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प्रभु में आनन्दित रहो

जब हम परमेश्वर की बनाई रचनाओं को ध्यान से देखें, तब हमें एहसास होता है कि परमेश्वर हमें कितने ज़्यादा अनुग्रह के वरदान दे रहा है। ताज़ी हवा, स्वच्छ पानी, हरे पेड़–पौधे, हमारे पास प्यारे लोग, मौसम या ऋतु में आते बदलाव से आनन्ददायक अनुभूति, आदि बहुत सारी ऐसी बातें हैं जिनके लिए हम धन्यवादित व आनन्दित हो सकते हैं। इसलिए बाइबल अक्सर कहती है कि धन्यवादित व आनन्दित होना सद्गुण है जो मसीहियों को अपनाना चाहिए।

पश्चिमी–पूर्वी दोनों देशों में, पुराने समय से ऐसी प्रथा चलती थी कि राजमहल या किले पर, जहां राजा रहता था, विशेष झण्डा लगा होता था। यह इस बात का चिन्ह था कि राजा उसमें है। इस तरह से मसीहियों का हमेशा आनन्दित होना भी इस बात का चिन्ह है कि उनके अन्दर परमेश्वर है। लेकिन इसके विपरित यदि मसीही निराश रहें, शिकायत करें और आनन्द खोएं, तो यह इसका चिन्ह होगा कि उनके अन्दर परमेश्वर नहीं है।

इस्राएली जो पुराने नियम के समय जंगल पर चलते थे, उनके इतिहास को देखें। उस समय परमेश्वर इस तरह अपनी उपस्थिति लोगों को दिखाता था कि वह दिन में बादल का खम्भा और रात में आग का खम्भा निवासस्थान के परम पवित्रस्थान पर खड़ा करता था। बाइबल में हमारी तुलना परमेश्वर के मन्दिर से की गई है। हम भी जो परमेश्वर का मन्दिर हैं, हर बात में आनन्दित रहने के द्वारा लोगों को दिखाएंगे कि परमेश्वर हमारे अन्दर है।

हमें क्यों मसीही होने से सदा आनन्दित रहना है?



यदि हम शारीरिक तौर पर देखें, तो लगता है कि हमारे सामने हमेशा ऐसी बातें आती हैं जिनसे हमारे पास शिकायतें आती हैं। लेकिन यदि हम इसे आत्मिक तौर पर देखें, तो जानेंगे कि ये सब कुछ धन्यवाद देने की बातें हैं। इसलिए परमेश्वर ने कहा है कि सर्वदा आनन्दित रहो।

1थिस 5:14–22 “हे भाइयो, हम तुमसे आग्रह करते हैं कि आलसियों को चेतावनी दो, कायरों को प्रोत्साहन दो, निर्बलों की सहायता करो, सब के साथ सहनशीलता दिखाओ। ध्यान रखो कि कोई बुराई के बदले किसी से बुराई न करे, परन्तु सर्वदा एक दूसरे की तथा सब लोगों की भलाई करने में प्रयत्नशील रहे। सर्वदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना करो, प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद दो, क्योंकि मसीह यीशु में तुम्हारे लिए परमेश्वर की यही इच्छा है। आत्मा को न बुझाओ, भविष्यद्वाणियों को तुच्छ न जानो। सब बातों को सावधानी से परखोऌ जो अच्छी है उसे दृढ़तापूर्वक थामे रहो। सब प्रकार की बुराई से बचे रहो।”

हमारे परमेश्वर में हमेशा आनन्दित होने का कारण यह है कि वह परमेश्वर जो हमें अनन्त जीवन व उद्धार देता है, हमारे साथ है। परमेश्वर ने हमसे इतना प्रेम किया है कि उसने अपने जीवन का बलिदान किया।

यूह 3:16–17 “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, कि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। क्योंकि परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत को दोषी ठहराए, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाएं।”

हम जानते हैं कि परमेश्वर ने संसार से कितना अधिक प्रेम किया है। उसने अपने एकलौते पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु हमारे उद्धार के लिए दोषबलि के रूप में इस धरती पर भेजा। हम ने ऐसा ही बहुत अधिक प्रेम व आशीष पाई है। इसलिए हमें हर दिन आनन्दित रहना चाहिए और किसी से भी शिकायत नहीं करनी चाहिए।

