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परमेश्वर को ग्रहण कर


बाइबल के सत्य के वचनों में परमेश्वर की इच्छाएं होती हैं, जिससे वह हमें उद्धार का उत्तराधिकरी, सत्य का मार्ग और धार्मिकता के मार्ग पर लेकर जाता है और परमेश्वर के जन के रूप में पूर्णत: सिद्ध करता है।

2 हज़ार वर्ष पहले, बाइबल में जिन्होंने शरीर में आए परमेश्वर को भली ­ भांति ग्रहण किया उन व्यक्तियों का कार्य, आज हमें शिक्षा देने के लिए अच्छा नमूना है। आइए हम उनके द्वारा सही तरह से परमेश्वर को ग्रहण करने के विश्वास की मुद्रा सीखें, और इस उद्धार के समाचार को सारे क्षेत्रों और विदेशों के हर प्रांतों में फैलाएं कि, इस युग में प्रकट हुए ऐलोहीम परमेश्वर को ग्रहण करो।


अधिकार, जो परमेश्वर को ग्रहण करने वालों को दिया जाता है

सबसे पहले आइए, हम बाइबल की आयत को देखें, जो हमें महसूस कराती है कि जिन्होंने शरीर में इस धरती पर आए यीशु को ग्रहण किया, उन लोगों ने कौन सी आशीष प्राप्त की।

यूह 1:10–13 “वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे न पहचाना। वह अपनों के पास आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया। परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं ­ वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, और न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।”

सृष्टिकर्ता परमेश्वर, जिसने सारी वस्तुओं को सृजा, इस धरती पर आया, परन्तु प्राय: लोगों ने उसे न तो पहचाना और न ही ग्रहण किया। परन्तु बहुत कम लोगों ने ही परमेश्वर को पहचानने की आशीष और भाग्य पाया था। वे परमेश्वर से उत्पन्न हुए थे, और वे अनुग्रहमय विश्वास लिए थे कि चाहे परमेश्वर शरीर में आया, तब भी उसका आदर किया और उसके पीछे जहां कहीं भी चलते थे, जहां वह अगुवाई करता था।

हम भी पहले कुछ भी नहीं थे, सिर्फ पापी मनुष्य ही थे। परमेश्वर को ग्रहण करने के द्वारा हमें राजाओं का राजा, प्रभुओं का प्रभु, परमेश्वर की सन्तान होने का विशिष्ट अधिकार मिला है। यह इसके जैसा है कि हाइड्रोजन ऑक्सीजन से मिलने के पहले हवा में सिर्फ एक पदार्थ ही था, किन्तु एक दूसरे से मिलने के द्वारा नया प्रदार्थ, ‘पानी’ में बदल जाता है, जो सभी जीवित प्राणियों के लिए अति आवश्यक है।

फ़िलहाल विदेश प्रचारक दल का समाचार यरूशलेम मंदिर में लगातार उमड़ पड़ रहा है। उनका समाचार है कि उन्होंने बहुतेरे विदेशी भाई ­ बहनों को ढूंढ़ा है, जिन्होंने इस सुसमाचार को सुनकर इस धरती पर आए परमेश्वर को ग्रहण किया है और वे इससे बहुत हर्षित हुए हैं। इस सिय्योन के सुगन्धित संदेश सुनकर हमें ऐसा महसूस होता है कि हम कितना आशीषित और धन्य हैं, क्योंकि हम परमेश्वर को ग्रहण करके उसकी सेवा कर सकते हैं।


जो परमेश्वर को ग्रहण करता है वह परमेश्वर का प्रतिफल पाएगा

यीशु ने ज़िक्र किया कि, जो उसे ग्रहण करता है, वह कौन सी आशीष पाएगा।

मत 10:40–42 “जो तुम्हें ग्रहण करता है वह मुझे ग्रहण करता है, और जो मुझे ग्रहण करता है, वह मेरे भेजने वाले को ग्रहण करता है। जो नबी को नबी जानकर ग्रहण करे, वह नबी का प्रतिफल पाएगा, और जो धर्मी को धर्मी व्यक्ति मानकर ग्रहण करे, वह धर्मी का प्रतिफल पाएगा। जो कोई इन छोटों में से किसी एक को चेला जान कर ठण्डे पानी का एक गिलास भी पीने को दे तो मैं तुम से सच कहता हूं कि वह अपना प्रतिफल कदापि नहीं खोएगा।”

हम नबी या धर्मी को ग्रहण करने से प्रतिफल कदापि नहीं खोते हैं। तब, यदि हम परमेश्वर को, जो उनसे बड़ा है, ग्रहण करें, तब इससे मिलते प्रतिफल और आशीष से और बड़ा प्रतिफल कोई नहीं होगा।

1 रा 17:8–16 “तब यहोवा का यह वचन उसके पास पहुंचा, “उठ, सीदोन के सारपत को जा, और वहीं रह, देख, मैंने वहां एक विधवा को तेरे लिए भोजन का प्रबन्ध करने की आज्ञा दी है।” अत: उठ कर सारपत को गया, और जब वह नगर के फाटक के पास पहुंचा तो देखो, एक विधवा लकड़ियां बीन रही थी... उसने उसे पुकार कर कहा, “अपने हाथ में एक टुकड़ा रोटी भी मेरे लिए लेती आना।” परन्तु उसने कहा, “तेरे परमेश्वर यहोवा के जीवन की शपथ, मेरे पास एक भी रोटी नहीं है, घड़े में केवल मुट्ठी भर आटा और कुप्पी में थोड़ा सा तेल है, और देख, मैं कुछ लकड़ी बीन कर लिए जाती हूं कि मैं जाऊं और अपने और अपने बेटे के लिए पकाऊं, और फिर हम उसे खाएं और मर जाएं।” तब एलिय्याह ने उस से कहा, “मत डर, जाकर अपनी बात के अनुसार कर, परन्तु उसमें से पहले मेरे लिए एक छोटी ­ सी रोटी बना कर मेरे पास ले आ, फिर इसके बाद अपने और अपने बेटे के लिए बनाना। क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, ‘जब तक यहोवा भूमि पर मेंह न बरसाएगा तब तक न तो उस घड़े का आटा समाप्त होगा और न उस कुप्पी का तेल घटेगा’।” अत: उसने जाकर एलिय्याह के वचन के अनुसार किया। तब से एलिय्याह और उस स्त्री के घराने के लोग बहुत दिन तक खाते रहे। यहोवा के उस वचन के अनुसार जो उसने एलिय्याह के द्वारा कहा था न तो उस घड़े का आटा समाप्त हुआ और न उस कुप्पी का तेल घटा।”

सारपत में गंभीर अकाल पड़ा था। वहां एक विधवा थी, जो एक आख़िरी भोजन छोड़कर सिर्फ मरने के दिन का इन्तजार कर रही थी। हताश और दरिद्र अवस्था में, उसने नबी एलिय्याह को भली ­ भांति ग्रहण करने से आशीष पाई कि जब तक अकाल न समाप्त हुआ, तब तक न उस घड़े का आटा समाप्त हुआ और न उस कुप्पी का तेल घटा।


लोग, जिन्होंने परमेश्वर को ग्रहण किया

जब हम इन बातों को देखते हैं कि लोगों ने नबी को ग्रहण करके आशीष पाई, तब हमें पता चलता है कि यदि हम परमेश्वर को शालीनत: ग्रहण करके सेवा करते हैं, तो अनन्त आशीष पा सकते हैं। यीशु के समय भी वैसे लोग थे, जिन्होंने परमेश्वर को ग्रहण करके आशीष पाई।

लूक 19:1–9 “यह यरीहो में प्रवेश करके वहां से जा रहा था तो देखो, वहां एक मनुष्य था जिसका नाम जक्कई था। वह चुंगी लेने वालों का प्रमुख था और धनी था। वह यीशु को देखने का प्रयत्न कर रहा था, परन्तु भीड़ के कारण देख नहीं पा रहा था क्योंकि वह नाटा था। तब उसे देखने के लिए वह दौड़कर एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया, क्योंकि यीशु उसी मार्ग से होकर जाने वाला था। जब यीशु उस स्थान पर पहुंचा तो उसने ऊपर देख कर उस से कहा, “जक्कई, शीघ्र नीचे उतर आ, क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना है।” और उसने झटपट नीचे उतरकर प्रसन्नतापूर्वक उसका स्वागत किया... जक्कई ने खड़े होकर प्रभु से कहा, “प्रभु, देख, मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को दे दूंगा और यदि मैंने किसी से अन्याय करके कुछ भी लिया है तो उसे चौगुना लौटा दूंगा।” यीशु ने उसके लिए कहा, “आज इस घर में उद्धार आया है, क्योंकि यह मनुष्य भी इब्राहीम का एक पुत्र है।”

जक्कई ने माना कि यीशु को ग्रहण करना असीमित गौरव की बात है। उसने यीशु से यह कह कर प्रसन्नता और धन्यवाद को प्रकट किया कि ‘मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को दे दूंगा और यदि मैंने किसी से अन्याय करके कुछ भी लिया है तो उसे चौगुना लौटा दूंगा।’

इस तरह से पापी के लिए परमेश्वर को ग्रहण करना, सच में बड़ा गौरव है। लेकिन आत्मिक आंखें न खुल जाने के कारण और समझ की कमी होने के कारण, यदि परमेश्वर को पास में देखते हुए भी, हम उसके ईश्वरीय गुण को न तो समझते और न ही ग्रहण करते हैं, तब हम उद्धार के अनुग्रह की ओर आगे नहीं बढ़ सकते। यीशु के समय में भी, कितने ज्ज्यादा लोग यीशु के साथ एकी जगह में रहते थे! लेकिन जक्कई के जैसा यीशु पर विश्वास करने वाले और ग्रहण करने वाले थोड़े ही थे।

आज भी परमेश्वर स्वयं इस पृथ्वी पर आकर पापी के साथ जी रहे हैं। लेकिन प्राय: लोग उसे न तो पहचानते और न ही ग्रहण कर रहे हैं। फिर भी हम जक्कई के समान सच्चे मन से धन्यवाद और खुशी के साथ ऐलोहीम परमेश्वर को ग्रहण करेंगे।

यूह 12:1–7 “फिर फसह के छ: दिन पहिले यीशु बैतनिय्याह में आया जहां लाज़र था, जिसे यीशु ने मृतकों में से जिलाया था। इसलिए उन्होंने वहां उसके लिए भोजन तैयार किया, और मार्था सेवा कर रही थी। उसके साथ जो भोजन के लिए बैठे थे, उनमें से लाज़र एक था। तब मरियम ने जटामांसी का आधा किलो बहुमूल्य और असली इत्र लेकर यीशु के पैरों पर मला और अपने बालों से उसके पैर पोंछे और इ्रत्र की सुगन्ध से घर सुगन्धित हो गया... इसलिए यीशु ने कहा, “उसे रहने दो कि वह इसे मेरे गाड़े जाने के दिन के लिए रख सके।”

बैतनिय्याह में, लाज़र के घर में, यीशु के लिए भोज का प्रबन्ध किया गया था। मरियम ने परमेश्वर को, जो उसके जैसे पापी को बचाने के लिए आया, महसूस किया और इज़्ज़त देने के लिए क़ीमती इत्र की किफ़ायत न करके उस पर मला। यीशु ने मरियम के विश्वास को देख कर आज्ञा दी, “समस्त संसार में जहां कहीं यह सुसमाचार प्रचार किया जाएगा, वहां इस स्त्री के कार्य का वर्णन भी उसकी स्मृति में किया जाएगा।”(मत 26:13)


ऐलोहीम परमेश्वर को ग्रहण करने की मुद्रा

ऐसे दृश्य को देखते हुए हमें, जिन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार मिला है, इस पर विचार करना है कि क्या हम मरियम मगदलीनी और जक्कई के जैसे परमेश्वर को भली ­ भांति ग्रहण कर रहे हैं या नहीं।

यीशु ने न तो जक्कई की सम्पत्ति और न ही मरियम के क़ीमती इत्र को चाहा। उनके विश्वास के सुगन्ध ने ही यीशु के मन को छुया था। हमेंं भी, जो आज पवित्र आत्मा के युग में रहते हैं, परमेश्वर को ग्रहण करने और इज़्ज़त देने में, उनसे भी कहीं मज़बूत और सुन्दर विश्वास से, परमेश्वर के मन को छूना चाहिए।

यूह 5:39-44 “तुम पवित्रशास्त्रों में ढूंढ़ते हो क्योंकि तुम सोचते हो कि उनमें अनन्त जीवन मिलता है, और ये वे ही हैं जो मेरे विषय में साक्षी देते हैं, ओर तुम मेरे पास आना नहीं चाहते कि जीवन पाओ... मैं अपने पिता के नाम से आया हूं और तुम मुझे ग्रहण नहीं करते। यदि कोई और अपने ही नाम से आए तो तुम उसे ग्रहण करोगे। तुम कैसे विश्वास कर सकते हो, जब कि तुम स्वयं एक दूसरे से आदर चाहते हो और जो आदर अद्वैत परमेश्वर की ओर से है, पाना नहीं चाहते?”

कोई जो हमेशा आशा करता है कि परमेश्वर मेरी ओर कुछ न कुछ करे, वह परमेश्वर को सम्पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर पाता है। सच्चे मन से जो परमेश्वर को ग्रहण करता है, वह है, जो मरियम और जक्कई के जैसे हमेशा सोचता है कि मैं परमेश्वर की ओर क्या करूं।

क्या परमेश्वर अच्छा भोजन, जो मनुष्य देता है, खाकर प्रसन्न होगा? परमेश्वर उसके मन से प्रसन्न होता है, जिसने उसे ग्रहण किया।

यदि हम परमेश्वर को सच्चे मन से प्रेम करते हैं, तो हमें परमेश्वर को, जिसने हमारे लिए बलिहारी का जीवन व्यतीत किया, धन्यवाद देते हुए प्रतिदिन सोचना चाहिए कि कैसे हम उसके अनुग्रह को लौटा दें। तथा हमें खुश रहना चाहिए और परमेश्वर के अनुग्रह को पूरे मन और पूरी ईमानदारी से लौटाना चाहिए क्योंकि परमेश्वर ने हमें उसे ग्रहण करने का मौका और सम्मान दिया है।

अब यह सोचने का समय है कि हम परमेश्वर की ओर क्या कर सकें। आइए हम हमारे बीते हुए समय पर पश्चाताप करें, और पवित्र महिमा के दिन की अभिलाषा करते हुए, हम पापी का उद्धार करने के लिए इस धरती पर दूसरी बार आए परमेश्वर के अनुग्रह का धन्यवाद दें, और मरियम और जक्कई के मन के जैसे परमेश्वर का सम्मानपूर्वक स्वागत करें।


पूरे विश्व में समाचार सुनाएं कि परमेश्वर को ग्रहण कर

जो परमेश्वर ने हमें दिया वह अनुग्रह, विशाल और बड़ा है। लेकिन जो हम परमेश्वर को लौटा सकते हैं, वह सीमित और छोटा है। लेकिन परमेश्वर उसके अनुग्रह को लौटाने की हमारी छोटी कोशिश को बड़ी मानता है और हमारे लिए स्वर्ग की अपार आशीष की तैयारी की है।

1कुर 2:9 “जैसा लिखा है, “जिन बातों को आंख ने नहीं देखा और न कान ने सुना, और जो मनुष्य के हृदय में नहीं समाईं, उन्हीं को परमेश्वर ने अपने प्रेम करने वालों के लिए तैयार किया है।”

यदि अब तक हमारा विश्वास छोटे बच्चे के समान हो जो सिर्फ कुढ़कुढ़ाते और शिकायत करते हुए हमेशा माता ­ पिता को कुछ देने को चिढ़ाता है, तो अब से विश्वास की प्रौढ़ सन्तान बन कर परमेश्वर को, जो मनुष्य की शक्ति के बाहर अत्यंत और महिमामय चीजें देने को तैयार है, अच्छी चीजें लौटाना चाहिए।

परमेश्वर प्रत्येक हमारे लिए मनोहर चीजों की तैयारी कर रहा है। इसलिए उसने हमसे निवेदन किया कि शैतान की सारी रुकावटों को, जो परमेश्वर की महिमा को ढंकती और हमें परमेश्वर से दूर करती हैं, हटा कर जीवन के मुकुट की रक्षा अन्त तक दृढ़ता से करें।


2कुर 4:4-6 “उन अविश्वासियों की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्धा कर दिया है कि वे परमेश्वर के प्रतिरूप, अर्थात् मसीह के तेजोमय सुसमाचार की ज्योति को, न देख सकें। हम तो अपना नहीं परन्तु मसीह यीशु का प्रचार करते हैं कि वह प्रभु है, और अपने विषय में यह कहते हैं कि हम यीशु के कारण तुम्हारे दास हैं, क्योंकि परमेश्वर जिसने कहा, “अन्धकार में से ज्योति चमके,” वही है जो हमारे हृदयों में चमका है कि हमें मसीह के चेहरे में परमेश्वर की महिमा के ज्ञान की ज्योति दे।”

जब हम सोचते हैं कि परमेश्वर, जो ज्योतिर्मय महिमा में वास करता है, हम पापी का त्याग न करके उद्धार देने के लिए इस पृथ्वी पर शरीर में आए हैं, तब हम अनुमान लगा सकते हैं कि पिता और माता का प्रेम कितना बड़ा है। इसलिए हमें शैतान के कार्य को अवश्य ही रोकना चाहिए, जो परमेश्वर की महिमा के प्रकाशित न होने की धुन में रहता है, और सम्पूर्ण समझ एंव विश्वास के साथ पिता और माता को आदर देना चाहिए।

अब हम पूरे संसार में, सामरिया और पृथ्वी के छोर तक, जाकर सारे देशों और सारी जातियों को परमेश्वर को ग्रहण करने का सुसमाचार प्रचार यत्नपूर्वक करें, जिससे हम परमेश्वर को प्रसन्न्ता दे सकें।

इस समय में, जब परमेश्वर, यीशु के पहली बार आने के समय से सात गुणा अधिक महिमा और सामर्थ्य प्रकट करते हैं, हम बुलाए गए हैं। इसलिए मरियम और जक्कई से भी और अधिक पूरी ईमानदारी से परमेश्वर को ग्रहण करें और यत्नपूर्वक सारी जातियों को सुसमाचार प्रचार करें कि परमेश्वर को ग्रहण करके जीवन का जल पाने के लिए आओ। आशा है कि सब सुन्दर विश्वास के कार्य करें ताकि पिता के आने के दिन ऐसा गर्व कर सकें कि मेरे जीवनकाल में पछताने के लिए कभी विश्वास की कमी नहीं थी।