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अभिमानी न हो


अब, पूरे संसार से अलग हुए परिवार बादल की तरह सिय्योन में उमड़ आ रहे हैं। तो हमारा मन पहले से और ज्यादा विकसित होना चाहिए। जितना ज्यादा सदस्य सत्य में आते हैं, उतना ही ज्यादा अगुवे सिय्योन में मांगे जाते हैं। हम जो परमेश्वर से पहले बुलाए जाकर सुसमाचार के पवित्र कार्य में सहयोगी हो रहे हैं, जब नम्र मन से परमेश्वर का आदर करेंगे और सदस्यों की सेवा करेंगे, तब सुसमाचार का कार्य बहुत ही जल्दी पूरा होगा।

हमें सिर्फ वचन सुनना ही नहीं, परन्तु परमेश्वर की सारी शिक्षाओं को जीवन में लागू करना चाहिए। परमेश्वर उन नकली मसीहियों से बिल्कुल खुश नहीं होता जो चर्च के अन्दर मसीही बनते हैं, लेकिन चर्च के बाहर परमेश्वर के मार्ग से भटक जाते हैं।


अभिमानी न हो

पश्चिमी देशों में एक कहावत है, "जो सत्य जानना चाहता है, उसे स्वयं को झुकाना पड़ता है।" इसका मतलब है कि जो सत्य जानना चाहता है, उसे हमेशा नम्र व्यवहार रखना चाहिए, क्योंकि सत्य हमेशा नीचे रहता है, न कि ऊंचे या विशेष स्थान में।

घमण्डी मन के कारण, हम स्वर्ग से नीचे निकाल दिए गए थे। इसलिए परमेश्वर घमण्ड करने वाले से सख्त घृणा करता है। बाइबल के पुराने नियम से लेकर नए नियम तक यही शिक्षा हर कहीं लिखी हुई है कि अभिमानी न हो।

रो 11:17–23 "परन्तु यदि कुछ डालियां तोड़ दी गई हों, और तू जंगली जैतून होकर उसमें कलम लगाया गया और उसके साथ जैतून वृक्ष की जड़ के उत्तम रस का भागी हो गया हो, तो डालियों के प्रति अहंकार न कर, परन्तु यदि तू अहंकार करे तो स्मरण रख कि तू जड़ को नहीं परन्तु जड़ तुझे संभालती है...। वे अपने अविश्वास के कारण तोड़ दी गईं और तू केवल अपने विश्वास के कारण स्थिर है। अभिमानी न हो, परन्तु भय मान, क्योंकि यदि परमेश्वर ने स्वाभाविक डालियों को नहीं छोड़ा तो वह तुझे भी नहीं छोड़ेगा...।"

कलम के दृष्टान्त में, यहूदियों की तुलना अच्छे जैतून से, और अन्यजातियों की तुलना जंगली जैतून से की गई है। वास्तव में यहूदी परमेश्वर के चुने हुए लोग थे, और वे पहले से उद्धार का वादा पा चुके थे(यूह 4:22 संदर्भ)। लेकिन उन्होंने मानव की देह धारण करके पृथ्वी पर आए अपने परमेश्वर को अस्वीकार किया और ठुकराया, और उसे क्रूस पर चढ़ाए जाने का दण्ड दिया। इस कारण से परमेश्वर ने यहूदियों से उद्धार का वादा छीन कर अन्यजातियों को दे दिया। थोड़े शब्दों में कहें, तो घमण्डी मन के कारण अच्छे जैतून की मूल डालियां तोड़ दी गई, और उन पर हम जंगली जैतून की डालियों की कलम लगाई गई। इससे हमें मसीह को स्वीकार करने का मौका मिला है, और हम मसीह के अनुग्रह, दया व प्रेम में जड़ का उत्तम रस पा रहे हैं।

