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वचन के करीब रहो

बाइबल में अगर हम विश्वास के उन पूर्वजों के जीवन को देखें, जिनसे परमेश्वर ने प्रेम किया और जिन्होंने उद्धार पाया, तो हम जान सकेंगे कि उनमें एक समानता थी और वह यह थी कि वे हमेशा परमेश्वर के वचन के करीब रहे और उन्होंने उसके वचन को संपूर्ण माना। उनकी तरह, हमें भी वचन के करीब रहना चाहिए ताकि हम अनन्त स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें।

मनुष्य अपने करीबी लोगों से प्रभावित होता है। अगर कोई एयरकंडिशनर के नजदीक रहे, तो उससे ठंडी हवा दी जाती है, और अगर वह हीटर के नजदीक रहे, तो उससे गर्म हवा दी जाती है। उसी तरह से, अगर कोई परमेश्वर के नजदीक रहे, तो उससे परमेश्वर की जीवन की ऊर्जा उमड़ेगी, है न? जो व्यक्ति परमेश्वर के करीब नहीं जाता, पर अपने ही विचारों में लीन रहता है, वह कभी भी परमेश्वर से आने वाले पवित्र आत्मा की शक्ति को महसूस नहीं कर सकता।

आशा है कि सिय्योन के सभी सदस्य हमेशा परमेश्वर के करीब रहें, ताकि दुनिया भर में सभी प्यासी आत्माओं पर पवित्र आत्मा की सुखदायी वर्षा बहुतायत में उंडेली जाए। इसके लिए, हमें हमेशा परमेश्वर के वचन के करीब रहना चाहिए और हर समय उसका पालन करना चाहिए।

परमेश्वर के वचनों में न तो कुछ बढ़ाना और न कुछ घटाना



परमेश्वर कहते हैं कि जो भी स्वर्ग के राज्य में सहभागी होना चाहता है, वह वचन पर पूरी तरह निर्भर रहे।

प्रक 22:17–19 आत्मा और दुल्हिन दोनों कहती हैं, “आ!” और सुननेवाला भी कहे, “आ!” जो प्यासा हो वह आए, और जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले। मैं हर एक को, जो इस पुस्तक की भविष्यद्वाणी की बातें सुनता है, गवाही देता हूं: यदि कोई मनुष्य इन बातों में कुछ बढ़ाए तो परमेश्वर उन विपत्तियों को, जो इस पुस्तक में लिखी हैं, उस पर बढ़ाएगा। यदि कोई इस भविष्यद्वाणी की पुस्तक की बातों में से कुछ निकाल डाले, तो परमेश्वर उस जीवन के वृक्ष और पवित्र नगर में से, जिसका वर्णन इस पुस्तक में है, उसका भाग निकाल देगा।

हमारे स्वर्गीय पिता और माता अपनी संतानों को सिखाते हैं कि हमें वचनों में कुछ बढ़ाए या कुछ घटाए बिना वचन जो जैसा है, उसका वैसा ही पालन करना चाहिए। वे चाहते हैं कि हम वचन के करीब रहें क्योंकि वचन जीवन, उद्धार और अनन्त खुशी लाता है।

इस संसार में बहुत से लोग हैं जो परमेश्वर के वचन से ज्यादा संसार के पैसे, आदर, सत्ता और भोग–विलास से प्रेम करते हैं। हालांकि, पिछले इतिहास को ध्यान में रखते हुए, हम देख सकते हैं कि जिन लोगों ने सांसारिक वस्तुओं से प्रेम किया, उनमें से बहुतों का आखिर में दुखद अंत हुआ।

यीशु के दृष्टांत में, एक उड़ाऊ पुत्र ने जिसने सांसारिक सुखों का पीछा किया, अपने पिता के घर को छोड़ा और दूर देश को चला गया, और वहां उसे बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा। जब वह सभी प्रकार की कठिनाइयों से गुजरा, उसे महसूस हुआ कि क्यों वह अत्यंत शोचनीय स्थिति में पहुंच गया है। उसका दुर्भाग्य तब से शुरू हुआ जब वह अपने पिता और अपने घर से बहुत दूर रहा। इसलिए उसने सारी चीजों को छोड़ा और अपने पिता के करीब अपने घर लौटा।(लूक 15:11–24)

