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फिलो से

ग्रीक भाषा के शब्द ‘ (फिलो से)’ का अर्थ होता है, “मैं आपसे प्रेम करता हूं।” यह पतरस का उत्तर था जब यीशु ने उसे तीन बार पूछा था कि “क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?”

क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?


आज, इस संसार के सभी कोनों में बहुत से अपराध हो रहे हैं। विगत समय की तुलना में आज अपराध और भी क्रूर और भयंकर हो गए हैं। लोगों ने इंसानियत को खो दिया है, और यहां तक कि वे अपनी मूलभूत नैतिकता को भी भूल गए हैं। इसका कारण यह है कि उनका खुद के प्रति और दूसरों के प्रति प्रेम ठण्डा पड़ गया है। यहां तक कि बहुत से ईसाई परमेश्वर का पालन नहीं करते। वे परमेश्वर के वचन से नहीं बदलते, बल्कि उन्होंने परमेश्वर के प्रेम से मुंह फेर लिया है।
हमारे हृदयों में उस प्रेम को बोने के लिए जो न तो हमारे पास स्वर्ग में था और न ही पृथ्वी पर था, मसीह इस पृथ्वी पर आए। उन्होंने अपने बलिदान के द्वारा हमें अपना अनन्त प्रेम दिखाया। उन्होंने हमें बचाने के लिये, जिन्हें अपने घमण्ड और अनाज्ञाकारिता के कारण परमेश्वर से विश्वासघात करने के बाद स्वर्ग से निकाल दिया गया था, अपने आपका बलिदान किया। तब, क्या हम पतरस के समान परमेश्वर को “मैं आपसे प्रेम करता हूं” स्पष्ट उत्तर देने के लिए तैयार हैं? आइए हम अपने आपको जांचें।

यूह 21:15–17 भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से कहा, “हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है?” उसने उससे कहा, “हां प्रभु; तू तो जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं।”... तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं।” यीशु ने उससे कहा, “मेरी भेड़ों को चरा।”

यीशु ने तीन बार पतरस से एक ही सवाल किया, “क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?” तब पतरस ने लगातार जवाब दिया, “हां प्रभु, तू जानता है कि मैं तुझ से प्रेम करता हूं।” पतरस के अटल प्रेम को पक्का करने के बाद, यीशु ने “मेरी भेड़ों को चरा,” कहते हुए अपनी भेड़ें उसे सौंप दीं।
परमेश्वर के प्रति प्रेम के बिना कोई चरवाहा या डीकन या यहां तक कि चर्च का सदस्य भी नहीं बन सकता। चाहे हम सब को सुसमाचार सौंपा गया है, हम उसे ईर्ष्या, जलन और दुश्मनी से पूरा नहीं कर सकते, लेकिन परमेश्वर के प्रति उग्र प्रेम के द्वारा पूरा कर सकते हैं।
बाइबल हमें दिखाती है कि पतरस यीशु से कितना प्रेम रखता था। जब महायाजक के द्वारा भेजी गई एक बड़ी भीड़ यीशु को पकड़ने के लिये आई थी, तो पतरस ने अपनी तलवार निकालकर महायाजक के एक दास का कान काट डाला था। वह यीशु से बहुत ज्यादा प्रेम करता था।(मत 26:47–53; यूह 18:1–11) जब यीशु ने अपने चेलों से कहा कि उन्हें बहुत दु:ख उठाकर मर जाना पड़ेगा, तो पतरस ने यीशु से कहा, “नहीं, प्रभु!” क्योंकि वह यीशु से बहुत ज्यादा प्रेम करता था।(मत 16:21–23) यहां तक कि जब यीशु ने पतरस को “हे शैतान, मेरे सामने से दूर हो,” कहते हुए बुरी तरह से डांटा था, तो भी उसने मसीह के प्रति अपने प्रेम को नहीं खोया था। बल्कि, उसने अपना विश्वास चट्टान पर स्थापित किया और परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला एक अच्छा चरवाहा बना।
जब तक हम परमेश्वर से पतरस के समान प्रेम नहीं करते, हम उस मेम्ने का, जिसका हमें जहां कहीं वह जाता है पालन करना चाहिए, पालन नहीं कर सकेंगे, और अंत में उद्धार नहीं पा सकेंगे। 1,44,000 ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर से संपूर्ण रूप से प्रेम करते हैं और उन पर विश्वास रखते हैं।

जलते हुए हृदय के साथ परमेश्वर के प्रेम को बांटो


हम सुसमाचार के अन्तिम युग में जी रहे हैं, और हमें बाइबल की सभी 66पुस्तकों में समाया हुआ परमेश्वर का प्रेम लोगों तक पहुंचाने का कार्य सौंपा गया है। यह कार्य लाचारी से किए गए प्रचार से नहीं, लेकिन परमेश्वर के प्रति ज्वलित और सच्चे प्रेम के द्वारा पूरा हो सकता है।

फिलि 2:5–8 जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो... यहां तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।

