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भय और एक तोड़ा

बाइबल भय को दो तरह से वर्णन करती है: “परमेश्वर का भय मान” और “भयभीत न हो।” बाइबल हमें परमेश्वर का भय मानने के लिए इसलिए नहीं कहती है कि परमेश्वर डरावने हैं, बल्कि इसलिए कहती है कि परमेश्वर हमारे सृजनहार और उद्धारकर्ता हैं। और दूसरी तरफ बाइबल हमें भयभीत न होने के लिए भी कहती है। इसका मतलब है कि हमें परमेश्वर के अलावा किसी भी चीज या व्यक्ति से भयभीत नहीं होना चाहिए।

यीशु के द्वारा दिए गए तोड़ों के दृष्टान्त में, वह जिसने एक तोड़ा पाया था, डर गया था, और उसने अपना एक तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया था। परमेश्वर ने हम से कहा है कि हमारे पास ऐसा डर नहीं, लेकिन एक निडर विश्वास होना चाहिए।

भयभीत जीवन



लोग जीवन में बहुत से डरों का अनुभव करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि दुनिया में ज्यादातर लोगों को निपुण और कुशल न होने का डर होता है, और वे नई चीजों से भी डरते हैं।

वे जिन्हें गंदगी या दूषण से डरने की बीमारी है, वे जीवाणु से डरते हैं। जब वे बस जैसे सार्वजनिक वाहन से सफर करते हैं, तब वे हैंडल भी पकड़ना पसंद नहीं करते। वे अपने रूमाल से हैंडल को अच्छे से पोंछने के बाद ही उसे पकड़ते हैं।

असफलता का डर लोगों को हिचकिचाने पर मजबूर करता है। इनके अलावा, किसी के द्वारा अपनी आलोचना किए जाने का डर, अपने जीवन में बदलाव आने का डर, सफल होने का डर, जिम्मेदारी उठाने का डर, समापन करने का डर, नकारे जाने का डर, कोई गलत निर्णय ले लेने का डर इत्यादि बहुत से डर होते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ज्यादातर लोग हर रोज किसी न किसी डर में जीते हैं।

हालांकि, इन अंतिम दिनों में परमेश्वर ने हमें पहरेदार, यानी सुसमाचार का प्रचार करने का कार्य सौंपा है, और हमें किसी भी चीज से न डरने के लिए कहा है। परमेश्वर ने हमें पूरे संसार में लोगों को चेतावनी देने की आज्ञा दी है। फिर भी कुछ लोग परमेश्वर की आज्ञाओं का प्रचार भी नहीं कर सकते या हिम्मत के साथ उनके नाम की घोषणा नहीं कर सकते या मूर्तिपूजा को नहीं नकार सकते। यह सब डर से भरे हुए मन से पैदा होता है।

असफलता के डर के कारण सीमित किया जाना



यदि किसी व्यक्ति पर असफलता के डर से लगाम लगाया गया है, तो वह कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता या कुछ भी नहीं कर सकता। प्राणियों के साथ भी वैसा ही होता है।

एक बार एक व्यक्ति ने सर्कस में एक अजीब बात देखी। प्रदर्शन के बाद, उसने खूंटे से हाथियों को बंधे देखा: माता हाथी एक पतली सी रस्सी के साथ इतने छोटे खूंटे से बंधी हुई थी कि वह आसानी से उससे छूट कर भाग सके, जबकि बच्चे हाथी को एक मोटी सी रस्सी के साथ एक बड़े खूंटे से कसकर बांधा गया था।

इसका कारण जानने के लिए वह बहुत ही उत्सुक हुआ, और उसने ट्रेनर से पूछा कि बच्चे हाथी को माता हाथी से ज्यादा कसकर क्यों बांधा गया है। तब उस ट्रेनर ने उत्तर दिया कि, “बच्चा हाथी अभी पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं हुआ है, इसलिए कुछ समय तक वह अपनी पूरी ताकत से जोर लगाता रहता है कि वह उस खूंटे को जिससे वह बंधा हुआ है, जमीन से उखाड़कर वहां से छूट सके। इसलिए मैं ने उसे मोटी रस्सी के साथ बड़े खूंटे से बांधा है। हालांकि, माता हाथी को याद है कि जब वो छोटी थी, उस समय उसके बहुत प्रयत्न करने पर भी वह उससे छूटने में असमर्थ थी। इसलिए जब एक बार माता हाथी यह देख लेती है कि उसे बांधा गया है, तो वह छूटने की कोशिश भी नहीं करती। इसलिए मैं ने बच्चे हाथी को बड़े खूंटे से बांधा है, जबकि माता हाथी को बड़े और ताकतवर होने पर भी, छोटे खूंटे से बांधा है।” इस तरह से, प्राणियों को ट्रेनिंग देनेवाले भी असफलता के डर का उपयोग करते हैं।

