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कर्म सहित विश्वास

बाइबल कहती है कि राज्य का सुसमाचार इस संसार में रहनेवाले सभी जातियों के लोगों को प्रचार किया जाएगा(मत 24:14)। और वह यह भी स्पष्ट रूप से गवाही देती है कि सुसमाचार के स्वर सारी पृथ्वी पर, और उसके वचन जगत की छोर तक पहुंचेंगे(रो 10:18)।

अब दुनिया के कोने–कोने से यह सिय्योन की सुगंध पहुंच रही है कि भविष्यवाणी के वचनों को सुनकर हमारे भाई और बहनें जागृत हुए हैं और वे दुनिया भर में सभी जातियों के लोगों को निडरता से परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार कर रहे हैं। लेकिन अब भी कुछ सदस्य हैं जो सुसमाचार के प्रचार में भाग लेने में हिचकिचाते हैं।

बाइबल की भविष्यवाणी के अनुसार आज सभी 7 अरब लोगों को सुसमाचार का प्रचार करने के लिए कार्य जरूरी है। सुसमाचार का कार्य तब पूरा हो सकेगा जब हम सभी एक मन होकर उसमें भाग लें। आइए हम बाइबल के द्वारा देखें कि कार्य करना कितना महत्वपूर्ण है।

कर्म के द्वारा एक चमत्कारिक कार्य हुआ



बाइबल में उन अनेक पूर्वजों के कार्य दर्ज किए गए हैं, जिन्होंने परमेश्वर के वचनों को कार्य में लाकर महान इतिहास रचा। उनमें से एक यहोशू है। उसने परमेश्वर के वचन पर विश्वास किया और उस पर अमल किया और इससे वह एक चमत्कार देख सका।

यहो 6:1–2 यरीहो के सब फाटक इस्राएलियों के डर के मारे लगातार बन्द रहे, और कोई बाहर भीतर आने जाने नहीं पाता था। फिर यहोवा ने यहोशू से कहा, “सुन, मैं यरीहो को उसके राजा और शूरवीरों समेत तेरे वश में कर देता हूं। इसलिए तुम में जितने योद्धा हैं नगर को घेर लें, और उस नगर के चारों ओर एक बार घूम आएं। और छ: दिन तक ऐसा ही किया करना। और सात याजक संदूक के आगे आगे मेढ़ों के सींगों के सात नरसिंगे लिए हुए चलें; फिर सातवें दिन तुम नगर के चारों ओर सात बार घूमना, और याजक भी नरसिंगे फूंकते चलें। और जब वे मेढ़ों के सींगों के नरसिंगे देर तक फूंकते रहें, तब सब लोग नरसिंगे का शब्द सुनते ही बड़ी ध्वनि से जयजयकार करें; तब नगर की शहरपनाह नेव से गिर जाएगी, और सब लोग अपने अपने सामने चढ़ जाएं।”

40 वर्षों की जंगल की यात्रा के अन्त में, जिस समय इस्राएलियों ने कनान देश में प्रवेश करने ही वाले थे जहां दूध और मधु की धाराएं बहती थीं, उस समय उन्होंने यरीहो नगर का सामना किया जिसे एक अजेय नगर के रूप में जाना जाता था। तब परमेश्वर ने यहोशू को यरीहो नगर को नष्ट करने की गुप्त योजना बताई। परमेश्वर की यह योजना थी कि वे छह दिनों तक हर रोज एक बार शहर के चारों ओर घूमें और सातवें दिन सात बार घूमें और याजकों के नरसिंगा फूंकने पर सब एक साथ जयजयकार करें।

यहोशू और सभी इस्राएलियों ने परमेश्वर के इस वचन का पालन किया। तब उन्होंने परमेश्वर की भविष्यवाणी को ठीक अपनी आंखों के सामने पूरा होता देखा।