यदि हमारा स्वभाव मसीह के स्वभाव के जैसा न हो, तो प्रचार का कार्य एक यातना जैसा बन जाएगा। हालांकि, यदि हमारा स्वभाव मसीह के जैसा हो, तो जिस प्रकार मसीह ने हम से प्रेम किया है, वैसे ही अपने भाइयों और बहनों से प्रेम करेंगे, और हम परमेश्वर से प्रेम रखने से कभी भी पीछे नहीं हटेंगे।
जब हम परमेश्वर के प्रति प्रेम या मसीह के जैसे स्वभाव के बिना सुसमाचार का प्रचार करें या परमेश्वर की आराधना करें या उपदेश दें, तो हम ठनठनाता हुआ पीतल और झंझनाती हुई झांझ होंगे।
मसीह ने, जो परमेश्वर के स्वरूप में थे, किसके लिए दु:ख उठाए? क्या उन्होंने हमारे लिए, जिन्होंने स्वर्ग में पाप किया था, और जिन्हें स्वर्ग से निकाल दिया गया था, पापबलि के रूप में अपने जीवन का बलिदान नहीं किया?

“मेरी सन्तानो! मैं ने तुम से मृत्यु तक प्रेम किया है। क्रूस की पीड़ा या मेरे बनाए गए जीवों की घृणा तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम को नहीं रोक सकती।” क्या आप परमेश्वर की उत्सुक आवाज को नहीं सुन सकते?
आइए हम यह सोचें कि हमने परमेश्वर से कितना प्रेम किया है, क्रूस पर मृत्यु होने तक प्रेम करने का नमूना जो उन्होंने हमें दिखाया है उसका हमने कितना पालन किया है। क्या हम छोटी बातों की वजह से कमजोर नहीं हो गए, या अपने आवेगों को न रोक कर परमेश्वर के वचनों को नहीं भूल गए?
यदि हम परमेश्वर से संपूर्ण प्रेम न करें, तो हम अंत तक विश्वास में खड़े नहीं रह सकते; जब हवा चलेगी, तो हम भूसी के समान उड़ जाएंगे। सिर्फ गेहूं को जो परमेश्वर के प्रेम से भरा है, महिमामय मुकुट दिया जाएगा।

यश 53:1–12 ... वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था... निश्चय उसने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दु:खों को उठा लिया... परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम चंगे हो जाएं।

ऊपर के वचन स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि हमारे पवित्र परमेश्वर ने हम, पापियों को, जिन्हें मरना नियुक्त था, शान्ति, खुशी, अनन्त जीवन और आशीर्वाद देने के लिए कितना ज्यादा दु:ख उठाया है। हमें स्वर्ग ले जाने के लिए, हमारे सभी अपराधों को मिटाने के लिए, हमारे परमेश्वर ने अपना शरीर फाड़ा और अपना लहू बहाया। नई वाचा के फसह के द्वारा उनका शरीर खाकर और उनका लहू पीकर, हमारे मन मसीह के मन के समान बदल गए हैं। नई वाचा का फसह मनाकर हम मसीह में और मसीह हम में स्थिर बने रहते हैं, जिसकी वजह से हम उस मार्ग पर चल सकते हैं जिस पर मसीह चले थे, उनके समान स्वभाव धारण कर सकते हैं, और हर घड़ी, हर समय, उनके प्रेम का अभ्यास कर सकते हैं।
अब यह हमारी बारी है कि हम परमेश्वर से प्रेम करें। अब तक परमेश्वर ने हम से बिना किसी शर्त के असीमित प्रेम किया है; अब हमें परमेश्वर के प्रति उत्कट प्रेम के साथ “फिलो से” चिल्लाते हुए, सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए।

परमेश्वर के बेशर्ती प्रेम के रास्ते का पालन करते हुए, हमें सबसे पहले अपने आपको बलिदान करना चाहिए और भाइयों से प्रेम करना चाहिए; हमें जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है, वैसी चीजों को समझते हुए सुसमाचार का कार्य करना चाहिए। जब उन्होंने हमें सुसमाचार का कार्य सौंपा, तो उन्होंने हम से कुछ भी नहीं मांगा। उन्होंने सिर्फ हम से पूछा, “क्या तुम मुझ से प्रेम रखते हो?” यदि हम विश्वास के साथ कह सकें, “फिलो से(मैं आपसे प्रेम करता हूं),” तो हम नबी के रूप में अपने कार्य को बहुत से फल पैदा करके, विश्वासयोग्य ढंग से पूरा कर सकते हैं।

कार्य जो हमारे प्रेमी परमेश्वर ने हमें सौंपा है


आइए हम देखें कि परमेश्वर हम कमजोरों और असंपूर्णों से कितना ज्यादा प्रेम करते हैं।

यश 49:14–18 परन्तु सिय्योन ने कहा, “यहोवा ने मुझे त्याग दिया है”... “क्या यह हो सकता है कि कोई माता अपने दूधपीते बच्चे को भूल जाए और अपने जन्माए हुए लड़के पर दया न करे? हां, वह तो भूल सकती है, परन्तु मैं तुझे नहीं भूल सकता।

