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जब तक तुम में मसीह का रूप न बन जाए

उस दिन जब हम अपने परिश्रमों से विश्राम पाएंगे, हम में से हर एक अपने पिछले दिनों के परिश्रमों की याद करेगा। जब सुसमाचार का प्रत्येक कार्य, जो हमने संसार में किया है, स्वर्ग में लिखा जाएगा, तब यह देखा जाएगा कि हमने स्वर्ग की आशीष पाने के योग्य मसीही जीवन जिया है या नहीं। इसके साथ हमारा न्याय किया जाएगा।

इस से पहले कि बचाव का दिन भूसी के समान जाता रहे, हमें सोचना चाहिए कि हमने स्वर्ग जाने के लिए अभी तक क्या तैयार नहीं किया है। जब दस कुंवारियों का दृष्टान्त देखें, पांच कुंवारियों ने तैयार होने से दुल्हे का स्वागत किया, लेकिन पांच कुंवारियां तैयार न होने से विवाह भोज में नहीं जा सकीं।(मत 25:1–13)

स्वर्ग जाने के लिए, मुख्य बात यह है कि हमारे पास परमेश्वर है या नहीं। मैं निवेदन करता हूं कि आप परमेश्वर का दिया हुआ समय बेकार में बिताने के बजाय, अनन्त मृत्यु की ओर ले जाने वाले सांसारिक विचार व लालच को छोड़ने की कोशिश करें और हमेशा परमेश्वर में बसते रहें। आइए हम दृढ़ विश्वास करें कि बाइबल में लिखी हुई सभी भविष्यवाणियां निश्चय ही पूरी होंगी, और समय को, चाहे समय एक मिनट हो या एक सेकंड हो, गंभीरता से बिताते हुए, एक आत्मा बचाने के कार्य में और मन लगाएं।

हमारा शरीर परमेश्वर का मंदिर है



परमेश्वर के लोग स्वयं परमेश्वर के मंदिर हैं जहां परमेश्वर ठहरता है। और वे पवित्र लोग हैं जैसे परमेश्वर पवित्र हैं, क्योंकि परमेश्वर हमेशा उनके पास रहता है,

1कुर 3:16–17 “क्या तुम नहीं जानते कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है? यदि कोई परमेश्वर के मन्दिर को नष्ट करे तो परमेश्वर उसे नष्ट करेगा; क्योंकि परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह तुम हो।”

यदि कोई परमेश्वर के मन्दिर को नष्ट करे तो परमेश्वर उसे नष्ट करेगा। मूर्ति पूजा ही मन्दिर नष्ट होने का कारण बनती है। जब हम पुराने नियम के इतिहास को देखें, परमेश्वर का मन्दिर बहुत बार, हर प्रकार की मूर्ति से भरपूर हो गया था, और इससे वह परमेश्वर के क्रोध से नष्ट किया गया। लेकिन हिजकिय्याह और योशिय्याह राजा ने फसह मनाने के द्वारा सभी मूर्तियों को हटा दिया और मन्दिर को पवित्र किया, जिससे उन्होंने आशीष पाई।

यदि हम उस परमेश्वर को, जो हम में बना रहता है, सही रूप से न पहचानें, तब ऐसा अजीब परिणाम निकलेगा कि हम दूसरी मूर्तियों की पूजा करेंगे। जैसे कि इस्राएलियों ने परमेश्वर की पूजा करने का दावा तो किया, लेकिन बिना सोचे–समझे मन्दिर में बाल, अशेरा आदि हर प्रकार की मूर्ति की पूजा की।

हम फिर से यह मन में लगाएं कि हम परमेश्वर के मन्दिर हैं। पिता के युग में लोग वह मन्दिर थे जिसमें यहोवा परमेश्वर ठहरता था, और पुत्र के युग में लोग वह मन्दिर थे जिसमें यीशु मसीह ठहरता था, और इस पवित्र आत्मा के युग में हमें वह मन्दिर होना चाहिए जिसमें एलोहीम परमेश्वर, पवित्र आत्मा और दुल्हिन ठहरते हैं। प्रेरित पौलुस के अन्दर भी हमेशा परमेश्वर का वास था, जिससे वह परमेश्वर के साथ चलता था।