जब हम प्रकृति को देखें जिसे परमेश्वर ने बनाया, तब हमें इसका एहसास होगा कि हमारी देखभाल के लिए, जो शरण नगर में रह रहे हैं, परमेश्वर ने कितना ज़्यादा ख्याल रखा है, और हम से कितना प्यार करता है। यदि हम परमेश्वर के इस प्रेम का एहसास करेंगे, तब हम किसी भी स्थिति में आनन्दित व धन्यवादित रह सकेंगे। बजाए इसके कि परमेश्वर के अनुग्रह के लाखों लाख वरदानों को भूल कर, बाकी जीवन को सिर्फ़ शिकायत करते या कुड़कुड़ाते हुए बिताएं, इस बात पर हमेशा आनन्दित व धन्यवादित रहें कि हमने परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार व स्वर्ग जाने की आशा पाई है।

हब 3:16–18 “...चाहे अंजीर का वृक्ष न फूले, न दाखलताओं में फल लगे, और जैतून वृक्ष फल न दे, खेतों में अनाज उत्पन्न न हो, और भेड़शालाओं से भेड़–बकरियां जाती रहें और थानों में गाय–बैल न रहें। फिर भी यहोवा के कारण मैं आनन्दित रहूंगा और अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर में मग्न रहूंगा।”

हमारे पास न तो शक्ति, न ज्ञान और न धन है, लेकिन परमेश्वर हमेशा हमारे साथ है, हमारी रक्षा करता है और हम से प्रेम करता है, तो यह कितनी खुशी व धन्यवाद की बात है! इस धरती पर चाहे हमारे पास कुछ नहीं हो, या हम सबसे नीचे निम्न वर्ग के हों, तो भी पूरे ब्रह्मांड का स्वामी, परमेश्वर हमारे साथ है और उसने हमें स्वर्ग के सारे भण्डार दिए हैं। इसलिए सचमुच हम संसार में सबसे धनवान हैं और सबसे आनन्दित लोग हैं।

हम सच्चे मसीही हैं, तो हमें हमेशा आनन्द का झण्डा इस चिन्ह के रूप में लहराना चाहिए कि हमारे अन्दर परमेश्वर है। लेकिन यदि हम यह पल–पल भूलें कि परमेश्वर हमारे साथ है, तो मन में आनन्द मिट जाएगा और उसकी जगह शिकायत बैठ जाएगी। परमेश्वर जो हमारी रक्षा करता है, रात–दिन हमारे साथ है। तो चाहे दाखलताओं में फल न लगें, थानों में गाय बैल न हों, और खेतों में अन्न न उपजे, फिर भी हम उसके प्रेम का एहसास करके, हर बात में आनन्दित व धन्यवादित होते हुए जीवन जीएंगे।

संसार में सबसे स्वादिष्ट खाना



यह कहानी किसी राज्य के एक राजा की है। एक दिन राजा ने पूरे देश में यह घोषित करवाया कि जो राजा को सबसे स्वादिष्ट खाना खिलाएगा, उसे राज्य का आधा भाग तक दिया जाएगा। उसके बाद, राज्य के कोने–कोने से रसोइयों की भारी भीड़ ऐसी एकत्रित हुई जैसे बादल घिरे हुए हों। वे अपनी–अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करते हुए अलग–अलग भोजन बनाकर राजा के सामने ले आए। लेकिन किसी भी भोजन से राजा सन्तुष्ट नहीं था।

उस समय एक रसोइए ने राजा के सामने आकर कहा, “हे राजा! मैं संसार में सबसे स्वादिष्ट खाना आपको खिलाऊंगा। लेकिन इसे खाने के लिए एक जरूरी शर्त है जो आपको माननी पड़ेगी। क्या आप किसी भी शर्त पर सहमत हो सकेंगे?”
“हां, संसार में सबसे स्वादिष्ट खाना खाने के लिए मैं किसी भी शर्त पर सहमत होऊंगा।”

राजा का पक्का वादा सुनकर, रसोइए ने सैनिकों को कहा कि राजा को कारागार में बन्द करे। यह राजा के लिए बहुत अपमान की बात थी। फिर भी, जैसे राजा ने पहले वादा किया था कि किसी भी शर्त को मानेगा, राजा को ऐसा ही करना पड़ा। राजा कई दिनों तक कारागार में रहा और उसने कुछ भी नहीं खाया।

