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नए सिरे से जन्मे लोग

हाल ही में पूरे संसार से ऐसी खबरों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है कि सदस्य पश्चाताप करते हुए सुंदर ढंग से एकजुट हो रहे हैं। और दुनिया के कोने–कोने से यह समाचार आ रहा है कि बहुत सदस्य जो स्वर्गीय माता के अच्छे उदाहरण और शिक्षाओं के द्वारा प्रेरित हुए हैं, आंसुओं के साथ अपनी गलती के लिए पहले माफी मांगकर समझौता कर रहे हैं और पश्चाताप का जीवन जीने का संकल्प कर रहे हैं। “माफ कीजिए” या “क्षमा कीजिए” जैसी बात अब हमारे मन में गहरी गूंज पैदा कर रही है।

परमेश्वर ने कहा है कि जब स्वर्ग का राज्य निकट है, तब परमेश्वर सदस्यों के हृदयों को एक होने देंगे आरै हमारे कठोर हृदयों को कोमल हृदयों में बदलेंगे(यहेज 36:24–27)। इस वचन को पूरा होते हुए देखकर मुझे लगता है कि सच में स्वर्ग का राज्य बहुत निकट आया है। स्वर्गीय पिता और माता भी सिय्योन के सदस्यों को जो एकता से रह रहे हैं, खुशी के साथ देख रहे होंगे।

स्वर्ग का राज्य उनके लिए है जो पश्चाताप करते हैं



यदि अब तक आपके पास ऐसा सदस्य है जो आपके पास रहने पर भी आपसे दूरी बनाता है, तो आइए हम आज इस पल उसके पास पहले जाएं और अपना हाथ आगे बढ़ाकर उसका हाथ थाम लें और माफी मांगें। मैं आशा करता हूं कि हम सब सही तरह से यह समझते हुए कि हम पापी हैं, परमेश्वर की इस पवित्र शिक्षा का पालन करें कि खुद को ऊंचा करने के बजाय पहले खुद को नीचा करो।

बहुत पहले स्वर्ग में हमने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया था और अनजाने में विद्रोह में दुष्टों का साथ दिया था। इसी कारण हमें इस पृथ्वी पर गिरा दिया गया है। शैतान से भरमाए जाने के बाद, हमारे मन में पापी स्वभाव जो पहले हमारे पास नहीं था, पैदा हुआ और बसने लगा। जब हम उस पापी स्वभाव से मुड़ जाएं, तभी हम अपने खोए हुए मूल स्वभाव को पुन: प्राप्त करके स्वर्ग के राज्य में लौट सकते हैं।

मत 4:15–17 जबूलून और नप्ताली के देश, झील के मार्ग से यरदन के पार, अन्यजातियों का गलील– जो लोग अन्धकार में बैठे थे, उन्होंने बड़ी ज्योति देखी; और जो मृत्यु के देश और छाया में बैठे थे, उन पर ज्योति चमकी। उस समय से यीशु ने प्रचार करना और यह कहना आरम्भ किया, “मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है।”

पश्चाताप का अर्थ होता है, अपना मन फिराकर सुधर जाना। चूंकि हमने स्वर्ग में पाप किए थे और पृथ्वी पर गिरा दिए गए हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि हमारे इस पृथ्वी पर जीने का मकसद यह है, पश्चाताप करना। यदि यहां हम सब सम्पूर्ण पश्चाताप करें, यानी एक या दो व्यक्ति नहीं, बल्कि सिय्योन के सभी सदस्य सच्चे मन से पश्चात्ताप करें, तो क्या अनंत स्वर्ग हमारे सामने और अधिक निकट नहीं आएगा?

जंगल की यात्रा के लंबी होने का कारण यह नहीं था कि मिस्र से कनान बहुत दूर था। वास्तविक दूरी तो कम थी, पर इस्राएल के लोगों के पास पश्चातापी मन और सम्पूर्ण विश्वास नहीं था। इसी वजह से छोटा मार्ग एक लंबा मार्ग बन गया, जिस पर उन्हें 40 वर्षों के लंबे समय तक चलना पड़ा।

