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सुसमाचार का कार्य परमेश्वर की योजना के अनुसार होता है

परमेश्वर हमें हमेशा साहस देते हैं, ताकि हम हिम्मत जुटाकर निडर हो सकें। लेकिन जब कभी हम सुसमाचार का प्रचार करते हुए मुश्किल स्थिति का सामना करते हैं, तब हम मारे डर के जम–से जाते हैं। परमेश्वर कहते हैं, “मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूं(यश 41:10)।” भले ही हम परमेश्वर के इन वचनों को सुनते हैं, लेकिन कभी–कभी हम अंदरूनी पहलू के बजाय सिर्फ बाहर से दिखाई देने वाली स्थिति पर ध्यान देते हैं।

यदि सत्य के प्रचारक हिचकिचाएं या पीछे हटें, तो सुसमाचार का कार्य पूरा नहीं हो सकेगा। जब हम महसूस करें कि हमारे परमेश्वर कितने महान हैं और दृढ़ता से विश्वास करें कि परमेश्वर स्वयं सुसमाचार के कार्य की अगुवाई कर रहे हैं, सिर्फ तब ही हम आत्मविश्वास रख सकते हैं और सुसमाचार का सब कार्य सफल हो सकता है।

परमेश्वर पूरे अंतरिक्ष का संचालन करते हैं



अंतरिक्ष से देखा जाए, तो पृथ्वी सिर्फ मिट्टी का एक कण है। यह बिल्कुल नगण्य और छोटी है। इसके विपरीत, अंतरिक्ष हमारी कल्पना से परे बेहद विशाल और सुंदर है। पूरे अंतरिक्ष की शानदार व विशाल खगोलीय वस्तुएं परमेश्वर के द्वारा निर्धारित नियम के अनुसार संतुलन बनाए रखती हैं और चलती हैं, और अंतरिक्ष में अनगिनत तारे परमेश्वर की योजना के अनुसार सूक्ष्मता एवं परिशुद्धता के साथ एक–दूसरे की परिक्रमा करते हैं।

वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं जो महान अंतरिक्ष को संचालित करते हैं और खगोलीय वस्तुओं के परिभ्रमण की दिशा को बदल सकते हैं। आइए हम अतीत में हुई घटनाओं के द्वारा परमेश्वर की महान शक्ति की पुष्टि करें।

यहो 10:12–13 उस समय, अर्थात् जिस दिन यहोवा ने एमोरियों को इस्राएलियों के वश में कर दिया, उस दिन यहोशू ने यहोवा से इस्राएलियों के देखते इस प्रकार कहा, “हे सूर्य, तू गिबोन पर, और हे चन्द्रमा, तू अय्यालोन की तराई के ऊपर थमा रह।” और सूर्य उस समय तक थमा रहा, और चन्द्रमा उस समय तक ठहरा रहा, जब तक उस जाति के लोगों ने अपने शत्रुओं से बदला न लिया। क्या यह बात याशार नामक पुस्तक में नहीं लिखी है कि सूर्य आकाशमण्डल के बीचों बीच ठहरा रहा, और लगभग चार पहर तक न डूबा?

यहोशू के नेतृत्व में इस्राएल की सेना कनान देश पर कब्जा कर लेने के लिए एमोरियों से लड़ी। यदि सूर्यास्त के बाद अंधेरा हो जाता, तब इस्राएल की सेना परेशानी में पड़ सकती थी। इस स्थिति में यहोशू ने आग्रहपूर्वक परमेश्वर से सहायता मांगी। तब एक आश्चर्यजनक घटना घटित हुई; सूर्य आकाश के मध्य में ठहरा रहा और लगभग पूरे दिन न डूबा। सूर्य जिसे परमेश्वर ने गिबोन पर ठहरने दिया, तब तक नहीं डूब गया जब तक इस्राएल ने युद्ध में जीत हासिल नहीं की।

सूर्य जो हमेशा नियमित रूप से चलता था, रुक गया। यह एक चमत्कारिक घटना थी जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रगट हुई। इसके अलावा, परमेश्वर ने यह बड़ी अविश्वसनीय बात भी दिखाई कि सूर्य को पीछे की ओर लौटा दिया गया।