ऐसे ही, परमेश्वर जिसने हमें भी उद्धार का अनुग्रह दिया है, हर एक को विभिन्न वरदान देता है। पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा, एक को ज्ञान की बातें अच्छे से सिखाने की सामर्थ्य दी जाती है, और दूसरे को बुद्धि की बातें अच्छे से सुनाने की सामर्थ्य दी जाती है। फिर किसी के मन में एक आत्मा को बचाने के उत्साह व जोश दिया जाता है।(1कुर 12:4–11)

परन्तु परमेश्वर ने हमसे कहा है कि किसी पर भी अहंकार न करो और बिल्कुल अभिमानी न हों। क्योंकि डालियों पर लगे फलों को जड़ ही संभालती है, न कि कलमी डालियां संभालती हैं। इसलिए यदि हम परमेश्वर के अनुग्रह व दया को महसूस न करके अभिमानी होंगे, तब जैसे मूल डालियों, यहूदियों से आशीष वापस ले ली गई थी, उसी तरह हमें दिया गया उद्धार का अनुग्रह ले लिया जाएगा और दूसरों को दिया जाएगा।


अभिमानी होने का परिणाम

अभिमान हमारी आत्मा के लिए जहर के समान है। अभिमान परमेश्वर की दी हुई बुद्धि और विवेक को नष्ट करता है, और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को कम कर देता है। हमें इस तथ्य को हमेशा याद करते हुए, परमेश्वर को जो हमें सामर्थ्य देता है, सारी महिमा चढ़ानी चाहिए।

नीत 16:18–19 "विनाश से पहले घमण्ड होता है, और ठोकर खाने से पहले गर्व होता है। दीन लोगों के साथ नम्र होना घमण्डियों के साथ लूट बांट लेने से उत्तम है।"

परमेश्वर घमण्डी लोगों को कभी माफ नहीं करता। परमेश्वर मनुष्य के बाहरी रूप को नहीं देखता, परन्तु उसके हृदय को देखता है।

हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि हमारे पास सभी अनुग्रह व आशीष परमेश्वर से आए हैं। लेकिन हम कभी–कभी सोचते हैं कि ‘मेरे कारण काम अच्छा हो गया है'', ‘मैंने बढ़िया काम किया है''। ऐसा विचार ही आत्मिक सामर्थ्य को कम कर देता है। इसी कारण से, यदि हम सुसमाचार के कर्तव्य व दायित्व को, जो परमेश्वर ने हमें सौंपा है, ईमानदारी से न निभाएं, तो परमेश्वर के राज्य में जाने के बाद, यह सचमुच कितने अफसोस की बात होगी!

मनुष्य बहुत ही कमजोर होता है। इसलिए अभिमान व अहंकार भरे मन से बहुत जल्दी पाप के कीचड़ में फंसता जाता है। मूसा भी, जो उन दिनों के किसी अन्य व्यक्ति से और अधिक नम्र था, घमण्ड की बातें बोलने के कारण, परमेश्वर ने उसे बड़ी उलाहना और डांट लगाई थी। जब इस्राएली सीन नाम जंगल में पहुंचे, उन्हें पानी की प्यास लगी। तब वे अगुवे मूसा व हारून पर कुड़कुड़ाने लगे। इस पर परमेश्वर ने मूसा से कहा कि अपनी लाठी से चट्टान पर मारोगे, तो पानी निकलेगा। मूसा ने परमेश्वर की शिक्षा के अनुसार लाठी से चट्टान पर मारा, और उससे मीठे जल का सोता ऐसा फूट निकला कि सभी इस्राएली व पशु पी सके। मूसा के जीवन में परमेश्वर की महिमा करना एक आदत सी बनी गई थी, लेकिन उस समय उसने एक बड़ी गलती कर दी। इस्राएलियों को अगुवों पर कुड़कुड़ाते और तिरस्कार करते सुनते ही, मूसा ने मुंह से ऐसी बात कह दी, "क्या हम को इस चट्टान में से तुम्हारे लिये जल निकालना होगा?"।(गिन 20:1–13)