हमें माता की शिक्षाओं को, जो हमें जागृत करने के लिए दी गई हैं, अपने हृदय–पटल पर गहराई से अंकित करते हुए सच्चे मन से पश्चाताप करना चाहिए, और हमें उस तरह परमेश्वर से प्रेम करना और उनका आदर करना चाहिए, जिस तरह हम पहले स्वर्ग में करते थे। परमेश्वर ने फसह के पर्व जैसे विभिन्न सत्यों के द्वारा हमारे सामने वह मार्ग खोला है जिसके द्वारा हम परमेश्वर की ओर लौट सकते हैं(2इत 30:1 –8; मला 3:7–12)। परमेश्वर जैसा मार्गदर्शन करते थे, उसी तरह जब हम चलते थे, तब परमेश्वर हमारे मन के भीतर से उस पुराने पापमय स्वभाव को मिटा देते थे जो ऊंचा बनना चाहता था। आखिरकार, अब परमेश्वर ने हमें ऐसे सुन्दर रूप में बदल दिया है कि हम पहले दूसरे का हाथ थाम सकते हैं और पहले खुद को नीचा करते हुए माफी मांग सकते हैं।

पश्चाताप और उद्धार



परमेश्वर की ओर जाने का मार्ग दूर नहीं है। स्वर्ग का राज्य हमारे निकट है। भले ही स्वर्ग निकट है, लेकिन यदि स्वर्ग हमसे दूर है, तो उसके जिम्मेदार हम ही हैं। हमें पश्चाताप करना चाहिए और अपने स्वभाव को ऐसे सुंदर स्वभाव में जल्दी बदलना चाहिए जो परमेश्वर चाहते हैं।

भजन 7:9–12 भला हो कि दुष्‍टों की बुराई का अन्त हो जाए, परन्तु धर्म को तू स्थिर कर; क्योंकि धर्मी परमेश्‍वर मन और मर्म का ज्ञाता है। मेरी ढाल परमेश्‍वर के हाथ में है, वह सीधे मनवालों को बचाता है। परमेश्‍वर धर्मी और न्यायी है, वरन् ऐसा ईश्‍वर है जो प्रति दिन क्रोध करता है। यदि मनुष्य न फिरे तो वह अपनी तलवार पर सान चढ़ाएगा; वह अपना धनुष चढ़ाकर तीर सन्धान चुका है;

“यदि मनुष्य न फिरे तो वह अपनी तलवार पर सान चढ़ाएगा,” इस वचन का मतलब है कि परमेश्वर पश्चाताप न करने वाले पापी का विरोध करेंगे और उसका न्याय करेंगे। जब हम इस विषय के बारे में सोचते हैं, तो हम सब को जो पापी हैं, इस पृथ्वी पर खुद को और अधिक नीचा करना चाहिए और अपने पापों से पछताते हुए पश्चाताप का जीवन जीना चाहिए।

लूक 18:9–14 उसने उनसे जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और दूसरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्‍टान्त कहा: “दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने के लिये गए; एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेनेवाला। फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यों प्रार्थना करने लगा, ‘हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि मैं और मनुष्यों के समान अन्धेर करनेवाला, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेनेवाले के समान हूं। मैं सप्ताह में दो बार उपवास रखता हूं; मैं अपनी सब कमाई का दसवां अंश भी देता हूं।’ “परन्तु चुंगी लेनेवाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आंखें उठाना भी न चाहा, वरन् अपनी छाती पीट–पीटकर कहा, ‘हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर!मैं तुम से कहता हूं कि वह दूसरा नहीं, परन्तु यही मनुष्य धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।”

यीशु के इस दृष्टान्त में चुंगी लेनेवाले ने यह महसूस करते हुए कि वह पापी है, एक पापी के रूप में परमेश्वर से नम्र मन के साथ प्रार्थना की। तब परमेश्वर ने उस चुंगी लेनेवाले को धर्मी ठहराया।

मसीह की शिक्षाओं को अपने मन में अंकित करके, आइए हम अपने अन्दर से सब दुष्ट मनों को निकाल दें, जैसे कि अब तक पश्चाताप न करनेवाला मन, घमण्डी मन, खुद को ऊंचा करनेवाला मन आदि। और आइए हम खुद को नीचा करके सिय्योन के परिवार के साथ मिलजुलकर एकता से रहें। फिस से अपने भीतर झांककर देखिए और जांच कीजिए कि कहीं आप ऊंचे बनने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं या फिर कहीं आप अपनी खुद की खुशी के लिए दूसरों के मन को दुखी नहीं कर रहे हैं।