यश 38:1–8 उन दिनों में हिजकिय्याह ऐसा रोगी हुआ कि वह मरने पर था। तब आमोस के पुत्र यशायाह नबी ने उसके पास जाकर कहा, “यहोवा यों कहता है, अपने घराने के विषय जो आज्ञा देनी हो वह दे, क्योंकि तू न बचेगा मर ही जाएगा।” तब हिजकिय्याह ने दीवार की ओर मुंह फेरकर यहोवा से प्रार्थना करके कहा, “हे यहोवा, मैं विनती करता हूं, स्मरण कर कि मैं सच्‍चाई और खरे मन से अपने को तेरे सम्मुख जानकर चलता आया हूं और जो तेरी दृष्‍टि में उचित था वही करता आया हूं।” और हिजकिय्याह बिलख बिलखकर रोने लगा। तब यहोवा का यह वचन यशायाह के पास पहुंचा: “जाकर हिजकिय्याह से कह कि तेरे मूलपुरुष दाऊद का परमेश्‍वर यहोवा यों कहता है, ‘मैं ने तेरी प्रार्थना सुनी और तेरे आंसू देखे हैं; सुन, मैं तेरी आयु पन्द्रह वर्ष और बढ़ा दूंगा। अश्शूर के राजा के हाथ से मैं तेरी और इस नगर की रक्षा करके बचाऊंगा।’ ” यहोवा अपने इस कहे हुए वचन को पूरा करेगा, और यहोवा की ओर से इस बात का तेरे लिये यह चिह्न होगा कि धूप की छाया जो आहाज की धूपघड़ी में ढल गई है, मैं दस अंश पीछे की ओर लौटा दूंगा।” अत: वह छाया जो दस अंश ढल चुकी थी लौट गई।

जब हिजकिय्याह बीमार था, तब परमेश्वर ने उसकी मृत्यु की पूर्व सूचना देने के लिए यशायाह नबी को भेजा। तब हिजकिय्याह ने आंसू बहाते हुए परमेश्वर से प्रार्थना की। इससे प्रेरित होकर परमेश्वर ने उसके जीवनकाल को बढ़ा दिया। इसका चिन्ह दिखाने के लिए परमेश्वर ने चमत्कारिक रूप से धूप की छाया को, जो धूपघड़ी में ढल गई थी, दस अंश पीछे की ओर लौटा दिया।

यह एक सामान्य ज्ञान और एक प्राकृतिक नियम है कि सूर्य पूर्व दिशा से उदय होता है और पश्चिम में ढलता है। इसलिए सूर्य के लिए पीछे की ओर वापस जाना असंभव है। लेकिन फिर भी, भौतिक विज्ञान के नियमों से परे अलौकिक घटनाएं घटीं। सिर्फ परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ऐसी घटनाएं घटीं जिन्हें हम मनुष्य चमत्कार कहने के अलावा कुछ नहीं कह सकते।

पृथ्वी जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सृजी गई



सिर्फ सूर्य ही नहीं, बल्कि पृथ्वी भी परमेश्वर के प्रयोजन के अनुसार सृजी गई और अस्तित्व में है।

अय 26:7–8 वह उत्तर दिशा को निराधार फैलाए रहता है, और बिना टेक पृथ्वी को लटकाए रखता है। वह जल को अपनी काली घटाओं में बांध रखता, और बादल उसके बोझ से नहीं फटता।

ऊपर का वचन कहता है कि बिना टेक पृथ्वी को लटकाए रखा हुआ है। यह दिखाता है कि पृथ्वी की सृष्टि भी परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हुई थी।

पृथ्वी जिस पर हम रहते हैं, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई है, और विशाल अंतरिक्ष भी जिसमें पृथ्वी है, परमेश्वर के द्वारा संचालित किया जा रहा है। फिर भी, परमेश्वर ने विशाल अंतरिक्ष को बनाया है और अब वह उसे संचालित कर रहे हैं, इस तथ्य को अनदेखा करते हुए हम दिखाई देने वाली सांसारिक घटनाओं की ओर अधिक झुकते हैं।

लेकिन जब हम इस तथ्य को महसूस करें कि परमेश्वर पूरे अंतरिक्ष का संचालन करते हैं, तब हमारा सब कुछ अच्छा चलेगा। यदि हमारे पास विश्वास होगा, तो हमारे चारों ओर की सभी घटनाएं परमेश्वर की इच्छा के अनुसार घट जाएंगी। इसके विपरीत, यदि हमारे पास विश्वास न होगा, तो सभी चीजें ऐसे कारकों के रूप में दिखाई देंगी जो हमारे लिए परेशानी और बाधा पैदा करते हैं।

जब हम कठिनाई का सामना करें, तब आइए हम खुद को इस बात की याद दिलाएं कि वह हमारे पिता और हमारी माता हैं जिन्होंने पृथ्वी को बनाया है और जो पृथ्वी से भी बहुत बड़े अंतरिक्ष का संचालन करते हैं। प्रतिकूल वातावरण और परिस्थितियां भी जो हमें मुसीबतों में फंसाते हैं, अन्त में परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सही और अनुकूल बनेंगे। आदि से अन्त को जानने वाले परमेश्वर ही सुसमाचार का कार्य चला रहे हैं और उद्धार के मार्ग पर हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। तो इसका परिणाम क्या होगा?

यदि कुछ परमेश्वर की ओर से हो, तो वह कभी नहीं मिटेगा और कभी असफल नहीं होगा(प्रे 5:38:39)। इतिहास के आरम्भ से ही बहुत से लोग प्रकट होते थे जो परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध विरोध करते थे। लेकिन दुनिया उनकी इच्छा के अनुसार एक पल के लिए भी नहीं चलती थी। 2,000 वर्ष पहले, प्रथम चर्च में लोगों का एक समूह था जिन्होंने परमेश्वर के सुसमाचार के कार्य में बाधा डालने की योजना बनाई, लेकिन प्रचार काम को पूरा होने से मनुष्य की शक्ति नहीं रोक सकती थी।

आज भी ऐसा ही है। यह दुनिया सिर्फ सृष्टिकर्ता परमेश्वर की योजना के अनुसार ही चलती है, और हम इस दुनिया में जीते हैं। इस तथ्य को अपने मन में रखते हुए आइए हम साहसपूर्वक सुसमाचार का प्रचार करें। तब हम अवश्य ही परमेश्वर की इस भविष्यवाणी को पूरा होते हुए देखेंगे कि बहुत से लोग सिय्योन में उमड़कर आएंगे।

मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊंचे हैं।



हमारे अन्दर डर की भावना तब आती है जब हम इस पर विश्वास नहीं करते कि पूरा अंतरिक्ष परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलाया जाता है। परमेश्वर अपने लोगों को संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं, लेकिन व्यापक व ऊंचे दृष्टिकोण से, यानी परमेश्वर के दृष्टिकोण से दुनिया को देखने की सलाह देते हैं।

यश 55:8–9 क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है।

परमेश्वर कहते हैं कि परमेश्वर और हमारे सोच विचारों में आकाश और पृथ्वी का अन्तर है। हम अपने विचार और सामर्थ्य से पृथ्वी को जरा–सा भी नहीं हिला सकते या फिर थोड़ी देर के लिए भी सूर्य को नहीं रोक सकते। लेकिन परमेश्वर बाइबल के द्वारा दिखाए गए चमत्कारों से भी कहीं अधिक चमत्कारी चीजों को हमें दिखा सकते हैं।

तो फिर, हमें परमेश्वर के विचार और हमारे विचार में से किसे चुनना चाहिए? जब हमारे विचार परमेश्वर की शिक्षाओं के विरुद्ध हो जाते हैं, तब हमें बिना हिचकिचाहट के अपने खुद के विचारों को फेंक देने का फैसला करने की जरूरत होती है।

यश 55:6–7 “जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो; दुष्‍ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, वह हमारे परमेश्‍वर की ओर फिरे और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा।

बाइबल कहती है, “दुष्‍ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे।” परमेश्वर ने उस पर जो ऐसा करता है, दया करने और उसे क्षमा करने की प्रतिज्ञा की है।

यदि हम अपने खुद के विचारों को न फेंकें, तो हम यह सोचने की भूल कर सकते हैं कि परमेश्वर की महान शिक्षाओं से हमारे विचार बेहतर हैं। यदि ऐसा हो, तब एक जिद्दी‚ आत्म–केंद्रित और अहंकारी विश्वास हमारे हृदय में बस जाएगा, जिससे हम परमेश्वर के उद्धार का अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकेंगे। यदि हममें से कोई ऐसी भूल कर बैठा है, तो उसे परमेश्वर के वचनों का पालन करना चाहिए और जल्दी परमेश्वर की ओर फिरकर क्षमा मांगनी चाहिए।

परमेश्वर घमण्डी को नीचा करते हैं



जो परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं पहचानते, वे यह सोचते हुए सफलता का श्रेय खुद को देते हैं कि उनकी काबिलियत की वजह से सब कुछ अच्छा चल रहा है। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। सुसमाचार का कार्य मनुष्य की क्षमताओं से पूरा नहीं हो सकता। यह इसलिए पूरा होता है कि परमेश्वर हमारे विश्वास को देखते हैं और उचित समय पर सुसमाचार का द्वार खोलते हैं। चूंकि परमेश्वर हर तरह से हमारी अगुवाई कर रहे हैं, इसलिए चर्च ऑफ गॉड ऐसा विकसित हो सका है जैसा कि आज है।

परमेश्वर उन्हें आशीष नहीं देते जो अहंकार से भर गए हैं। दानिय्येल के समय में जब बेबीलोन के राजा नबूकदनेस्सर ने खुद को ऊंचा किया, तब वह परमेश्वर की आशीषों से वंचित हो गया।

दान 5:17–21 दानिय्येल ने राजा से कहा... हे राजा, परमप्रधान परमेश्‍वर ने तेरे पिता नबूकदनेस्सर को राज्य, बड़ाई, प्रतिष्‍ठा और प्रताप दिया था; और उस बड़ाई के कारण जो उस ने उसको दी थी, देश देश और जाति–जाति के सब लोग, और भिन्न–भिन्न भाषा बोलनेवाले उसके सामने कांपते और थरथराते थे; जिसे वह चाहता उसे वह घात करता था, और जिसको वह चाहता उसे वह जीवित रखता था; जिसे वह चाहता उसे वह ऊंचा पद देता था, और जिसको वह चाहता उसे वह गिरा देता था। परन्तु जब उसका मन फूल उठा, और उसकी आत्मा कठोर हो गई, यहां तक कि वह अभिमान करने लगा, तब वह अपने राजसिंहासन पर से उतारा गया, और उसकी प्रतिष्‍ठा भंग की गई; वह मनुष्यों में से निकाला गया, और उसका मन पशुओं का सा, और उसका निवास जंगली गदहों के बीच हो गया; वह बैलों के समान घास चरता, और उसका शरीर आकाश की ओस से भींगा करता था, जब तक कि उसने जान न लिया कि परमप्रधान परमेश्‍वर मनुष्यों के राज्य में प्रभुता करता है और जिसे चाहता उसी को उस पर अधिकारी ठहराता है।

राजा नबूकदनेस्सर ने घमण्ड से भरकर सोचा कि उसने अपनी खुद की काबिलियत और शक्ति से एक दृढ़ राज्य का निर्माण किया है। तब परमेश्वर ने उसे एक पशु का मन दिया। आखिरकार, वह सिंहासन से वंचित कर दिया गया, और उसका निवास जंगली गदहों के बीच हो गया; वह बैलों के समान घास चरता था, और उसका शरीर आकाश की ओस से भींगा करता था।

लंबे समय तक घास के मैदान में पशु की तरह जीने के बाद, उसे महसूस हुआ कि परमेश्वर मनुष्यों के सभी राज्यों में प्रभुता करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार किसी को भी उन पर अधिकारी ठहराते हैं। सिर्फ तब ही परमेश्वर ने उसे उसकी बुद्धि फिर दे दी, और उसे एक राजा के रूप में अपना सिंहासन फिर से मिला। अपने पापों के लिए पश्चाताप करते हुए उसने परमेश्वर को स्तुति और महिमा दी(दान 4:28–37)।

जब तक परमेश्वर को पूरी तरह महसूस न करें



जब हमारे मन में घमण्ड पैदा होता है, तब परमेश्वर हमारे मन से गायब हो जाते हैं और हमारा मन स्वार्थ से भर जाता है, और आखिर में परमेश्वर आशीष का द्वार बन्द करते हैं। जब हम इस्राएल के जंगल के इतिहास को जांच लें, तो हम देख सकते हैं कि इस्राएलियों ने भी वही गलती की।

व्य 8:1–3 जो जो आज्ञा मैं आज तुझे सुनाता हूं उन सभों पर चलने की चौकसी करना, इसलिये कि तुम जीवित रहो और बढ़ते रहो, और जिस देश के विषय में यहोवा ने तुम्हारे पूर्वजों से शपथ खाई है उसमें जाकर उसके अधिकारी हो जाओ। और स्मरण रख कि तेरा परमेश्वर यहोवा उन चालीस वर्षों में तुझे सारे जंगल के मार्ग में से इसलिये ले आया है, कि वह तुझे नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा करके यह जान ले कि तेरे मन में क्या क्या है, और कि तू उसकी आज्ञाओं का पालन करेगा या नहीं। उसने तुझ को नम्र बनाया, और भूखा भी होने दिया, फिर वह मन्ना, जिसे न तू और न तेरे पुरखा ही जानते थे, वही तुझ को खिलाया; इसलिये कि वह तुझ को सिखाए कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहता, परन्तु जो जो वचन यहोवा के मुंह से निकलते हैं उन ही से वह जीवित रहता है।

इस्राएलियों को सीधे मार्ग से कनान पहुंचने में करीब दस दिन लग सकते थे। लेकिन पूरे जंगल में घूम–घूमकर वे 40 वर्ष के बाद कनान तक पहुंचे। परमेश्वर ने इसलिए ऐसा किया कि वह जंगल में उन्हें नम्र बनाएं और उनकी परीक्षा करके यह जान लें कि उनके मन में क्या है, और कि वे परमेश्वर की आज्ञाओं पर चलेंगे या नहीं(व्य 8:2)। लेकिन वे सिर्फ दिखाई देनेवाली चीजों में उलझ गए और एक दूसरे पर दोष लगाते हुए झगड़ा किया, जिससे वे आखिर परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाए।

वह किस प्रकार की मानसिकता थी जो परमेश्वर चाहते थे कि इस्राएली जंगल की यात्रा के दौरान रखें? परमेश्वर चाहते थे कि वे परमेश्वर को पूरी तरह महसूस करें और उनके वचन को मानें, ताकि वे जल्दी कनान में प्रवेश करके आशीषों को प्राप्त कर सकें। मगर उन्होंने महसूस नहीं किया कि परमेश्वर हर कदम पर उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं। इस बेहद आसान और बिल्कुल स्पष्ट तथ्य को समझने में उन्हें चालीस वर्ष लगे।

इन बातों को इसलिए लिख दिया गया है कि हमारे लिए वे उदाहरण और चेतावनी रहें(1कुर 10:1–11)। यदि हम सिर्फ दिखाई देनेवाली शारीरिक दुनिया की चीजों का पीछा करें, तो हम परमेश्वर को कभी महसूस नहीं कर सकते। बाइबल स्पष्ट रूप से गवाही देती है कि स्वर्ग के परमेश्वर सब कुछ चलाते हैं, इस दुनिया पर शासन करते हैं और जिसे वह चाहते हैं उसी को सभी राज्यों पर अधिकारी ठहराते हैं। दूसरे शब्दों में सब कुछ परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अवश्य ही पूरा होता है। इसलिए यदि हम सच में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो हमें परमेश्वर के वचन को किसी भी चीज से अधिक बहुमूल्य मानना चाहिए और उसे अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मानक बनाना चाहिए।

परमेश्वर ने हमसे यह प्रतिज्ञा की है कि सुसमाचार का प्रचार दुनिया भर में होगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के लिए 7 अरब की संख्या न के बराबर होती है। यदि हम परमेश्वर पर संपूर्ण विश्वास रखें और परमेश्वर की इच्छा का पालन करने का यत्न करें, तो सभी 7 अरब लोगों को सुसमाचार का प्रचार किया जाएगा और उद्धार का कार्य परमेश्वर के अनुग्रह से जल्दी पूरा होगा।

अनन्त स्वर्ग का राज्य नजदीक है। इस समय जिसकी हमें जरूरत है, वह पश्चाताप है। जब तक हम पूरी तरह से बदल नहीं जाते, तब तक हम स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकते। परमेश्वर की संतान होने के नाते आइए हम आज्ञाकारिता के साथ सत्य के मार्ग पर चलें जिसका पालन करने की आज्ञा परमेश्वर ने हमें दी है, और प्रेम और विनम्रता के साथ एक दूसरे की सेवा करें, ताकि हम परमेश्वर को महिमा दे सकें और जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी सुसमाचार का कार्य पूरा कर सकें।