मनुष्य के दृष्टिकोण व नजरिए से ऐसी गलती करना बहुत ही आसान है। जब कभी सुसमचार का कार्य अद्भुत तरीके से पूरा होता है, तब हमें महसूस करना चाहिए कि उसमें मनुष्य की सामर्थ्य नहीं, पर परमेश्वर की अदृश्य सामर्थ्य कार्यशील है।


वह वचन जो परमेश्वर की ओर से है, न कि मनुष्य की ओर से

यहेज 3:17 "हे मनुष्य के सन्तान, मैंने तुझे इस्राएल के घराने का पहरेदार नियुक्त किया है। जब भी तू मेरे मुख का वचन सुने तो उन्हें मेरी ओर से चेतावनी देना।"

परमेश्वर ने नबी यहेजकेल को आज्ञा दी, "जब भी तू मेरे मुख का वचन सुने तो उन्हें मेरी ओर से चेतावनी देना।" ऐसे ही, नबियों ने अपनी ओर से बातें नहीं कीं, परन्तु वे परमेश्वर की ओर से वचन सुनाते थे। तो हम जो सुसमाचार के नबी हैं, परमेश्वर के वचन सुनाते समय यह कैसे कह सकते हैं कि ‘मैंने सुनाया''?

शाऊल भी ऐसा ही था। परमेश्वर ने शाऊल को इस्राएल के पहले राजा के रूप में इसलिए चुना था, क्योंकि वह पहले बहुत नम्र था। लेकिन राजा बनने के बाद, शाऊल के मन में धीरे–धीरे घमण्ड अपना स्थान लेता गया, और उससे उसने परमेश्वर के वचन का पालन नहीं किया। अत: परमेश्वर ने उस महिमा को जो शाऊल को दी थी, वापस ले ली।

परमेश्वर के सामने कोई भी व्यक्ति गर्व व अहंकार नहीं कर सकता। लोग जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, वे तो नम्र नहीं, पर अहंकारी व्यवहार करते हैं। लेकिन हमें जो सत्य में परमेश्वर के साथ रहते हैं, नम्र व दयालु होते हुए, स्वयं को दीन करने के द्वारा अहंकार से बचाकर रखना चाहिए। नम्रता एक सद्गुण है जिसे हमें हर शारीरिक कर्म और आत्मिक कर्म के लिए अपनाना चाहिए।

यीशु ने भी इस धरती पर आकर नम्रता के बारे में समझाया।

मत 16:15–17 "उसने उनसे कहा, "पर तुम क्या कहते हो? मैं कौन हूं?" शमौन पतरस ने उत्तर दिया, "तू जीवित परमेश्वर का पुत्र मसीह है।" यीशु ने उस से कहा, "हे शमौन, योना के पुत्र, तू धन्य है, क्योंकि मांस और लहू ने इसे तुझ पर प्रकट नहीं किया, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है।"

जब पतरस ने मसीह को पहचाना, तब यीशु ने पतरस से कहा कि उसने आप ही इस बात को नहीं जाना है, परन्तु स्वर्गीय पिता ने यह बात उस पर प्रकट की है। इसे सुनकर शायद पतरस को उस समय ऐसा सन्देह हुआ होगा, "मैंने ही देखकर और सुनकर यह पहचान लिया है कि यीशु मसीह है, फिर भी वह क्योंकर कहता है कि परमेश्वर ने मुझे यह बात प्रकट की है? ऐसे ही शायद वह इस भ्रम में पड़ सका होता कि उसने आप ही सत्य को महसूस किया है, और उससे वह घमण्डी भी हो सका होता। पतरस को ऐसी गलती करने से बचाने के लिए, यीशु ने पहले से कह दिया कि जिसने उस पर यह बात प्रकट की है, वह परमेश्वर है।

