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क्या आप परमेश्वर से प्रेम करते हैं?


परमेश्वर हमसे प्रेम करते हैं। उन्होंने संसार की सृष्टि से पहले प्रेम से हमें चुन लिया, और जब क्रूस पर उनकी सांस थम गई थी, उस अंतिम क्षण तक हमारी सुरक्षा के लिए चिंता की, और इस क्षण भी, वह लगातार हमसे प्रेम करते हैं।

क्या सच में हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं? चाहे अब हम परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर चल रहे हैं, आइए हम यह सोचने के लिए कुछ समय लें कि क्या सच में हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं।

बाइबल कहती है कि, “तेरेइयरूशलेमउ प्रेमी कुशल से रहें,”(भज 122:6) और “जो बातें आंख ने नहीं देखीं और कान ने नहीं सुनीं, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं, वे ही हैं जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिए तैयार की हैं।”(1कुर 2:9) इस आत्मिक जुबली के वर्ष में, मैं चाहता हूं कि हम सब परमेश्वर के प्रेम को अपने हृदयों पर अंकित कर लें और परमेश्वर के साथ खुशी से चलें, ताकि हम सब उस अनुग्रह और आशीषों को पा सकें जो परमेश्वर ने हमारे लिए तैयार किए हैं, और स्वर्गीय सन्तानों के रूप में स्वर्ग के राज्य में चल सकें।

यदि मैं अपनी मां की मां बनकर पैदा हो सकता

हाल ही में मैंने इंटरनेट पर “यदि मैं संसार में फिर से जन्म ले सकता!” नामक कहानी पढ़ी। एक माध्यमिक स्कूल के शिक्षक ने अपने छात्रों को क्लास के दौरान एक असाइन्मन्ट दिया; उसने छात्रों को “यदि मैं संसार में फिर से जन्म ले सकता” शीर्षक के साथ कहानियां लिखने को कहा। छात्रों के द्वारा प्रस्तुत की गई कहानियों में से, एक ऐसी विशेष कहानी थी जिसने शिक्षक का ध्यान आकर्षित किया। वह कहानी एक विकलांग छात्र के द्वारा लिखी गई थी जो अपनी मां की सहायता से स्कूल आने के लिए व्हीलचेयर का प्रयोग करता था।

उसकी कहानी उसकी इस इच्छा की अभिव्यक्ति के साथ हुई कि, “यदि मैं संसार में फिर से जन्म ले सकता, तो मैं अपनी मां की मां बनता।” नीचे वर्णित कारण ने यह दिखाया कि उसके मन में क्या था: उसने सोचा था कि उसकी मां ने उसे स्कूल लाने–ले जाने के लिए और दिन–रात उसकी देखभाल करने के लिए कितनी पीड़ा उठाई है। अपनी मां से पाए उस बेशुमार प्रेम को ध्यान में रखते हुए, वह इस निष्कर्ष पर आया था कि अपनी मां के प्रति चाहे वह कितना भी समर्पित बने और आज्ञाधीन बने, फिर भी वह अपनी मां के प्रेम का बदला नहीं चुका सकेगा, और अपनी मां के उस असीम प्रेम का बदला चुकाने का एक ही रास्ता है कि वह अपनी मां की मां बने।

वह एक पहलवान या फिर एक ऊंची कूद खिलाड़ी बनने के लिए स्वस्थ रूप से फिर से पैदा होने की इच्छा कर सकता था। हालांकि, उसने अपने लिए कुछ भी आशा नहीं की। उसने केवल यही सोचा कि, ‘मेरी मां ने केवल यही आशा की कि मैं जीवन में कामयाब होऊं, तो अपनी मां के प्रेम और समर्पण का बदला चुकाने के लिए मैं क्या कर सकता हूं।’ इसलिए, वह अपनी उम्र के छात्रों की तुलना में ऐसा प्रशंसनीय और बहुत बड़ा विचार कर सकता कि, ‘यदि मैं फिर से पैदा हो सकता, तो मैं अपनी मां की मां बनूंगा और मेरे लिए उनके बेशुमार प्रेम का बदला चुकाऊंगा।’