जितना करीब वह अपने घर के पास आया, उतना करीब वह खुशी की ओर बढ़ा। जब वह उड़ाऊ पुत्र अपने पिता के करीब लौट आया, तब उसने अपने पिता के प्रेम को महसूस किया और पूर्णता से सुख व आनंद भोग सका। उसी तरह जब हम परमेश्वर के वचन के करीब आएंगे, हम वह अनन्त सुख व आनंद भोग सकेंगे, जो परमेश्वर हमें प्रदान करेंगे।

उन पूर्वजों का जीवन जो परमेश्वर के वचन के करीब रहे



बाइबल में दर्ज किए गए विश्वास के पूर्वजों में से नूह के जीवन के द्वारा हम पुष्टि करें, कि जब हम वचन के करीब रहते हैं, परमेश्वर हमें हर आशीष बहुतायत से प्रदान करते हैं।

उत 6:14–19 इसलिये तू गोपेर वृक्ष की लकड़ी का एक जहाज बना ले, उसमें कोठरियां बनाना, और भीतर–बाहर उस पर राल लगाना। इस ढंग से तू उसको बनाना: जहाज की लम्बाई तीन सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊंचाई तीस हाथ की हो। जहाज में एक खिड़की बनाना, और उसके एक हाथ ऊपर से इसकी छत बनाना, और जहाज की एक ओर एक द्वार रखना; और जहाज में पहला, दूसरा, तीसरा खण्ड बनाना। और सुन, मैं आप पृथ्वी पर जल–प्रलय करके सब प्राणियों को, जिनमें जीवन का प्राण है, आकाश के नीचे से नष्ट करने पर हूं; और सब जो पृथ्वी पर हैं मर जाएंगे। परन्तु तेरे संग मैं वाचा बांधता हूं: इसलिये तू अपने पुत्रों, स्त्री, और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना। और सब जीवित प्राणियों में से तू एक एक जाति के दो दो, अर्थात् एक नर और एक मादा जहाज में ले जाकर, अपने साथ जीवित रखना।

परमेश्वर ने नूह से कहा कि जल–प्रलय के द्वारा इस पृथ्वी का न्याय होने से पहले वह जहाज बना ले। नूह हमेशा परमेश्वर के करीब रहा, इसलिए वह उनके शब्दों को सुन सका।

उन दिनों में इस पृथ्वी पर बहुत सारे लोग थे, पर सिर्फ नूह परमेश्वर के करीब रहता था। जबकि दूसरे लोग परमेश्वर से बहुत दूर रहते थे और वे अंत में अपनी दुष्टता के कारण नष्ट हो गए, नूह हमेशा परमेश्वर के करीब जाता था और उनके वचनों के द्वारा जीता था, इसी कारण उसे वह जहाज बनाने का मौका मिला, जिससे वह अपने आपको, अपने परिवार को, और सब जीवित प्राणियों को बचा सका।

निर्गमन के समय में भी बहुत से लोग परमेश्वर से दूर रहते थे। नूह की तरह बहुत कम लोग थे जो परमेश्वर के वचन के करीब रहते थे। आइए हम बारह जासूसों के बारे में सोचें। जब वे कनान की जासूसी करके लौटे, जिन्होंने बलवान् कनानियों को देखा, उनमें से दस जासूसों में पराजय की भावना पनपने लगी, और उन्होंने कहा, “जितने पुरुष हम ने उसमें देखे वे सब के सब बड़े डील डौल के हैं; और हम अपनी दृष्टि में उनके सामने टिड्डे के समान हैं,” पर यहोशू और कालिब ने कहा, “वे हमारी रोटी ठहरेंगे।” वे किस कारण से ऐसा चिल्ला सके?