हम जब सत्य को महसूस करते हैं, तो हमारे साथ भी ऐसा ही हो सकता है। हम शुरू में न तो बाइबल के बारे में कुछ जानते थे और न ही कोई सत्य। लेकिन जब हम वचन पढ़ते हुए कुछ समझ जाते हैं, तो हमारा मन गर्व से फूल उठने लगता है। जैसे हवा से फूला हुआ गुब्बारा ऊपर उड़ता है, वैसे ही जब घमण्ड से भर जाएं, तब हम यह सोचकर बहुत ऊंचे होना चाहते हैं कि ‘मैंने ही इसे महसूस किया है''। उस समय हम उस परमेश्वर को जिसने हमें बुद्धि और समझ दी, भूल जाते हैं।

हमें महसूस करना चाहिए कि सब कुछ परमेश्वर से दिया हुआ उपहार और आशीष है। हम जंगली जैतून हैं। इसलिए वह फल जो हम पैदा करते हैं, कमजोर व बेकार हैं। लेकिन यदि हम मसीह में कलम किए जाएंगे, तो मूल्यवान व ठोस फल पैदा कर सकेंगे। इसलिए यीशु ने पतरस से कहा, "मांस और लहू ने इसे तुझ पर प्रकट नहीं किया, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है।"

नाश होने से पहले मनुष्य के मन में घमण्ड, और आशीष पाने से पहले नम्रता होती है

विनीत भाव से और नम्र मन से हमें परमेश्वर के सुसमाचार के कार्य को ईमानदारी से निभाना चाहिए। जब हम परमेश्वर के वचन पर और अधिक ध्यान दें और नई वाचा के सत्य में विश्वासी बने रहें, तब हम स्वर्ग के निवासियों की तरह निर्मल बन जाएंगे।

परमेश्वर हर समय नम्र लोगों को आशीष देता है, और घमण्डी लोगों से आशीष वापस ले लेता है। घमण्डी मन रखने वाले को परमेश्वर बिल्कुल भी पसंद नहीं करता है, चाहे उसके पास ज्यादा योग्यताएं हों। परमेश्वर ने राजा नबूकदनेस्सर के महिमामय सिंहासन को इसलिए छीन लिया, क्योंकि वह घमण्डी हो गया था।

दान 4:29–31, 34–37 " ... तब उसने कहा, ‘क्या यह महान् बेबीलोन नहीं जिसे स्वयं मैंने अपने बाहुबल से अपने प्रताप की महिमा और अपने राजसी निवास के लिए बनाया है?'' राजा यह बात बोल ही रहा था तभी स्वर्ग से यह आवाज़ आई कि ‘हे राजा नबूकदनेस्सर, तुझे सूचित किया जाता है कि राज्य तुझसे छीन लिया गया है। ... उन दिनों के बाद मुझ नबूकदनेस्सर ने स्वर्ग की ओर दृष्टि की और मेरी बुद्धि फिर ज्यों की त्यों हो गई। तब मैंने परमप्रधान को धन्य कहा ... अब मैं नबूकदनेस्सर, स्वर्ग के राजा की प्रशंसा, स्तुति और महिमा करता हूं, क्योंकि उसके सब कार्य सच्चे और उसके मार्ग न्यायोचित हैं और वह अभिमानियों को दीन करने में समर्थ है।"

मनुष्य से पद, अधिकार और सब कुछ छीन लिया जाएगा जब वह घमण्डी हो जाएगा। जैसे ही नबूकदनेस्सर ने यह कहा, "मैंने ही किया!", परमेश्वर ने उससे कहा, "‘तुझे सूचित किया जाता है कि राज्य तुझसे छीन लिया गया है।" ऐसे ही जब नबूकदनेस्सर घमण्ड से भर गया, तब परमेश्वर ने तुरन्त उससे उसकी महिमा व अधिकार ले लिए।

बुद्धि, समझ, महिमा और सब चले जाने के बाद, वह 7 वर्ष तक मैदान की हरी घास के बीच रात की ओस से भींगा करते हुए मैदान के पशुओं की तरह रहता था। लेकिन अन्त में उसे महसूस हो गया कि सब परमेश्वर का दिया हुआ है, और वह सिर्फ ऐसा दुर्बल मनुष्य ही है जो पल भर में बुद्धि व समझ को खोकर पशु के समान बन सकता है। और उसे इस बात पर बहुत अफसोस हुआ कि वह पहले इतना मूर्ख था कि दुर्बल मनुष्य होकर सोचता था कि मैंने स्वयं सब किया है। ऐसे ही उसने पश्चाताप करते हुए नम्र मन से परमेश्वर की स्तुति व प्रशंसा की, तब परमेश्वर ने उसे बुद्धि व समझ को वापस लौटा दिया।

