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उद्धार के कार्य को पूरा करने की शक्ति का स्रोत

हमारे भाई और बहनें विश्वास में एक मन होकर कड़ी मेहनत कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप, दुनिया भर में 7,000 से अधिक सिय्योन अब स्थापित हुए हैं। उद्धार के इस अद्भुत कार्य को देखकर, कुछ सोच सकते हैं कि यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि प्रधान कार्यालय के कुछ विभाग योजना बनाने में अच्छा है, और दूसरे सोच सकते हैं कि हमने ऐसे महान परिणाम इसलिए पाए हैं क्योंकि हमारे पास पादरी और मिशनरी हैं जो उत्कृष्ट नेतृत्व के साथ संपन्न हैं।

लेकिन, यदि हम बाइबल के द्वारा उस पर नजर डालें, तब हम महसूस कर सकते हैं कि चाहे परमेश्वर किसी भी लोगों को नियुक्त करें, राज्य का सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, और उद्धार का कार्य परमेश्वर की मदद के द्वारा पूरा हो सकता है। हम सब पापी स्वर्गदूत हैं जो स्वर्गदूतों की दुनिया में पाप करके इस पृथ्वी पर गिरा दिए गए। हममें से कोई भी घमण्ड या आत्मप्रशंसा करने वाला नहीं होना चाहिए। उसके बजाय, हमें परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहिए और चुंगी लेनेवाले के समान बहुत पश्चाताप करना चाहिए जिसने कहा, “हे प्रभु, मैं एक पापी हूं!” इस प्रकार के विश्वास के साथ, हमें हमेशा इसके बारे में सोचते हुए कि उद्धार के कार्य को पूरा करने की शक्ति कहां से आती है, अनन्त स्वर्ग के राज्य की ओर आगे बढ़ना चाहिए।

इस्राएल तब जीत लेता जब मूसा ने अपने हाथ ऊपर उठाए रखा



इस्राएलियों की 40 वर्षों की जंगल की यात्रा के दौरान इस्राएल और अमालेक के बीच युद्ध हुआ था। यहोशू इस्राएल के सैनिकों के साथ अमालेकियों से लड़ने गया और जीत प्राप्त की। लेकिन, इस्राएल की जीत यहोशू पर जिसने सेना का नेतृत्व किया या सैनिकों पर जिन्होंने उसका पालन किया, निर्भर नहीं थी।

निर्ग 17:8–13 तब अमालेकी आकर रपीदीम में इस्राएलियों से लड़ने लगे। तब मूसा ने यहोशू से कहा, “हमारे लिये कई पुरुषों को चुनकर छांट ले, और बाहर जाकर अमालेकियों से लड़; और मैं कल परमेश्वर की लाठी हाथ में लिये हुए पहाड़ी की चोटी पर खड़ा रहूंगा।” मूसा की इस आज्ञा के अनुसार यहोशू अमालेकियों से लड़ने लगा; और मूसा, हारून, और हूर पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गए। जब तक मूसा अपना हाथ उठाए रहता था तब तक तो इस्राएल प्रबल होता था; परन्तु जब जब वह उसे नीचे करता तब तब अमालेक प्रबल होता था। पर जब मूसा के हाथ भर गए, तब उन्होंने एक पत्थर लेकर मूसा के नीचे रख दिया, और वह उस पर बैठ गया, और हारून और हूर एक एक अलंग में उसके हाथों को सम्भाले रहे; और उसके हाथ सूर्यास्त तक स्थिर रहे। और यहोशू ने अनुचरों समेत अमालेकियों को तलवार के बल से हरा दिया।

वे एक दूसरे के विरुद्ध लड़ते हुए युद्ध चरम पर था। उस समय, मूसा पर्वत के ऊपर था। जब वह अपने हाथ उठाए रहता तो इस्राएली जीत लेते, और जब वह अपने हाथों को नीचे करता तो अमालेकी जीत लेते। युद्ध का परिणाम इस पर निर्भर था कि मूसा अपने हाथों को उठाए रहता था या उन्हें नीचे करता था। मूसा ने लगातार अपने हाथ ऊपर उठाए रखे, और आखिरकार इस्राएल जीत गया।

