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अपने जीवन का अंदाज़ सुसमाचार के सुयोग्य होने दे

अब, जैसे कि परमेश्वर ने योजना की थी, सुसमाचार का कार्य संपूर्ण हो रहा है; हमारे स्वर्गीय परिवार के बहुत सदस्य जो पूरे संसार में बिखर गए थे, अब सिय्योन की ओर आ रहे हैं। सुसमाचार का और परमेश्वर के पवित्र नाम का प्रचार करने वालों के पांव अब और तेज़ी से चल रहे हैं। परमेश्वर को बहुत धन्यवाद!
मैं अच्छे से जानता हूं कि अब सुसमाचार का प्रचार करना सिय्योन के सभी भाइयों और बहनों में एक रीति बन गया है। अब, परमेश्वर की शिक्षाओं के द्वारा, आइए हम इस बात पर विचार करें कि कैसे हम सुसमाचार के सुयोग्य जीवन जी सकते हैं।

कुछ देने में पाने से ज्यादा आशीष है



हम प्रार्थना करने, अध्ययन करने और प्रचार करने के द्वारा खुद का नेतृत्व सुसमाचार के सुयोग्य अंदाज़ में करने की कोशिश करते हैं। अंदाज़ या शैली किसी व्यक्ति के विचार और आत्मा से पैदा होता है। इसलिए वह अंदाज़ जो सुसमाचार के सुयोग्य है, परमेश्वर को प्रसन्न करने वाले विचारों से पैदा होता है। बाइबल हमें कहती है कि सुसमाचार के सुयोग्य अंदाज़ क्या है।

प्रे 20:35 मैं ने तुम्हें सब कुछ करके दिखाया कि इस रीति से परिश्रम करते हुए निर्बलों को सम्भालना और प्रभु यीशु के वचन स्मरण रखना अवश्य है, जो उसने आप ही कहा है: ‘लेने से देना धन्य है।’

परमेश्वर हम से सबसे ज्यादा जो मांगते हैं वह है कि हम प्रेम पर आधारित होकर देने का अंदाज़ धारण करें। परमेश्वर चाहते हैं कि हम कुछ भी, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, दूसरों से पाने के बजाय उन्हें दें। यदि हम प्रेम की परिभाषा या परमेश्वर के आशीर्वाद पाने के रास्ते को पूर्ण रूप से न समझें, तो शायद हम अपने पड़ोसियों और समाज को हानि पहुंचाएं और आशीर्वाद न पा सकें।
जब हम दूसरों की सहायता करते हैं, तो परमेश्वर के आशीर्वाद हमारे पास आते हैं। सबसे महान सहायता जो मर रहे हैं उन्हें जीवन का रास्ता सिखाना ही होगा। प्रेरित पौलुस एक अच्छा उदाहरण है। उसने बहुत से लोगों को मृत्यु से छुड़ाया और परमेश्वर से बड़ी आशीष पाई।
आइए हम सुसमाचार के लिए अपने जीवन के अंदाज़ के बारे में सोचें। हम कौन सी ओर थे, देने की या लेने की? “परमेश्वर ने मुझे यह क्यों नहीं दिया? क्यों उन्होंने मुझे इस बार आशीर्वाद नहीं दिया?” ऐसा सोचने के बजाय, हमें सोचना चाहिए, “हमें बचाने और हमारी सुरक्षा करने के लिए परमेश्वर कितने दर्द उठा रहे हैं! 6,000 सालों के लिए परमेश्वर भविष्यवाणियों को पूरा करने के लिए लगातार कार्य कर रहे हैं। अब, मैं उनके लिए क्या कर सकता हूं?” इस तरह से, यदि हम परमेश्वर की दया का बदला देने की कोशिश करें, तो हम सुसमाचार के बहुत फल पैदा करेंगे और परमेश्वर को प्रसन्न करेंगे।

यदि हम अपने आपका सुसमाचार के सुयोग्य अंदाज़ में नेतृत्व करना चाहते हैं, तो हमें पाने के बजाय देना चाहिए। यदि हमें पाना पसंद है, तो शायद हम दूसरों को तकलीफ देंगे या मानसिक रूप से या वस्तुत: कुछ खो देंगे। यह सुसमाचार के सुयोग्य अंदाज़ नहीं है। जो सिर्फ पाना चाहता है वह उस मनुष्य के समान है जो अपनी प्यास बुझाने के लिए समुद्र का पानी पीता है; जितना ज्यादा वह पीता है, उतनी ही उसे ज्यादा प्यास लगती है। वैसे मनुष्य को कभी भी संतुष्टि नहीं होगी। वह हमेशा कुड़कुड़ाता है और जल्द ही उसे ज्यादा देने के लिए कहता है, फिर चाहे वह जो उसने मांगा हो उसे पहले से दिया गया क्यों न हो। चाहे परमेश्वर ने उसे बहुतायत का आशीर्वाद दिया हो, वह निरंतर मांगता रहता है जैसे कि वह खाली हो गया हो।
उसके विपरीत, जो धन्यवाद के साथ सुसमाचार का कार्य करता है वह हमेशा दूसरों की सहायता करने की कोशिश करता है, फिर चाहे वह कमजोर और निर्बल हो; वह परमेश्वर को प्रसन्न करने और उनकी सहायता करने की कोशिश करता है। उसके परिणाम स्वरूप, उसका जीवन आशावादी और बहुतायत से आशीर्वादित हो जाता है।