यह बाइबल की बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा है कि जो लोग घमण्ड से चलते हैं, उन्हें परमेश्वर नीचा करता है। इस्राएलियों के जंगल पर रहने के समय से लेकर आज तक, परमेश्वर अपनी प्रजाओं को नीचा करता आया है और उन्हें ‘जगत के कूड़े व मैल की तरह''(1कुर 4:13) बनाता है। तो हमें सावधान रहना चाहिए, और अपने घमण्ड से पश्चाताप करते हुए पिछले दिनों की खोई हुई महिमा, बुद्धि व समझ को पुन:प्राप्त करना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि नबूकदनेस्सर के जैसे, अभिमान से भरे मन के कारण बुद्धि व समझ हम से छीन ली जाए।


सुसमाचार का कार्य जो नम्र मन से पूरा होता है

हमें ऊंचे पद पर आसीन होने का प्रयास नहीं करना चाहिए, परन्तु नीचे होते हुए सदस्यों की कठिनाई को बांटना चाहिए और उनके साथ होते हुए उनके विश्वास को मजबूत करना चाहिए। ऐसा करते हुए हम अगुवों के रूप में विश्वास का आदर्श प्रस्तुत कर सकेंगे। विश्वास के आत्मिक जंगल में परमेश्वर ने हमें इसलिए चलने दिया है, ताकि हम स्वयं को नीचा करके नम्र मन रख सकें।

व्य 8:2 "फिर तू उस सम्पूर्ण मार्ग को स्मरण रखना जिस पर इन चालीस वर्षाें तक तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे इस जंगल में से इसलिए ले आया है कि वह तुझ को नम्र करे तथा जांचकर यह जान ले कि तेरे मन में क्या है और कि तू उसकी आज्ञाओं का पालन करेगा या नहीं।"

परमेश्वर हमें जगत में सबसे बड़ा भी और महान भी कर सकता है। लेकिन जैसे परमेश्वर जंगल में इस्राएलियों को नम्र करता था, वैसे ही परमेश्वर हमें सबसे नीचा करके जंगल के मार्ग की ओर ले जाता है। वह हमें कभी भूखा रहने देता है, कभी महान तो कभी नीचा करता है।

हम अवश्य ही यह संकल्प बनाए रखेंगे कि किसी भी स्थिति में, किसी भी कठिनाई में हम नम्र भाव से परमेश्वर के सुसमाचार के कार्य को पूूरा करेंगे। इसके लिए हमें हमेशा परमेश्वर के सामने विनीत भाव से स्वयं को नीचा करना चाहिए और सदस्यों के सामने नम्र व्यवहार करना चाहिए। जब हम सुसमाचार के कार्य के लिए मेहनत करने वाले सहकर्मी के रूप में, हर एक सदस्य को आदर देंगे, उनकी देखभाल करेंगे और उन्हें ध्यान, उत्साह, प्रोत्साहन व प्रेम का मन देंगे, तब मुझे विश्वास है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेम व आशीष से भरपूर विश्वासी जीवन जी सकेंगे।

आइए हम यह शिक्षा मन में रखें कि हम अभिमानी न हों, और यह ध्यान में रखें कि हम घमण्डी मन से स्वर्ग में कभी नहीं जा सकते और नम्र और विनीत मन में स्वर्ग जाने की बुद्धि व परमेश्वर का प्रेम समाता है। मैं सिय्योन के सदस्यों से आशा करता हूं कि अपनी स्थिति में व पद पर रहते हुए, परमेश्वर के सुसमाचार के कार्य के लिए कड़ी मेहनत करें।