जंगल में इस्राएलियों के साथ हुई घटना हमें जो आज विश्वास के जंगल की यात्रा में चल रहे हैं, अच्छे से दिखाती है कि विजय की प्रेरक शक्ति कहां है। मूसा यीशु, यानी परमेश्वर को दर्शाता है। जैसे इस्राएल तब जीत सका जब मूसा अपना हाथ ऊपर उठाए रहा, ठीक वैसे इस अंतिम युग, यानी पवित्र आत्मा के युग में सुसमाचार कार्य तब पूरा हो सकता है जब परमेश्वर हमारे साथ होते हैं और हमारी मदद करते हैं। मंदिर के निर्माण के कार्य के संबंध में, परमेश्वर ने कहा, “न तो बल से, और न शक्ति से, परन्तु मेरे आत्मा के द्वारा होगा”(जक 4:6)। चाहे नेता कितने ही समझदार और बुद्धिमान क्यों न हो और चाहे हमारे पास कितने ज्यादा चर्च और सदस्य क्यों न हों, लेकिन परमेश्वर की मदद के बिना, दुनिया को बचाने का कार्य पूरा करना असंभव है। यह ठीक ऐसा ही है जैसे इस्राएली सेना युद्ध जीत नहीं सकती थी यदि मूसा अपने हाथ ऊपर उठाए न रहा होता, फिर चाहे एक नेता के रूप में यहोशू कितना ही चतुर और उत्कृष्ट होता और चाहे उसके पास कितने ही साहसी सैनिक और शक्तिशाली हथियार होते।

हमें पूरी तरह परमेश्वर के सहारे की आवश्यकता है। हमारी जीत का इंतजार करते हुए और हमारे लिए प्रार्थना करते हुए स्वर्गीय माता पर्दे के पीछे अपने हाथ ऊपर उठाए रही हैं। चूंकि हमारी पवित्र माता उस तरह हमें सहारा देती हैं, तो उद्धार का अद्भुत कार्य अब किया जा रहा है। आइए हम, इस तथ्य को मन में रखें और इसके बारे में सोचते हुए कि सारी शक्ति कहां से आती है, सुसमाचार के कार्य में भाग लें। अवश्य ही, मूसा के अपने हाथ ऊपर उठाए रखने के दौरान, यहोशू और इस्राएल की सेना को युद्ध में लड़ना पड़ा। यहोशू की तरह हम विश्वास की अच्छी लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन हमारी जीत स्वर्गीय माता पर निर्भर है जो हमारे लिए प्रार्थना करते हुए हमें आत्मिक सामर्थ्य देती हैं। हमें इस तथ्य को नहीं भूलना चाहिए।

लाल समुद्र जो एक बाधा था, उद्धार के लिए एक उपकरण बन गया



लाल समुद्र का विभाजन भी हमें दिखाता है कि परमेश्वर को भूलकर हम हमारी खुदकी शक्ति से कभी भी सुसमाचार के कार्य को पूरा नहीं कर सकते। जब इस्राएली मिस्र से बाहर निकले और कनान देश की ओर आगे बढ़े, जहां दूध और मधु की धाराएं बहती थीं, तब पहली बाधा जिसका उन्होंने सामना किया, वह लाल समुद्र थी। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि लाल समुद्र उथला समुद्र है, लेकिन वह काफी गहरा है। इस्राएल के प्रधान या नेता चिंता में पड़े हुए होंगे कि करीब 30 लाख के लोग और उनके भेड़–बकरियों को लेकर कैसे लाल समुद्र को पार करें। लेकिन, चूंकि परमेश्वर ने उनकी मदद की, गहरा और चौड़ा लाल समुद्र तुरंत खुल गया और उनके लिए मार्ग बना।

निर्ग 14:10–21 जब फिरौन निकट आया, तब इस्राएलियों ने आंखें उठाकर क्या देखा कि मिस्री हमारा पीछा किए चले आ रहे हैं; और इस्राएली अत्यन्त डर गए, और चिल्लागकर यहोवा की दोहाई दी... मूसा ने लोगों से कहा, “डरो मत, खड़े खड़े वह उद्धार का काम देखो, जो यहोवा आज तुम्हारे लिये करेगा; क्योंकि जिन मिस्रियों को तुम आज देखते हो, उनको फिर कभी न देखोगे। यहोवा आप ही तुम्हारे लिये लड़ेगा, इसलिये तुम चुपचाप रहो।” तब यहोवा ने मूसा से कहा, “तू क्यों मेरी दोहाई दे रहा है? इस्राएलियों को आज्ञा दे कि यहां से कूच करें। और तू अपनी लाठी उठाकर अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ा, और वह दो भाग हो जाएगा; तब इस्राएली समुद्र के बीच होकर स्थल ही स्थल पर चले जाएंगे... तब मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया; और यहोवा ने रात भर प्रचण्ड पुरवाई चलाई, और समुद्र को दो भाग करके जल ऐसा हटा दिया, जिससे उसके बीच सूखी भूमि हो गई।

