमारी सहायता न होने पर भी, परमेश्वर को अपना कार्य करने में थोड़ी सी भी तकलीफ नहीं आएगी। हमें महान और बड़े ईनाम देने के लिए, परमेश्वर ने हमें यहां इस पृथ्वी पर सुसमाचार का प्रचार करने का कार्य सौंपा है।
आइए हम इस मौके को न छोड़ें और छोटी बातों में भी परमेश्वर का पालन करें। आइए हम चाहे छोटी हो या बड़ी हो, सब बातों में विश्वसनीय रहें और परमेश्वर की सहायता करें। हम सब के लिए इस समय मौके खुले हैं। यह अनन्त ईनाम को पाने का एक मौका है। जब हम परमेश्वर और उनके वचनों के प्रति छोटी बातों में भी विश्वसनीय रहें, तो हम सम्पूर्ण विश्वसनीयता को पा सकते हैं, जैसे कि परमेश्वर ने हम से कहा है, “प्राण देने तक विश्वासी रह।”(प्रक 2:10)
आशीर्वाद या शाप इस बात पर निर्भर करता है कि हम छोटी बातों में विश्वासी हैं या नहीं। हमें हर छोटी बात का और परमेश्वर के प्रत्येक वचन का पालन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। तब, परमेश्वर हमारे छोटे हाथों को महान समझेंगे और हमें अपनी पसन्द के योग्य समझेंगे; वह हमें उन सभी अच्छी वस्तुओं को भोगने देंगे जो उन्होंने स्वर्ग में हमारे लिए तैयार की हैं।