गल 2:20 “मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं.। अब मैं जीवित नहीं रहा, परन्तु मसीह मुझ में जीवित है, और अब मैं जो शरीर में जीवित हूं, तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझ से प्रेम किया और मेरे लिए अपने आप को दे दिया।”

गल 6:14–17 “परन्तु ऐसा कभी न हो कि मैं किसी अन्य बात पर गर्व करूं, सिवाय प्रभु यीशु मसीह के क्रूस के, जिसके द्वारा संसार मेरी दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया जा चुका है, और मैं संसार की दृष्टि में। ... अब से मुझे कोई दुख न दे, क्योंकि मैं यीशु के दाग़ों को अपने शरीर में लिए फिरता हूं।”


पौलुस ने कहा, “मैं क्रूस पर चढ़ाया गया हूं।” यह कहने का मतलब है कि वह अपने अन्दर खुद का त्याग करके आत्मिक रूप से मर गया है। इस तरह, जब हम खुद पाप के कारण क्रूस पर चढ़ाए जाकर मर जाएं, और हमारे अन्दर केवल मसीह ही जीवित रहे, तब हम असली मसीही बनेंगे।

पौलुस कभी सदस्यों को वचन सिखाता था, तो कभी स्वर्ग की आशा दिलाता था, कभी जनता के बीच अपने विश्वास का अंगीकार करता था। इससे वह बहुत कोशिश करता था कि सदस्यों के हृदय में सांसारिक वस्तु नहीं, परन्तु केवल मसीह ही निवास कर सके। ऐसा करते हुए, पौलुस अपने में यीशु के दुख का दाग़ भी ले सका।

मसीह का रूप और मसीह की खुशबू बनो



यदि हमारे अन्दर परमेश्वर का निवास है, तो हमसे परमेश्वर की इच्छा और कार्य प्रकट होगा। लोग जो खुशबू से भरे हुए हैं, उनसे हमेशा खुशबू निकलती है। उसी तरह, लोग जिनमें परमेश्वर रहता है, उनसे सहजता से परमेश्वर की खुशबू फैलती है।

एलोहीम परमेश्वर में सभी मानव को बचाने का जोश है। इसलिए लोग जिनमें एलोहीम परमेश्वर का निवास है, उनमें भी वह ही जोश रहेगा, और उनमें उस स्वर्गीय पिता और माता की खुशबू होगी जो अन्त तक सन्तान के मन को पछतावे व उद्धार की ओर फिराते हैं, और अपनी सन्तान की देखभाल करते हैं और उनसे ऐसे प्रेम करते हैं जैसे वे झुके सरकंडे तक को न तोड़ते हों और बुझते दीपक तक को न बुझाते हों।
पुराने समय से आज तक, बहुत लोग अपने गुण और स्वभाव को उन्नत, सभ्य, समर्थ आदि बनाने के लिए, हर प्रकार की कोशिश करते आए हैं। फिर भी, अपनी कोशिश से कोई भी सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं पा सका। लेकिन जब हमारे अन्दर परमेश्वर निवास करता है, तब हमारा स्वभाव अपने आप ही बदलेगा।

जब हमारे अन्दर मसीह निवास करे, तब हम ‘ईश्वरीय स्वभाव’(2पत 1:4) में सहभागी हो सकेंगे। प्रेरित पौलुस को इसका गहरा एहसास हुआ था, इसलिए वह कोशिश करता था कि उसके अन्दर हमेशा मसीह जीवित हो, और वह सदस्यों के मसीह का रूप धरने तक पीड़ाएं सहता था।

गल 4:17–19 “ ... हे मेरे बच्चो, जब तक तुम में मसीह का रूप न बन जाए, मैं तुम्हारे लिए प्रसव की सी पीड़ा में हूं।”

आरम्भिक कलीसिया के सदस्य, परमेश्वर का रूप धरने तक, बहुत ज्य़ादा कठिनाइयों का सामना करते थे। कुरिन्थुस, गलातिया आदि क्षेत्र में, कभी कई लोग परमेश्वर पर पूरी तरह से विश्वास न करने के कारण भटक जाते थे, तो कभी कई लोग देमास के समान संसार के मोह में पड़ कर परमेश्वर को त्याग देते थे। पौलुस इससे बहुत खेदित होता था, और प्रसव की सी पीड़ा सहते हुए प्रयास करता था कि सदस्य पूरी तरह से मसीह का रूप धर सकें।
यदि हम में परमेश्वर का रूप न बनेगा, तब हम ईश्वरीय स्वभाव में भाग नहीं ले सकेंगे। जैसे कि परमेश्वर ने कहा कि ‘जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है’(यूह 15:1–8), जब परमेश्वर और हम एक बनें, तब हम पवित्र आत्मा का फल पैदा कर सकेंगे। इसी कारण परमेश्वर ने पौलुस के द्वारा इस प्रकार कहा;