कई दिन बीत गए। रसोइए ने राजा के सामने अपने द्वारा पकाया हुआ भोजन परोसा। वास्तव में वह भोजन उन चिकने भोजनों की तुलना में बहुत साधारण सा था जो वह पहले हर दिन खाता था। लेकिन उसे यह भोजन उन भोजनों से सबसे स्वादिष्ट लगा जो वह पहले जीवन भर चखता था। उसने उसकी बड़ी प्रशंसा की। राजा ने जन्म से लेकर उस समय तक कभी भूख का एहसास नहीं किया था, और वह हमेशा अत्यन्त चिकना और मजेदार भोजन खाता था। लेकिन जब उसने कारागार में बन्द किया जाकर, कड़ी भूख का अनुभव किया, तब उस समय से वह भोजन के महत्व और इसके सच्चे स्वाद का एहसास कर सका।

परमेश्वर हमें ऐसे कारण के लिए कभी–कभी दुख के समय से गुज़रने देता है, और हमें जीवन में आनन्द, क्रोध, दुख व सुख, आदि तरह–तरह का अनुभव करने देता है। जैसे राजा भोजन के स्वाद व महत्व का एहसास नहीं कर पाया, क्योंकि उसने हमेशा अत्यन्त अच्छे व चिकने भोजन का मजा लिया, वैसे ही हमारा जीवन यदि हमेशा केवल आनन्द, खुशी व सुख से भरा हो, तो हम परमेश्वर की आशीषों का एहसास नहीं करेंगे और परमेश्वर को धन्यवाद देना भूल जाएंगे।

कोहरे व खराब मौसम के बाद, यदि धूप से भरा–भरा उजला सा दिन आए, तो हमारी खुशी दो गुणा हो जाती है। उसी तरह से, हम विश्वासी जीवन में अत्याचार या क्लेश झेलने के द्वारा, सच्ची शान्ति की खुशी को जान सकेंगे, और सुसमाचार का प्रचार करते हुए किए गए परिश्रमों के द्वारा, हम अनन्त विश्राम की खुशी को जानेंगे, और बीमारी व मृत्यु के दुखों के द्वारा, हम स्वास्थ्य व अनन्त जीवन की खुशी को जानेंगे। जब हम परमेश्वर की इस इच्छा का एहसास करेंगे, तब हम सभी परिस्थितियों में आनन्दित व धन्यवादित रहेंगे।

आशीष व आनन्द जो परीक्षाओं से गुज़रने के द्वारा पाया जाता है



विश्वास के जंगल में चलने के दौरान, हम अक्सर कठिनाइयों व समस्याओं का सामना करते हैं। लेकिन यदि हम आत्मिक रूप से देखें, तो हमें जरूर यह महसूस होगा कि सब कुछ धन्यवाद देने की बात है।

परमेश्वर हमें कभी–कभी मुसीबत व परेशानी में डाल देता है, ताकि हम उन्हें सहते सहते पक्के हो जाएं, और हम सिद्ध होकर नये मनुष्य रूप में फिर जन्म लें जो स्वर्ग के वारिस होंगे। परमेश्वर की ऐसी योजना को जब हम सोचते हैं, तब हम जान सकते हैं कि हमारे सभी क्लेशों व दुखों का मतलब परमेश्वर का प्रेम है जो हमें आशीष व उद्धार देना चाहता है।

रो 8:16–18 “आत्मा स्वयं हमारी आत्मा के साथ मिल कर साक्षी देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं। यदि हम सन्तान हैं तो उत्तराधिकारी भी–परमेश्वर के उत्तराधिकारी और मसीह के सह–उत्तराधिकारी जबकि हम वास्तव में उसके साथ दुख उठाते हैं कि उसके साथ महिमा भी पाएं। क्योंकि मैं यह समझता हूं कि वर्तमान समय के दुखों की तुलना करना आनेवाली महिमा से जो हम पर प्रकट होने वाली है, उचित नहीं।”

सुसमाचार का प्रचार करते समय हम ठट्ठों में उड़ाए जाते हैं और हमारी निन्दा की जाती है। उस समय हम से ज़्यादा जो दुखी रहता है, वह परमेश्वर है। लेकिन परमेश्वर इन्तज़ार करता है कि हमारा विश्वास परीक्षाओं से गुज़रकर सोने के समान और अधिक चमक निखर जाए। इस धरती के दुख और क्लेश उस महिमा के सामने, जो हम स्वर्ग वापस जाकर पाएंगे, कुछ भी नहीं हैं। इस समय के दुख और क्लेश तो सिर्फ़ थोड़े समय के लिए होंगे, लेकिन स्वर्ग की महिमा जो परमेश्वर हमें देगा, सदा–सर्वदा के लिए होगा।(दान 7:18 संदर्भ)

इसलिए थोड़े समय की परीक्षाओं से होकर गुज़रने का धीरज हमें रखना चाहिए, और हमें उस परमेश्वर के सच्चे प्रेम को न भूलना चाहिए जो हमें अनन्त स्वर्ग की ओर ले जाने के लिए मेहनत कर रहा है। हमारे दुख और क्लेश उन दुखों व बलिदानों के सामने, जो परमेश्वर ने हमारे उद्धार के लिए उठाए हैं, कुछ भी नहीं हैं। हमें उद्धार देने के लिए, परमेश्वर ने स्वर्ग में महिमामय सिंहासन को भी पीछे छोड़ दिया, और इस धरती पर आकर क्रूस के दुखों को, यहां तक कि मृत्यु के दुखों को भी सह लिया। जब हम परमेश्वर के बलिदान व प्रेम को सोचें, तो उसे सदा–सर्वदा धन्यवाद देते हुए भी यह बहुत कम होगा।

मसीहियों के योग्य उचित जीवन



परमेश्वर हम से ऐसा प्रेम करता है कि वह हमारे उद्धार के लिए निरन्तर मेहनत करता है और बलिदान करता है। परमेश्वर का प्रेम बहुत ही बड़ा है। लेकिन इस प्रेम की तुलना में वह चीज़ जिससे हम परमेश्वर को खुश कर सकते हैं, बहुत ही छोटी है।

चाहे हम कितना भी सोचते हों कि हम किससे परमेश्वर के अनुग्रह को लौटा सकेंगे, लेकिन कुछ भी नहीं है जो हम कमज़ोर मनुष्य, परमेश्वर को वापस दे सकते हैं। इस धरती पर हम जो परमेश्वर को दिलाते हैं, वह सिर्फ़ दुख और परिश्रम ही है। परमेश्वर को खुशी लौटाने का सबसे अच्छा मार्ग सिर्फ़ यह है कि खोए हुए सारे भाई–बहनों को जल्दी ढूंढ़कर उनका उद्धार करें और अपने पापी स्वभाव को छोड़कर सुन्दर स्वर्गदूतों के रूप में बदल जाएं।

कुल 3:1–10 “इसलिए यदि तुम मसीह के साथ जीवित किए गए तो उन वस्तुओं की खोज में लगे रहो जो स्वर्ग की हैं, जहां मसीह विद्यमान है और परमेश्वर की दाहिनी ओर विराजमान है। अपना मन पृथ्वी पर की नहीं, परन्तु स्वर्गीय वस्तुओं पर लगाओ, क्योंकि तुम तो मर चुके हो और तुम्हारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है। जब मसीह, जो हमारा जीवन है, प्रकट होगा, तब तुम भी उसके साथ महिमा में प्रकट किए जाओगे। इसलिए अपनी पार्थिव देह के अंगों को मृतक समझो, अर्थात् व्यभिचार, अशुद्धता, वासना, बुरी लालसा और लोभ को जो मूर्तिपूजा है। इन्हीं के कारण परमेश्वर का प्रकोप आएगा। और जब तुम इन बुराइयों में जीवन व्यतीत करते थे तो तुम इन्हीं के अनुसार चलते थे। परन्तु अब तुम भी इन सब को अर्थात् क्रोध, रोष, बैरभाव, निन्दा और मुंह से गालियां बकना, छोड़ दो। एक दूसरे से झूठ मत बोलो, क्योंकि तुमने अपने पुराने मनुष्यत्व को उसके बुरे कार्यों सहित त्याग दिया है, और नए मनुष्यत्व को पहिन लिया है जो अपने सृष्टिकर्ता के स्वरूप के अनुसार सत्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए नया बनता जाता है।”

