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शब्द और उद्धार

शब्दों का एक व्यक्ति के जीवन में बड़ा महत्व होता है। हम अक्सर देखते हैं कि लोग जो बोलते हैं वह इस बात का कारण बनता है कि वे दूसरों का विश्वास खो देते हैं जिसे उन्होंने उस समय तक हासिल किया, और वह लोगों के बीच परस्पर भरोसे के टूट जाने का कारण भी बन सकता है।

बिना बात किए जीवन जीना असंभव है। यदि हम दूसरों से बात करते हैं, हम क्या कहने जा रहे हैं, हमें इसके बारे में सावधान रहने की जरूरत है और सुननेवालों की भावनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि सुननेवाले इसके बारे में क्या सोचेंगे, उनके विश्वास पर इसका क्या असर पड़ेगा, और यह क्या परिणाम सामने लाएगा। शब्द जो बिना सोचे समझे कहे जाते हैं या शब्द जो एक से दूसरे मुंह तक फैलने की प्रक्रिया में बढ़कर गंभीर हो जाते हैं, लोगों के बीच मतभेद और गलतफहमी पैदा कर सकते हैं।

इस लौकिक संसार में, शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। विश्वास में, उद्धार से संबंधित शब्द और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। परमेश्वर ने बाइबल में शब्दों के महत्व के बारे में बहुत शिक्षाएं लिखी हैं। बाइबल के माध्यम से, आइए हम इसके बारे में सोचें कि हमारे विश्वास के जीवन में भी, हमारे शब्द कितने महत्वपूर्ण हैं।


अच्छे और कृपालु शब्द


परमेश्वर ने हमें सिखाया है कि हम शिकायत भरे शब्द नहीं, पर धन्यवाद और अनुग्रह भरे शब्द कहें।

इफ 4:26–32 क्रोध तो करो, पर पाप मत करो; सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे, और न शैतान को अवसर दो... कोई गन्दी बात तुम्हारे मुंह से न निकले, पर आवश्यकता के अनुसार वही जो उन्नति के लिये उत्तम हो, ताकि उससे सुननेवालों पर अनुग्रह हो... सब प्रकार की कड़वाहट और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए। एक दूसरे पर कृपाल, और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।

ऊपर के शब्द किसी व्यक्ति का निजी विचार या सिद्धांत नहीं है, पर पवित्र आत्मा से प्रेरित हुए लोगों के द्वारा बाइबल में लिखे गए परमेश्वर के शब्द हैं। यदि हमने धन्यवाद के बजाय शिकायतों से भरा जीवन जिया है, तो अब से हमें परमेश्वर की इच्छा के अनुसार केवल ऐसे अच्छे शब्द कहते हुए, जिनसे सुननेवालों पर अनुग्रह हो, एक कृतज्ञतापूर्ण जीवन जीना चाहिए।

बाइबल में हर शब्द केवल आंखों और कानों को प्रसन्न करने के लिए नहीं लिखा है। उन लोगों के लिए जो वचन को व्यवहार में नहीं रखते, बाइबल का कोई अर्थ नहीं रह जाता; उन लोगों का उद्धार से कुछ लेना देना नहीं।

एक व्यक्ति था जो कुछ कृपालु शब्द कहने के कारण स्वर्ग में गया। जब यीशु मनुष्यजाति के पापों को उठाकर क्रूस पर चढ़ाए गए, यीशु के दोनों तरफ दो डाकू थे। यीशु के बाईं तरफ वाले डाकू ने यीशु की निन्दा करने के लिए भीड़ का साथ देकर अपमानजनक बातें कहीं और उनका मजाक उड़ा दिया, “क्या तू मसीह नहीं? तो फिर अपने आप को और हमें बचा।” इसके विपरीत, यीशु के दाहिनी ओर वाले डाकू ने उसे डांटकर कहा, “हम तो न्यायनुसार दण्ड पा रहे हैं, क्योंकि हम अपने कामों का ठीक फल पा रहे हैं, पर यीशु ने कोई अनुचित काम नहीं किया।” और फिर उसने कहा, “हे यीशु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना।” इस पर यीशु ने उससे कहा, “मैं तुझ से सच कहता हूं कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।”