सिय्योन को हमेशा हर्ष और आनन्द के शब्द से भरपूर रहना चाहिए। परमेश्वर की ओर से आशीष का फल हमेशा वहां दिया जाता है जहां सदस्य पश्चाताप करते हैं और एक–दूसरे के साथ मिलजुलकर एकता से रहते हैं। जब हम पश्चाताप करते हैं, तब परमेश्वर उसके योग्य फल देते हैं, इसलिए बाइबल उसे “पश्चाताप के योग्य फल” कहती है(मत 3:8)। हाल ही में हम सिय्योन की सुगंध के द्वारा सुन रहे हैं कि सदस्यों ने पश्चाताप करते ही फल उत्पन्न किया है और पश्चाताप करते ही बहुत से नए सदस्य सिय्योन में लौट आए हैं। इस तरह ये ताजा खबरें आ रही हैं कि जहां–जहां सदस्य पश्चाताप करते हैं, वहीं परमेश्वर बहुत अनुग्रह बरसाते हैं।

प्रेममय स्वभाव जिसे हमें पुन:प्राप्त करना चाहिए



पश्चाताप तब उत्पन्न होता है जब हम परमेश्वर के प्रति प्रेम रखते हैं, और जब हम परमेश्वर के प्रेम का एहसास करते हैं। परमेश्वर हमसे पश्चाताप करने का आग्रह करते हैं, क्योंकि हम संपूर्ण पश्चाताप करने पर अपना प्रेममय स्वभाव पुन:प्राप्त कर सकते हैं।

1यूह 4:7–21 हे प्रियो, हम आपस में प्रेम रखें; क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है। जो कोई प्रेम करता है, वह परमेश्वर से जन्मा है और परमेश्वर को जानता है। जो प्रेम नहीं रखता वह परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, वह इस से प्रगट हुआ कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को जगत में भेजा है कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं। प्रेम इस में नहीं कि हम ने परमेश्‍वर से प्रेम किया, पर इस में है कि उसने हम से प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिये अपने पुत्र को भेजा। हे प्रियो, जब परमेश्‍वर ने हम से ऐसा प्रेम किया, तो हम को भी आपस में प्रेम रखना चाहिए। परमेश्‍वर को कभी किसी ने नहीं देखा; यदि हम आपस में प्रेम रखें, तो परमेश्‍वर हम में बना रहता है और उसका प्रेम हम में सिद्ध हो गया है... और जो प्रेम में बना रहता है वह परमेश्वर उसमें बना रहता है, और परमेश्वर उसमें बना रहता है। इसी से प्रेम हम में सिद्ध हुआ कि हमें न्याय के दिन हियाव हो; क्योंकि जैसा वह है वैसे ही संसार में हम भी हैं। प्रेम में भय नहीं होता, वरन् सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है; क्योंकि भय का सम्बन्ध दण्ड से होता है, और जो भय करता है वह प्रेम में सिद्ध नहीं हुआ। हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहले उसने हम से प्रेम किया। यदि कोई कहे, “मैं परमेश्वर से प्रेम रखता हूं,” और अपने भाई से बैर रखे; तो वह झूठा है; क्योंकि जो अपने भाई से, जिसे उसने देखा है प्रेम नहीं रखता, तो वह परमेश्वर से भी जिसे उसने नहीं देखा, प्रेम नहीं रख सकता। उससे हमें यह आज्ञा मिली है, कि जो कोई परमेश्वर से प्रेम रखता है वह अपने भाई से भी प्रेम रखे।

1यूहन्ना के चौथे अध्याय के वचन के द्वारा हम फिर से परमेश्वर का प्रेम समझ सकते हैं। परमेश्वर जो प्रेम हैं उनके सदृश्य बनकर, आइए हम प्रेमपूर्ण संतान बनें। सिय्योन के सभी सदस्य नई वाचा के मार्ग पर चलने के लिए और उसका प्रचार करने के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि नई वाचा के अन्दर हमारा वह आखिरी मिशन पश्चाताप है जिसे पिता और माता चाहते हैं कि हम पूरा करें।

यदि हम पश्चाताप करें, तो हम अपने मूल स्वभाव को पुन:प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि जिन्होंने पश्चाताप किया है, उन्होंने अपना मूल प्रेममय स्वभाव पुन:प्राप्त किया है। यदि हम अपने प्रेममय स्वभाव को पुन:प्राप्त करते हैं, तो हम अपने भाई से नफरत नहीं कर सकते। परमेश्वर ने हमसे स्पष्ट रूप से कहा, “जो अपने भाई से जिसे उसने देखा है प्रेम नहीं रखता, तो वह परमेश्वर से भी जिसे उसने नहीं देखा प्रेम नहीं रख सकता।” परमेश्वर ने हमें हमारे प्रेममय स्वभाव को फिर से दिलाने के लिए उस पश्चाताप का मार्ग दिया है जिस पर हमें नई वाचा के अंदर चलना चाहिए।