यहो 6:15–20 फिर सातवें दिन वे बड़े तड़के उठकर उसी रीति से नगर के चारों ओर सात बार घूम आए; केवल उसी दिन वे सात बार घूमे। तब सातवीं बार जब याजक नरसिंग फूंकते थे, तब यहोशू ने लोगों से कहा, “जयजयकार करो; क्योंकि यहोवा ने यह नगर तुम्हें दे दिया है... तब लोगों ने जयजयकार किया, और याजक नरसिंगे फूंकते रहे। और जब लोगों ने नरसिंगे का शब्द सुना तो फिर बड़ी ही ध्वनि से उन्होंने जयजयकार किया, तब शहरपनाह नींव से गिर पड़ी, और लोग अपने अपने सामने से उस नगर में चढ़ गए, और नगर को ले लिया।

सातवें दिन पर इस्राएली सात बार यरीहो नगर के चारों ओर घूमे और याजकों के नरसिंगा फूंकने पर और यहोशू की चिल्लाहट पर सभी ने एक साथ जयजयकार किया। तब यरीहो की शहरपनाह जो अजेय लगती थी, तुरन्त ही गिर पड़ी।

भले ही परमेश्वर ने उन्हें ऐसा करने को कहा था, लेकिन यदि नगर के चारों ओर कोई नहीं घूमता और नहीं चिल्लाता, तो क्या यरीहो नगर गिरता? बिल्कुल नहीं! परमेश्वर की कही हर एक बात सिर्फ तभी पूरी हो सकती है जब हम उसे कार्य में लाते हैं। बाइबल कई ऐतिहासिक घटनाओं के द्वारा हमें यह निश्चित तथ्य सिखाती है।

परमेश्वर के हमें कार्य करने को कहने का कारण



एक चीनी दार्शनिक क्सुनझी जो युद्धरत राज्य काल के दौरान रहता था, उसने कहा, “देखना सुनने से बेहतर है, जानना देखने से बेहतर है, और करना जानने से बेहतर है। सीखना सिर्फ कार्य करने पर रुकता है।” इसका मतलब किसी बात को अभ्यास में लाना सिर्फ सुनने और देखने से अधिक महत्वपूर्ण है।

वास्तव में ऐसा कहा जाता है कि देखने से प्राप्त की गई जानकारी उस जानकारी से अधिक याद रहती है जो सुनने से प्राप्त होती है, और किसी उत्तेजना से प्राप्त की गई जानकारी की तुलना में अनुभवों से प्राप्त की गई जानकारी अधिक दिनों तक याद रहती है। जैसे यह कहावत है, “मैं सुनता हूं और फिर मैं भूल जाता हूं। मैं देखता हूं और फिर मुझे याद रहता है। मैं करता हूं और फिर मैं समझता हूं,” जो चीजें हम व्यक्तिगत रूप से करते हैं, हम उसे सिर्फ स्मरण नहीं करते, बल्कि उसे अपने हृदयों से समझ सकते हैं। इसलिए हमें अपने विश्वास को कार्य में लाने की जरूरत है।

1रा 17:8–16 तब यहोवा का यह वचन उसके पास पहुंचा, “चलकर सीदोन के सारपत नगर में जाकर वहीं रह : सुन, मैं ने वहां की एक विधवा को तेरे खिलाने की आज्ञा दी है।” अत: वह वहां से चल दिया, और सारपत को गया; नगर के फाटक के पास पहुंचकर उसने क्या देखा कि, एक विधवा लकड़ी बीन रही है, उसको बुलाकर उसने कहा, “किसी पात्र में मेरे पीने को थोड़ा पानी ले आ।” जब वह लेने जा रही थी, तो उसने उसे पुकार के, कहा, “अपने हाथ में एक टुकड़ा रोटी भी मेरे पास लेती आ।” उसने कहा, “तेरे परमेश्वर यहोवा के जीवन की शपथ मेरे पास एक भी रोटी नहीं है केवल घड़े में मुट्ठी भर मैदा और कुप्पी में थोड़ा सा तेल है, और मैं दो एक लकड़ी बीनकर लिए जाती हूं कि अपने और अपने बेटे के लिये उसे पकाऊं, और हम उसे खाएं, फिर मर जाएं।” एलिय्याह ने उस से कहा, “मत डर; जाकर अपनी बात के अनुसार कर, परन्तु पहले मेरे लिये एक छोटी सी रोटी बनाकर मेरे पास ले आ, फिर इसके बाद अपने और अपने बेटे के लिये बनाना। क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, कि जब तक यहोवा भूमि पर मेंह न बरसाएगा तब तक न तो उस घड़े का मैदा समाप्त होगा, और न उस कुप्पी का तेल घटेगा।” तब वह चली गई, और एलिय्याह के वचन के अनुसार किया, तब से वह और स्त्री और उसका घराना बहुत दिन तक खाते रहे। यहोवा के उस वचन के अनुसार जो उसने एलिय्याह के द्वारा कहा था, न तो उस घड़े का मैदा समाप्त हुआ, और न उस कुप्पी का तेल घटा।

