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घृणा को त्याग कर प्रेम में बदलते जाएं


एक बार मैंने परिवार की परिभाषा के बारे में एक वाक्य पढ़ा– “परिवार पिता का राज्य है, माता की दुनिया है और बच्चों का स्वर्ग है।” परिवार पिता का राज्य, माता की दुनिया और बच्चों का स्वर्ग इसलिए हो सकता है, क्योंकि परिवार के सदस्य एक–दूसरे के लिए गहरे प्रेम और समर्पण भाव रखते हैं।

हम स्वर्गीय परिवार के सदस्यों को भी इस तरह एक साथ मिल–जुलकर रहना चाहिए। परमेश्वर परिवार की उस भट्ठी में हमें निर्मल करता है, जहां झगड़ा, घृणा, ईष्र्या आदि सांसारिक स्वभाव पिघल जाते हैं, ताकि हमारा स्वभाव स्फटिक जैसा निर्मल बनकर प्रेमी–स्वभाव बन सके। परमेश्वर ने हमारे लिए आत्मिक परिवार और शारीरिक परिवार का संबंध इसलिए बनाया है, जिससे हम परिवार के जरिए प्रेम से परिपूर्ण आत्मिक स्वभाव में नया बनते जाएं।

प्रेम का विपरित अर्थ ‘घृणा’ है। ऐसे लोगों के रूप में बदलने के लिए, जो परमेश्वर के राज्य के योग्य हैं, हमारे लिए जो अनावश्यक तत्व है, वह ‘घृणा’ है। जब हम घृणा को त्याग देंगे जो हृदय में कहीं रहती है, और हृदय को प्रेम से भर देंगे, तब हम स्वर्गीय लोगों के रूप में पूर्ण रूप से बदल सकेंगे।


घृणा को हटाने का ढंग – धन्यवाद

एक व्यक्ति सुबह को पत्नी से झगड़ा होने के बाद घर से बाहर निकला। उसका गुस्सा ठंडा नहीं हो रहा था। मुख्य सड़क की ओर चलते–चलते अचानक उसने ताजा हवा, बादलों के बीच में चमकती हुई सूर्य की किरणों और हरे पत्तों को देखा, तब उसे ऐसा एहसास हुआ जैसे वह स्वर्गलोक में हो।

उस समय उसे अपने पापों की याद आई, और उसने सोचा, ‘मेरे गम्भीर पाप से परमेश्वर मुझे मृत्युदण्ड भी दे सकता है, लेकिन वह अभी आकाश की खिड़की खोल कर मुझे भरपूर अनुग्रह और खुशी दे रहा है! मैंने छोटी बात के कारण घृणा की और गुस्सा किया, परन्तु परमेश्वर ने, जिसे 1000 हज़ार गुना ज्यादा गुस्सा मुझ पर करना चाहिए, गुस्सा नहीं किया है।’ जब उसने यह महसूस किया, तुरन्त जाकर पत्नी से मांफी मांगी।

इसमें यह अच्छी तरह से दिखाया गया है कि हम किस तरह का मन लेने से मन के अन्दर घृणा को हटा सकेंगे। जब उसने परमेश्वर का धन्यवाद किया, तभी घृणा की भावना पूरी तरह से दूर हो गई। इस तरह यदि हम परमेश्वर को सोचते हुए धन्यवाद देंगे, तब नफरत की भावना पर, जो हम संसार में रहते हुए अपनाते हैं, काबू पा सकेंगे और उसे दूर कर सकेंगे।

हमने पिछले समय परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया था। हमारा पाप और गलती उन सभी बातों की तुलना में, जो हमें नफरत, गुस्सा और क्रोध दिलाती हैं, कई हज़ार, कई लाख गुना ज्यादा परमेश्वर को गुस्सा दिलाने वाली बात थी। आत्मिक परिवार में सभी भाइयो और बहनो! आइए हम यह गौर से सोचने का समय लें कि हमने परमेश्वर के इस वचन का कितने अच्छे से पालन किया है कि ‘एक दूसरे से प्रेम करो’