लाल समुद्र इस्राएलियों के लिए बहुत ही मुश्किल बाधा था। लेकिन चूंकि परमेश्वर ने उनकी मदद की, बाधा प्रतिज्ञा के कनान देश में जाने का एक शॉर्टकट बनी और दुश्मनों को नष्ट करके उनसे इस्राएलियों की रक्षा करने का एक उपकरण बनी। उसी तरह, यदि परमेश्वर हमारे साथ हैं, तो बाधाएं अब और बाधाएं नहीं, लेकिन वे हमारी रक्षा और मदद करने के उपकरण बनती हैं।

जिसने लाल समुद्र को विभाजित किया, वह न तो मूसा था न ही उसकी लाठी थी। जो सिर्फ दिखाई देनेवाली चीजों पर विश्वास करते हैं, वे सोच सकते हैं कि लाल समुद्र को विभाजित करने की शक्ति मूसा की लाठी से आई, लेकिन वास्तव में लाठी में कोई अलौकिक शक्ति नहीं थी। किसने लाठी को अपनी शक्ति से भर दिया? मूसा ने बस अपनी लाठी को उठाया जैसे परमेश्वर ने कहा था, “तू अपनी लाठी उठाकर अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ा।” तब परमेश्वर ने उसके लिए सब कुछ किया।

यदि हम सोचें कि हम स्वयं कार्य करते हैं, तो सुसमाचार के कार्य की प्रगति धीमी होगी। सिर्फ जब हम परमेश्वर की शक्ति को महसूस करते और परमेश्वर से मदद मांगते हैं, तब ही सुसमाचार के कार्य में प्रगति हो सकती है। मुझे यकीन है कि चूंकि हमारे सदस्यों ने उसे महसूस किया और उस पर विश्वास किया, तो परमेश्वर ने लाल समुद्र को विभाजित करने जैसा चमत्कारिक कार्य किया – उन्होंने पिछले वर्ष तक दुनिया भर में 7,000 सिय्योन स्थापित होने की अनुमति दी। इस वर्ष भी, आइए हम इस एहसास को हमारे मनों में रखें। सुसमाचार का कार्य ऐसी चीज नहीं है जो मनुष्य की शक्ति के द्वारा पूरी हो सकती। एक चरवाहे की बदसूरत लाठी को भी लाल समुद्र को विभाजित करने के लिए पर्याप्त शक्ति दी जा सकती है। आइए हम इस पर विश्वास करके सुसमाचार का कार्य करें। सारी शक्ति परमेश्वर से आती है, और परमेश्वर से दिए गए मिशन के अनुसार हमें जाकर परमेश्वर के वचन का प्रचार करना चाहिए। तब परमेश्वर हमारे लिए सब कुछ करेंगे।

पीतल के सांप की घटना, उद्धार परमेश्वर पर निर्भर था



परमेश्वर की मदद के बिना, हम उद्धार के कार्य में कोई प्रगति नहीं कर सकते। अतीत में हुई घटना और इस युग में हमारे साथ हो रही चीजों से यह साबित होता है। आइए हम किसी भी परिस्थिति में परमेश्वर को न भूलें, लेकिन हमेशा इसके बारे में सोचें कि उद्धार की शक्ति कहां से आती है। जो उद्धार लाता है वह हमारा तरीका या सामर्थ्य नहीं है। परमेश्वर ने हमें शक्ति पहनाई है और परमेश्वर की शक्ति के द्वारा हम संसार के सभी लोगों की अगुवाई उद्धार में कर सकते हैं।