यीशु के दाहिनी ओर वाला डाकू अपने शब्दों के कारण बचाया गया – मानव इतिहास में वह एक सबसे श्रेष्ठ वक्ता के रूप में माना जा सकता है। इस संसार में अनगिनत लोग हैं और वे अपने दैनिक जीवन में बहुत सारे शब्द कहते हैं। उनमें से कुछ केवल क्षणिक लाभ के लिए सोचते हैं और यीशु के बाईं ओर वाले डाकू के द्वारा कहे गए शब्दों के समान शब्द कहते हैं, और दूसरे अनंतकाल की ओर देखते हैं और यीशु के दाहिनी ओर वाले डाकू के द्वारा कहे गए शब्दों के समान शब्द कहते हैं। हम उन दो प्रकार के लोगों को चर्च में भी देख सकते हैं।


विनाश लाने वाले शब्द, और जीत लाने वाले शब्द


निर्गमन के दूसरे वर्ष में, मूसा ने कनान देश की छानबीन के लिए बारह भेदियों को चुना। वे चालीस दिनों तक कनान देश का अध्ययन करके वापस आए। जब उन्होंने इस्राएलियों को उस देश के बारे में रिपोर्ट दी, उनमें से दस भेदियों ने निराशजनक शब्द कहते हुए कनान देश के बारे में बुरा समाचार फैलाया कि, “जिस प्रदेश को हम लोगों ने देखा, वह शक्तिशाली लोगों से भरा है। वे लोग इतने अधिक शक्तिशाली हैं कि उनके सामने खड़े होने पर हम लोगों ने अपने आपको टिड्डा अनुभव किया। उन लोगों को पराजित करने के लिए हम पर्याप्त शक्तिशाली नहीं हैं।”

दस भेदियों से ऐसी रिपोर्ट सुनने के बाद, सभी लोग परमेश्वर और मूसा के विरुद्ध कुड़कुड़ाने लगे और रात भर जोर से रोते रहे। यहोशू और कालेब ने जो बारह भेदियों में से दो थे, चिल्लाकर कहा, “उस देश के लोगों से न डरो। परमेश्वर ने हमें वह देश देने का वादा किया है, तुम लोग इस पर क्यों विश्वास नहीं करते?” हालांकि, इस्राएली अपना विश्वास पहले ही खो चुके थे, और उन्होंने यहोशू और कालेब की बातें न सुनीं।

तब पूरे इस्राएलियों के सामने परमेश्वर का तेज दिखाई दिया, और उन्होंने कहा कि सारी इस्राएली जिन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत की, मरुभूमि में नष्ट हो जाएंगे, और कालेब और यहोशू को छोड़, हर एक व्यक्ति जो बीस वर्ष में या अधिक उम्र का है, कनान देश में प्रवेश नहीं कर पाएगा। इस्राएली चालीस वर्षों तक मरुभूमि में भटकते रहे जब तक परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करने वाले सारे लोग मरुभूमि में नष्ट न हो गए। चालीस वर्षों के बाद, यहोशू और कालेब के नेतृत्व में द्वितीय पीढ़ी ने कनान देश में प्रवेश किया।

बातें करना महत्वपूर्ण है, और सुनना एवं समझना भी महत्वपूर्ण है। यद्यपि इस्राएलियों ने नकारात्मक शब्दों को सुना, यदि उन्होंने मिस्र में प्रदर्शित परमेश्वर की महान शक्ति, यानी उनके लाल समुद्र को दो भागों में बांटने और मरुभूमि में हर दिन स्वर्ग से उन्हें मन्ना खिलाने के चमत्कार के बारे में सोचा होता, तो उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास किया होता। हालांकि, उन्होंने केवल उसी के बारे में सोचा जो उनके ठीक सामने था, और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत की। उन दस भेदियों के साथ समस्या यह थी कि उन्होंने नकारात्मक शब्दों को कहते हुए छ: लाख लोगों का विनाश की ओर नेतृत्व किया, और इस्राएलियों के साथ समस्या यह थी कि जब उन्होंने दस भेदियों ने जो कहा उसे सुना, वे उस पर ठीक से विचार नहीं कर पाए।

शैतान हमारे रास्ते में रुकावट डालने के लिए तरह–तरह के उपाय सुझाता है, ताकि हम स्वर्ग के राज्य जाने में सक्षम न हों। इसलिए, वह हमें धन्यवाद के बजाय कुड़कुड़ाने वाले बनाने के लिए हमारे सामने कई चीजें रखता है। जब कोई चीज घटित होती है, उन लोगों की नजरों में जो बाहरी स्वरूप को देखकर न्याय करते हैं, वह ऐसी बात लगती है जिससे वे अधन्यवादी हों चाहे वास्तव में वह ऐसा कुछ नहीं है।

चाहे कोई हमें कुछ भी कहता है, आइए हम सबसे पहले परमेवश्र को सोचें। भले ही कितना ही बड़ा या ताकतवर आदमी क्यों न हो, वह भी परमेश्वर के बनाए प्राणियों में से एक है। हमें आदमी से बिल्कुल डरने की जरूरत नहीं है।

इसके बारे में सोचिए कि दाऊद ने कैसे गोलियत को हराया। इस्राएल के सभी पुरुष उससे कांपते और डरते थे, पर वह असमर्थ होकर युवा दाऊद के द्वारा मार डाला गया। यह दाऊद की ताकत से न था कि उसने गोलियत को हराया। उसे याद कीजिए जो दाऊद ने उस समय कहा था। उसने ऐसा नहीं कहा था कि वह बहादुर और गोफन चलाने में माहिर था, मगर कहा, “तू तलवार और भाला और सांग लिए हुए मेरे पास आता है; परन्तु मैं सेनाओं के यहोवा के नाम से तेरे पास आता हूं।” केवल परमेश्वर पर भरोस करते हुए, उसने गोलियत के माथे पर गोफन से एक पत्थर फेंका। वो गोलियत के माथे के भीतर घुस गया। परमेश्वर ने दाऊद के साहस को देखा जिसने पूरी तरह परमेश्वर पर भरोसा किया, और पत्थर को गोलियत पर लगने के लिए उसकी दिशा को नियंत्रित किया।

दाऊद ने बहुत से अनुग्रहपूर्ण शब्द कहे। भजन संहिता की किताब में, जिसे दाऊद ने पवित्र आत्मा से प्रेरित होकर लिखा, बहुत सारे सुंदर शब्द हैं जो हमें दिखलाते हैं कि हमें किस प्रकार के शब्द परमेश्वर को कहने चाहिए और परमेश्वर की प्रशंसा और महिमा किस प्रकार से करनी चाहिए। हर शब्द को जो हम कहते हैं, उस तरह के विश्वास से भरा होना चाहिए।


धन्यवाद के शब्द, जीवन देनेवाले शब्द


जब हम किसी परिस्थिति का सामना करते हैं, हो सकता है कि हम उस समय यह समझ न पाएं कि क्यों वह परिस्थिति उत्पन्न हुई, लेकिन यदि हम परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं, हम बाद में उसे समझ सकते हैं। इस कारण से बाइबल कहती है, “मानना तो बलि चढ़ाने से उत्तम है,” और “हर बात में धन्यवाद करो।”(1शम 15:22; 1थिस 5:18)

इफ 5:3–4 जैसा पवित्र लागों के योग्य है, वैसा तु में व्यभिचार और किसी प्रकार के अशुद्ध काम या लोभ की चर्चा तक न हो; और न निर्लज्जता, न मूढ़ता की बातचीत की, न ठट्ठे की; क्योंकि ये बातें शोभा नहीं देतीं, वरन् धन्यवाद ही सुना जाए।

परमेश्वर के लोगों को धन्यवाद के शब्द कहने चाहिए। जब हम एक कठिन परिस्थिति का सामना करते हैं, यदि अपने खुद के अनुभवों पर निर्भर होकर हमें उस परिस्थिति से निपटना कठिन लगता हो और उसे असंभव सोचकर हार मान जाते हों, हम कृतज्ञ नहीं हो सकते। जो भी कठिनाइयां हम पर आएं, हमें धन्यवाद देना चाहिए। परमेश्वर के साथ जो सारी वस्तुओं की सृष्टि करके उन्हें नियंत्रित करते हैं, सब कुछ संभव है। इसलिए, जब हम एक कठिन परिस्थिति का सामना करते हैं, हमें यह अहसास करने की जरूरत है कि अवश्य उस परिस्थिति के लिए परमेश्वर की निश्चित इच्छा है।

इफ 6:16–20 ... और मेरे लिये भी कि मुझे बोलने के समय ऐसा प्रबल वचन दिया जाए कि मैं साहस के साथ सुसमाचार का भेद बता सकूं, जिसके लिये मैं जंजीर से जकड़ा हुआ राजदूत हूं; और यह भी कि मैं उसके विषय में जैसा मुझे चाहिए साहस से बोलूं।