यदि हम बदल न जाएं, तो स्वर्ग नहीं जा सकते



गल 5:16–26 “परन्तु मैं कहता हूं कि पवित्र आत्मा के अनुसार चलो ... क्योंकि शरीर तो पवित्र आत्मा के विरोध में और पवित्र आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करता है ... अब शरीर के काम स्पष्ट हैं, अर्थात् व्यभिचार, अशुद्धता, कामुकता, मूर्तिपूजा, जादूटोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, मतभेद, फूट, दलबन्दी, द्वेष, मतवालापन, रंगरेलियां तथा इस प्रकार के अन्य काम हैं ... ऐसे ऐसे काम करने वाले तो परमेश्वर के राज्य के उत्तराधिकारी न होंगे। परन्तु पवित्र आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, दयालुता, भलाई, विश्वस्तता, नम्रता व संयम हैं। ऐसे ऐसे कामों के विरुद्ध कोई व्यवस्था नहीं है। और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने अपने शरीर को दुर्वासनाओंतथा लालसाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है। यदि हम पवित्र आत्मा के द्वारा जीवित हैं तो पवित्र आत्मा के अनुसार चलें भी। हम अहंकारी न बनें, एक दूसरे को न छेड़ें, और न ही डाह रखें।”

पवित्र आत्मा के अनुसार चलने वाले लोग सांसारिक लालसा नहीं करते। जब हम पवित्र आत्मा की अगुवाई के अनुसार चलेंगे, तब शरीर की लालसा पूरी तरह से मिटती जाएगी। लेकिन हम शरीर की लालसा के अनुसार चलें, तो पवित्र आत्मा की लालसा से हमारा मन नहीं भरेगा।

शरीर के अनुसार चलें, तो हम परमेश्वर के राज्य का वारिस नहीं होंगे। बाइबल में बहुत बार लिखा है कि ऐसे काम जो अन्धकारपूर्ण हैं, उन बेकार के काम करने वाले लोग स्वर्ग नहीं जाएंगे।

इफ 5:1–14 “इसलिए प्रिय बालकों के सदृश परमेश्वर का अनुकरण करने वाले बनो, और प्रेम में चलो जैसे मसीह ने भी हम से प्रेम किया ... जैसा पवित्र लोगों के लिए उचित है, तुम्हारे मध्य न तो व्यभिचार, न किसी प्रकार के अशुद्ध काम, न लोभ का नाम तक लिया जाए, और न तो घृणित कार्य, न मूर्खतापूर्ण बातें, न ठट्ठे की बातें जो शोभा नहीं देती हैं पाई जाएं, वरन् धन्यवाद ही दिया जाए। क्योंकि तुम यह निश्चयपूर्वक जानते हो कि कोई व्यभिचारी, अशुद्ध जन, या लोभी मनुष्य अर्थात् मूर्तिपूजक, मसीह और परमेश्वर के राज्य का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता ... अत: ज्योति की सन्तान के सदृश चलो– क्योंकि ज्योति का फल सब प्रकार कीभलाई, धार्मिकता और सत्य है– परखो कि प्रभु किन बातों से प्रसन्न होता है। अन्धकार के निष्फल कामों में सहभागी न हो वरन् इन कामों को प्रकट करो ... ”

हमें ऐसे ही जीवन जीना चाहिए। मैं विश्वास करता हूं कि अधिकांश सदस्य तो इसे महसूस करके अनुग्रहमय जीवन जी रहे हैं। लेकिन कोई ऐसा सदस्य भी हो सकता है जो विश्वास से जीने का दावा करते हुए भी, शरीर की बेकार लालसाओं से भटक कर आत्माओं को बचाने की जिम्मेदारी को भूल गया है। यदि कोई ऐसा करता है, तो उसे जल्दी से जल्दी उन लालसाओं को छोड़ना चाहिए।

