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छोटी शुरुआत और समृद्ध भविष्य

हम ऐसी आशा के साथ जीते हैं कि चाहे हमारी शुरुआत छोटी प्रतीत होती है, हमारा भविष्य परमेश्वर की कृपा के द्वारा समृद्ध होगा। परमेश्वर ने इस संसार में दूसरे लोगों को नहीं, लेकिन हम से प्रतिज्ञा की है। उस प्रतिज्ञा के शब्द ऐसे हैं:

अय 8:7 चाहे तेरा भाग पहले छोटा ही रहा हो, परन्तु अन्त में तेरी बहुत बढ़ती होती।

इस संसार में सब बातों के लिए एक समय होता है: शुरू होने का समय और समाप्त होने का समय। इसलिए, सुसमाचार के कार्य के लिए भी एक समय है। चाहे हमारे सुसमाचार के कार्य की शुरुआत छोटी थी, लेकिन जैसे जैसे वह आगे बढ़ता जाता है, वैसे वैसे वह और भी ज्यादा समृद्ध होता जाता है। पिछले दिनों में वह बढ़ा है, वर्तमान समय में बढ़ रहा है, और आगे भविष्य में भी वह और ज्यादा बढ़ेगा।

एक अदृश्य बल हमारे भविष्य को समृद्ध बनाता है



सब बातों के लिए एक शुरुआत और एक अंत होता है, और शुरुआत और अंत के बीच में कुछ प्रक्रिया होती है। तब, सुसमाचार के कार्य की प्रक्रिया में एक छोटी शुरुआत से एक समृद्ध अंत लाने के लिए कौन सा बल काम करता है? उस अदृश्य बल का स्रोत क्या है? आइए हम मत्ती की पुस्तक में देखें।

मत 9:27–30 जब यीशु वहां से आगे बढ़ा, तो दो अंधे उसके पीछे यह पुकारते हुए चले... “तुम्हारे विश्वास के अनुसार तुम्हारे लिये हो।” और उनकी आंखें खुल गईं।

दो अंधों ने संपूर्ण रूप से विश्वास किया था कि यीशु उनकी आंखें लौटाएंगे। उनके संपूर्ण विश्वास ने एक अद्भुत परिणाम लाया; वे अंधकार से बाहर आकर, एक प्रकाशमान ज्योति देख सके। इस तरह, जब हमारे पास एक संपूर्ण विश्वास है, तो परमेश्वर हमें एक समृद्ध भविष्य देते हैं। परमेश्वर उत्साही मन से हमें बार–बार कहते हैं, “तुम्हारे विश्वास के अनुसार तुम्हारे साथ हो।”
मान लीजिए कि हम एक मनुष्य से मिलते हैं जो परमेश्वर के सत्य की खोज में है। उसे सत्य के वचन सुनाते समय यदि हम ऐसा संदेह करें कि वह इसे स्वीकार करेगा या नहीं, तो हम कभी भी अच्छा फल नहीं पा सकते। हालांकि, यदि हम ऐसे पूर्ण विश्वास के साथ उसे परमेश्वर के वचन कहें कि परमेश्वर ने पहले से उसे बचाने की योजना बनाई है और हमें उस तक पहुंचाया है, तो हम अपने दृढ़ विश्वास के अनुसार कृपालु परिणाम पाएंगे।

हम इस सिद्धांत को चंद्र के द्वारा भी समझ सकते हैं। चंद्र अपना खुद का प्रकाश नहीं चमकाता; वह सिर्फ उसी प्रकाश को परावर्तित करता है जिसे वह सूर्य से पाता है। इसलिए चंद्र सिर्फ उतना ही दिखाई देता है जितना प्रकाश वह सूर्य से पाता है; यदि वह आधा चंद्र सूर्य–प्रकाश पाता है, तो आधा चंद्र दिखाई देता है; यदि वह बहुत थोड़ा सा प्रकाश पाता है, तो उसका बहुत पतला सा भाग दिखाई देता है; और यदि वह पृथ्वी के सूर्य–प्रकाश को न रोकने के कारण सूर्य–प्रकाश की अच्छी मात्रा ग्रहण करे, तो पूर्ण चंद्र दिखाई देता है।
बाइबल कहती है कि परमेश्वर ज्योति हैं।(1यूह 1:5) उनकी ज्योति पूरे ब्रह्माण्ड में प्रकाशित होती है। हम, चंद्र के समान, उनकी ज्योति को ग्रहण करते हैं और अंधेरे संसार को वापस देते हैं। जैसे कि चंद्र का प्रकाशमान होना उस मात्रा पर निर्भर करता है जो वह सूर्य से ग्रहण करता है, वैसे ही सुसमाचार की ज्योति की चमक भी हमारे विश्वास की दशा पर निर्भर करती है। यदि हमारे विश्वास की मात्रा नवचंद्र जैसी है तो, हम एक नवचंद्र की जितनी ज्योति है उसे संसार को देंगे, और यदि वह आधा चंद्र जैसी है, तो हम एक आधे चंद्र की जितनी ज्योति है उसे संसार को देंगे। एक नवचंद्र या आधा चंद्र जैसी विश्वास की मात्रा के द्वारा, हम पूर्ण चंद्र की तरह संपूर्ण ज्योति नहीं दे सकते।
जब हम परमेश्वर की सामर्थ्य और कृपा की ज्योति संसार को दें, तो हमारे विश्वास की चमक कितनी होनी चाहिए? परमेश्वर हमेशा हम से कहते हैं, “तुम्हारे विश्वास के अनुसार तुम्हारे साथ हो।”

लूक 5:18–26 उस समय कोई लोग एक मनुष्य को जो लकवे का रोगी था, खाट पर लाए... उसने उनका विश्वास देखकर उससे कहा, “हे मनुष्य, तेरे पाप क्षमा हुए।”...