गिन 13:25–14:9 ... उन्होंने मूसा से यह कहकर वर्णन किया, “जिस देश में तू ने हम को भेजा था उसमें हम गए; उसमें सचमुच दूध और मधु की धाराएं बहती हैं, और उसकी उपज में से यही है। परन्तु उस देश के निवासी बलवान् हैं, और उसके नगर गढ़वाले हैं और बहुत बड़े हैं... और जितने पुरुष हम ने उसमें देखे वे सब के सब बड़े डील डौल के हैं। फिर हम ने वहां नपीलों को, अर्थात् नपीली जातिवाले अनाकवंशियों को देखा; और हम अपनी दृष्टि में उनके सामने टिड्डे के समान दिखाई पड़ते थे, और ऐसे ही उनकी दृष्टि में मालूम पड़ते थे।”... और नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालिब, जो देश के भेद लेनेवालों में से थे, अपने अपने वस्त्र फाड़कर, इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे... यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिसमें दूध और मधु की धाराएं बहती हैं, पहुंचाकर उसे हमें दे देगा। केवल इतना करो कि तुम यहोवा के विरुद्ध बलवा न करो; और न तो उस देश के लोगों से डरो, क्योंकि वे हमारी रोटी ठहरेंगे...

यहोशू और कालिब हमेशा परमेश्वर के करीब थे, इसलिए वे परमेश्वर की खुशबू को महसूस कर सकते थे। इसी कारण वे हमेशा ऐसा सोचते हुए परमेश्वर पर दृढ़ विश्वास रखने के काबिल हो सके, ‘इस समय भी परमेश्वर हमारी अगुवाई कर रहे हैं।’ उनके विपरीत, दूसरे दस जासूस परमेश्वर से बहुत दूर रहते थे, इसलिए वे परमेश्वर की खुशबू को महसूस नहीं कर सके और परमेश्वर के अस्तित्व का एहसास करने में असफल रहे। इसलिए भले ही परमेश्वर ने उस कनान देश को देने का वादा किया, जिसमें दूध और मधु की धाराएं बहती थीं, फिर भी उन्होंने परमेश्वर के परम वचन पर विश्वास नहीं किया।

परमेश्वर ने जब एक बार कहा कि वह उन्हें कनान देंगे, तब उन्हें उनके वचन पर विश्वास करके आगे बढ़ना चाहिए था। हालांकि, जंगल की यात्रा के दौरान, जब भी उन्होंने बाधाओं का सामना किया, वे निराश हो गए, और उन्होंने बहुत बार अपना विश्वास पूरी तरह खो दिया। अंत में, दुर्भाग्य से उन में से यहोशू और कालिब को छोड़ कोई भी कनान देश में प्रवेश नहीं कर सका, क्योंकि वे परमेश्वर के करीब नहीं आए।

गिन 14:26–30 फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, “यह बुरी मण्डली मुझ पर बुड़बुड़ाती रहती है, उसको मैं कब तक सहता रहूं? इस्राएली जो मुझ पर बुड़बुड़ाते रहते हैं, उनका यह बुड़बुड़ाना मैं ने सुना है... मेरे जीवन की शपथ जो बातें तुम ने मेरे सुनते कही हैं, नि:सन्देह मैं उसी के अनुसार तुम्हारे साथ व्यवहार करूंगा। तुम्हारे शव इसी जंगल में पड़े रहेंगे; और तुम सब में से बीस वर्ष के या उससे अधिक आयु के जितने गिने गए थे, और मुझ पर बुड़बुड़ाते थे, उनमें से यपुन्ने के पुत्र कालिब और नून के पुत्र यहोशू को छोड़ कोई भी उस देश में न जाने पाएगा, जिसके विषय मैं ने शपथ खाई है कि तुम को उसमें बसाऊंगा।”

सिर्फ वही जो पूर्ण रूप से परमेश्वर के वचनों को मानते हैं, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं।



प्रतिज्ञा किए हुए कनान देश की ओर इस्राएलियों की जंगल की यात्रा स्वर्ग की ओर हमारी विश्वास की यात्रा को दर्शाती है। अतीत के इतिहास से शिक्षा पाकर, हमें परमेश्वर के हर वचन को पूर्ण रूप से मानना चाहिए और उसका आदर करना चाहिए। स्वर्ग का राज्य वह जगह है जहां सिर्फ वही लोग प्रवेश कर सकते हैं, जो परमेश्वर के करीब रहते हैं और उनके वचन पर पूर्ण विश्वास करते हैं।

आइए हम परमेश्वर के और करीब आएं और उनके वचन का पालन करें। परमेश्वर के जितने करीब होंगे, उतना ही हम परमेश्वर की खुशबू को महसूस कर सकेंगे। अगर किसी को परमेश्वर की खुशबू का एहसास नहीं होता, तो उसे महसूस करना चाहिए कि वह अभी परमेश्वर से बहुत दूर है, और जैसे उड़ाऊ पुत्र अपने घर लौटा, वैसे उसे परमेश्वर के करीब आना चाहिए।

कृपया वचन में बने रहिए। बाइबल के वचन सिर्फ पढ़ने के द्वारा लागू नहीं होते। हमें हर एक वचन को अपने हृदय में संजोने की और उसे अमल में लाने की जरूरत है। अगर हम वचन के करीब जीएंगे, तो हम परमेश्वर के हर वचन का गहरा अर्थ जान सकेंगे और आनंद और आशीष का अनुभव कर सकेंगे।

याक 1:22–25 परन्तु वचन पर चलनेवाले बनो, और केवल सुननेवाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं। क्योंकि जो कोई वचन का सुननेवाला हो और उस पर चलनेवाला न हो, तो वह उस मनुष्य के समान है जो अपना स्वाभाविक मुंह दर्पण में देखता है। इसलिये कि वह अपने आप को देखकर चला जाता और तुरन्त भूल जाता है कि मैं कैसा था। पर जो व्यक्ति स्वतंत्रता की सिद्ध व्यवस्था पर ध्यान करता रहता है, वह अपने काम में इसलिये आशीष पाएगा कि सुनकर भूलता नहीं पर वैसा ही काम करता है।

याक 2:14–26 हे मेरे भाइयो, यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो इससे क्या लाभ? क्या ऐसा विश्वास कभी उसका उद्धार कर सकता है?... पर हे निकम्मे मनुष्य, क्या तू यह भी नहीं जानता कि कर्म बिना विश्वास व्यर्थ है? जब हमारे पिता अब्राहम ने अपने पुत्र इसहाक को वेदी पर चढ़ाया, तो क्या वह कर्मों से धार्मिक न ठहरा था? अत: तू ने देख लिया कि विश्वास ने उसके कामों के साथ मिलकर प्रभाव डाला है, और कर्मों से विश्वास सिद्ध हुआ... अत: जैसे देह आत्मा बिना मरी हुई है, वैसा ही विश्वास भी कर्म बिना मरा हुआ है।

बाइबल कहती है कि विश्वास कर्म बिना व्यर्थ और मरा हुआ है। जब हम न सिर्फ परमेश्वर के वचन को सुनेंगे, बल्कि उसे अमल में भी लाएंगे, तब हम वचन के करीब रह सकेंगे और हमारा विश्वास संपूर्ण बन सकेगा। नूह जिसने जहाज बनाया, और अब्राहम जो अपने एकलौते पुत्र इसहाक को होमबलि स्वरूप अर्पण करने को तैयार था, उन्होंने न सिर्फ परमेश्वर के वचन सुने, बल्कि उनका पालन भी किया। इसलिए वे धर्मी माने गए और आशीषित भी किए गए। परमेश्वर के वचन के करीब रहने का मतलब है, उनके वचन का पालन करना।

वचन को अमल में लाएं



जब हम परमेश्वर के वचन को, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, अमल में लाने के द्वारा वचन के करीब रहते हैं, तब जैसा परमेश्वर ने कहा है, हम अनुग्रहपूर्ण परिणाम पा सकते हैं। लेकिन यदि हम कर्म न करें, तो हम कुछ भी नहीं पा सकते। इस सत्य को मन में रखते हुए, आइए हम प्रचार के मिशन के बारे में सोचें, जिसे हमें प्राथमिकता देनी चाहिए और पवित्र मानना चाहिए।

2तीम 4:2–8 तू वचन का प्रचार कर, समय और असमय तैयार रह, सब प्रकार की सहनशीलता और शिक्षा के साथ उलाहना दे और डांट और समझा... पर तू सब बातों में सावधान रह, दु:ख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर, और अपनी सेवा को पूरा कर... मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी और न्यायी है, मुझे उस दिन देगा, और मुझे ही नहीं वरन् उन सब को भी जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं।

अगर हम ऊपर के वचनों के करीब रहना चाहते हैं, तो हमें उन्हें अमल में लाने की जरूरत है। केवल शब्दों या विचारों या संकल्प से नहीं, पर कार्यों के द्वारा हमें वचन का प्रचार करना चाहिए। यही परमेश्वर के वचनों के करीब रहने का सही रास्ता है।

प्रेरित पौलुस ने इन वचनों को अमल में लाया। भले ही उसने यहूदियों से पांच बार उन्तालीस उन्तालीस कोड़े खाए और बहुत नुकसान सहा, फिर भी उसने न तो वचन का प्रचार करने में थोड़ा सा भी संकोच किया और न ही डरा। वह परमेश्वर के वचन के इतना करीब रहता था, इसलिए उसने जहां कहीं भी सुसमाचार का बीज बोया, वह वहां बहुत फल उत्पन्न कर सका, और इस पृथ्वी पर अपने जीवन के अंतिम क्षण में उसे पूरा विश्वास था कि उसके लिए धर्म का मुकुट रखा गया है।

हमें भी हर दिन निडरता से वचन का प्रचार करते हुए परमेश्वर के वचन के करीब रहना चाहिए। अगर हम ऐसा करेंगे, तो हम पवित्र आत्मा की शक्ति धारण करेंगे और अवश्य परमेश्वर से अनुग्रहपूर्ण परिणाम पा सकेंगे।

इफ 6:10–20 इसलिए प्रभु में और उसकी शक्ति के प्रभाव में बलवन्त बनो। परमेश्वर के सारे हथियार बांध लो कि तुम शैतान की युक्तियों के सामने खड़े रह सको... इसलिए सत्य से अपनी कमर कसकर, और धार्मिकता की झिलम पहिन कर, और पांवों में मेल के सुसमाचार की तैयारी के जूते पहिन कर; और इन सब के साथ विश्वास की ढाल लेकर स्थिर रहो जिससे तुम उस दुष्ट के सब जलते हुए तीरों को बुझा सको। और उद्धार का टोप, और आत्मा की तलवार, जो परमेश्वर का वचन है, ले लो... और मेरे लिये भी कि मुझे बोलने के समय ऐसा प्रबल वचन दिया जाए कि मैं साहस के साथ सुसमाचार का भेद बता सकूं, जिसके लिये मैं जंजीर से जकड़ा हुआ राजदूत हूं; और यह भी कि मैं उसके विषय में जैसा मुझे चाहिए साहस से बोलूं।

अभी हम परमेश्वर के दूत हैं, जो पवित्र आत्मा के सारे हथियार बांधकर पूरे संसार की ओर जाते हैं। परमेश्वर हमें अपनी ओर से संसार में निकट आनेवाले न्याय और उद्धार के शुभ संदेश की घोषणा करने के लिए भेजते हैं। इसलिए पूरे संसार में उन सभी को जिन्होंने अभी तक संदेश नहीं सुना, परमेश्वर का यह संदेश बताना हमारा कत्र्तव्य है।

इसके लिए, अब दुनिया भर में आत्माओं को बचाने का आंदोलन किया जा रहा है। यह सोचने के बजाय, कि ‘अगर मैं नहीं करूंगा तो कोई दूसरा करेगा,’ हमें स्वयं यह मिशन पूरा करना चाहिए। अगर हम सभी दुनिया को बचाने के मिशन में सहभागी होंगे, तो उद्धार का कार्य जल्द ही पूरा हो जाएगा। अगर हम में से प्रत्येक जन इसे न करेगा, दुनिया को बचाने का लक्ष्य बिना कुछ पाए समाप्त हो जाएगा।

परमेश्वर अपनी आशीष उन्हें देते हैं जो भविष्यद्वाणी के नरसिंगे के शब्द के अनुसार कार्य करते हैं, और उन्हें आशीष नहीं देते जो बिना कुछ किए चुप रहते हैं। अगर हम परमेश्वर के वचन के करीब रहें और निडरता से पतरस और योना की तरह परमेश्वर का संदेश चिल्लाएंगे, तो हम एक दिन में 3,000 या 1,20,000 लोगों की अगुवाई मन फिराव की ओर कर सकते हैं।(प्रे 2:38–41; योना 3:1–10; 4:11) मैं आग्रहपूर्वक आशा करता हूं कि सिय्योन में सभी भाई और बहनें पतरस और योना की तरह महान नबी बनें और परमेश्वर के वचन के करीब रहकर हर दिन दुनिया के सभी लोगों की अगुवाई उद्धार की ओर करें।