प्रेम का अर्थ है, दूसरों की भलाई चाहना



बाइबल में उन लोगों के बारे में बहुत सी घटनाएं हैं जिन्होंने लगातार दिया और आशीर्वादित हुए, और उन लोगों के बारे में जिन्होंने हमेशा पाना चाहा और आशीर्वादों से वंचित हो गए।
परमेश्वर हमेशा हमें प्रेम देते हैं। इस क्षण तक वह हमें सिर्फ देते आए हैं। अपना लहू बहाकर, उन्होंने हमें प्रेम दिया, और अपना मांस फाड़ कर, हमें अनन्त जीवन दिया। वह हम पापियों के लिए जिन्हें मरना नियुक्त था, पृथ्वी पर शरीर पहनकर आए।
शैतान के द्वारा नई वाचा नष्ट कर दी गई थी, इसलिए हमारे परमेश्वर ने तीन बार में सात पर्वों समेत अपने सभी नियमों और विधियों को जो स्वर्ग में या पृथ्वी पर या पृथ्वी के नीचे कोई नहीं ला सकता था, पुन:स्थापित किया, और हमें जीवन दिया।
सिर्फ मसीह हमें जीवन दे सकते हैं और अपने नियमों की पुन:स्थापना कर सकते हैं, इसलिए वह इस पृथ्वी पर दुबारा आए। चूंकि वह हमें यह सब कुछ मुफ्त में देने आए थे, इसलिए उनका जीवन शर्म, पीड़ा और बलिदान से भरपूर था। मसीह, हमारे सृजनहार ने हम से कुछ भी लेना नहीं चाहा, लेकिन हमेशा हमें सब कुछ दिया।
अब हम आशा रखते हैं कि सुसमाचार प्रचलित हो जाएगा और हम बहुत से फल पैदा करेंगे। और इसके लिए, हमें दूसरों की सहायता करने की और दूसरों का भला करने की कोशिश करनी चाहिए। जब हम दूसरों की अनन्त जीवन, परमेश्वर के वचन और प्रेम पाने के लिए सहायता करते हैं, तो सिय्योन में कोई भी मुसीबत नहीं होती; सिर्फ प्रेम बहेगा, और सुसमाचार के फल प्रचुर हो जाएंगे और हमारा उद्धार जल्द ही पूरा हो जाएगा।

1कुर 13:4–7 प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता... वह सब बातें सह लेता है, सब बातों की प्रतीति करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है।

जब हम प्रेम का अभ्यास करें, तो उस प्रेम का आधार स्वार्थ नहीं, परन्तु दूसरों की चिन्ता होना चाहिए। ‘मेरा स्वयं का भला न खोजने’ का अर्थ है कि ‘मेरी स्वयं की सहूलियत और आसानी के लिए दूसरों को परेशानियां न देना।’
यदि हम परेशान होने की वजह से अपने भाई पर गुस्सा करें और चिल्लाएं, तो हम उसे बहुत चोट पहुंचा सकते हैं। यदि हम परेशान या चिन्तित होते हुए भी अपने भाई के साथ सहनशील और विनम्र रहें, तो वह भी हमारे साथ प्रेम से व्यवहार करेगा। तब हमारे बीच में मुस्कान खिलेगी और हम सब शांति और मेल भाव से रहेंगे।
इस तरह से, दूसरों की भलाई चाहना प्रेम को अभ्यास में लाने का एक महत्वपूर्ण तत्व है। अब तक हम बहुत सी आत्माओं को एक ईमानदार हृदय के साथ उद्धार की ओर ले आए हैं। हमारे प्रयासों को व्यर्थ न होने देने के लिए, हमें इन शब्दों को प्रतिदिन याद करना चाहिए, “प्यार पाने से प्यार देने में ज्यादा आशीष है,” और “प्रेम स्वार्थी नहीं होता।”
यदि प्रत्येक पादरी, सत्य में जिन्हें समस्याएं हैं उन्हें सान्त्वना देते हुए, अपनी भेड़ों की आत्मिक सहायता करें, और चर्च के सदस्य पादरी के पद को समझें और एक दूसरे की प्रशंसा करके और एक दूसरे को प्रोत्साहन देते हुए उनका बोझ थोड़ा हल्का करें, तो शैतान कभी भी चर्च को धोखा नहीं दे सकता। हालांकि, यदि भाई भाई की ईर्ष्या करें और एक दूसरे के विरुद्ध बातें करें, तो उस चर्च का क्या होगा?

1कुर 6:6–9 तुम में भाई–भाई में मुकद्दमा होता है, और वह भी अविश्वासियों के सामने... क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे?...