चाहे यह एक छोटी सी कहानी है, यह हमारे मनों पर एक महान और स्थायी प्रभाव छोड़ जाती है। हम अपनी मुश्किलों के बारे में पहले सोचते हैं। हालांकि, उस छात्र ने स्वयं से ज्यादा, अपनी मां के बारे में सोचा, जिन्होंने उसके लिए अपने आपको बलिदान किया था। इसलिए, उसने इस कहानी में लिखा कि, “यदि मैं फिर से जन्म ले सकता, तो मैं अपनी मां की मां बनता।”

आइए हम सिर्फ अपनी पीड़ाओं और थकान के बारे में न सोचें, लेकिन उस बलिदान के मार्ग के बारे में सोचें जो स्वर्गीय माता हम, यानी अपनी सन्तानों के लिए चल रही हैं। मैं चाहता हूं कि कहानी के उस छात्र के समान, हम सब के हृदयों में गहराई तक माता का बलिदान अंकित हो, ताकि हम भी माता की सन्तान के रूप में माता को स्वयं से ज्यादा महत्वपूर्ण मान सकें और स्नेह कर सकें।

“क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?”

चर्च ऐसी जगह नहीं है जहां केवल आराधना के नियम और विधियां होती हैं, लेकिन वह ऐसी जगह है जहां परमेश्वर, जो स्वयं प्रेम है, अपनी सन्तानों पर प्रेम बरसाते हैं और संतान भी परमेश्वर से प्रेम करती हैं। जब हम परमेश्वर की आराधना करते हैं, तो हमारे हृदयों में परमेश्वर के प्रति प्रेम होना चाहिए। यदि हम परमेश्वर के प्रति प्रेम के बिना केवल धार्मिक विधियों के अनुसार आराधना करें, तो वह खुशी का ऐसा बलिदान कभी नहीं बन सकता जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है।

हमें अपना पूरा मन परमेश्वर को देना चाहिए।(मत 22:35–38) जैसे उस कहानी का छात्र अपने लिए बलिदान करनेवाली अपनी मां के प्रेम का बदला चुकाना चाहता था, हमें भी वैसा ही करना चाहिए: हमें परमेश्वर के प्रति प्रेम से भरपूर हृदय के साथ चर्च जाना चाहिए, सब्त के दिन का पालन करना चाहिए, फसह का पर्व मनाना चाहिए, और स्वर्ग के राज्य की ओर आगे बढ़ना चाहिए।

आइए हम यीशु के बारह चेलों में से पतरस और यहूदा इस्करियोती के बारे में सोचें। शुरुआत में, वे दोनों ही यह कहते हुए उनके चेले बने कि जहां कहीं भी यीशु जाएंगे वे उनका पालन करेंगे। हालांकि, उनमें से एक ने शहादत के मार्ग पर चलते हुए अंत तक यीशु से प्रेम किया और उनका पालन किया, लेकिन दूसरे ने चांदी के तीस सिक्कों के लिए यीशु के साथ विश्वासघात किया और उन्हें क्रूस पर चढ़ाने के लिए सौंप दिया। जिसने परमेश्वर से संपूर्ण रूप से प्रेम किया था और जिसने नहीं किया था, उनके परिणाम में पक्का अंतर था।

यूह 21:15–17 भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से कहा, “हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है?” उसने उससे कहा, “हां, प्रभु; तू तो जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं।” उसने उससे कहा, “मेरे मेमनों को चरा।” उसने फिर दूसरी बार उससे कहा, “हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?” उसने उनसे कहा, “हां, प्रभु; तू जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं।” उसने उससे कहा, “मेरी भेड़ों की रखवाली कर।” उसने तीसरी बार उससे कहा, “हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?” पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, “क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?” और उससे कहा, “हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं।” यीशु ने उससे कहा, “मेरी भेड़ों को चरा।”

जब यीशु ने पतरस को अपनी भेड़ें सौंपीं, तो उससे पूछा कि, “क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?” “क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?” “हा, प्रभु!” “क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?” “हा, प्रभु; तू तो जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं।” पतरस ने यीशु से बहुत प्रेम किया था, और वही प्रेम प्रथम चर्च की नींव बना था।

यदि आज परमेश्वर हमसे वही प्रश्न करते हैं, तो क्या हमें भी “हां, प्रभु” ऐसा ही उत्तर नहीं देना चाहिए? आइए हम पिता और माता के बलिदान के बारे में सोचें जिन्होंने हमें बचाने के लिए क्रूस की पीड़ा को सहन किया और फिर से शरीर में होकर आए और आज इस दिन तक हमारे लिए बलिदान कर रहे हैं। हम केवल क्रूस के बलिदान के बारे में सोचते हैं। हालांकि, जब तक वह पूरा नहीं हुआ था, तब तक यानी मूसा के समय से लेकर यीशु के समय तक, 1500 से ज्यादा सालों तक दिन प्रतिदिन पापों के लिए बलिदान किया जाता था; प्रत्येक पापबलि परमेश्वर के दुख और बलिदानमय प्रेम को दर्शाता था। परमेश्वर हमें, यानी अपनी पापी सन्तानों को बचाने के लिए इस पृथ्वी पर आए हैं, और आज भी हमारे पापों के लिए मृत्यु होने तक कष्टों को उठा रहे हैं। हम अक्सर इस बात को भूल जाते हैं।

परमेश्वर महिमामय स्वर्ग के राज्य में आराम से विश्राम कर सकते थे, फिर भी, क्यों वे इस पृथ्वी पर आए और मनुष्यों के द्वारा बदनाम किए गए? वह सब कुछ हमारे लिए था; उन्होंने हम से इतना ज्यादा प्रेम किया कि उन्होंने वह सब कुछ हमारे लिए किया।

जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं

जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे कभी भी परमेश्वर से विश्वासघात नहीं करेंगे, फिर चाहे परमेश्वर उन्हें ज्यादा मजदूरी न दें या फिर उन्हें ऊंचा पद न दें। यहूदा इस्करियोती के हृदय में परमेश्वर के प्रति प्रेम नहीं था। उसने परमेश्वर से ज्यादा पैसों से प्रेम किया था।

जैसे पतरस ने किया था, आइए हम भी वैसे ही पूरे दिल से परमेश्वर से प्रेम करते हुए और अंत तक उनका पालन करते हुए विश्वास के मार्ग पर चलें। यदि हम परमेश्वर के प्रेम को महसूस करें और हमेशा इसके बारे में सोचें कि हम परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने के लिए क्या कर सकते हैं या हमें क्या करना चाहिए, तो हम कभी भी यहूदा इस्करियोती के समान मूर्ख न बनेंगे।

निर्ग 20:6 और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हजारों पर करुणा किया करता हूं।

परमेश्वर उनसे प्रेम करनेवालों की हजारों पीढ़ियों पर प्रेम दिखाते हैं। सच में यह कितनी महान आशीष है! परमेश्वर हर किसी को ऐसा महान प्रतिफल नहीं देते। यदि हम इसके बारे में ध्यानपूर्वक सोचें, तो हम देख सकेंगे कि चाहे संसार में अनगिनत लोग हैं, फिर भी केवल कुछ ही परमेश्वर से सच में प्रेम करते हैं।

व्य 13:1–3 यदि तेरे बीच कोई भविष्यद्वक्ता या स्वप्न देखनेवाला प्रगट होकर तुझे कोई चिन्ह या चमत्कार दिखाए, और जिस चिन्ह या चमत्कार को प्रमाण ठहराकर वह तुझ से कहे, ‘आओ हम पराए देवताओं के अनुयायी होकर, जिनसे तुम अब तक अनजान रहे, उनकी पूजा करें,’ तब तुम उस भविष्यद्वक्ता या स्वप्न देखनेवाले के वचन पर कभी कान न धरना; क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर यहोवा तुम्हारी परीक्षा लेगा, जिससे यह जान ले, कि ये मुझ से अपने सारे मन और सारे प्राण के साथ प्रेम रखते हैं या नहीं?

बाइबल कहती है कि परमेश्वर यह देखने के लिए हमारी परीक्षा ले रहे हैं कि हम उनसे अपने पूरे मन से और अपनी पूरी आत्मा से प्रेम करते हैं या नहीं। हालांकि, कभी–कभी हम परमेश्वर से ज्यादा अपने आपसे प्रेम करते हैं और परमेश्वर की महिमा से बढ़कर अपनी महिमा के बारे में सोचते हैं। ऐसा जीवन जीते हुए, हम परमेश्वर के अनुग्रह और बलिदान के बारे में बात करते हैं। यह कितना अफसोसजनक है!

केवल अपनी परिस्थितियों के बारे में सोचने के बजाय, आइए हम परमेश्वर पर ध्यान केंद्रित करें। हमें हमेशा इसके बारे में सोचना चाहिए कि सर्वशक्तिमान एलोहीम परमेश्वर, पिता और माता क्यों अपने सारे अधिकारों को छोड़कर, इस पृथ्वी पर शरीर में होकर आए हैं और हमारे साथ रहते हैं, और हमें पिता और माता का आदर करना चाहिए। जो सबसे पहले परमेश्वर की महिमा और उनके दुखों के बारे में सोचता है, वही परमेश्वर से सच्चा प्रेम रखनेवाला है।

न्या 5:31 “हे यहोवा, तेरे सब शत्रु ऐसे ही नष्ट हो जाएं! परन्तु उसके प्रेमी लोग प्रताप के साथ उदय होते हुए सूर्य के समान तेजोमय हों।” फिर देश में चालीस वर्ष तक शान्ति रही।

यह वह दृश्य है जब दबोरा नामक एक नबिया ने परमेश्वर से प्रेम रखनेवालों को आशीष देने के लिए विनती की थी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि परमेश्वर के सभी शत्रु नष्ट हो जाएं और जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे प्रताप के साथ उदय होते हुए सूर्य के समान तेजोमय हों।

परमेश्वर की सन्तान के रूप में आत्मिक रूप से शक्तिशाली होने के लिए, हमें अपने हृदयों में सबसे बढ़कर परमेश्वर के प्रति प्रेम रखना चाहिए। ऐसा सोचने के बजाय कि ‘मैं परमेश्वर के वचनों को अच्छे से सिखाता हूं और अच्छे से प्रचार करता हूं,’ ‘मैं एक समूह का नेता हूं,’ या, ‘मैं पुरोहित कर्मचारी हूं,’ कृपया अपने आपसे यह प्रश्न पूछिए कि आप परमेश्वर से कितना प्रेम करते हैं। परमेश्वर ने ऐसा नहीं पूछा था कि, “तुम्हारा पद या शीर्षक क्या है?” या “क्या ऐसा कुछ है जो तुम अच्छे से कर सकते हो?” लेकिन उन्होंने केवल पूछा था कि, “क्या तुम मुझ से प्रेम रखते हो?” जब परमेश्वर अपनी सन्तानों से यह प्रश्न पूछेंगे, तो अपने पूरे हृदय से “हा!” कहकर उत्तर देनेवालों को ही परमेश्वर खोजेंगे।

परमेश्वर के प्रति प्रेम के कारण दी गई महिमा

सुलैमान की बुद्धि और महिमा, और सुलैमान के समय में इस्राएल की समृद्धि – यह सब कुछ परमेश्वर के प्रति प्रेम से भरपूर हृदय से आया था।

1रा 3:3–10 सुलैमान यहोवा से प्रेम रखता था और अपने पिता दाऊद की विधियों पर चलता तो रहा... वहां की वेदी पर सुलैमान ने एक हज़ार होमबलि चढ़ाए। गिबोन में यहोवा ने रात को स्वप्न के द्वारा सुलैमान को दर्शन देकर कहा, “जो कुछ तू चाहे कि मैं तुझे दूं, वह मांग।” सुलैमान ने कहा... “तूने अपने दास को मेरे पिता दाऊद के स्थान पर राजा किया है, परन्तु मैं छोटा लड़का–सा हूं जो भीतर बाहर आना जाना नहीं जानता। फिर तेरा दास तेरी चुनी हुई प्रजा के बहुत से लोगों के मध्य में है, जिनकी गिनती बहुतायत के मारे नहीं हो सकती। तू अपने दास को अपनी प्रजा का न्याय करने के लिये समझने की ऐसी शक्ति दे, कि मैं भले बुरे को परख सकूं : क्योंकि कौन ऐसा है कि तेरी इतनी बड़ी प्रजा का न्याय कर सके?” इस बात से प्रभु प्रसन्न हुआ कि सुलैमान ने ऐसा वरदान मांगा है।

जब सुलैमान को परमेश्वर की आशीष प्राप्त करने का मौका दिया गया, तब यदि उसने परमेश्वर से प्रेम न किया होता, तो उसने परमेश्वर से ऐसा कुछ मांगा होता जो उसने खुद के लिए चाहा था। हालांकि, उसने भले–बुरे को परखने और परमेश्वर के लोगों के लिए सही न्याय करने के लिए बुद्धि मांगी, ताकि वे गलत रूप से दोषी न ठहराए जाएं और उन्हें मृत्यु की सजा न दी जाए। सुलैमान ने जो मांगा था उससे परमेश्वर प्रसन्न हुए थे।

जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे हमेशा ऐसे ही विचार करते हैं जो परमेश्वर की इच्छा से मेल खाते हैं। परमेश्वर ने अपने लोगों के हृदयों को एक कर देने की प्रतिज्ञा दी है।(यहेज 11:19–20) सब भाइयों और बहनों को एक हृदय लेने के लिए, जो परमेश्वर के हृदय के अनुकूल है, अपने हृदयों में परमेश्वर के प्रति प्रेम को अंकित करना चाहिए।

परमेश्वर से प्रेम करने का एक निश्चित कारण भी है। हम सब पाप में पड़े थे; हम सब स्वर्ग के ऐसे विकलांग लोग थे, जिन्हें यदि अकेला छोड़ दिया गया होता तो मर गए होते। केवल हमारे स्वर्गीय पिता और माता को छोड़ किसी को भी हमारी परवाह न थी। केवल हमें बचाने के बारे में सोचते हुए, हमारे पिता इस पृथ्वी पर आए और सैंतीस सालों तक दुख उठाया, और हमारी माता आज भी हमारे साथ हैं।

जब हमारे स्वर्गीय पिता और माता इस पृथ्वी पर शरीर में होकर आए, तो क्या उनके साथ अच्छा व्यवहार किया गया? यदि ऐसा हुआ होता, तो बाइबल की भविष्यवाणियां पूरी न हुई होतीं। उन्होंने व्याकुलता से अपनी सन्तानों के लिए, दिन–रात प्रार्थनाएं कीं, और अकेले ही हमारे पापों का जुआ उठाया। उन्हें ठट्ठों में उड़ाया गया, सताया गया और तिरस्कृत किया गया, लेकिन उन्होंने उनकी जरा सी भी परवाह नहीं की; उन्होंने केवल इस इच्छा के साथ सब कुछ सहन किया कि सन्तान उद्धार पाएं। क्या ऐसा कोई होगा जो ऐसी जगह में, जहां उसके जीवन का एक बार संकट हुआ, फिर से जाएगा? हालांकि, हमें उद्धार देने के लिए, परमेश्वर इस पृथ्वी पर दुबारा आए, जहां एक बार उन्हें मार दिया गया था।

आइए हम केवल अपनी ही पीड़ाओं और दुखों के बारे में न सोचें, लेकिन परमेश्वर के बारे में सोचें जिन्होंने हमारे लिए दुख उठाए और सभी मुसीबतों को सहन किया। परमेश्वर के प्रेम को महसूस करते हुए, जिन्होंने हमारे लिए बलिदान किया है, हमें परमेश्वर के प्रेम से भरे हृदयों की गहराई से परमेश्वर को धन्यवाद और महिमा चढ़ानी चाहिए। यदि परमेश्वर हमसे पूछें कि, “यदि तुम फिर से जन्म ले सको, तो तुम क्या करोगे?” तो क्या हमें ऐसा उत्तर नहीं देना चाहिए कि, “स्वर्गीय पिता और माता, हम आपकी प्रेमी सन्तानों के रूप में आपसे और भी ज्यादा प्रेम करेंगे?” मैं आप सब से यह सोचने के लिए कहना चाहता हूं कि उन परमेश्वर के लिए जिन्होंने हमारे लिए बलिदान किया, आप क्या कर सकते हैं।

“परमेश्वर, मैं आपसे प्रेम करता हूं”

चूंकि सुलैमान के हृदय में परमेश्वर के प्रति प्रेम था, परमेश्वर ने उसे बुद्धि दी और उसके सभी कार्यों में सफलता दिलाई। सुलैमान के पिता, दाऊद ने भी परमेश्वर से अपने पूरे हृदय से प्रेम किया था। भजन संहिता की पुस्तक में, हम “हे परमेश्वर, मैं तुझ से प्रेम करता हूं,” इस बात को उसके गीत के विषय के रूप में देख सकते हैं।

भज 18:1–11 हे परमेश्वर, हे मेरे बल, मैं तुझ से प्रेम करता हूं। यहोवा मेरी चट्टान, और मेरा गढ़ और मेरा छुड़ानेवाला है; मेरा ईश्वर, मेरी चट्टान है, जिसका मैं शरणागत हूं, वह मेरी ढाल और मेरी मुक्ति का सींग है, और मेरा ऊंचा गढ़ है। मैं यहोवा को, जो स्तुति के योग्य है, पुकारूंगा; इस प्रकार मैं अपने शत्रुओं से बचाया जाऊंगा। मृत्यु की रस्सियों से मैं चारों ओर घिर गया हूं, और अधर्म की बाढ़ ने मुझ को भयभीत कर दिया; पाताल की रस्सियां मेरे चारों ओर थीं, और मृत्यु के फन्दे मुझ पर आए थे। अपने संकट में मैं ने यहोवा परमेश्वर को पुकारा; मैं ने अपने परमेश्वर की दोहाई दी; और उसने अपने मन्दिर में से मेरी बातें सुनी; और मेरी दोहाई उसके पास पहुंचकर उसके कानों में पड़ी...

दाऊद ने अपने गीत की शुरुआत “हे परमेश्वर, हे मेरे बल, मैं तुझ से प्रेम करता हूं” इस काव्यांश से की। दाऊद और सुलैमान जैसे बाइबल के सभी नायकों ने, जिन्हें बचाया गया था, बड़ी–बड़ी उपलब्धियां इसलिए प्राप्त नहीं की थीं कि उन्होंने कर्तव्य–भावना महसूस की थी, लेकिन इसलिए कि उनके हृदयों में परमेश्वर के प्रति प्रेम था। यदि हम कुछ कार्य केवल कर्तव्य–भावना से करें, तो कुछ समय के बाद, परेशान और असहाय महसूस करते हुए, हमें वह कार्य करने में मुश्किल होगी। हालांकि, यदि हम वह कार्य प्रेम से करें, तो हमें ऐसा कुछ भी महसूस नहीं होगा। उन माता–पिता के बारे में सोचिए जिनकी सन्तान बीमार है; चाहे वे अपनी सन्तान के जीवन को बचाने के लिए उनकी देखभाल करते हुए कई रातों से न सोएं, फिर भी उन्हें थकान महसूस नहीं होती। यह प्रेम की सामर्थ्य है।

यदि आपको सुसमाचार प्रचार करना मुश्किल लगता है, तो इसके बारे में सोचिए कि क्या आप सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं या नहीं। यदि हम कुछ कार्य केवल इसी विचार के साथ करें कि हम इसलिए यह करते हैं क्योंकि यह हमें सौंपा गया है, तो हम बहुत आसानी से थक जाते हैं। हालांकि, यदि हम उसे अपने हृदयों में परमेश्वर के प्रति प्रेम रखकर करें, तो हमें बिल्कुल भी थकान महसूस नहीं होगी। प्रेम के बिना की गई चीजें बिल्कुल अर्थहीन हैं।(1कुर 13:1–3) जब हम अपने हृदयों में परमेश्वर के प्रति प्रेम रखकर कार्य करते हैं, केवल तभी हम कह सकते हैं कि हम सुसमाचार के लिए कार्य करते हैं।

यदि अब तक हमने केवल परमेश्वर से प्रेम प्राप्त ही किया है, तो अबसे हमें परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाना चाहिए, फिर चाहे वह थोड़ा सा ही क्यों न हो। जब हम दाऊद और सुलैमान के समान परमेश्वर को महिमा देते हैं, उनका आदर करते हैं, और हमेशा उनसे प्रेम करते हैं, तो परमेश्वर हमें बहुत ज्यादा बुद्धि और आशीष देंगे।

इस संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो परमेश्वर से बढ़कर स्वयं से प्रेम करते हैं। हालांकि, हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं। परमेश्वर के प्रति प्रेम और विश्वास से भरपूर हृदय से, आइए हम स्वर्गीय पिता और माता को और अधिक महिमा चढ़ाएं और जहां कहीं वे हमें ले जाते हैं, वहां उनका पालन करें, ताकि हम सब हाथों में हाथ डालकर एक साथ उस अनन्त स्वर्ग के राज्य में जा सकें जो पिता और माता ने हमारे लिए तैयार किया है।