हमारे पिताजी हर जगह गए जहां उनकी संतान थीं; चाहे वे पहाड़ की घाटी में रहती हों या समुद्र के किनारे पर एक गांव में रहती हों, चाहे वहां जाने में तीन दिन और रात क्यों न लगते हों। अपने मांस और लहू के द्वारा, हमारे पिताजी ने अपनी सन्तानों की आत्मिक आंखें खोल दीं जो शैतान के धोखे में आने से अपने माता–पिता को नहीं पहचान पाती थीं। हम अपने पिताजी को उनके प्रेम के लिए
कैसे बदला दे सकते हैं?
आइए हम अपने पूर्वजों के जीवन पर दृष्टि करें, जो हम से पहले विश्वास के मार्ग पर चले थे, और अपने विश्वास को जांचें।

इब्र 11:24–26 विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया। इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुख भोगना अधिक उत्तम लगा। उसने मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा, क्योंकि उसकी आंखें फल पाने की ओर लगी थीं।

इब्र 11:33–38 इन्होंने विश्वास ही के द्वारा राज्य जीते... पथराव किए गए; आरे से चीरे गए; उनकी परीक्षा की गई; तलवार से मारे गए... संसार उनके योग्य न था।

चाहे प्रथम चर्च के शहीदों को पत्थरों से मारा गया, आरे से काटा गया और तलवारों से घात किया गया, उन्होंने परमेश्वर से बहुत ज्यादा प्रेम किया, इसलिए पवित्र आत्मा हमेशा उनके साथ था। परिणाम स्वरूप, उन्होंने विश्वास के अच्छे निशान छोडे. जिनसे स्वर्गदूत भी ईर्ष्या करते हैं, और वे सुसमाचार के युग को समाप्त करने वाले 1,44,000 के लिए एक अच्छा उदाहरण बने।
उन्होंने अपना जीवन भी दांव पर लगाकर, परमेश्वर से प्रेम किया और मसीह के मार्ग का पालन किया। लेकिन चूंकि हमें जीवित रूप में बदल जाने की महिमा दी गई है, तो क्या हमें परमेश्वर से और ज्यादा प्रेम नहीं करना चाहिए? चाहे सुसमाचार का मार्ग कठिन है, हमें परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए जिन्होंने समुद्र के बालू के समान लोगों में से हमें यह कार्य सौंपा है, सुसमाचार का प्रचार खुशी के साथ करना चाहिए।

‘मैं कैसे परमेश्वर की इच्छा को कृपालु रूप से बता सकूं?’ ‘कैसे मैं अपने परिवार जन को और ज्यादा खोज सकूं, कि परमेश्वर को प्रसन्न कर सकूं?’ यदि हम इस प्रकार के मानसिक रवैये के साथ सुसमाचार का प्रचार करें, तो हम दिन प्रतिदिन और भी ज्यादा खुश हो जाएंगे। लेकिन यदि हम परमेश्वर के प्रति प्रेम के बिना सिर्फ कर्तव्य की भावना रखते हुए सुसमाचार का प्रचार करें, तो हम कभी भी उन्हें प्रसन्न नहीं कर सकेंगे और अंत में एक दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम पाएंगे। जब हम परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम का अंगीकार कर सकते हैं, तो हमारे विश्वास की सभी दुविधाओं का निवारण हो जाता है।

यदि हम उत्साह से परमेश्वर से प्रेम करें, तो हमारा विश्वास कभी भी ठण्डा नहीं पड़ेगा; हमारे होंठों से कभी भी अकृपालु वचन नहीं निकलेंगे; हम कभी भी “एक दूसरे से प्रेम करो” इस वचन के विरुद्ध नहीं जाएंगे; हम कभी भी सुसमाचार के प्रचार को अनदेखा नहीं करेंगे; तो हम कैसे परमेश्वर के उत्साही निवेदन को मना कर सकते हैं? जितना ज्यादा हम परमेश्वर से प्रेम करेंगे, उतना ज्यादा हमारा विश्वास संपूर्ण बनेगा।

प्रथम चर्च के संत परमेश्वर से कितना ज्यादा प्रेम करते थे? बाइबल कहती है कि यह संसार उनके प्रेम के लायक नहीं था। वे पूरे संसार में मसीह की खुशबू को फैलाते थे। कितना अद्भुत था!
हमें प्रथम चर्च के समय दिए गए पवित्र आत्मा से सात गुना ज्यादा शक्तिशाली पवित्र आत्मा दिया गया है। हम पवित्र आत्मा और दुल्हिन से प्रेम करते हैं जो हमें जीवन का जल देते हैं। हमें लोबान की खुशबू के जैसे विश्वास के साथ उनका पालन करना चाहिए।
हमारे पूर्वजों ने मृत्यु का भय न रखते हुए परमेश्वर से प्रेम किया। हम 1,44,000 संत हैं जिन्हें उनसे भी महान प्रेम का अभ्यास करना चाहिए। आइए हम अपने हृदय की गहराई से “फिलो से” चिल्लाते हुए, परमेश्वर की “मेरी भेड़ों को चरा,” इस विनती का पालन करें। जब तक सभी 1,44,000 सिय्योन पहाड़ पर मेम्ने के साथ खड़े न हो जाएं, आइए हम “फिलो से” चिल्लाएं।