इस्राएल के देश में भयंकर सूखा पड़ने के दौरान परमेश्वर के वचन में आज्ञाकारी होकर एलिय्याह सारपत गया और वहां एक विधवा के घर में रहा। ठीक जैसे परमेश्वर ने भविष्यवाणी की थी, इस्राएल में तीन वर्ष का लंबा सूखा पड़ा और बहुत से लोग भूख से पीड़ित थे। सारपत की विधवा का भी भोजन समाप्त हो रहा था; उसके पास केवल घड़े में मुट्ठी भर मैदा और कुप्पी में थोड़ा सा तेल था, और उसने चाहा कि वह अपने और अपने बेटे के लिए आखिरी भोजन पकाए, और वे उसे खाएं और फिर भूख से मर जाएं।

उसी वक्त एलिय्याह ने सारपत की विधवा से कहा कि पहले उसके लिए एक रोटी बनाकर ले आओ। इस निराशाजनक स्थिति में भी सारपत की विधवा ने परमेश्वर की इच्छा का पालन किया और ठीक वैसा ही किया जैसा उसने कहा था। परिणाम स्वरूप, उसने एक चमत्कार का अनुभव किया; सूखे के समाप्त होने तक न तो उस घड़े का मैदा समाप्त हुआ, और न उस कुप्पी का तेल घटा।

एक खतरनाक स्थिति में एलिय्याह को अपना आखिरी भोजन परोसना उसके लिए आसान नहीं था। मगर सारपत की विधवा ने परमेश्वर के वचन पर, जो नबी ने उस तक पहुंचाया था, भरोसा किया और उसे अभ्यास में लाया, तब वह समझ सकी कि यह सब उसे आशीष देने के लिए परमेश्वर का कार्य था।

उस समय भी ऐसा ही था जब परमेश्वर ने गिदोन से कहा कि वह अपने 32,000 सैनिकों को 300 तक कम करे। वास्तव में उसकी 32,000 पुरुषों की सेना पहले ही से मिद्यानियों की 1,35,000 पुरुषों की बड़ी सेना के मुकाबले बहुत छोटी थी, लेकिन परमेश्वर ने गिदोन को उसके सैनिकों की संख्या को कम करने को कहा। यह मनुष्य की दृष्टि में अनुचित लग रहा था। लेकिन जैसे परमेश्वर ने योजना बनाई थी, ठीक वैसे ही युद्ध इस्राएल की महान विजय के साथ समाप्त हुआ(न्या 7:2–23)। इस तरह जब हम परमेश्वर के कहने के अनुसार करें, तब हम अच्छे परिणाम पा सकेंगे और हमें दिए गए परमेश्वर के वचनों का अर्थ पूरी तरह से समझ सकेंगे।

स्वर्ग का राज्य उनके लिए है जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाते हैं

हम परमेश्वर के वचनों को कार्य में लाए बिना पूरी तरह से नहीं समझ सकते। इसलिए परमेश्वर हमेशा जोर देते हैं कि हमारे पास विश्वास होना चाहिए और साथ ही कार्य भी करना चाहिए।

याक 2:14–17 हे मेरे भाइयो, यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो उस से क्या लाभ? क्या ऐसा विश्वास कभी उसका उद्धार कर सकता है? यदि कोई भाई या बहिन नगें उघाड़े हो और उन्हें प्रतिदिन भोजन की घटी हो, और तुम में से कोई उनसे कहे, “कुशल से जाओ, तुम गरम रहो और तृप्त रहो,” पर जो वस्तुएं देह के लिये आवश्यक हैं वह उन्हें न दे तो क्या लाभ? वैसे ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है।