यदि परमेश्वर स्वर्ग से पृथ्वी को देखे, तो उसे पृथ्वी छोटे से धूलिकण या घड़े में एक छोटी बूंद जैसी लगती है। ऐसी पृथ्वी पर परमेश्वर ने अपना स्वर्गीय सिंहासन छोड़ कर एक असहाय और नम्र व्यक्ति का रूप धर कर जीने का चुनाव किया है। उसने यह इसलिए किया, क्योंकि वह हमें बचाना चाहता है। यदि ऐसा परमेश्वर हमारे अन्दर जीवित हो, तो हमें किस पर सबसे बड़ा ध्यान देना चाहिए? ‘उस आत्मा को उद्धार के पास ले जाने के लिए, मैं क्या करूं?’, ‘उस आत्मा को परमेश्वर के पास जाने के लिए, मैं कैसे उसकी अगुवाई करूं?’ इस तरह आत्मा का उद्धार करना ही, उस व्यक्ति की सब से बड़ी रुचि होगी जिसके अन्दर एलोहीम परमेश्वर कार्य करते हैं और प्रभाव डालते हैं।

यदि किसी का मन सांसारिक लालसाओं से भरा हुआ हो, तो वह ऐसा सोचने के बजाय कि ‘उद्धार के रास्ते पर जाने के लिए, मैं कैसे भाई की मदद करूंगा?’, हमेशा दिखावा करने पर और अपने को ऊंचे से ऊंचा उठाने पर ध्यान लगाएगा। शैतान ऐसे लोगों को हर प्रकार की परीक्षा देता है। यदि परमेश्वर सन्तान को अभी भी, बेकार और व्यर्थ वस्तुओं से पराजित हुए देखे, तो उसे कितना खेद होगा?

मसीह के जैसे, जब हम आत्मा बचाने के लिए अपना बलिदान दे सकेंगे, तब हम सम्पूर्ण मनुष्य के रूप में नया जन्म ले सकेंगे। गुणवत्ता पूर्ण बर्तन होने तक, कुम्हार बहुत बार बर्तन गढ़ता है और उसे आकार देता है। लेकिन यदि बर्तन पहले से ऐसा सम्पूर्ण उत्पाद बना है जो कुम्हार आखिर में चाहता है, तो फिर से चाक घुमाना, भट्ठे में डालना, और बर्तन पर मीनाकारी करना बिल्कुल जरूरी नहीं है। इसलिए पहले, हमारे अन्दर मसीह का रूप पूरी तरह से बनना चाहिए, तब हम मसीह के आने का इन्तज़ार कर सकेंगे।

मसीह की शिक्षा के अनुसार जीने का जीवन



पवित्र लोग, जो परमेश्वर की आज्ञाएं मानते हैं, अपने जीवन में उन शिक्षाओं को लागू करना चाहिए जो उन्होंने परमेश्वर से सीखी हैं। यदि हमारे अन्दर पिता और माता का वास है, तो हमें पिता और माता के जैसे, जो स्वर्ग में अपरम्पार महिमा को छोड़ कर हमारे उद्धार के लिए इस पृथ्वी तक आए हैं, लोगों को बचाने का काम पूरे मन, दिल और ईमानदारी से करना चाहिए।

इफ 4:17–32 “ ... तुमने तो मसीह को इस प्रकार नहीं जाना– यदि वास्तव में तुम ने उसके विषय में सुना और जैसा यीशु में सत्य है उसमें सिखाए भी गए, कि तुम पिछले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को उतार डालो जो भरमाने वाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है। और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नए बनते जाओ, और नए मनुष्यत्व को पहिन लो जो परमेश्वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है ... क्रोध तो करो पर पाप न करो। तुम्हारा क्रोध सूर्य अस्त होने तक बना न रहे। शैतान को अवसर न दो ... कोई अश्लील बात तुम्हारे मुंह से न निकले, परन्तु केवल ऐसी बात निकले जो उस समय की आवश्यकता के अनुसार उन्नति के लिए उत्तम हो, जिससे कि सुनने वालों पर अनुग्रह हो ... सब प्रकार की कड़ुवाहट, रोष, क्रोध, कलह और निन्दा, सब प्रकार के बैर–भाव सहित तुम से दूर किए जाएं। एक दूसरे के प्रति दयालु और करुणामय बनो, और परमेश्वर ने मसीह में जैसे तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।”