गिन 21:4–9 फिर उन्होंने होर पहाड़ से कूच करके लाल समुद्र का मार्ग लिया कि एदोम देश से बाहर बाहर घूमकर जाएं; और लोगों का मन मार्ग के कारण बहुत व्याकुल हो गया। इसलिए वे परमेश्वर के विरुद्ध बात करने लगे, और मूसा से कहा, “तुम लोग हम को मिस्र से जंगल में मरने के लिए क्यों ले आए हो? यहां न तो रोटी है, और न पानी, और हमारे प्राण इस निकम्मी रोटी से दु:खित हैं।” अत: यहोवा ने उन लोगों में तेज विषवाले सांप भेजे, जो उनको डसने लगे, और बहुत से इस्राएली मर गए... तब मूसा ने उनके लिए प्रार्थना की। यहोवा ने मूसा से कहा, “एक तेज विषवाले सांप की प्रतिमा बनवाकर खम्भे पर लटका; तब जो सांप से डसा हुआ उसको देख ले वह जीवित बचेगा।” अत: मूसा ने पीतल का एक सांप बनवाकर खम्भे पर लटकाया; तब सांप के डसे हुओं में से जिस जिस ने उस पीतल के सांप की ओर देखा वह जीवित बच गया।

इस्राएलियों के जंगल के इतिहास में लोग जो विषवाले सांपों से डसे हुए थे, वे पीतल के सांप को देखकर जीवित बच गए थे। यह एक चमत्कार था जो परमेश्वर की सामर्थ्य से हुआ था। लेकिन, इस्राएलियों ने राजा हिजकिय्याह के समय तक, करीब 800 वर्षों तक मूर्खता से पीतल के सांप की पूजा की थी। परमेश्वर को भूलकर, उन्होंने सिर्फ दिखाई देनेवाली घटनाओं को देखा। इसके कारण वे भ्रम में पड़ गए कि पीतल के सांप ने उन्हें बचाया, और अन्त में वे मूर्तियों की उपासना करने लगे।

शक्ति का स्रोत न तो पीतल का सांप था न ही मूसा था, जिसने परमेश्वर और लोगों के बीच मध्यस्थ का काम किया था, लेकिन शक्ति का स्रोत परमेश्वर का यह वचन था, “जो सांप से डसा हुआ उसको देख ले वह जीवित बचेगा।” जिन्होंने परमेश्वर के वचन को माना, वे अपने विश्वास के अनुसार जीवित बच गए थे। अमालेकियों के विरुद्ध युद्ध में यहोशू की सेना की जीत, मूसा की लाठी से लाल समुद्र का विभाजन, पीतल के सांप की घटना… इन सभी ऐतिहासिक घटनाओं के द्वारा, हम खोज सकते हैं कि परमेश्वर हमेशा पर्दे के पीछे अपनी शक्ति से उद्धार के कार्य को पूरा करते हैं।

तब, हमें अपने उद्धार के लिए किस पर भरोसा करना चाहिए? हमारे सुसमाचार की पर्यावरण में अनगिनत चीजें हो रही हैं। कभी–कभी हममें बहुत सी चीजों की कमी होती है, और कभी–कभी बहुत सी बाधाएं होती हैं। जब कभी ऐसा होता है, तब हमें हमारे आसपास के किसी पर निर्भर होना टालना चाहिए, और साथ ही हमारा बाहरी परिवेश या परिस्थितियों पर ध्यान केंद्रित करना टालना चाहिए। नहीं तो, हम हमेशा इस्राएलियों की तरह कुड़कुड़ाएंगे और हम विश्वास के जंगल की यात्रा के अन्त तक कुड़कुड़ाते रहेंगे।

दिखाई देनेवाली शारीरिक चीजों के माध्यम से हमारी समस्याओं को हल करने की कोशिश करने के बजाय हमें हमेशा परमेश्वर के बारे में सोचना चाहिए। परमेश्वर उद्धार के कार्य को पूरा करने की सभी शक्ति का स्रोत हैं। जब हम इस पर विश्वास करते हुए परमेश्वर का पालन करें, तब हमारी बाधाएं हमें मदद करनेवाली उपकरण बनेंगी।

परमेश्वर को याद करो



शैतान आसानी से हार नहीं मानता, लेकिन परमेश्वर के सुसमाचार के राज्य को स्थापित करने में लगातार बाधा डालता है। इतनी सारी मुश्किलों के बावजूद, हमारा चर्च दुनिया भर में स्थापित हो रहा है क्योंकि परमेश्वर हमारे साथ हैं। सिर्फ जब परमेश्वर अपने हाथ ऊपर उठाए रखते हैं, तब ही उद्धार का कार्य पूरा हो सकता है। हमें हमेशा इसे मन में रखना चाहिए और परमेश्वर को महिमा और धन्यवाद देना नहीं भूलना चाहिए।