यदि हम प्रेम न रखें, तो हम कुछ भी नहीं हैं



प्रेम में पश्चाताप, धीरज और दूसरी सभी चीजें निहित होती हैं। हमें अपने स्वर्गदूत के मूल स्वभाव को पुन:प्राप्त करने के लिए, जो हम पहले खो चुके हैं, पश्चाताप की प्रक्रिया से पूरी तरह गुजरना चाहिए जिसे परमेश्वर के द्वारा हमें प्रदान किया गया है।

1कुर 13:1–3 यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूं और प्रेम न रखूं, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल, और झंझनाती हुई झांझ हूं। और यदि मैं भविष्यद्वाणी कर सकूं, और सब भेदों और सब प्रकार के ज्ञान को समझूं, और मुझे यहां तक पूरा विश्वास हो कि मैं पहाड़ों को हटा दूं, परन्तु प्रेम न रखूं, तो मैं कुछ भी नहीं। यदि मैं अपनी सम्पूर्ण संपत्ति कंगालों को खिला दूं, या अपनी देह जलाने के लिये दे दूं, और प्रेम न रखूं, तो मुझे कुछ भी लाभ नहीं।

कहा गया है, “यदि कोई स्वर्गदूतों की बोलियां बोले और प्रेम न रखे, तो वह ठनठनाता हुआ पीतल और झंझनाती हुई झांझ है। और उसे यहां तक पूरा विश्वास हो कि वह पहाड़ों को हटा दे, परन्तु प्रेम न रखे, तो वह कुछ भी नहीं।” परमेश्वर प्रेम हैं, इसलिए हम भी जो उनकी संतान हैं, प्रेममय स्वभाव के साथ पैदा हुए हैं। लेकिन शैतान ने हमारे स्वभाव को, जो पहले हमारे पास था, ईर्ष्या, नफरत, अभिमान और घमण्ड में बदल दिया था, इसलिए परमेश्वर हमारे अंदर स्वर्गदूत के स्वभाव को पुन: जगा रहे हैं।

स्वर्गीय माता की बहुमूल्य शिक्षाओं के अनुसार, पूरे विश्व में सिय्योन के परिवारवालों के द्वारा पश्चाताप का आंदोलन चलाया जा रहा है। 2,000 साल पहले, प्रेरितों ने पिन्तेकुस्त के दिन पहली बरसात का पवित्र आत्मा पाने के बाद एक दिन में 3,000 लोगों की मन फिराव की ओर अगुवाई की(प्रे 2: 1–41)। लगभग 3,000 लोगों की सत्य की ओर अगुवाई करके उन्हें बचाया गया, इस अद्भुत घटना के पीछे पश्चाताप था। सिय्योन में सुंदर पश्चाताप पूरा होने पर, परमेश्वर उस पश्चाताप के योग्य फलों की अनुमति देते हैं। आज एक दिन में सिर्फ 3,000 लोगों की नहीं, बल्कि उससे ज्यादा लोगों की उद्धार के मार्ग की ओर अगुवाई करने के लिए, हमें सबसे पहले पश्चाताप करना चाहिए, है न?

परमेश्वर ने कहा कि यदि कोई अपनी सम्पूर्ण संपत्ति कंगालों को खिला दे और प्रेम न रखे, तो उसे कुछ भी लाभ नहीं। बेशक, परमेश्वर ने इस सच्चे प्रेम को नई वाचा के फसह के पर्व में रख दिया है, लेकिन यदि हम उस प्रेम के बिना फसह के पर्व के दिन सिर्फ रोटी खाएं और सिर्फ दाखमधु पीएं, तो इसका कोई अर्थ नहीं होगा। ऐसे प्रेमपूर्ण अर्थ को परमेश्वर ने उस नई वाचा के सत्य में शामिल किया है जो हमें परमेश्वर के मांस और लहू के द्वारा एक देह बनने देता है।

1कुर 13:4–7 प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुंझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है। वह सब बातें सह लेता है, सब बातों की प्रतीति करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है।

प्रेममय स्वभाव धीरजवन्त है, कृपालु है, डाह नहीं करता और अपनी बड़ाई नहीं करता। यदि कोई अपनी बड़ाई करता है, तो इससे यह नतीजा निकलता है कि वह खुद को ऊंचा करता है। और फिर अपने आपको ऊंचा समझने से उसका मन घमंड से फूल जाता है और मानने लगता है कि वह दूसरों से बेहतर है। इसलिए प्रेममय स्वभाव अपनी बड़ाई नहीं करता और घमंड से नहीं फूलता, और वह अनरीति नहीं चलता, अपनी भलाई नहीं चाहता, नहीं झुंझलाता और बुरा नहीं मानता। और वह कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है। वह सब बातें सह लेता है, सब बातों की प्रतीति करता है, सब बातों की आशा रखता है और सब बातों में धीरज धरता है।