कुछ कालेज के छात्रों ने एक पाइक नामक मछली पर एक प्रयोग किया था। उन्होंने एक मछलीघर को पानी से भर दिया और उसमें एक मछली को और चारे को रखा, लेकिन मछलीघर के बीच में कांच की एक चादर रखकर उन दोनों को एक दूसरे से अलग कर दिया। पहले से मछली ने उग्रता से चारे को खाने की कोशिश की। हालांकि, बार बार उस कांच की चादर से टकराने के कारण, उसने जल्दी ही चारे का पीछा करना छोड़ दिया। यहां तक कि जब कांच की वह चादर हटा दी गई, तब भी उसने उस चारे के बारे में कुछ ध्यान नहीं दिया। बाद में, ऐसा हुआ कि वह चारा मछली के पास आया और मछली को छूते हुए गया, फिर भी मछली ने चारे को खाना न चाहा।

जब असफलता का डर और यह विचार हम पर प्रभुत्व करे कि, ‘चाहे मैं कितना ही प्रयास कर लूं, मैं यह नहीं कर सकता,’ तो हम परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार ईमानदारी से नहीं कर सकते। स्वर्ग में उठा लिए जाने से पहले, मसीह ने हम से पृथ्वी की छोर तक सुसमाचार का प्रचार करने को कहा था।

हालांकि, यदि हम केवल अपनी असफलताओं को ही याद करें, तो चाहे हम अनुकूल परिस्थिति में क्यों न हों, हम यह सोचेंगे कि हम नाकाम हो जाएंगे, और बहुत आसानी से हार मान लेते हैं। ‘मैं ने बहुत ही उत्सुकता से चारे का पीछा किया था, लेकिन केवल किसी चीज से टकराता गया था,’ या फिर, ‘मैं अब और आगे नहीं जा सकता।’ आइए हम अपने मनों में से ऐसे सभी नकारात्मक विचारों को निकाल दें। यदि हम केवल कल की असफलताओं को ही याद रखें और आज फिर से प्रयास न करें, तो क्या हम भी उस माता हाथी और पाइक मछली के समान नहीं हैं?

पिछले समय में हमने असफलता पाई होगी। हालांकि, परिस्थितियां आज बहुत ज्यादा बदल चुकी हैं। लोगों के मन सुसमाचार सुनने के लिए और भी ज्यादा खुले और ग्रहणशील हो गए हैं, और हम परमेश्वर से बहुत ज्यादा सामर्थ्य पा रहे हैं।

हृदय जो परमेश्वर ने हमें दिया है



परमेश्वर ने हमें एक आशीर्वादित कार्य, यानी नई वाचा के सेवकों के रूप में सेवा करने का कार्य दिया है। इस कार्य को ईमानदारी से करने का मार्ग अपने हृदयों में से असफलता का भय निकालना है। परमेश्वर ने हमें भय की आत्मा नहीं दी है।

2तीम 1:6–9 ... क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय की नहीं पर सामर्थ्य और प्रेम और संयम की आत्मा दी है। इसलिये हमारे प्रभु की गवाही से, और मुझ से जो उसका कैदी हूं, लज्जित न हो, पर उस परमेश्वर की सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिये मेरे साथ दु:ख उठा...

भय की आत्मा परमेश्वर की ओर से नहीं है। इसलिए हमें किसी भी चीज से डरने की जरूरत नहीं है, है न? ‘क्या होगा यदि मैं उस व्यक्ति को परमेश्वर के वचन का प्रचार करते समय उससे आलोचना पाऊंगा तो?’ या ‘यदि मैं यह गवाही पूरे आत्मविश्वास के साथ और सही ढंग से नहीं दे सकूंगा तो क्या होगा?’ अपनी आलोचना किए जाने का डर और असफलता का डर हमें सुसमाचार की तुरही को जोर से फूंकने से रोकता है। परमेश्वर ने हमें भय की नहीं लेकिन प्रेम और साहस की आत्मा दी है। ‘उस आत्मा की परमेश्वर की बांहों में और स्वर्ग के राज्य की ओर अगुआई करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?’