भाई–बहनों के आपस में पैदा हुई घृणा

उत्पत्ति ग्रंथ में, मनुष्य के इतिहास में पहली बार पैदा हुई घृणा और उसके कारण किए गए पाप की शुरुआत के बारे में लिखा गया है।

उत 4:1–8 “... कैन अपनी भूमि की उपज में से यहोवा के लिए भेंट लाया। और हाबिल ने भी अपनी भेड़–बकरियों के पहलौठों में से कुछ को चर्बी सहित, भेंट चढ़ाया। तब यहोवा ने हाबिल और उसकी भेंट को तो ग्रहण किया, परन्तु कैन और उसकी भेंट को उसने ग्रहण नहीं किया। तब कैन अति क्रोधित हुआ और उसका मुंह उतर गया। और यहोवा ने कैन से कहा, “तू क्यों क्रोधित है? और तेरा मुंह क्यों उतरा हुआ है? यदि तू भला करे तो क्या तू ग्रहण न किया जाएगा? पर यदि तू भला न करे तो पाप द्वार पर दुबका बैठा है और वह तेरी लालसा करता है, परन्तु तुझे उस पर प्रभुता करना है।” तब कैन ने अपने भाई हाबिल से बात की, और जब वे मैदान में थे तो ऐसा हुआ कि कैन ने लपक कर अपने भाई हाबिल को मार डाला।”

कैन ने छोटे भाई के प्रति घृणा का भाव रखा। इससे वह छोटे भाई, हाबिल की हत्या करके, मनुष्य जाति के इतिहास में पहला हत्यारा बना। इस तरह घृणा भयानक और अधम पाप का कारक बनती है। इसलिए परमेश्वर ने शिक्षा दी है कि हम एक दूसरे के पाप क्षमा करें, एक दूसरे पर कृपालु हों, और यह आज्ञा दी है कि एक दूसरे से प्रेम करो। हमें कैन के जैसा नहीं बनना है जिसने भाई से नफरत की, परन्तु जैसे परमेश्वर ने हमसे प्रेम किया है, वैसे ही हमें भाई–बहनों से प्रेम करना चाहिए।

उत 27:41–45 “इसलिए एसाव ने याकूब से, उस आशीर्वाद के कारण जो उसके पिता ने उसे दिया था, बैर रखा। एसाव ने अपने मन में कहा, “मेरे पिता की मृत्यु के दिन निकट हैं, उसके बाद मैं अपने भाई याकूब का घात करूंगा।” जब रिबका को उसके ज्येष्ठ पुत्र एसाव की ये बातें बताई गईं, तो उसने अपने छोटे पुत्र याकूब को बुलवाकर कहा, “तेरा भाई एसाव तुझे मारकर ही दम लेने का विचार कर अपने आपको सान्त्वना दे रहा है। “अत: हे मेरे पुत्र, अब जो मैं कहती हूं, उसे कर: तुरन्त मेरे भाई लाबान के पास हारान को भाग जा। “जब तक तेरे भाई का प्रकोप शान्त न हो जाए, तब तक कुछ समय के लिए तू वहीं रहना, अर्थात् जब तक तेरे विरुद्ध तेरे भाई का क्रोध शान्त न हो जाए और जो कुछ तू ने उसके साथ किया है उसे वह भूल न जाए। और तब मैं तुझे वहां से बुलवा लूंगी। मैं एक ही दिन में क्यों तुम दोनों से हाथ धो बैठूं?”

याकूब और एसाब, दो भाइयों के बीच भी घृणा पैदा हुई थी। जब एक भाई ने आशीष पाई थी, दूसरे भाई ने अपनी आशीष को खो दिया था। ऐसे में जिसने आशीष को खोया था, उसके मन में ईष्र्या और जलन उसके प्रति होने लगा जिसने उसके बदले आशीष पाई थी। वही ईष्र्या इतनी बढ़ गई कि उसने अपने भाई की हत्या करने की इच्छा रखी।

उत 37:4–5 “जब उसके भाइयों ने देखा कि हमारा पिता हम सब भाइयों से अधिक उसी से प्रेम करता है तो वे उस से बैर रखने लगे और उस के साथ ठीक से बात भी नहीं करते थे। फिर यूसुफ ने एक स्वप्न देखा और जब उसने अपने भाइयों से इसका वर्णन किया तो वे उस से और भी अधिक बैर रखने लगे। ”