सम्पूर्ण पश्चाताप करने से पवित्र आत्मा का फल पैदा होता है



स्वर्गदूतों की दुनिया में हमारा मूल स्वभाव इस तरह प्रेममय था। लेकिन हमने शैतान के धोखे में आकर अपना यह स्वभाव खो दिया था, और हम पृथ्वी पर नीचे गिरा दिए गए थे। इसलिए यहां पृथ्वी पर हम झगड़ा करते थे और अपने बारे में यही सुनना चाहते थे कि हम दूसरों से बेहतर हैं, और हम दूसरों की तुलना में और अधिक अच्छी परिस्थिति और वातावरण में रहने के लिए दूसरों को दुख पहुंचाते थे। लेकिन हम नई वाचा के सत्य में स्वर्गीय पिता और माता से मिले और अपने दुष्ट स्वभाव को छोड़ने लगे। उसे छोड़ने का मतलब पश्चाताप करना है, और पश्चाताप करने का मतलब अपनी गलती को ठीक करके परमेश्वर की ओर लौटना है, और उसमें अपने खोए हुए स्वर्गदूत के स्वभाव को पुन: प्राप्त करने का अर्थ भी निहित होता है। इसलिए बाइबल कठोरता से चेतावनी देती है कि जो व्यक्ति पश्चाताप नहीं करता, वह स्वर्ग में वापस नहीं लौट सकता, और यह भी कि परमेश्वर पश्चाताप न करने वाले के लिए अपनी तलवार पर सान चढ़ाते हैं।

1कुर 13:8–13 प्रेम कभी टलता नहीं; भविष्यद्वाणियां हों, तो समाप्त हो जाएंगी, भाषाएं हो, तो जाती रहेंगी; ज्ञान हो, तो मिट जाएगा। क्योंकि हमारा ज्ञान अधूरा है, और हमारी भविष्यद्वाणी अथूरी; परन्तु जब सर्वसिद्ध आएगा, तो अधूरा मिट जाएगा। जब मैं बालक था, तो मैं बालकों के समान बोलता था, बालकों का सा मन था, बालकों की सी समझ थी; परन्तु जब सियाना हो गया तो बालकों की बातें छोड़ दीं। अभी हमें दर्पण में धुंधला सा दिखाई देता है, परन्तु उस समय आमने–सामने देखेंगे, इस समय मेरा ज्ञान अधूरा है, परन्तु उस समय ऐसी पूरी रीति से पहिचानूंगा, जैसा मैं पहिचाना गया हूं। पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी हैं, पर इन में सब से बड़ा प्रेम है।

हमारे पास विश्वास होना चाहिए, और हमारे विश्वास में आशा की आवश्यकता है, लेकिन बाइबल कहती है कि प्रेम सबसे बड़ा है। जब हम अपना प्रेममय स्वभाव पुन: प्राप्त करेंगे, तब ही हम स्वर्ग जा सकेंगे। मैं आप सिय्योन के सदस्यों से आशा करता हूं कि आप सम्पूर्ण पश्चाताप पूरा करें और पश्चाताप के योग्य फल पैदा करने के लिए परमेश्वर से अधिक प्रार्थना करें, ताकि आप बहुतायत से पवित्र आत्मा पा सकें और ज्यादा सुसमाचार के सुंदर फल पैदा करके पिता और माता की महिमा कर सकें।

यदि आप पेड़ से फल प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको केवल इसके लिए कोशिश नहीं करनी चाहिए कि पेड़ की डालियों पर फल लगे। हमें दिखाई न देने वाली जड़ों को पर्याप्त मात्रा में पानी और आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करना चाहिए। तभी फल खुद–ब–खुद लग जाते हैं। हमें सिर्फ डालियों पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। जब तक पेड़ की डालियों पर फल न लगे, तब तक दिखाई न देने वाली जड़ों से ही कुछ कार्य किया जाना चाहिए। इस तरह, हमें फल पैदा करने के लिए अवश्य ही परमेश्वर में बने रहना चाहिए और पोषक तत्व के रूप में पश्चाताप होना जरूरी है। मुझे आशा है कि आप सम्पूर्ण पश्चाताप करते हुए परमेश्वर से पवित्र आत्मा पाएं और उसके द्वारा सुन्दर फल प्रचुरता पैदा करें।