सुसमाचार का प्रचार करते हुए फल उत्पन्न करने की प्रक्रिया में, हम असफल हो सकते हैं या फिर हम से कोई भूल हो सकती है। हालांकि, चूंकि हमारी असफलता या भूल जानबूझकर नहीं की गई है, इसलिए परमेश्वर हमें सफल होने के लिए अवश्य और अधिक सहायता देंगे। हमें आत्मिक कटाई करनेवाले और सुसमाचार के पहरेदारों के रूप में केवल परमेश्वर की पवित्र आज्ञा का ईमानदारी से पालन करना चाहिए।

रो 8:12–17 ... इसलिये कि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं। क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली कि फिर भयभीत हो, परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम हे अब्बा, हे पिता कहकर पुकारते हैं। आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं; और यदि सन्तान हैं तो वारिस भी, वरन् परमेश्वर के वारिस...

बाइबल कहती है कि चूंकि हमने लेपालकपन की आत्मा पाई है, हमारे पास अधिकार है कि हम परमेश्वर को “अब्बा और पिता” कहकर पुकार सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमारे पिता और माता हैं, तो क्या वे अपनी सन्तानों की सहायता नहीं करेंगे? वे हमेशा हमें अपना कार्यभार संभालने के लिए मदद करते हैं। हमें इस पर विश्वास करना चाहिए।

आत्मा आप ही गवाही देती है कि हम परमेश्वर की सन्तान और स्वर्गीय विरासत पाने योग्य वारिस हैं। फिर भी, क्या अभी भी हम डरते और हिचकिचाते हैं, जैसे कि हमने दासत्व की आत्मा पाई हो? अब हम जीवित नहीं रहते, पर मसीह हम में जीवित हैं।(गल 2:20) जब हम अपने हृदयों से हर प्रकार के डर को निकालकर अपनेआपको परमेश्वर के पवित्र आत्मा से भरकर, सुसमाचार का प्रचार करें, तो हम संसार के बहुत से लोगों को स्वर्ग और उद्धार के मार्ग की ओर ले आ सकते हैं।

डर और एक तोड़ा



आइए हम उस मूर्ख दास की कहानी के बारे में सोचें, जिसने अपने डर के कारण अपने स्वामी का तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया था और स्वामी के वापस आने पर सिर्फ एक ही तोड़ा उसे वापस दिया।

मत 25:14–30 ... तब, जिसको पांच तोड़े मिले थे, उसने तुरन्त जाकर उनसे लेन–देन किया, और पांच तोड़े और कमाए। इसी रीति से जिसको दो मिले थे, उसने भी दो और कमाए। परन्तु जिसको एक मिला था, उसने जाकर मिट्टी खोदी, और अपने स्वामी के रुपये छिपा दिए। बहुत दिनों के बाद उन दासों का स्वामी आकर उनसे लेखा लेने लगा। जिसको पांच तोड़े मिले थे, उसने पांच तोड़े और लाकर कहा... और जिसको दो तोड़े मिले थे, उसने भी आकर कहा... उसके स्वामी ने उससे कहा, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा; मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा। अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो।” तब जिसको एक तोड़ा मिला था, उसने आकर कहा, “हे स्वामी, मैं तुझे जानता था कि तू कठोर मनुष्य है: तू जहां कहीं नहीं बोता वहां काटता है, और जहां नहीं छींटता वहां से बटोरता है। इसलिए मैं डर गया और जाकर तेरा तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया। देख, जो तेरा है, वह यह है।” उसके स्वामी ने उसे उत्तर दिया, “हे दुष्ट और आलसी दास... इस निकम्मे दास को बाहर के अंधेरे में डाल दो, जहां रोना और दांत पीसना होगा।”

ऊपर के दृष्टान्त में, वह मनुष्य जिसे एक तोड़ा दिया गया था, डर गया था। इसी कारण उसने वह एक तोड़ा संभाल कर रख दिया। अपने डर के कारण उसने उस एक तोड़े के साथ कुछ भी नहीं किया। डर और एक तोड़ा एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। यदि उसने केवल प्रचार किया होता, तो उसने जो पाया था उससे बढ़कर दस गुना या सौ गुना हो गया होता। ‘यदि वह व्यक्ति मेरी बात नहीं सुनेगा तो क्या होगा?’ असफलता के भय के कारण, उस मूर्ख दास ने एक तोड़े को संभाल कर रख दिया और कुछ भी प्राप्त नहीं किया।

यदि हम अपने डर को निकाल दें, तो हम एक तोड़े को दो तोड़ों में, दो तोड़ों को पांच तोड़ों में और पांच तोड़ों को दस तोड़ों में बदल सकते हैं। परमेश्वर के दिए तोड़ों का हम जितना ज्यादा उपयोग करते हैं, वे उतने ही ज्यादा बढ़ते हैं। यदि उस व्यक्ति ने, जिसे एक तोड़ा दिया गया था, अपना तोड़ा व्यापार में लगाया होता, तो उसे अवश्य ही बढ़ाया होता। हालांकि, उसने अपने तोड़े का प्रयोग नहीं किया और कुछ भी नहीं पाया। आखिरकार उसके स्वामी ने उसे दुष्ट और आलसी दास कहकर डांटा।

जैसे एक बीज जो बोया गया है, बढ़कर दर्जनों गुना या सैकड़ों गुना फल उत्पन्न करता है, वैसे ही परमेश्वर के वचन के बीज को यदि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार बोया जाए, तो वह बहुतायत से फल उत्पन्न करता है। अनुपजाऊ भूमि में डाला गया बीज फल उत्पन्न नहीं कर सकता, लेकिन वह कोई असफलता नहीं। यदि परमेश्वर हम से बीज बोने को कहें, तो हमें बीज बोना चाहिए, और यदि परमेश्वर हम से पानी देने को कहें, तो हमें पानी देना चाहिए। हमें सिर्फ परमेश्वर के निर्देशों का पालन करना चाहिए, क्योंकि वह परमेश्वर हैं जो उस बीज को बढ़ाते हैं। इसलिए परमेश्वर की सन्तान के तौर पर, हमें सबसे पहले अपना कार्य ईमानदारी से करना चाहिए और उसके बाद अच्छे परिणाम की आशा करनी चाहिए।

भय से ऊपर उठकर प्रचार करने का परिणाम



एक भयभीत हृदय के साथ, हम हमेशा वह दास बनते हैं जिसे एक तोड़ा दिया गया था। हालांकि, जैसे कि परमेश्वर ने कहा है, यदि हमारे हृदय एक प्रेम, आनंद और शान्ति से भरपूर हों, तो जैसे–जैसे हम अपने तोड़ों का उपयोग करते हैं, वैसे–वैसे हमारे तोड़े बढ़ते जाते हैं। इस बात को मन में रखते हुए, आइए हम अपने हृदयों से सभी डरों को निकाल दें और सामरिया और पृथ्वी की छोर तक सुसमाचार का प्रचार साहस के साथ करें।

योना 1:1–17 यहोवा का यह वचन अमितै के पुत्र योना के पास पहुंचा: “उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और उसके विरुद्ध प्रचार कर; क्योंकि उसकी बुराई मेरी दृष्टि में बढ़ गई है।” परन्तु योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिये उठा... तब यहोवा ने समुद्र में एक प्रचण्ड आंधी चलाई, और समुद्र में बड़ी आंधी उठी, यहां तक कि जहाज़ टूटने पर था... तब उन्होंने योना को उठाकर समुद्र में फेंक दिया; और समुद्र की भयानक लहरें थम गईं... यहोवा ने एक बड़ा सा मच्छ ठहराया था कि योना को निगल ले; और योना उस महामच्छ के पेट में तीन दिन और तीन रात पड़ा रहा।

परमेश्वर ने योना से बड़े नगर नीनवे जाकर उनके वचनों का प्रचार करने को कहा था। नीनवे उस अश्शूर की राजधानी थी जिसने इस्राएल पर आक्रमण किया था; अश्शूर ने परमेश्वर की निन्दा की थी और परमेश्वर के लोगों को सताया था। योना नीनवे जाकर परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने से डरता था। अपनी मृत्यु के भय के कारण, योना ने एक नाव में बैठकर किसी दूर देश में भाग जाना चाहा।

हालांकि, परमेश्वर ने अपनी अलौकिक शक्ति से उसे रोका। जब योना बड़े मच्छ के पेट से बचाया गया, तो परमेश्वर ने उससे दुबारा अपना संदेश पहुंचाने के लिए कहा। तब योना नीनवे की ओर गया।

योना 3:1–10 ... योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, “अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।” तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया... राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया... “और वे परमेश्वर की दोहाई चिल्ला–चिल्ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्चात्ताप करें। सम्भव है, परमेश्वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएं।” जब परमेश्वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।

योना जिसने परमेश्वर की सामर्थ्य का अनुभव किया था, दुश्मन देश की राजधानी में चला गया और वहां परमेश्वर की चेतावनी की घोषणा की। तब आश्चर्यजनक रूप से नीनवे के लोगों ने, जो परमेश्वर से दूर हो गए थे, परमेश्वर के संदेश पर विश्वास किया और उपवास के साथ पश्चाताप किया। परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों के जैसे नहीं थे। योना ने सोचा था कि नीनवे के लोग दुष्ट हैं और वे परमेश्वर के संदेश को नहीं सुनेंगे। असफलता का भय उनके लिए एक समस्या थी।

जैसे ही नीनवे के लोगों ने पश्चाताप किया, परमेश्वर ने उन्हें दण्ड देने की अपनी पहली योजना को टाल दी। उसके बाद योना चिन्ता में पड़ गया। क्योंकि उसने सोचा कि उसने पहले लोगों को यह घोषणा की थी कि चालीस दिनों के बाद नीनवे नष्ट हो जाएगा, लेकिन वह नष्ट नहीं हुआ, तो लोग उसकी हंसी उड़ाएंगे और उसे एक झूठा नबी कहेंगे। हालांकि, परमेश्वर का मूल उद्देश्य 1,20,000 लोगों को बचाना था।

जब योना अपने डर से बाहर निकला और उसने परमेश्वर के वचनों का प्रचार किया, तो 1,20,000 लोगों ने पश्चाताप किया और वे परमेश्वर के पास आए। यदि योना ने अपने इस कार्य से भागना जारी रखा होता, तो क्या हुआ होता? ये बातें हमारे लिए एक उदाहरण के रूप में घटित हुई थीं।

उठ, प्रकाशमान हो



परमेश्वर ने कहा है कि, “मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूं।”(यश 41:10) हमें इस वचन को सिर्फ शब्दों में नहीं समझना चाहिए, लेकिन इसे अमल में लाना चाहिए। परमेश्वर की सन्तान के रूप में, जब हम इस विश्वास के साथ कि परमेश्वर हमारे साथ हैं, बिना किसी डर के परमेश्वर का अंतिम कार्य करते हैं, तो हम अपने तोड़ों को कई गुना ज्यादा बढ़ा सकते हैं।

यश 60:1–3 उठ, प्रकाशमान हो; क्योंकि तेरा प्रकाश आ गया है, और यहोवा का तेज तेरे ऊपर उदय हुआ है। देख, पृथ्वी पर तो अन्धियारा और राज्य राज्य के लोगों पर घोर अन्धकार छाया हुआ है; परन्तु तेरे ऊपर यहोवा उदय होगा, और उसका तेज तुझ पर प्रगट होगा। जाति जाति तेरे पास प्रकाश के लिये और राजा तेरे आरोहण के प्रताप की ओर आएंगे।

यदि हम परमेश्वर का प्रकाश न चमकाएं, तो जातियां उनके आरोहण के प्रताप की ओर कैसे आ सकेंगी? चूंकि हम ने सुसमाचार का प्रकाश उन पर चमकाया है, बहुत सी जातियां परमेश्वर के प्रकाश की ओर आई हैं।

अब हम विदेशों से ऐसे सुसमाचार सुनते हैं कि ऐसी जगहों में भी जहां सुसमाचार अभी हाल ही में प्रचार किया जाना शुरू हुआ है, वहां से भी सुसमाचार के फल लगातार पैदा किए जा रहे हैं। जब कभी भी हम इस अनुग्रहपूर्ण समाचार को सुनते हैं, हम फिर से याद करते हैं कि यदि हम प्रचार करते रहें, तो स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार अवश्य ही पूरा किया जाएगा; सिर्फ तभी समस्या बनेगी यदि हम फल उत्पन्न करने के लिए कोई प्रयास न करें।

आइए हम अपने हृदयों से सभी डरों को निकाल दें; जैसे कि गलतियां करने का डर, असफलता का डर इत्यादि। प्रेम में कोई भय नहीं होता, वरन् सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है।(1यूह 4:18) यदि हम परमेश्वर के दिए हृदय के साथ हर एक आत्मा को बचाने की कोशिश करें, तो हम सुसमाचार के बहुत से फल पैदा करते हुए, अपने तोड़ों को बढ़ा सकेंगे। सिय्योन के भाइयो और बहनो, आइए हम सभी प्रकार के डरों से मुक्त हो जाएं और परमेश्वर के द्वारा हमें सौंपे गए सुसमाचार के कार्य को आत्मविश्वास के साथ पूरा करें, ताकि हम अनन्तकाल तक स्वर्गीय आशीर्वादों को भोग सकें।