व्य 8:11–18 इसलिये सावधान रहना, कहीं ऐसा न हो कि अपने परमेश्वर यहोवा को भूलकर उसकी जो जो आज्ञा, नियम, और विधि मैं आज तुझे सुनाता हूं उनका मानना छोड़ दे; ऐसा न हो कि जब तू खाकर तृप्तह हो, और अच्छे अच्छे घर बनाकर उनमें रहने लगे, और तेरी गाय–बैलों और भेड़–बकरियों की बढ़ती हो, और तेरा सोना, चांदी, और तेरा सब प्रकार का धन बढ़ जाए, तब तेरे मन में अहंकार समा जाए, और तू अपने परमेश्वर यहोवा को भूल जाए, जो तुझ को दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है, और उस बड़े और भयानक जंगल में से ले आया है, जहां तेज विषवाले सर्प और बिच्छू हैं और जलरहित सूखे देश में उसने तेरे लिये चकमक की चट्टान से जल निकाला, और तुझे जंगल में मन्ना खिलाया, जिसे तुम्हारे पुरखा जानते भी न थे, इसलिये कि वह तुझे नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा करके अन्त में तेरा भला ही करे। और कहीं ऐसा न हो कि तू सोचने लगे कि यह सम्पत्ति मेरे ही सामर्थ्य और मेरे ही भुजबल से मुझे प्राप्त हुई। परन्तु तू अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण रखना, क्योंकि वही है जो तुझे सम्पत्ति प्राप्त करने की सामर्थ्य इसलिये देता है...

इस्राएलियों की जंगल की यात्रा से एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें परमेश्वर को नहीं भूलना चाहिए। उद्धार पाने के लिए हम में से किसी को भी परमेश्वर को नहीं भूलना चाहिए जो शक्ति का स्रोत हैं। यदि हम मन में रखें कि सारी शक्ति परमेश्वर से आती है और हमेशा परमेश्वर से मदद मांगे, तो हम सुसमाचार के कार्य में प्रगति कर सकते हैं। लेकिन, यदि हमारे पास यह गलत विचार हो, ‘मैंने यह स्वयं किया,’ और ‘मैं इसे किसी भी व्यक्ति से अधिक बेहतर कर सकता हूं,’ तो अब तक प्राप्त हुईं चीजें भी रेत का महल बन जाएंगी। परमेश्वर हमें बहुत अच्छे से जानते हैं क्योंकि उन्होंने हमें सृजा है। इसलिए, वह हमें उन्हें न भूलने को कहते हैं भले ही जब हमारा सोना और चांदी बढ़ जाएं और परिस्थिति हमारे अनुकूल हो।”

यदि हम परमेश्वर को भूल जाएं, तो हमारे विश्वास का जीवन पूरी तरह से व्यर्थ है। परमेश्वर हमारी रक्षा करते और हमें किसी भी खतरनाक बाधाओं से सुरक्षित रखते हैं। फिर भी, यदि हम ऐसा सोचकर घमंडी बन जाएं कि हमने खुद ही इसे किया है, तो हम और अधिक परमेश्वर की मदद की अपेक्षा नहीं कर सकते और हर जगह समस्याएं होंगी।

व्य 8:1–3 जो जो आज्ञा मैं आज तुझे सुनाता हूं उन सभों पर चलने की चौकसी करना, इसलिये कि तुम जीवित रहो और बढ़ते रहो, और जिस देश के विषय में यहोवा ने तुम्हारे पूर्वजों से शपथ खाई है उसमें जाकर उसके अधिकारी हो जाओ। और स्मरण रख कि तेरा परमेश्वर यहोवा उन चालीस वर्षों में तुझे सारे जंगल के मार्ग में से इसलिये ले आया है, कि वह तुझे नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा करके यह जान ले कि तेरे मन में क्या क्या है, और कि तू उसकी आज्ञाओं का पालन करेगा या नहीं। उसने तुझ को नम्र बनाया, और भूखा भी होने दिया, फिर वह मन्ना, जिसे न तू और न तेरे पुरखा ही जानते थे, वही तुझ को खिलाया; इसलिये कि वह तुझ को सिखाए कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहता, परन्तु जो जो वचन यहोवा के मुंह से निकलते हैं उन ही से वह जीवित रहता है।