हमें परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने और उनकी इच्छा कहने के लिए भी आवश्यक शब्द कहने चाहिए। हमें अपने विचार या नजरिए से न तो एक दूसरे को चोट देनेवाले शब्द कहने चाहिए, न ही घमंड करने वाले शब्द कहने चाहिए, और न ही एक दूसरे से निंदात्मक या भेदभावपूर्ण शब्द कहने चाहिए। सिय्योन में, हमें हमेशा कृपालु शब्द कहने की जरूरत है, ताकि हम दूसरों के विश्वास का निर्माण कर सकें।

प्रथम चर्च में भी कई तरह के लोग थे: वे जिनके पास अच्छा विश्वास था, वे जो विश्वास में कमजोर थे, वे जिनमें समझ न थी, और वे जो लोगों को आसानी से भड़काते थे और आसानी से भड़काए जाते थे। इसलिए, आपस में संघर्ष होते थे, और फूट उत्पत्ति होती थी, इसलिए उनमें से कुछ ने विश्वास खो दिया और स्वर्ग में प्रवेश करने में नाकाम हुए। जब कभी ऐसा हुआ, प्रेरित पौलुस ने कृपालु शब्द कहते हुए आत्मिक रूप से उन्हें जगाया, “मैं ने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा, परन्तु परमेश्वर ने बढ़ाया।”(1कुर 3:3–7)


जो वचन में नहीं चूकता वही सिद्ध मनुष्य है


आइए कुछ और वचनों को देखें जो दिखलाते हैं कि हमारे शब्दों का हमारे उद्धार पर क्या असर होता है।

याक 3:2–6 इसलिये कि हम सब बहुत बार चूक जाते हैं; जो कोई वचन में नहीं चूकता वही तो सिद्ध मनुष्य है... देखो, जहाज भी, यद्यपि ऐसे बड़े होते हैं, और प्रचण्ड वायु से चलाए जाते हैं, तौभी एक छोटी सी पतवार के द्वारा मांझी की इच्छा के अनुसार घुमाए जाते हैं। वैसे ही जीभ भी एक छोटा सा अंग है और बड़ी बड़ी डींगें मारती है। देखो, थोड़ी सी आग से कितने बड़े वन में आग लग जाती है। जीभ भी एक आग है; जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है और सारी देह पर कलंक लगाती है, और जीवन–गति में आग लगा देती है और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है।

हम जो कहते हैं उसके बारे में हमें सावधान रहने की जरूरत है, और हमें यह भी विचार करने की जरूरत है कि जो हमने सुना वह परमेश्वर से है या नहीं। किस तरह के लोगों को कनान में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी, दस भेदिए जो कुड़कुड़ाए? या यहोशू और कालेब जिन्होंने दृढ़ता से परमेश्वर पर विश्वास रखा और धन्यवाद के शब्द कहे? कनान में जिन्होंने प्रवेश किया, वे लोग थे जिन्होंने परमेश्वर पर निर्भर किया और धन्यवाद देने के शब्द कहे। कनान देश स्वर्ग के अनंत राज्य को दर्शाता है। 3,500 साल पहले इस्राएल के इतिहास के द्वारा, परमेश्वर पहले ही हमें दिखा चुके हैं कि कुड़कुड़ाने वाले शब्द क्या परिणाम सामने लाते हैं और किस तरह के लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाएंगे।

दाऊद की पत्नी मीकल की घटना के जरिए, हम देख सकते हैं कि अकृपालु शब्द क्या परिणाम सामने लाएंगे।

2शम 6:16–23 जब यहोवा का सन्दूक दाऊदपुर में आ रहा था, तब शाऊल की बेटी मीकल ने खिड़की में से झांककर दाऊद राजा को यहोवा के सम्मुख नाचते कूदते देखा, और उसे मन ही मन तुच्छ जाना... तब दाऊद अपने घराने को आशीर्वाद देने के लिये लौटा, और शाऊल की बेटी मीकल दाऊद से मिलने को निकली, और कहने लगी, "आज इस्राएल का राजा जब अपना शरीर अपने कर्मचारियों की दासियों के सामने ऐसा उघाड़े हुए था, जैसा कोई निकम्मा अपना तन उघाड़े रहता है, तब क्या ही प्रतापी देख पड़ता था !” दाऊद ने मीकल से कहा, “यहोवा, जिसने तेरे पिता और उसके समस्त घराने के बदले मुझ को चुनकर अपनी प्रजा इस्राएल का प्रधान होने को ठहरा दिया है, उसके सम्मुख मैं ऐसा नाचा – और मैं यहोवा के सम्मुख इसी प्रकार नाचा करूंगा। और इससे भी अधिक तुच्छ बनूंगा, और अपनी दृष्टि में नीच ठहरूंगा; और जिन दासियों की तू ने चर्चा की वे भी मेरा आदरमान करेंगी।” और शाऊल की बेटी मीकल के मरने के दिन तब कोई सन्तान न हुई।