भले ही पिछले दिनों में हमारा स्वभाव शिकायत में और कुड़कुड़ाने में जीना था, लेकिन अब से हमें परमेश्वर में नये मनुष्य के रूप में फिर जन्म लेकर स्वर्ग की वस्तुओं की लालसा और आशा करनी चाहिए, और सच्चे भाईचारे से सब को जोड़ने का प्रयास करते हुए जीवन जीना चाहिए। यदि हम ऐसे मसीही हैं, जिसके अन्दर परमेश्वर है, तो सदाचार व सुन्दर स्वभाव से परमेश्वर की महिमा करना आवश्यक है।

इफ 5:1–17 “इसलिए प्रिय बालकों के सदृश परमेश्वर का अनुकरण करने वाले बनो, और प्रेम में चलो जैसे मसीह ने भी हम से प्रेम किया और सुखदायक सुगन्धित भेंट बनकर हमारे लिए अपने आपको परमेश्वर के सम्मुख बलिदान कर दिया...। और न तो घृणित कार्य, न मूर्खतापूर्ण बातें, न ठट्ठे की बातें जो शोभा नहीं देती हैं पाई जाएं, वरन् धन्यवाद ही दिया जाए। क्योंकि तुम यह निश्चयपूर्वक जानते हो कि कोई व्यभिचारी, अशुद्ध जन, या लोभी मनुष्य अर्थात् मूर्तिपूजक, मसीह और परमेश्वर के राज्य का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता। कोई तुम्हें व्यर्थ बातों से धोखा न दे, क्योंकि इन ही के कारण आज्ञा न मानने वालों पर परमेश्वर का प्रकोप पड़ता है। इसलिए तुम ऐसे लोगों के सहभागी न बनो। पहिले तो तुम अन्धकार थे, परन्तु अब प्रभु में ज्योति हो, अत: ज्योति की सन्तान के सदृश चलो– क्योंकि ज्योति का फल सब प्रकार की भलाई, धार्मिकता और सत्य है परखो कि प्रभु किन बातों से प्रसन्न होता है। अन्धकार के निष्फल कामों में सहभागी न हो वरन् इन कामों को प्रकट करो। क्योंकि जो काम गुप्त में उनके द्वारा किए जाते हैं। उनकी चर्चा भी लज्जा की बात है। पर जितने कार्य प्रकट किए जाते हैं वे सब ज्योति से प्रकट होते हैं, क्योंकि जो सब कुछ प्रकट करता है वह ज्योति है। इस कारण वह कहता है, “हे सोने वाले, जाग और मृतकों में से जी उठ, तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी।” इसलिए सावधान रहो कि तुम कैसी चाल चलते हो– निर्बुद्धि मनुष्यों के सदृश नहीं वरन् बुद्धिमानों के सदृश चलो। समय का पूरा पूरा उपयोग करो, क्योंकि दिन बुरे हैं। इस कारण निर्बुद्धि न हो, परन्तु यह जान लो कि प्रभु की इच्छा क्या है।”

आइए समझें कि परमेश्वर ने हमें क्यों हमेशा धन्यवादित व आनन्दित होने के लिए कहा है,और आइए न भूलें कि हमेशा हमारे अन्दर परमेश्वर जीवित है और हमेशा हमारे साथ परमेश्वर चलता है।

स्वर्ग में, जहां हम वापस जाएंगे, न दर्द, न दुख और न शोक हैं। हम परमेश्वर की इस योजना को अच्छी तरह समझेंगे कि यदि हम इस धरती पर थोड़े समय तक दुखों से भरा हुआ जीवन जीएं, तो हमें स्वर्ग के राज्य की महिमा और आशीषों की गहराई का पूरा एहसास होगा और हमारा आनन्द पूरा होगा। इसलिए हमें सारी कठिनाइयों व पीड़ाओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। मैं आशा करता हूं कि हमेशा ‘आनन्द’ का झण्डा लहराते हुए, जो प्रदर्शित करता है कि परमेश्वर हमारे साथ है, हम स्वर्ग के आदेश का पालन करें और जयजयकार करते हुए फल उत्पन्न करें।