बाइबल कहती है कि कर्म रहित विश्वास हमें नहीं बचा सकता और वह अपने स्वभाव में मरा हुआ है। जिनका विश्वास मरा हुआ है, वे परमेश्वर की सामर्थ्य का बिल्कुल अनुभव नहीं कर सकते।

यदि हम परमेश्वर के वचन सिर्फ अपने कानों से सुनें और सिर्फ अपनी आंखों से देखें, तो हम उन्हें कितना अधिक समझ सकेंगे और कितनी देर तक उसे याद रख सकेंगे? भले ही हम जानते हैं कि हमें प्रार्थना करनी है, परमेश्वर के वचन का अध्ययन करना है और सुसमाचार प्रचार करना है, लेकिन जब तक हम इन बातों पर अमल न करें, तब तक हम परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ सकेंगे। कर्म रहित विश्वास मरा हुआ है और हमारी अगुवाई स्वर्ग में कभी नहीं कर सकता।


मत 7:21 “जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है।

सिर्फ वे ही जो परमेश्वर की इच्छा पर चलते हैं, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। चाहे बाइबल में हजारों और लाखों बहुमूल्य वचन हों, लेकिन जब तक हम उन्हें कार्य में न लाएं, तब तक वे कुछ नहीं, बस उन शब्दों के संयोजन की एक सूची है जो खाली जगहों को भरते हैं। यदि हमने परमेश्वर के वचनों को सुना और पढ़ा है, तो हमें उन्हें अवश्य ही अभ्यास में लाना चाहिए। जब हम परमेश्वर की इच्छा पर चलते हैं, सिर्फ तभी हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं जिसका हम उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं।

अब आइए हम बाइबल के द्वारा देखें कि आज हमें परमेश्वर की कौन सी आज्ञा को अभ्यास में लाना चाहिए।

मर 16:15 और उसने उनसे कहा, तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।

इस युग में परमेश्वर ने हमें दूसरों से पहले बुलाया है और हम सभी लोगों को सुसमाचार का प्रचार करने की आज्ञा दी है। दुनिया भर में लगभग 7 अरब लोग हैं। 7 अरब लोगों को सुसमाचार का प्रचार करना एक विशेष मिशन है जो परमेश्वर ने अपने लोगों को सौंपा है जो इस युग में बचाए जाएंगे।

आइए हम परमेश्वर की इस आज्ञा को तुरन्त अभ्यास में लाएं। जब तक हम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, तब तक हम उन्हें नहीं समझ सकते, और यदि हम परमेश्वर के वचनों को समझने में नाकाम हों, तो वे वचन जल्द ही हमारी याद से गायब हो जाएंगे। जो परमेश्वर की कही बातों को अभ्यास में नहीं लाते, वे परमेश्वर के वचन के अनुसार नहीं जी सकते। जब इस्राएली जंगल में थे, तब उन्होंने कई बार परमेश्वर के वचन सुने, लेकिन वे जल्द ही उन्हें भूल गए और फिर से बुराई की। यह इसलिए था क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के वचनों को सुनने के बावजूद उन्हें अभ्यास में नहीं लाया।

यदि आप किसी चीज को कार्य में लाएं, तो आप उसे कभी नहीं भूलेंगे। सभी 7 अरब लोगों को राज्य का सुसमाचार प्रचार करने की परमेश्वर की आज्ञा को हमेशा स्मरण रखने के लिए, हमें उसे कार्य में लाने की जरूरत है। सिर्फ तब ही हम उसे अपने हृदयों से समझ सकते हैं और व्यक्तिगत रूप से भविष्यवाणी की पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं।

कार्य के द्वारा उद्धार का कार्य पूरा करना



इस युग में भी परमेश्वर हमें कर्म सहित विश्वास रखने को कहते हैं।

मी 4:1–2 अन्त के दिनों में ऐसा होगा कि यहोवा के भवन का पर्वत सब पहाड़ों पर दृढ़ किया जाएगा, और सब पहाड़ियों से अधिक ऊंचा किया जाएगा; और हर जाति के लोग धारा के समान उसकी ओर चलेंगे, और बहुत सी जातियों के लोग जाएंगे, और आपस में कहेंगे, “आओ, हम यहोवा के पर्वत पर चढ़कर, याकूब के परमेश्वर के भवन में जाएं; तब वह हम को अपने मार्ग सिखाएगा, और हम उसके पथों पर चलेंगे।” क्योंकि यहोवा की व्यवस्था सिय्योन से, और उसका वचन यरूशलेम से निकलेगा।