यूसुफ और भाइयों के बीच भी घृणा पैदा हुई थी। जब भाइयों को लगा कि किसी को पिता से ज्यादा प्रेम मिलता है तो किसी को कम, तब उनके मन में ईष्र्या और भेदभाव की भावना नफरत में बदल गई। ऐसे ही प्रेम न कर पाने के कारण आपस में घृणा पैदा की जाती है, और इससे सदा बुरा परिणाम निकलता है।

परमेश्वर हम सब पर एक समान दया करता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर किसी को सूर्य की ज्योति ज्यादा देता है तो किसी को कम। परमेश्वर अपने सूर्य को सब पर बराबर चमकाता है, चाहे वह धर्मी हो या अधर्मी। यही स्वर्गीय पिता का मन है। और माता की नौवीं शिक्षा में भी है कि सभी लोगों की गलतियों को समुद्र जैसे बड़े खुले मन से ढंक लें। समुद्र जैसा बड़ा मन ही माता का मन है। आइए हम अपने मन परमेश्वर के मन के समान बनाएं, और अपने भाई–बहनों की सांसारिक गन्दगियों को ऐसे साफ करें जैसे समुद्र गन्दगियों को साफ करता है।


कैन के जैसा न करो

क्यों बाइबल में उस व्यक्ति की कहानी लिखी है जो अपने भाई की घृणा करने के कारण उसे मारना चाहता था? मुझे विश्वास है कि परमेश्वर की इच्छा यह है कि यह उनके लिए, जो स्वर्ग जाने के लिए सम्पूर्ण बनाए जा रहे हैं, चेतावनी और शिक्षा बने। परमेश्वर ने हमें शिक्षा दी है कि हम अपने भाई से घृणा न करें, परन्तु एक दूसरे से प्रेम करें।

लैव 19:17 “तू अपने मन में अपने जाति–भाई से बैर न रखना। अपने पड़ोसी को अवश्य डांटना, नहीं तो तू भी उसके अधर्म का दोषी ठहरेगा।”

हमें इस समय से अपने अन्दर घर कर बैठी घृणा की भावना को हटाना चाहिए। यदि आपके मन में किसी भाई से घृणा करने का मन घर कर जाए, तो तुरन्त उसकी जगह माफ़ करने के मन से भरना चाहिए, और उस भाई की मदद करनी चाहिए कि वह भाई पिता और माता को देने के योग्य फल पैदा कर सके। पमेश्वर की सब से बड़ी इच्छा यह है कि हम नई वाचा में ऐसा ही करें।

1यूह 3:11–16 “क्योंकि जो समाचार तुमने आरम्भ से सुना, वह यह है कि हम एक दूसरे से प्रेम करें– कैन के समान नहीं, जो उस दुष्ट से था, और जिसने अपने भाई की हत्या की। उसने किस कारण से उसकी हत्या की? उसके कर्म तो दुष्ट और उसके भाई के कर्म धार्मिकता के थे। भाइयो, यदि संसार तुमसे घृणा करता है तो आश्चर्य न करना। हम जानते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में आ पहुंचे हैं, क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं। वह जो प्रेम नहीं रखता मृत्यु में बना रहता है। प्रत्येक जो अपने भाई से घृणा करता है, वह हत्यारा है, और तुम जानते हो कि किसी हत्यारे में अनन्त जीवन वास नहीं करता। हम प्रेम को इसी से जानते हैं, कि उसने हमारे लिए अपना प्राण दे दिया। अत: हमें भी भाइयों के लिए अपना प्राण देना चाहिए।”

परमेश्वर ने कहा है कि हम कैन के समान न करें। इसका मतलब है कि हम भाइयों से घृणा न करें। किसी भाई या बहन की बात या रवैया आपकी आंख का कांटा बनने पर और आपको सन्तुष्ट न करने पर, यदि आप गुस्से में आकर उससे नफरत करें और बैर भाव रखें, तो आत्मिक रूप से आपसे कैन का पाप दुहराया जाएगा। बाइबल चेतावनी देती है कि यदि हम अपने भाई से प्रेम न करें, तो हम मृत्यु की दशा में रहेंगे।

संसार में रहते समय, आपस में छोटी–बड़ी गलतफहमी या झगड़े होते रहते हैं, चाहे यह हमारी इच्छा के विपरित हो, और कभी–कभी कुछ बात ऐसी हैं जो एक व्यक्ति के हिसाब से गुस्सा दिलाने वाली है, तो दूसरे के हिसाब से नहीं। लेकिन यदि हम सब का धन्यवाद करें जो परमेश्वर ने दिया है, किसी भी स्थिति में खुश रहें और उनको स्वीकार करें, तो हमारे मन के अन्दर घृणा न रहेगी।

एक बार शैतान घृणा का बीज बोने के लिए धरती में घूम–फिर रहा था। तब उसने पाया कि धरती में घृणा का बीज बोने के लिए उचित जमीनें बहुत ही ज्यादा हैं। अधिकांश लोगों के मन उचित तापमान और अच्छा वातावरण बनाए रखते थे, जो बीज उगने के लिए बहुत ही अच्छा था। लेकिन किसी लोगों का मन बिल्कुल ऐसा नहीं था जिसमें घृणा का बीज उग सके। इसलिए शैतान उन लोगों के मन में घृणा का बीज नहीं बो सका। वे वही थे जो हमेशा धन्यवाद करते थे।

ऐसे ही धन्यवादी मन ऐसी जमीन है जिसमें घृणा चली जाती है और प्रेम बढ़ता जाता है। इसलिए धन्यवाद की जमीन में घृणा का बीज कभी नहीं उग सकता। प्रेम का फल भी धन्यवाद की जमीन में फल सकता है।

घृणा की भावना से, यदि आप को भाई–बहनों की गलती पर क्रोध आता हो, और वह गलती आपको बहुत ही बड़ी दिखाई देती हो, और आप सिय्योन पर बिगड़ी हुई नजर रखने लगे हों, तो इन सब को प्रेम से नष्ट करना चाहिए। यदि हम पिता और माता का धन्यवाद करने का मन लेंगे, तब मन के अन्दर चिढ़, परेशानी और तकलीफ का जन्म नहीं हो सकता। आइए हम धन्यवादी मन की जमीन में केवल प्रेम का बीज बोएं, तब हमारा सिय्योन ऐसा बन जाएगा जहां हर्ष, आनन्द, धन्यवाद और भजन गाने का शब्द सुनाई देगा।(यश 51:3 संदर्भ)


धन्यवादी मन जो प्रेम का फूल खिलाता है

1यूह 4:7–11 “प्रियो, हम आपस में प्रेम करें, क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है। प्रत्येक जो प्रेम करता है, परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है और परमेश्वर को जानता है। वह जो प्रेम नहीं करता परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। परमेश्वर का प्रेम हम में इसी से प्रकट हुआ कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेज दिया कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं। प्रेम इस में नहीं कि हमने परमेश्वर से प्रेम किया, परन्तु इसमें है कि उसने हमसे प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिए अपने पुत्र को भेजा। प्रियो, यदि परमेश्वर ने हम से ऐसा प्रेम किया तो हमको भी एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए।”

परमेश्वर के वचन के जैसे, हमें एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए। भाई–बहनों का कोई आचरण, बोलने का तरीका, रवैया आदि, जो आपके विचार के हिसाब से ठीक नहीं हैं, वे कभी–कभी आपके दिल को दुखाते हैं। लेकिन हम सोचें कि हमने परमेश्वर के साथ क्या किया था। हमने परमेश्वर के सामने बहुत ही बुरा आचरण किया था और बहुत ही बुरी बात कही थी। फिर भी परमेश्वर अपनी स्नेह भरी बाहों में हमें लगाता है, और हम पर सूर्य की ज्योति चमकाता है, और हमें हरियाली का एहसास देता है, और हमें ताजा हवा देता है।

जब हम धन्यवादी मन से अपने आसपास देखें, तब हर दिन अद्भुत अनुभव कर सकेंगे, और हर दिन मुंह से प्रशंसा कर सकेंगे। लेकिन जहां धन्यवादी मन रुका रहता है, वहीं उसकी जगह घृणा ही दुबक कर बैठती है। आइए हम परम्ोश्वर का यह वचन मन में रखें कि एक दूसरे से प्रेम करो, और सब से हमेशा धन्यवाद और भलाई की चेष्टा करें।

1थिस 5:12–22 “परन्तु भाइयो, हम तुमसे निवेदन करते हैं ... प्रेमपूर्वक उनका अत्यन्त सम्मान करो। एक दूसरे के साथ मेल–मिलाप से रहो। हे भाइयो, हम तुमसे आग्रह करते हैं कि आलसियों को चेतावनी दो, कायरों को प्रोत्साहन दो, निर्बलों की सहायता करो, सब के साथ सहनशीलता दिखाओ। ध्यान रखो कि कोई बुराई के बदले किसी से बुराई न करे, परन्तु सर्वदा एक दूसरे की तथा सब लोगों की भलाई करने में प्रयत्नशील रहे। सर्वदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना करो, प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद दो, क्योंकि मसीह यीशु में तुम्हारे लिए परमेश्वर की यही इच्छा है। आत्मा को न बुझाओ, भविष्यद्वाणियों को तुच्छ न जानो। सब बातों को सावधानी से परखो, जो अच्छी है उसे दृढ़तापूर्वक थामे रहो। सब प्रकार की बुराई से बचे रहो।”

परमेश्वर ने शिक्षा दी है कि हम आपस में मेल–मिलाप से रहें और किसी भी स्थिति में सब से भलाई करने में प्रयत्नशील रहें। यही पिता और माता की आज्ञा और शिक्षा है कि चाहे हम किसी के विचार से सहमत न हों, फिर भी उससे नफरत या बुराई न करें, परन्तु उससे भलाई करते रहें। और उन्होंने यह शिक्षा भी दी है कि सदा आनन्दित रहें और हर बात में धन्यवाद करें। यदि हम हमेशा पिता और माता के प्रति धन्यवादी मन प्रकट करें, तब हमारे अन्दर न कोई बुरा मन रहेगा, न ही शिकायत, न घृणा।

आइए हम अपने आप से सवाल पूछें, ‘पिछले दिनों क्या मैं भाई–बहनों को गुस्सा दिलाता था?, क्या मैं किसी से घृणा करता हूं?, क्या मैं शिकायत करता हूं?, क्या मैंने धन्यवादी मन खो दिया है?’। और आइए हम पिता और माता को याद करें। जब हम परमेश्वर को सोचते हैं, तब सब को हल किया जाता है, लेकिन जब हम परमेश्वर को नहीं सोचते और परमेश्वर से दूर होते हैं, तब शैतान हम पर हमला करने लगता है। हव्वा इसलिए भरमाई गई, क्योंकि आदम थोड़ी देर उसके साथ नहीं था। उसी तरह से, जब हम परमेश्वर के पास नहीं होते, तब शैतान मौका पाकर हमारे पास आता है।

आशा है कि आप हर बात में धन्यवाद करने की इच्छा न खोएं, ताकि घृणा की भावना पूरी तरह से मिट जा सके, और स्वर्गीय परिवार का घर, सिय्योन ऐसा स्थान हो सके जो पिता का राज्य है, माता की दुनिया है और बच्चों का स्वर्ग है। आइए हम सिय्योन को ऐसा स्थान बनाएं जिसमें पिता और माता का प्रेम भरपूर रहता है, कोई नफरत–घृणा नहीं रहती, धन्यवाद बहुतायत से किया जाता है और भाई–बहनों के लिए प्रार्थना एवं दया बनी रहती है, ताकि जैसे ही हमारे भाई और बहनें सिय्योन में आएं, उनका दुख, दर्द और शोक दूर चला जाए जो संसारी तूफान के साथ उन्होंने उठाया है। मैं सिय्योन के सदस्यों से आशा करता हूं कि आप हमेशा पिता और माता का बलिदान मन में सोचें, और घृणा नहीं, पर प्रेम, धन्यवाद और प्रार्थना करते रहें।