जो दूसरों की भलाई चाहते हैं उनके हृदयों में कोई भी दुष्टता नहीं होती।
हालांकि, जो अपनी भलाई की खोज में रहते हैं; जो सिर्फ कुछ पाने की चाह रखते हैं, वे अपने हृदयों में बुराई और दुष्टता भर देते हैं; वे उनसे ईर्ष्या महसूस करते हैं जिनकी प्रशंसा होती है और वे अपने आपको ऊंचा करने की कोशिश करते हैं; और वे मतभेद पैदा करते हैं और शैतान के द्वारा दिए गए अपने विकृत और धूर्त हृदय के कारण कष्ट उठाते हैं। आख़िरकार, उनके नाम जीवन की पुस्तक में नहीं लिखे जाएंगे, और न्याय के दिन वे परमेश्वर के कड़े स्वर को सुनेंगे कि वे परमेश्वर के राज्य के उत्तराधिकारी नहीं बन सकते।
जो दूसरों के साथ अच्छी चीजों को बांटने की कोशिश करते हैं, और जिनकी परमेश्वर के द्वारा सराहना की जाती है, सिर्फ उनके नाम स्वर्ग में जीवन की पुस्तक में लिखे जाएंगे। इस बात को ध्यान में रखते हुए, हमें पाने के बदले देने की कोशिश करनी चाहिए।

एक कंजूस भिखारी का भाग



बहुत समय पहले, जब एक राजा यह देखने के लिए निकला कि लोग कैसा जीवन जीते हैं, वह एक भिखारी से मिला। भिखारी ने उस राजा से भीख मांगी। तब राजा ने उससे कहा, “पहले तू मुझे एक चीज दे, तो मैं तुझे दूंगा।” कुछ देर तक भिखारी के सोचने के बाद, उसने अपने थैले में से जिसमें एक कद्दू और कुछ आलू थे, एक मकई निकाली। तब उसने उसमें से तीन मकई के दाने तोड़े और दु:ख के साथ उसे राजा को दिया। उस कंजूस भिखारी के लिए, जिसने उस समय तक किसी को कुछ भी नहीं दिया था लेकिन सिर्फ दूसरों से पाया था, तीन दाने देना भी बहुत बड़ी उदारता थी। उन तीन मकई के दानों को देखकर, राजा ने अपने सेवक से उसे तीन सोने के टुकडे. देने को कहा; प्रत्येक टुकड़ा मकई के दाने के आकार का था।
यदि भिखारी ने राजा को पूरी मकई या आलू या बड़ा कद्दू दिया होता, तो उसने जो दिया उसके आकार के अनुसार सोने की एक बड़ी मात्रा पाई होती। हालांकि, वह सिर्फ पाना चाहता था और देना नहीं चाहता था, इसलिए उसने उतना आशीर्वाद पाया जिसके लिए वह योग्य था। इस तरह से, जो देने की आदत नहीं बनाता वह ज्यादा नहीं दे सकता और फलत: वह महान आशीर्वाद को भी नहीं पा सकता।

पहले प्रेम देना ही सुसमाचार के सुयोग्य अंदाज़ है



जब हम अपने भाइयों और बहनों को आत्मिक भोजन देते और कमजोरों के लिए प्रार्थना करते और एक दूसरों की सहायता करते हुए देखते हैं, तो हम द्रवित हो जाते हैं। ऐसा, प्रेम को बांटता जीवन सुसमाचार के सुयोग्य है।
“प्यार पाने से प्यार देने में ज्यादा आशीष है,” इन शब्दों के अनुसार, दूसरों की सहायता करने के मार्ग ढूंढ़िए और जितना मुमकिन हो उतना ज्यादा दीजिए। ‘परमेश्वर के लिए, भाइयों के लिए, पूरी मानवजाति के लिए मैं क्या कर सकता हूं?’ यदि हम उत्सुकता से देते जाएं, तो हम अपने आपको नम्र बना सकते हैं और बड़ा मन धारण कर सकते हैं।
हम सच्चे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और मसीह का मन धारण करके संसार के लोगों की भलाई की आशा करते हैं। जब हम ज्यादा प्रेम देते हैं, हमारा सुसमाचार का कार्य और भी शीघ्रता से संपूर्ण हो जाएगा।
जब परमेश्वर न्यायाधीश के रूप में आएंगे, तो हम अपने कार्यों के अनुसार इनाम पाएंगे। जिन्होंने दूसरों को अच्छी वस्तुएं दी हैं; जिन्होंने परमेश्वर के वचन उन्हें दिए हैं; वे बहुतायत से इनाम और परमेश्वर की प्रशंसा पाएंगे।
परमेश्वर की सन्तान के तौर पर, हमें अपने पड़ोसियों को उद्धार का सत्य देते हुए जो आत्मिक भोजन है, परमेश्वर का प्रेम देना चाहिए। परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने के अलावा, हमें प्रतिदिन सुसमाचार के सुयोग्य अंदाज़ में जीवन भी जीना चाहिए। आप सभी स्वर्गीय लोगों को परमेश्वर आशीर्वाद दें!