बाइबल हमसे कहती है कि अंतिम दिनों में परमेश्वर हमें सत्य सिखाने के लिए आएंगे ताकि हम उनके पथों पर चलें। हम अभी इस भविष्यवाणी के युग में जी रहे हैं। सही तरह से उस सत्य के मार्ग को समझने के लिए जिसे परमेश्वर ने इस युग में सिय्योन में घोषित किया है, हमें क्या करना चाहिए? हमें परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना चाहिए।

परमेश्वर की व्यवस्था जो इस युग में सिय्योन से निकलती है, वह सत्य है जिसे हम सिर्फ तब समझ सकते हैं जब हम उसे अभ्यास में लाते हैं। जब परमेश्वर सत्य का मार्ग सिखाते हैं, तब उसे सबसे अच्छी तरह से समझने वाला व्यक्ति वह है जो लगातार उसे अभ्यास में लाता है(याक 1:25)। जो परमेश्वर के वचनों को सिर्फ सुनते हैं और पढ़ते हैं, वे ऐसे व्यक्ति हैं जो उन्हें जानते हुए भी अपने हृदयों से नहीं समझ सकते।

किसी चीज को जानना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण बात उसे अभ्यास में लाना है। जो व्यक्ति उस बात को जिसे वह जानता है, अभ्यास में लाता है फिर चाहे वह बहुत कम जानता हो, सिर्फ वही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है।

परमेश्वर यरीहो नगर को सीधे नष्ट कर सकते थे। तो फिर क्यों उन्होंने इस्राएलियों को सात दिनों तक उस नगर के चारों ओर घूमने की आज्ञा दी? यह इसलिए था क्योंकि वह चाहते थे कि इस्राएली उनके वचन का पूरी तरह से पालन करें और उसे अभ्यास में लाएं। इसलिए जब विश्वास के सभी पूर्वजों ने परमेश्वर की कही बातों को कार्य में लाया, तब परमेश्वर ने उन्हें विजय का आनन्द और महिमा का अनुभव करने दिया।

जब इस्राएलियों ने परमेश्वर की कही बात पर विश्वास किया और उसे अभ्यास में लाया, तब परमेश्वर ने उन्हें यरीहो को पराजित करने की महान आशीष दी। जब सारपत की विधवा ने परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार किया, तब परमेश्वर ने लंबे समय के सूखे के बावजूद उसके मैदा और तेल को समाप्त नहीं होने दिया। यदि हम उन ऐतिहासिक घटनाओं को याद करें, हम फिर से महसूस कर सकते हैं कि अपने विश्वास को कार्य में लाना कितना महत्वपूर्ण है।

परमेश्वर की दृष्टि में पृथ्वी बहुत ही छोटी है। वह डोल में की एक बून्द और पलड़ों पर की धूलि के तुल्य ठहरी। किसी मनुष्य की मदद के बिना, सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपना उद्धार का कार्य तत्क्षण में ही पूरा कर सकते हैं। फिर भी, उन्होंने 7 अरब लोगों को प्रचार करने का मिशन हमें सौंपा है। यह इसलिए है कि वह देखना चाहते हैं कि हमारे पास विश्वास है या नहीं और हम उसे कार्य में लाते हैं या नहीं।

यदि हमारे पास कर्म सहित विश्वास है, तो परमेश्वर हमें निश्चय ही अद्भुत परिणाम देखने की अनुमति देंगे जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की। जो भी हमने आज सीखा, आइए हम उसे कल या परसों तक टालने के बजाय तुरन्त अभ्यास में लाएं। मैं सभी सिय्योन के लोगों से विनती करना चाहता हूं कि आप ऐसा कर्म सहित विश्वास रखें और पूरे संसार में स्वर्गीय पिता और माता की महिमा प्रगट करें।