इस्राएलियों के 40 वर्षों की जंगल की यात्रा के दौरान, परमेश्वर ने उनकी परीक्षा की कि क्या वे उनकी आज्ञा मानेंगे या नहीं। इसमें परमेश्वर की गहरी इच्छा शामिल थी जो उन्हें संपूर्ण विश्वास प्राप्त करने में मदद करके अंत में आशीष देना चाहते थे। चूंकि परमेश्वर जानते थे कि आरामदायक परिस्थितियों में वे आसानी से परमेश्वर को भूल जाएंगे, तो परमेश्वर ने बंजर जंगल की ओर उनका नेतृत्व किया और उन्हें विभिन्न स्थितियों में डाला; कभी–कभी उन्होंने उन्हें भूखा रहने दिया, और उन्होंने मिस्री सेना को उनका पीछा करने दिया। यदि परमेश्वर थोड़ा जल्दी लाल समुद्र खोलते, तो इस्राएलियों को घबराकर मिस्र से भागने की कोई जरूरत नहीं होती। लाल समुद्र के सामने, जो अविश्वासी थे, उन्होंने अपनी शिकायतों को बाहर उंडेला; वे परीक्षा में पड़े। उनके 40 वर्षों की जंगल की यात्रा के पूरे समय में, परमेश्वर ने उस तरह उनके विश्वास को परखा।

हमें परीक्षा में नहीं पड़ना चाहिए। परमेश्वर सिय्योन में निवास करते हैं। सिर्फ पिता परमेश्वर ही नहीं लेकिन माता परमेश्वर भी हमारे साथ हैं और हमें साहस और सामर्थ्य देते हुए हमारा मार्गदर्शन करते हैं, ताकि हम सुसमाचार का प्रचार करने के मिशन को पूरा कर सकें। सुसमाचार का कार्य परमेश्वर की शक्ति के द्वारा पूरा होता है, हमारी खुदकी शक्ति से नहीं। इसलिए, आइए हम हमेशा परमेश्वर पर निर्भर रहते हुए और प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर से मदद मांगते हुए सुसमाचार का कार्य करें। उस व्यक्ति से जो ऐसा सोचता है, ‘मैंने यह मेरी खुदकी क्षमताओं से किया है,’ परमेश्वर कहते हैं:

1कुर 4:7 क्योंकि तुझ में और दूसरे में कौन भेद करता है? और तेरे पास क्या है जो तू ने (दूसरे से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (दूसरे से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया?

सब कुछ जो हमारे पास है वह परमेश्वर से है। जंगल में 40 वर्षों के दौरान, परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए सब कुछ किया; जब उन्हें कुछ करने के लिए कठिन लगा, तब परमेश्वर ने उसे करने में उनकी मदद की; उन्होंने उनके लिए एक मार्ग बनाया; उन्होंने बाधाओं को उनकी मदद करनेवाले उपकरण में बदला, ताकि वे मुश्किल प्रक्रिया से सुरक्षित रूप से गुजर सकें। इस इतिहास से सबक लेकर, हमें परमेश्वर को कभी नहीं भूलना चाहिए।

परमेश्वर अब सुसमाचार के लिए द्वार खोल रहे हैं, ताकि परम पवित्रस्थान से बहने वाले जीवन का जल संसार के और दूर और गहराई तक पहुंच सके। जमी हुई भूमि, अलास्का, अमेजन जंगल और हिमालय और एंडीज में उच्च पर्वतीय क्षेत्र में भी सुसमाचार का प्रचार किया जा रहा है। पिछले वर्ष, परमेश्वर की आशीष के द्वारा बहुत से सिय्योन स्थापित हुए हैं। इस वर्ष में भी बहुत सी आत्माओं की अगुवाई उद्धार के मार्ग में करने के लिए हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह कार्य किसने किया।

परमेश्वर, जो उद्धार के कार्य को पूरा करने की शक्ति का स्रोत हैं, हमारे साथ हैं और हमारा मार्गदर्शन करते हैं। सिर्फ जब परमेश्वर अपने हाथ ऊपर उठाए रखते हैं, तब ही हम जीत सकते हैं। इस बात को मन में रखकर, आइए हम स्वर्गीय पिता और माता से मदद मांगें और पृथ्वी की छोर तक सुसमाचार का प्रचार करें। तब हम बिना चूके उद्धार के कार्य को पूरा कर सकते हैं। मैं आग्रहपूर्वक आपसे कहता हूं कि आनन्द और आज्ञाकारिता से स्वर्गीय पिता और माता के मार्गदर्शन का पालन करें और पूरी दुनिया में यरूशलेम की महिमा की घोषणा करें, ताकि आप अनन्त स्वर्गीय कनान यानी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें।