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उद्देश्यपूर्ण जीवन

पूरी दिनचर्या खत्म होने के बाद कभी रात में, व एक वर्ष खत्म होने के बाद कभी नववर्ष में, लोग अपने बीते समय को याद करते हैं। हर एक को बराबर समय दिया जाता है। लेकिन कोई अपने समय को ईमानदारी से गुजारता है तो कोई समय बेकार गंवाता है। ऐसा फर्क इस बात से पड़ता है कि उसके पास उद्देश्य है या नहीं। जब हम जीवन में कुछ उद्देश्य बनाकर उसे प्राप्त करने की पूरी कोशिश करें, तब हमें सफल परिणाम मिल सकता है। इसलिए एक व्यक्ति या कोई समुदाय काम करने से पहले उद्देश्य को तय करते हैं।

हमारे विश्वासी जीवन में भी एक ही होता है। हर एक को दिया गया बराबर समय अब बीतता जा रहा है। इस दौरान जिसके जीवन में आत्मिक लक्ष्य हो, वह उस महिमा व आशीष की बाट जोहते हुए, जो स्वर्ग में मिलेगा, दिन प्रतिदिन ईमानदारी का जीवन जीएगा। लेकिन जिसके जीवन में आत्मिक लक्ष्य नहीं हो, उसे बहुमूल्य समय को बेकार की बातों में खर्च करते हुए जीवन जीना पड़ेगा। यह परमेश्वर की निर्धारित इच्छा है कि मनुष्य एक ही बार पैदा होता है और एक ही बार मरता है।(इब्र 9:27) मनुष्य के मरने के बाद, आत्मिक दुनिया में उसका न्याय अथवा उद्धार होता है। शारीरिक चीजें तो नश्वर हैं, इन व्यर्थ व बेकार चीजों के लिए अपना मन लगाने के बजाय, हमें अनन्त व आत्मिक दुनिया की ओर मन लगाते हुए विश्वास का लक्ष्य निश्चित करना चाहिए और उसे पूरा करने के लिए प्रयास करना चाहिए। जिन्दगी एक बार मिलती है। इसलिए इस जिन्दगी में हमें मूल्यवान व सार्थक जीवन जीते हुए अपने पदचिह्न छोड़ने चाहिए।


विश्वास का उद्देश्य जिसे हम स्वर्ग की आशीष के लिए बनाते हैं

बाइबल की शिक्षा के द्वारा, आइए हम पढ़ें कि हमें किस तरह का विश्वास अपनाना चाहिए। कुलुस्सियों के ग्रंथ में प्रेरित पौलुस ने ऐसा निवेदन किया है कि हम स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान लगाएं।

कुल 3:1–3 "इसलिए यदि तुम मसीह के साथ जीवित किए गए तो उन वस्तुओं की खोज में लगे रहो जो स्वर्ग की हैं, जहां मसीह विद्यमान है और परमेश्वर की दाहिनी ओर विराजमान है। अपना मन पृथ्वी पर की नहीं, परन्तु स्वर्गीय वस्तुओं पर लगाओ, क्योंकि तुम तो मर चुके हो और तुम्हारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है।"

लिखा है, "अपना मन स्वर्गीय वस्तुओं पर लगाओ।" इस वचन में यह निवेदन है कि हम स्वर्ग की आत्मिक वस्तुओं की खोज में लगे रहते हुए उस महान इच्छा के अनुरूप जो परमेश्वर हमसे चाहता है, अनुग्रह से परिपूर्ण विश्वासी जीवन जीएं। पिछले दिनों में हम तो सांसारिक चीजों के लिए जीवन जीते थे। लेकिन मसीह में नया जीवन पाने के बाद, हमें महिमामय स्वर्ग में रहने की आशा लेकर, केवल स्वर्ग की आशीष व महिमा की कामना करते हुए जीवन जीना चाहिए। प्रेरित पौलुस ने भी ऐसा जीवन जीने के लिए, विश्वास का उद्देश्य बनाया।

फिलि 3:12–14 "यह नहीं कि मैं प्राप्त कर चुका हूं या सिद्ध हो चुका हूं, पर उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अग्रसर होता जाता हूं, जिसके लिए मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था। हे भाइयो, मेरी धारणा यह नहीं कि मैं प्राप्त कर चुका हूं, परन्तु यह एक काम करता हूं, कि जो बातें पीछे रह गई हैं, उन्हें भूल कर आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, लक्ष्य की ओर दौड़ा जाता हूं कि वह इनाम पाऊं जिसके लिए परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है।"

उद्देश्यपूर्ण जीवन ही ऐसा जीवन है, जिसमें भविष्य की किसी चीज को प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास किया जाता है। यदि हम उस योग्यता के द्वारा, जो परमेश्वर ने प्रत्येक को दी है, सफल परिणाम बनाना चाहें, तो हमें पहले परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का संकल्प लेकर निश्चित लक्ष्य बनाना चाहिए, बजाय यह सोचने के कि ‘किसी न किसी तरीके से परमेश्वर अपना काम पूरा कर लेगा।''


जैसा उद्देश्य होता है, वैसा ही सोच और व्यवहार बनता है

पुराने समय एक गांव में एक अमीर आदमी रहता था। जब उसके एक मात्र पुत्र के शादी करने का समय आया, तो उसने स्वयं अपनी बहू को चुनना चाहा। उसने ऐसी बहू को चुनने के लिए, जो उसकी कठिन परिश्रम से कमाई गई संपत्ति को अच्छी तरह से संभाल सकती थी, दीवारों पर एक सूचना चिपका दी। उसमें लिखा था कि जो एक बर्तन के चावल पर एक महीने तक रहेगी, वह मेरी बहू हो सकेगी।

आसपास के गांवों तक इसके बारे में चर्चा की गई कि अमीर घर का आदमी अपनी बहू को चुन रहा है। इसे सुनकर बहुत सी कुंवारी लड़कियां उसके पास आईं। लेकिन वे सब उससे एक बर्तन का चावल लेने के बाद परेशान हो उठीं। जब एक महीना पूरा हुआ, उसने परीक्षा में शामिल हुई उन लड़कियों को बुलाया। उनमें से कुछ एक महीने तक चावल को थोड़ा–थोड़ा बांटकर खाने से दुबली पतली हो गई थीं और कुछ एक ही बार में पूरा चावल खाने के बाद भूखे रहने से बीच में ही छोड़कर वापस जा चुकी थीं। अमीर आदमी को अधिकांश लड़कियों की हालत बेहद दुबली नजर आई। लेकिन उस समय उसने एक लड़की को चावल से भरी बैलगाड़ी लेकर आते देखा जिसका चेहरा बहुत स्वस्थ व दमक रहा था। तब अमीर आदमी ने उससे पूछा,

"दूसरी लड़कियां तो किसी की पीठ पर उठाई जाकर आई हैं। लेकिन तुम क्यों थकी हुई नहीं लगती हो?"
"आपने एक बर्तन के चावल पर एक महीने तक जीने के लिए कहा था। जब मैंने यह सुना, मैंने सोचा कि यह असंभव बात है, शायद ऐसा कहने के पीछे कुछ और मतलब होगा। उसके बाद मैंने चावल को चक्की में पीस कर उससे रोटी बनाई, और उसे बाजार में बेचकर पैसा कमाया और उस पैसे से फिर चावल खरीद लिया। इस तरह मैं बार–बार यह करती थी कि चावल खरीद कर उससे रोटी बनाती थी और फिर बाजार में उसे बेचती थी। ऐसे ही मैंने पेट भर रोटी खाते हुए बचे चावल को भंडार में रखा।"

जब लड़की यह कह चुकी तो अमीर ने कहा,
"तुम ही मेरी बहू होने के लायक हो!''

बुद्धिमान लड़की ने ऐसा लक्ष्य बनाया था कि एक बर्तन के चावल से एक महिने तक रहूंगी, और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बहुत सा विचार किया, जिससे वह अमीर आदमी की योजना को समझ सकी। ऐसे ही उसका लक्ष्य निश्चित होने से वह लक्ष्य पूरा करने का उपाय पा सकी।

लक्ष्य के बिना यदि हम समय को बेकार गंवाएं, तो हमें कुछ भी नहीं मिलेगा। सुसमाचार–प्रचार के कार्य में भी अवश्य ही लक्ष्य होना चाहिए। जब हम उस लक्ष्य को पूरा करने पर विचार करेंगे और फिर सुसमाचार–प्रचार की योजना बनाएंगे, तब हम में परमेश्वर के वचन का पालन करने की दृढ़ इच्छाशक्ति आएगी।

जब हम एक आत्मा को सिय्योन में ले आने का लक्ष्य बनाएंगे, तब हम उस आत्मा के बारे में सोचेंगे और हमारे अन्दर उसके प्रति दया व प्रेम का भाव आएगा। सिय्योन में कोई चाहे पिछले दिनों में छोटी मोटी कड़वी बात सुनने पर बर्दाशत न कर पाता था, यदि वह दूसरे को परमेश्वर की ओर ले जाने की कोशिश करे, तो धीरज सीखेगा और वह खुशी व प्रेम को जानेगा जो आत्मा का उद्धार करने से आता है। यदि लक्ष्य नहीं हो तो विचार भी नहीं होगा, और यदि विचार नहीं हो तो काम भी नहीं होगा। और यदि हम काम न करें तो सफल परिणाम नहीं पा सकेंगे। इसलिए हमें अवश्य ही आत्मिक लक्ष्य बनाना चाहिए।


लोग जो उद्देश्य की पूर्ति की ओर बढ़ते जा रहे हैं

यदि हम आत्मिक कार्य में निश्चित उद्देश्य बनाएं, तो परिणाम के हिसाब से हम खुद को जांच–परख सकेंगे कि हमने सच में उद्देश्य के अनुसार फल पैदा करने की कोशिश की है, या फिर अस्पष्ट विचार से समय का पूरा उपयोग नहीं किया है।

मत 25:1–7 "तब स्वर्ग के राज्य की तुलना उन दस कुंवारियों से की जाएगी जो अपने दीपक लेकर दूल्हे से मिलने को निकलीं। उनमें से पांच मूर्ख और पांच बुद्धिमान थीं। क्योंकि मूर्खाें ने जब दीपक लिए तो उन्होंने अपने साथ तेल नहीं लिया, परन्तु बुद्धिमानों ने अपने दीपकों के साथ कुप्पियों में तेल भी लिया। जब दूल्हे के आने में देर हो रही थी तो वे सब ऊंगने लगीं और सो गई। परन्तु आधी रात को पुकार मची: ‘देखो, दूल्हा आ रहा है! उस से भेंट करने चलो!'' तब वे सब कुंवारियां उठ बैठीं और अपना अपना दीपक ठीक करने लगीं।"

यीशु के इस दृष्टान्त में दस कुंवारियों का उद्देश्य यह था कि वे दुल्हे से मिलें। उनमें से केवल पांच कुंवारी अपनी उद्देश्य की ओर प्रबल इच्छाशक्ति और दृढ़ निश्चय से आगे बढ़ी। उन्होंने उद्देश्य को पूरा करने के उपाय सुझाया और आसपास की स्थिति को देखते हुए, दुल्हे के स्वागत की तैयारी में काफी अधिक तेल को इकट्ठा किया। आखिर में जिनका लक्ष्य निश्चित था, केवल वे दुल्हे का स्वागत कर सकी।
तोड़ों के दृष्टान्त के द्वारा भी, हम ऐसी ही शिक्षा ले सकते हैं।

मत 25:13–23 "... फिर, यह उस मनुष्य के समान है जो यात्रा पर जाने को था और जिसने अपने दासों को बुलाकर अपनी सम्पत्ति उनको सौंप दी। उसने एक को पांच तोड़े, दूसरे को दो, और तीसरे को एक, अर्थात् प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार दिया, और यात्रा पर चला गया। जिसे पांच तोड़े मिले थे, उसने तुरन्त जाकर उनसे व्यापार किया और पांच तोड़े और कमाए। इसी प्रकार जिसे दो तोड़े मिले थे, उसने भी दो और कमाए। पर वह जिसे एक मिला था, उसने जाकर भूमि खोदी और अपने स्वामी के तोड़े को उसमें छिपा दिया। बहुत दिनों के पश्चात् उन दासों का स्वामी आया और उनसे लेखा लेने लगा। तब वह जिसे पांच तोड़े मिले थे, उसने पांच तोड़े और लाकर कहा, ‘स्वामी, तू ने मुझे पांच तोड़े सौंपे थे। देख, मैंने इनसे पांच और कमाए हैं।'' ... वह जिसे दो तोड़े मिले थे, उसने आकर कहा, ‘स्वामी, तू ने मुझे दो तोड़े सौंपे थे। देख, मैंने दो और कमाए हैं।'' स्वामी ने उस से कहा, ‘शाबाश, अच्छे और विश्वासयोग्य दास! तू थोड़े ही में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत–सी वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा। अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो।'' "

जिनको पांच तोड़े और दो तोड़े मिले थे, उन्होंने स्वामी के आने तक कुछ और तोड़ों को कमाने का उद्देश्य बनाया था। और वे उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उपाय सोचते हुए लगातार प्रयास करते थे।

दृष्टान्त में यीशु ने कहा था कि जिन्होंने कुछ और तोड़े कमाए थे, वे अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हुए। वास्तव में इसका मतलब था कि परमेश्वर उनसे प्रसन्न होता है और उन्हें ईनाम व ऐसा अधिकार देगा जिससे वे स्वर्ग के भोज में शामिल हो सकेंगे। प्रेरित पौलुस ने इस मतलब को समझा था। इसलिए वह लक्ष्य की ओर पूरी लगन से दौड़ता था और अपने विश्वास को दृढ़ करता था। अन्त में उसने यह कहते हुए खुद पर गर्व किया कि ‘मेरे लिए धार्मिकता का मुकुट रखा हुआ है।''

इस प्रकार जिसमें लक्ष्य व उद्देश्य होता है, वह दृढ़ विश्वास के साथ उसके लिए काम करेगा। छोटे लड़के, दाऊद इसलिए ऐसे गोलियत को गिरा कर मार सका जिससे बहादुर सेनापति भी डर के मारे कांपा, क्योंकि उसने एक निश्चित उद्देश्य को सामने रखा था कि वह गोलियत को नहीं छोड़ेगा जो परमेश्वर की निन्दा करता है, और उसे विश्वास था कि परमेश्वर उसे जीतने के लिए बुद्धि व सामर्थ्य देगा।


उद्देश्य के बिना परिणाम नहीं

उद्देश्य के साथ जीवन जीना सुन्दर है। यदि उद्देश्य होता है तो उसे पूरा करने के लिए काम करने से अच्छा परिणाम निकलता है। लेकिन यदि जीवन में उद्देश्य नहीं होता तो कुछ नहीं मिलता। इस प्रकार उद्देश्य एक मनुष्य के जीवन को बदलता है।

जीवन के उद्देश्य का निर्माण करके जीने वाले और उद्देश्य के बिना हर दिन जीने वाले के व्यवहार व परिणाम में बड़ा फर्क होता है। तोड़ों के दृष्टान्त में जिसे एक तोड़ा मिला था, उसने मन में यह सोचकर तोड़े को सिर्फ भूमि में छिपा दिया था कि ‘स्वामी आने पर बस इसे वापस दे दूंगा। उसने उससे और कमाना कभी नहीं सोचा, जिससे उसे कोई परिणाम नहीं मिला। उसके पास कोई उद्देश्य नहीं था, इसलिए वह आलसी बनकर आराम करता, खेलता और सोता रहा। आइए हम गौर करें कि विश्वासी जीवन जीते हुए यदि हम परमेश्वर की इच्छा के बारे में ऐसा सोचेंगे कि मुझे इससे कोई काम नहीं है, और यदि बेकार ही समय गंवाएंगे, तब परमेश्वर के आने के दिन हमें दण्ड मिलेगा।

मत 25:24–30 "तब वह भी जिसे एक तोड़ा मिला था आकर कहने लगा, ‘हे स्वामी, मैं जानता था कि तू कठोर मनुष्य है, जहां नहीं बोता वहां काटता है और जहां नहीं बिखेरता वहां से बटोरता है। अत: मैं डर गया और जाकर तेरे तोड़े को मैंने भूमि में छिपा दिया। देख, जो तेरा है उसे ले ले।'' परन्तु उसके स्वामी ने उसे उत्तर दिया, ‘हे दुष्ट और आलसी दास, तू यह जानता था कि जहां मैं नहीं बोता वहां से काटता हूं, और जहां बीज नहीं बिखेरता वहां से बटोरता हूं, तब तो तुझे चाहिए था कि मेरा धन साहूकारों के पास रख देता, जिससे कि मैं आकर अपना धन ब्याज समेत उनसे ले लेता। इसलिए इस से वह तोड़ा भी ले लो, और जिसके पास दस हैं, उसे दे दो। क्योंकि प्रत्येक जिसके पास है उसको और भी दिया जाएगा और उसके पास बहुत हो जाएगा। परन्तु जिसके पास नहीं है, उस से वह भी ले लिया जाएगा जो उसके पास है। इस निकम्मे दास को बाहर के अन्धियारे में डाल दो, जहां रोना और दांत पीसना होगा।'' "

वह दास जिसने भूमि में एक तोड़े को छिपा दिया था, उसने इस पर कभी विचार नहीं किया था कि तोड़े से कैसे लाभ कमाएगा, और उसने एक तोड़े का कोई मतलब नहीं रखा था। स्वामी के उसे तोड़ा देने का मतलब यही था कि वह उससे लेन देन करके और ज्यादा तोड़े कमाए। लेकिन उसने स्वामी की इच्छा का पालन नहीं किया, और जैसा पहले एक तोड़ा था, वैसे अन्त में भी एक ही तोड़ा रखा। आखिर में स्वामी ने उस निकम्मे दास को बाहर के अन्धियारे में डाल देने की आज्ञा दी।

जिसके पास उद्देश्य नहीं है, वह कुछ भी नहीं पा सकता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह समर्थ है या नहीं। लेकिन जिसके पास उद्देश्य है, वह अपनी क्षमता से चाहे वह ज्यादा हो या थोड़ी हो, सफल परिणाम लाता है। आइए हम इस कारण पर गौर करें कि जिसे एक तोड़ा मिला था, उसका परिणाम उनके परिणाम से क्यों अलग रहा जिन्हें पांच व दो तोड़े मिले थे? और सोचें कि अपने विश्वासी जीवन में हम कैसे आत्मिक तोड़े कमा सकेंगे।

वचन का प्रचार करने के समय जो दूसरों को परमेश्वर की सच्ची इच्छा को पूर्ण रूप से समझाने की भरपूर कोशिश करता है, वह ज्यादा फल पा सकता है। उपदेश सुनने के समय भी ऐसा ही होता है। जिसके पास सुनने का उद्देश्य है, वह आराधना में यह सोचते हुए उपदेश सुनने की कोशिश करता है कि ‘मैं इस उपदेश से क्या सीख सकूंगा और क्या महसूस कर सकूंगा?'', ‘उपदेशक क्या सुनाना चाहता है?'' और ‘जो मैंने पढ़ा है, प्रचार के लिए कैसे उसका उपयोग करूंगा?'' इसी वजह से उसे भले ही चर्च में आए थोड़ा समय हुआ हो, फिर भी कम समय में

उसका विश्वास बहुत ही बढ़ जाता है। लेकिन जो ऐसे उद्देश्य के बिना बैठा रहता है, वह उपदेश से जल्दी उब जाकर अनुग्रह नहीं पाता। इसी वजह से उसे भले ही चर्च में आए दस वर्ष हुए हों, फिर भी वह एक तोड़ा धारने वाले व्यक्ति के सामन, हमेशा एक जैसा रहते हुए कभी विकसित नहीं होगा।

यदि जैसा कल तक था, वैसा आज है और जो आज है वह कल भी रहे, तो स्वर्ग जाने से पहले हम कुछ भी नहीं कमा सकेंगे और एक तोड़ा धारने वाले व्यक्ति के समान बनेंगे जिसने अपने तोड़े को भूमि में छिपा दिया था। चाहे हम कितने भी लंबे समय से चर्च के सदस्य बने हों, हमें इस पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। लेकिन हमें केवल यह सोचना चाहिए कि अब तक किस तरह के आत्मिक उद्देश्य को लेकर कितना ज्यादा शुभ परिणाम प्राप्त किया है? और हम उद्देश्य की ओर कितने पास आए हैं?


परमेश्वर उसकी सहायता करता है जो प्रयास करता है

याकूब लाबान के घर में वेतन के बिना काम करता था। शादी के बाद जब उसे पत्नी मिली, उसने लाबान से उसकी सम्पत्ति में अपना हिस्सा मांगा। लाबान ने उससे अपनी भेड़–बकरियों में से चित्तीवाली या चितकबरी भेड़–बकरियों को हिस्से में देने का वादा किया। उसके बाद याकूब के सामने हमेशा एक लक्ष्य रहता था। दागदार व धारीदार भेड़–बकरियां पाने के लिए, याकूब ने पेड़ की कुछ शाखाओं को कहीं कहीं छील कर, उन्हें धारीदार बना दिया, जिससे उन शाखाओं की सफेदी दिखाई दे। और उन शाखाओं को कठौतों में ऐसे खड़ा किया, कि जहां भेड़–बकरी आकर पानी पीते थे वह उनके सामने हो। जब भेड़–बकरियां पानी पीने के लिये आती थीं तब गाभिन होती थीं। तब ऐसा हुआ कि शाखाओं के सामने गाभिन होने वाली भेड़–बकरियां चित्तीवाली या चितकबरे बच्चे को जनती थीं। जीव–विज्ञान के ज्ञान से इसे समझाना तो मुश्किल है। लेकिन बाइबल कहती है कि उस समय के बाद याकूब की सम्पत्ति बहुत जल्दी बढ़ गई।

उद्देश्य के बिना जीवन जीना व्यर्थ है और कठिन है। लेकिन यदि हम उद्देश्य की ओर दौड़ेंगे तो हमारे जीवन में हमेशा खुशी रहेगी। विशिष्ट प्रयास या काम किए बिना परिणाम का इन्तजार करने के बजाय, हमें परमेश्वर की इच्छा में कोई लक्ष्य बनाकर इसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए और वचन का प्रचार करना चाहिए। जब हमारे उद्देश्य एक एक कर सब पूरे होंगे, तब इससे हम खुशी महसूस कर सकेंगे और अनुभव कर सकेंगे कि हमारा विश्वास बढ़ता जा रहा है।

सब को यह अनुभव हुआ होगा कि हम लक्ष्य बनाने के बाद ईमानदारी व दिल से प्रार्थना करते हैं। यदि फल के लिए उद्देश्य बनाएं, तो फल पैदा करने के लिए ईमानदारी से प्रार्थना करने लगेंगे, और एक आत्मा को बचाने के बाद, हम उसके विश्वास के बढ़ने के लिए प्रार्थना करेंगे। इसी तरह से उद्देश्य प्रार्थना के एक स्रोत की तरह होता है। क्योंकि उद्देश्य होने से प्रार्थना लगातार की जाती है। परमेश्वर ने कहा कि निरन्तर प्रार्थना करो। इस वचन के पीछे एक गहन अर्थ है कि बिना रुके लगातार लक्ष्य की ओर आगे बढ़ो।

शुभ परिणाम हमें तब दिया जाता है जब हम उसके लिए भरपूर कोशिश करतें हैं। उद्देश्य स्वत: ही पूरा नहीं होता। जब हम मसीह में उद्देश्य का निर्माण करेंगे, तब परमेश्वर हमें उसे पूरा करने का सामर्थ्य देता है। परमेश्वर उसे और ज्यादा आशीष देता है जो ईमानदारी व पूरी कोशिश के साथ काम करता है। उसने कहा है कि हमें स्वर्ग की ओर से सामर्थ्य दी जाती है, न कि धरती की ओर से।

जंगली सूअर शाहबलूत का फल पसंद करता है। वह पेड़ से गिरे फल को खाने के बाद, जमीन खोदने लगता है। वास्तव में फल पेड़ से गिरता है। लेकिन जंगली सूअर यह सोचकर लगातार जमीन खोदने की कोशिश करता है कि जमीन में फल है, इसलिए जमीन के नीचे से फल मिलेगा। इसी तरह से हम भी उसके समान मूर्ख बनेंगे, यदि हम समस्याओं के हल को इस धरती पर की परिस्थिति व अवस्था से खोजने की कोशिश करें। यदि हम विश्वास करें कि सारी मदद व सामर्थ्य स्वर्ग से आती है, और परमेश्वर से प्रार्थना करें और लक्ष्य की ओर पूरी क्षमता से दौड़ें, तब अवश्य ही परमेश्वर हमें शुभ परिणाम देगा।

सारे संसार से बहुतेरे सदस्य पिता और माता परमेश्वर की आवाज सुनकर सिय्योन की ओर इसलिए आ रहे हैं, क्योंकि बहुत से सदस्यों ने विश्वास किया है कि परमेश्वर उनके साथ है, और दृढ़ संकल्प लिया है कि परमेश्वर के वचन का सही ढंग से पालन करेंगे। परमेश्वर के वादे के अनुसार, सब कुछ पूरा हो रहा है। इसलिए हमें केवल परमेश्वर पर विश्वास करके उसके पीछे चलना चाहिए। आइए हम जो परमेश्वर से बुलाए गए हैं, मेहनत से वचन का प्रचार करें और जोश से भरपूर विश्वास लें, ताकि खोए हुए भाइयों व बहनों को ढूंढ़ सकें और सुसमाचार सामरिया व पृथ्वी के छोर तक प्रसारित किया जा सके। हम केवल स्वर्ग जाकर अधिक ईनाम पाने की आशा ही न करें, लेकिन स्वर्ग की महिमा को अपना लक्ष्य बनाकर उसे पूरा करने के लिए उत्साहपूर्वक काम करें।