परमेश्वर ने शिक्षा दी है कि हम एक दूसरे से प्रेम करते हुए धार्मिक और पवित्र जीवन जीएं। लुचपन में लगे रहना, डाह करना, शिकायत करना, कुड़कुड़ाना आदि परमेश्वर की शिक्षा नहीं है। आइए हम पिछले दिनों की याद ताज़ा करते हुए सोचें कि क्या हमने मसीह की शिक्षाओं के अनुसार जीवन जिया है या नहीं। यह सोचे और पछताए बिना, हम स्वर्ग नहीं जा सकेंगे।

हम एक दूसरे के प्रति दयालु और करुणावान बनेंगे। जिसके अन्दर पिता और माता का वास है, वह क्रोध, ईर्ष्या और जलन जैसे दुष्कर्म में नहीं फंसा रहता। चाहे हम प्रेरित पौलुस के समान प्रसव की सी पीड़ा सहते हों, आइए हम भरपूर कोशिश करें कि हम भाइयों और बहनों के मन में परमेश्वर जमा कर, उन्हें सच्चे उद्धार की ओर ला सकें। जब ऐसे काम से हमारा हृदय धड़के और भावुक हो जाए, तो हम सच में ऐसे लोग कहलाएंगे जो मसीह का हृदय रखते हैं।

पिता और माता ने हम पर प्रतिज्ञा की हुई छाप लगा कर, हमें प्रतिज्ञा की सन्तान बनाया है, ताकि हम स्वर्ग के राज्य के वारिस हो सकें। परमेश्वर ने कहा कि हम इसहाक के समान प्रतिज्ञा की सन्तान हैं।(गल 4:28–29) जिस प्रकार इसहाक प्रतिज्ञा पाकर इब्राहीम का वारिस हुआ, उसी प्रकार हम भी प्रतिज्ञा पाकर स्वर्ग के वारिस हुए हैं। जो भी हो, कोई ऐसा गर्व करे कि ‘मैं स्वर्ग जाने की प्रतिज्ञा पा चुका हूं’ और वचन की अवहेलना करे, जल्दी गुस्सा करे, लालच करे, तो यह उसकी ग़लतफ़हमी होगी। चाहे वह परमेश्वर की आशीष पा चुका है, आशीष के योग्य जीवन न जीए, तो परमेश्वर ने कहा है कि उसकी आशीष छीन ली जाएगी और वचन के अनुसार उसका न्याय किया जाएगा।

शुद्ध करने वाला जल देने वाले एलोहीम परमेश्वर



हमारे अन्दर मसीह का रूप न बनने तक, अब से जल्दी ही तैयारी करेंगे। एक दिन में हमारा स्वभाव बदल नहीं सकता। चाहे स्वभाव कोशिश करते हुए भी, न बदल जाए, इसे असम्भव सोचकर हम निराश न होंगे। हमें और ज्य़ादा कोशिश करनी चाहिए। यदि केवल अपने अन्दर पिता और माता को बसने दें, तो सभी मसले हल हो जाएंगे।

आइए हम बाइबल के द्वारा पिता और माता को देखें जो जीवन के जल से हमारे पाप और मलीनता धोते हैं।

जक 13:1 “उस दिन दाऊद के घराने और यरूशलेम के निवासियों के लिए अपने पाप और अपनी मलीनता धोने को एक सोता बहाया जाएगा।”

जक 14:8 “फिर उस दिन यह भी होगा कि जीवन का जल यरूशलेम से बह निकलेगा। उसका आधा भाग पूर्वी सागर की ओर तथा आधा भाग पश्चिमी सागर की ओर बहेगा। वह ग्रीष्म और शीत दोनों ऋतुओं में बहता रहेगा।”

यहेज 36:24–26 “क्योंकि मैं तुम्हें जाति जाति और देश देश में से इकट्ठा करूंगा और तुम्हें तुम्हारे निज देश में पहुंचा दूंगा। तब मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूंगा और तुम शुद्ध हो जाओगे; मैं तुम्हें तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूर्तियों से शुद्ध करूंगा। और फिर मैं तुम्हें एक नया हृदय दूंगा और तुम्हारे भीतर एक नई आत्मा उत्पन्न करूंगा और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम्हें मांस का हृदय दूंगा।”