लकवे का रोगी और वे मनुष्य जो उसको उठाए हुए थे, उनके पास ऐसा दृढ़ विश्वास था कि यीशु के पास उसे चंगा करने की शक्ति थी। उनके विश्वास को देखकर, यीशु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उन्हें उनके पापों से क्षमा किया।
यदि हम सिर्फ प्रत्यक्ष वस्तुओं के बारे में सोचें, तो हमारा विश्वास गिर जाएगा; लेकिन यदि हमारे पास विश्वास है, तो प्रत्यक्ष वस्तुएं गिर जाएंगी। व्यावहारिक बुद्धि और विश्वास दोनों हमेशा एक दूसरे के विरोधी होते हैं। जिनके पाप क्षमा किए गए थे, वे अपनी व्यावहारिक बुद्धि पर नहीं, लेकिन यीशु पर निर्भर थे; विश्वास के द्वारा उन्होंने ऐसी परेशानियों को सुलझाया जो व्यावहारिक बुद्धि से नहीं सुलझ सकती थीं।
यदि हम एक समृद्ध भविष्य की आशा करते हैं, तो हमारे पास उस लकवे के रोगी के समान संपूर्ण विश्वास होना चाहिए। जब हम ऐसा संपूर्ण विश्वास रखें और ईमानदारी से अपना कार्य करें, तो हमारा भविष्य समृद्ध और कृपालु होगा।

मत 5:1–12 ... “धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। “धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शांति पाएंगे...

यद्यपि आत्मिक रूप से कमजोर लोग दीनता से शुरुआत करते हैं, बाद में वे स्वर्ग के राज्य से आशीर्वादित होते हैं; यद्यपि वे विलाप करते हुए शुरुआत करते हैं, उन्हें शान्ति दी जाती है। परमेश्वर हमारी शुरुआत तकलीफों में कराते हैं, लेकिन वह हमारे अंत को निश्चित रूप से आगे बढ़ाएंगे।

समृद्ध भविष्य के लिए उठो और प्रकाशमान हो जाओ



एक समृद्ध भविष्य की ओर आगे बढ़ते हुए, हम बहुत सी तकलीफों का सामना कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण चीज हमारा विश्वास है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर सब कुछ कर सकते हैं। एक बार हम शुरुआत करें, तो परमेश्वर निश्चित रूप से हमारे भविष्य को समृद्ध बना देंगे। हमें विश्वास करना चाहिए कि वह ऐतिहासिक क्षण जरूर आएगा जब हम समृद्ध बन जाएंगे।

यश 60:1–22 उठ, प्रकाशमान हो; क्योंकि तेरा प्रकाश आ गया है, और यहोवा का तेज तेरे ऊपर उदय हुआ है... जाति जाति तेरे पास प्रकाश के लिये और राजा तेरे आरोहण के प्रताप की ओर आएंगे।

फिलहाल, हमारे स्वर्गीय परिवार के बहुत से सदस्य सिय्योन में उमड़कर आ रहे हैं। हमारे सिय्योन के भाई और बहनें ज्यादा आत्माओं को मन फिराव और उद्धार की ओर ले आने के जोश की आग से जल रहे हैं। सभी जातियां और राजा हमारे द्वारा परमेश्वर की ज्योति को देखेंगे और बादल के समान, और अपने दरबों की ओर आते कबूतर के समान सिय्योन में उड़ चले आएंगे। जब हम ऐसे एक समृद्ध भविष्य में विश्वास रखते हैं, तो परमेश्वर हमारी आशा को पूरा कर देंगे।
“छोटे से छोटा एक हजार हो जाएगा और सब से दुर्बल एक सामर्थी जाति बन जाएगा। मैं यहोवा हूं; ठीक समय पर यह सब कुछ शीघ्रता से पूरा करूंगा।”(यश 60:22) इस प्रतिज्ञा पर विश्वास करते हुए, हमें सभी पीड़ाएं और तकलीफों को पार करना चाहिए।

यश 61:1–9 प्रभु यहोवा का आत्मा मुझ पर है... जितने उनको देखेंगे, पहिचान लेंगे कि यह वह वंश है जिसको परमेश्वर ने आशीष दी है।

वे लोग कौन हैं जिन्हें परमेश्वर ने आशीर्वादित किया है? क्या वे 1,44,000 नहीं जिन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा पाई है? शुरुआत किए बिना, हम एक समृद्ध भविष्य नहीं पा सकते। परमेश्वर ने हम से यह प्रतिज्ञा की है, “चाहे तेरा भाग पहले छोटा ही रहा हो, परन्तु अन्त में तेरी बहुत बढ़ती होती।” जैसे कि प्रतिज्ञा की गई है, हमारा भविष्य निश्चित रूप से समृद्ध होगा। परमेश्वर ने ऐसा भी कहा है, “तुम्हारे विश्वास के अनुसार तुम्हारे साथ हो।” हमारे पास एक दृढ़ विश्वास होना चाहिए ताकि हम एक महान भविष्य पा सकें। चाहे परमेश्वर के कार्य की शुरुआत छोटी दिखाई देती है, उसका अंत बहुत बड़ा होगा; परमेश्वर अपने समय पर सब कुछ पूरा करेंगे।
भाइयो और बहनो, आइए हम परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा रखें और हमारे विश्वास को कार्य में लाएं। आइए हम परमेश्वर की और उत्सुकता से आराधना करें और उनकी इच्छा के अनुसार संसार को उद्धार के सुसमाचार का प्रचार करें। परमेश्वर आप सब परमेश्वर की सन्तानों को आशीर्वाद दें!