दाऊद काफी खुश था क्योंकि परमेश्वर का संदूक दाऊदपुर में पहुंच रहा था, और वह परमेश्वर के समक्ष तन मन से नाचा। दाऊद की पत्नी, शाऊल की बेटी मीकल ने परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए दाऊद को बच्चों की तरह नाचते उछलते देखा और मन में उसका तिरस्कार किया और कहा, “तुम राजा होने पर लोगों के सामने नाचते हुए इतने छिछले हो गए हैं?” तब दाऊद न कहा, “मैं परमेश्वर के सम्मुख इसी प्रकार नाचा करूंगा। मैं इससे भी अधिक तुच्छ बनूंगा, अपनी दृष्टि में नीच ठहरूंगा।” उस समय के बाद परमेश्वर की आशीष और दाऊद की कृपा मीकल से विचलित हो गई, और उसके मरने के दिन तक उसे कोई संतान न हुई।


हमारे शब्दों के अनुसार, हमारे विश्वास के अनुसार


आइए वापस यीशु के समय में चलें और देखें कि उस समय के धार्मिक अगुवों ने परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार किया जो मानवजाति को बचाने के लिए मनुष्य बनकर इस पृथ्वी पर आए और उनसे क्या कहा।

मत 27:19–26 ... पीलातुस ने उनसे पूछा, “फिर यीशु को, जो मसीह कहलाता है, क्या करूं?” सब ने उससे कहा, “वह क्रुस पर चढ़ाया जाए!” हाकिम ने कहा; “क्यों, उसने क्या बुराई की है?” परन्तु वे और भी चिल्ला–चिल्लाकर कहने लगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।” जब पिलातुस ने देखा कि कुछ बन नहीं पड़ता परन्तु इसके विपरीत हुल्लड़ होता जाता है, तो उस ने पानी लेकर भीड़ के सामने अपने हाथ धोए और कहा, “मैं इस धर्मी के लहू से निर्दोष हूं; तुम ही जानो।” सब लोगों ने उत्तर दिया, “इसका लहू हम पर और हमारी सन्तान पर हो!” इस पर उसने बरअब्बा को उनके लिये छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया, कि क्रूस पर चढ़ाया जाए।

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान, यहूदी नरसंहार हुआ जहां 60 लाख से अधिक यहूदियों की हत्या की गई; वह मानव इतिहास में सबसे बुरी त्रासदी रही। उनके यह चिल्लाने का पाप, “उसे क्रूस पर चढ़ाया जाए! इसका लहू हम पर और हमारी संतान पर हो!” गायब नहीं हुआ, पर अपने पापों का भुगतान करने का वह समय निश्चय ही आया। यह भी उनके शब्दों का परिणाम था।

लूक 19:1–9 ... वहां जक्कई नाम एक मनुष्य था जो चुंगी लेनेवालों का सरदार था और धनी था। वह यीशु को देखना चाहता था कि वह कोन सा है? परन्तु भीड़ के कारण देख न सकता था। क्योंकि वह नाटा था। तब उसको देखने के लिये वह आगे दौड़कर एक गूलर क पेड़ पर चढ़ गया, क्योंकि वह उसी मार्ग से जाने वाला था। जब यीशु उस जगह पहुंचा, तो ऊपर दृष्टि करके उससे कहा; “हे जक्कई झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।” वह तुरन्त उतरकर आनन्द से उसे अपने घर को ले गया। यह देखकर सब लोग कुड़कुड़ाकर कहने लगे, “वह तो एक पापी मनुष्य के यहां जा उतरा है।” जक्कई ने खड़े होकर प्रभु से कहा; “हे प्रभु, देख, मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को देता हूं, और यदि किसी का कुछ भी अन्याय करके ले लिया है तो उसे चौगुना फेर देता हूं।” तब यीशु ने उससे कहा, “आज इस घर में उद्धार आया है, इसलिये कि यह भी इब्राहीम का एक पुत्र है।”

जक्कई अपने घर में यीशु के आगमन के लिए बहुत ही खुश था। और उसने कहा कि वह अपनी आधी संपत्ति कंगालों को देगा और यदि उसने किसी का कुछ भी अन्याय करके ले लिया तो उसे चौगुना फेर देगा। तब यीशु ने उससे कहा, “आज इस घर में उद्धार आया है।”

बाइबल में लोगों के शब्दों और कर्मों के माध्यम से, हम पूरी तरह समझ सकते हैं कि किस प्रकार के शब्द हमें उद्धार की ओर ले जाते हैं और किस प्रकार के शब्द उद्धार की ओर नहीं ले जा सकते हैं। बाइबल स्वर्गीय राजकुमार और राजकुमारियों को धार्मिकता में प्रशिक्षण देने के लिए एक किताब है। परमेश्वर ने हमें यह सिखाने के लिए अपने अनमोल शब्द दिए हैं कि किस प्रकार के शब्द हमें कहने चाहिए और किस प्रकार के शब्द हमें नहीं कहने चाहिए, और साथ ही किस प्र्रकार का विचार हमें रखना चाहिए और किस प्रकार का विचार हमें नहीं रखना चाहिए। क्या हमें परमेश्वर की इस अनमोल शिक्षा का पालन नहीं करना चाहिए?

इब्र 3:8–19 ... चौकस रहो कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो तुम्हें जीवते परमेश्वर से दूर हटा ले जाए... जैसा कहा जाता है, “यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मनों को कठोर न करो, जैसा कि क्रोध दिलाने के समय किया था।” भला किन लोगों ने सुनकर क्रोध दिलाया? क्या उन सब ने नहीं जो मूसा के द्वारा मिस्र से निकले थे? और वह चालीस वर्ष तक किन लोगों से क्रोधित रहा? क्या उन्हीं से नहीं, जिन्होंने पाप किया, और उनके शव जंगल में पड़े रहे? और उसने किनसे शपथ खाई कि तुम मेरे विश्राम में प्रवेश करने न पाओगे? क्या केवल उनसे जिन्होंने आज्ञा न मानी? अत: हम देखते हैं कि वे अविश्वास के कारण प्रवेश न कर सके।

वे लोग जिनके पास कोई विश्वास नहीं है, परमेश्वर को उद्धार के लिए धन्यवाद नहीं दे सकते और वे सभी बातों की शिकायत करते हैं। परमेश्वर उन्हें अलग करते हैं ताकि वे उस अनन्त विश्राम में प्रवेश न कर सकें जो उन्होंने अपने लोगों के लिए तैयार किया है।

शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। अदालत में लोगों के बयानों की रिकार्डिंग होती है और यह सबूत बनता है। इस तरह इस सांसारिक अदालत में जो वे कहते हैं उन सब शब्दों की रिकार्डिंग होती है, तो स्वर्ग में हमारे शब्द भी कितने और अधिक रिकार्डिंग होंगे? न्याय के दिन, परमेश्वर चाहे धन्यवाद के शब्द हों या शिकायत के शब्द हों, हमारे उन सभी शब्दों की जांच करेंगे जो हमने पृथ्वी पर रहते समय कहे। इसलिए यीशु ने कहा, “तू अपनी बातों के कारण निर्दोष, और अपनी बातों ही के कारण दोषी ठहराया जाएगा।”(मत 12:36–37)

हम फसह के पर्व और सब्त जैसे परमेश्वर की व्यवस्था और नियम का आदर करते हैं और उनका पालन करते हैं। इसी प्रकार, शब्दों के बारे में परमेश्वर की शिक्षाएं भी परमेश्वर की आज्ञा है जिसका हमें पालन करना चाहिए। आइए हम कुछ मूर्ख शब्द न कहें जो दस भेदियों की तरह परमेश्वर को भूलकर परमेश्वर के लोगों के विश्वास को नुकसान पहुंचाते हैं, पर हमेशा अनुग्रहपूर्ण शब्द कहें जो भाइयों और बहनों को अपने विश्वास का निर्माण करने में मदद करते हैं।

शब्द जो हमें सुसमाचार का प्रचार करने के लिए कहते हैं, वो हैं जो हमें कहना चाहिए। जितना संभव हो सके, अधिक से अधिक उतनी बार उन्हें कहिए। आइए हम परमेश्वर को महिमा देने के शब्द और धन्यवाद देने के शब्द बहुत बार कहें। दाऊद की तरह जिसने अपने को नीचा करके परमेश्वर को धन्यवाद, महिमा, और प्रशंसा दी, आइए हम परमेश्वर के मन के अनुकूल बनकर अनुग्रहपूर्ण शब्द कहें, ताकि हम सब उद्धार प्राप्त कर सकें।