जो इस युग में दाऊद के नाम से आया है, वह पवित्र आत्मा, हमारा पिता परमेश्वर है। और बाइबल में जो ऊपर की यरूशलेम है, वह हमारी माता हैं।(गल 4:26) बाइबल कहती है कि दाऊद के घराने और यरूशलेम के निवासियों के लिए पाप और अपनी मलीनता धोने को एक सोता बहाया जाएगा। इसका मतलब है कि स्वर्गीय पिता और माता जीवन के जल से अपनी सन्तान के, जो उनमें बनी रहती है, पाप और मलीनता धोएंगे।

परमेश्वर जीवन के जल से हमें शुद्ध करता है, और हमारे अन्दर एक नई आत्मा डालता है। इसका मतलब यह है कि हम तो पहले कुछ नापसंद बात सुनते ही, जल्दी गुस्सा करते थे और सत्य की अवहेलना करते थे, लेकिन परमेश्वर हमारे ऐसे कठोर हृदय को निकालेगा, और हमारे हृदय को कोमल हृदय में बदल देगा। यह तभी पूरा होगा जब हमारे अन्दर स्वर्गीय पिता और माता, जो जीवन के जल का स्रोत हैं, निवास करते हैं। जैसे जैसे हम पिता और माता को सोचेंगे, और उनकी गहरी इच्छा पर ध्यान देंगे, वैसे वैसे हम उतना ही मसीह को सही तरह जानेंगे। अत: हम मसीह के रूप में बदल जाएंगे।

प्रक 22:17 “आत्मा और दुल्हिन दोनों कहती हैं, “आ!” और सुनने वाला भी कहे, “आ!” जो
प्यासा हो, वह आए। जो चाहता है, वह जीवन का जल बिना मूल्य ले।”


पिता और माता हमें पुकार कर, जीवन का जल मुफ्त में पाने के लिए बुला रहे हैं। हमें, जो उनके बुलाने पर आंमत्रित हुए हैं, अपने अन्दर हमेशा पिता और माता का वास होने देना चाहिए। जब झगड़े व क्रोध की बात, असहनीय और अन्य सब कुछ बातें, जो उद्धार के संबधित नहीं हैं, हमारे सामने आएं, तब आइए हम पिता और माता की इच्छा को मन में सोचें। और आइए हम अपने अन्दर जीवित रहे पिता और माता को पूछें, कि ‘पिता और माता! यदि आपके सामने ऐसी बात आए, तो क्या आप सदस्यों पर ऊंची आवाज़ में गुस्सा करेंगे?’, ‘क्या आप ऐसी बात से सुसमाचार का प्रचार करना रोक देंगे?’

सिय्योन के सदस्यों का विश्वास, परमेश्वर की शिक्षाओं को जीवन में लागू करने के द्वारा, दिनों–दिन सम्पूर्ण बनता जा रहा है। पिछले समय, वे छोटी–मोटी बातों पर एक दूसरे से झगड़ा किया करते थे। लेकिन अब बहुत सदस्यों से यह सुनाई दे रहा है कि उन्हें सभी सदस्य सुन्दर ही दिखाई देते हैं, और सदस्यों के अन्त तक विश्वास रखकर, निश्चय ही स्वर्ग जाने की आशा करते हैं। जिसके पास परमेश्वर का मन नहीं है, चाहे वह ऐसे विचार को मूर्ख कहकर हंसे, तो भी हम केवल परमेश्वर को अपने अन्दर बसने देंगे और उसकी शिक्षा के अनुसार जीने की कोशिश करेंगे।

हमारे अन्दर परमेश्वर का रूप बनना बिल्कुल आसान नहीं है। लेकिन प्रार्थना करें, तो हमें सब कुछ मिल जाएगा। आइए हम उत्सुकता से प्रार्थना करें, ताकि पिता और माता का वास हमेशा हमारे अन्दर रह सके। ऐसा करने के बाद ही, हम पूरे संसार में मसीह की खुशबू फैला सकेंगे। मैं आप, सिय्योन के सदस्यों से आशा करता हूं कि आप अपने अन्दर मसीह का पूरा रूप बनाकर, बहुत सी आत्माओं को उद्धार की ओर लाएं।