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सन्तुष्ट रहना सीख लो

हाल ही में, सुसमाचार विदेश में बहुत ही जल्दी प्रसारित किया जा रहा है। क्योंकि सिय्योन परिवार के सदस्य प्रत्येक परिस्थिति में संतोषी रहते हैं और हमेशा परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं, इसी कारण परमेश्वर उन्हें पवित्र आत्मा की शक्ति बढ़ाने पर बल दे रहा है।

आर्थिक और सांस्कृतिक हर दृष्टि से सुसमाचार का प्रचार करना बिल्कुल आसान नहीं है, फिर भी सिय्योन के सदस्य खुश मन से और स्वेच्छा से सुसमाचार की सेवा कर रहे हैं। हरेक सदस्य कहता है कि जितनी मुश्किल और कठिन स्थिति होती है, उतना ही ज्यादा उसे महसूस होता है कि पिता और माता उसके साथ है। वे दुख और पीड़ा में भी कुड़कुड़ाए बिना निरन्तर खुशी रहते हैं और धन्यवाद देते हैं, तो क्या विदेश में सुसमाचार न फैलाया जाएगा? जब मैं स्वर्गीय परिवार में भाई व बहनों को हर स्थिति में सन्तुष्ट रहते देखता हूं, तब मुझे सच में उन पर गर्व महसूस होता है।


प्रचारकों का प्रत्येक परिस्थिति में सन्तुष्ट रहने का स्वभाव

एक युवा पती–पत्नी प्रचारक थे। वे एक विदेश में, जिसकी परिस्थिति कोरिया से अधिक खराब है, प्रचार करने के लिए चले गए थे। वे कठिन स्थिति में भी, हमेशा हंसते–मुस्कराते हुए सदस्यों और पड़ोसियों से प्रेम व्यवहार करते हैं और दूसरे से पहले सेवा करते हुए लोगों का आदर्श बनते हैं, जिसके द्वारा वे बहुत फल पैदा कर रहे हैं। जैसे सच्चे दिल से किए गए कर्म, कहीं भी हो, अवश्य ही फल लाते हैं, उस देश के मूल निवासी सदस्य भी उनकी प्रशंसा करते हैं।

एक बार, मैंने उसे ईमेल भेजा था। ईमेल पर उनसे कठिनाई पूछने पर, उन्होंने ऐसा जवाब दिया कि वे परमेश्वर को, जिसने उन्हें वहां भेजा, बहुत धन्यवाद देते हैं, और गरीब देश में प्रचार करते हुए उन्हें पिता और माता के दुख का अधिक अहसास हुआ है, शुरू में जब पिता ने इस धरती पर आकर सुसमाचार प्रचार किया, उसने कितना ज्यादा दुख उठाया होगा, और जब माता सुसमाचार का प्रचार करने लगी, एक–एक सन्तान को बचाने के लिए वह कितनी उत्सुक रही होगी। उन्होंने कठिन स्थिति में सन्तुष्ट रहना सीख कर, पिता और माता को निरन्तर धन्यवाद दिया, इससे मैं बहुत भावुक हो गया।

ऐसा सन्तुष्ट रहने का स्वभाव रखना परमेश्वर की इच्छा है। स्वर्ग जाने के लिए, हमें न केवल व्यवस्था का पालन करना है, बल्कि परमेश्वर में नए मनुष्यत्व को पहिन लेना चाहिए। अपना स्वभाव सुधारे बिना व्यवस्था का पालन करना बस ऊपरी दिखावा है।

फिलि 4:10–12 "...क्योंकि मैंने प्रत्येक परिस्थिति में सन्तुष्ट रहना सीख लिया है। मैं दीन–हीन दशा तथा सम्पन्नता में भी रहना जानता हूं, हर बात और प्रत्येक परिस्थिति में मैंने तृप्त होना, भूखा रहना, और घटना–बढ़ना सीख लिया है।"

प्रत्येक परिस्थिति में सन्तुष्ट रहने वाला, यदि एक विदेश में प्रचार करने जाए, तो वह जल्दी उस जगह की स्थिति के अनुकूल बनेगा, क्योंकि वह पौलुस के जैसे हर परिस्थिति में कैसा रहना जानता है। लेकिन यदि वह तात्कालिक व मुश्किल स्थिति का सामना करने पर कुड़कुड़ाए और शिकायत करे, तो वह न तो फल पैदा कर सकेगा और न ही परमेश्वर की इच्छा पूर्ण कर सकेगा। हमें इस पर विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही, हम अपनी वर्तमान स्थिति में रखे गए हैं। उसी स्थिति में रखने के द्वारा, परमेश्वर हमें चांदी और सोने के जैसे शुद्ध करना चाहता है और आशीष देकर तैयार हुए स्वर्ग में लेकर जाना चाहता है।


प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद दो

सन्तुष्ट रहने से धन्यवाद करने का मन आता है। सन्तुष्ट न रहने से शिकायत करने का मन आता है। मनुष्य का लालच कभी खत्म नहीं होता। जितना ज्यादा मनुष्य लेता है, उतनी ही शिकायत भी बढ़ जाती है। लेकिन हम तो स्वर्गीय वस्तुओं पर मन लगाते हुए दौड़ रहे हैं। हमें परमेश्वर के योग्य भाव रखते हुए, प्रत्येक परिस्थिति में सन्तुष्ट रहना और धन्यवाद देना चाहिए।

1थिस 5:13–18 "और उनके कार्य के कारण प्रेमपूर्वक उनका अत्यन्त सम्मान करो। एक दूसरे के साथ मेल–मिलाप से रहो। हे भाइयो, हम तुमसे आग्रह करते हैं कि आलसियों को चेतावनी दो, कायरों को प्रोत्साहन दो, निर्बलों की सहायता करो, सब के साथ सहनशीलता दिखाओ। ध्यान रखो कि कोई बुराई के बदले किसी से बुराई न करे, परन्तु सर्वदा एक दूसरे की तथा सब लोगों की भलाई करने में प्रयत्नशील रहे। सर्वदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना करो, प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद दो, क्योंकि मसीह यीशु में तुम्हारे लिए परमेश्वर की यही इच्छा है।"

प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद देने का मतलब, सभी बातों में धन्यवाद देना है। यही परमेश्वर की इच्छा है कि हम सिर्फ अनुकूल परिस्थिति में ही नहीं, पर प्रतिकूल परिस्थिति में भी धन्यवाद दें।

अब आपके आसपास सदस्यों और स्थिति पर ध्यान दीजिए। सदस्यों में से कुछ तो अच्छा आदर्श बनते हैं, जिनसे हम सबक ले सकते हैं, लेकिन कुछ एक कलंक के जैसा, कठोर स्वभाव के होते हैं, जिन्हें देखकर हम सोच सकते हैं कि हमें उनके जैसा कभी नहीं करना है। कभी–कभी हम अनुकूल परिस्थिति में भी हो सकते हैं और कभी–कभी ऐसी परिस्थिति में भी हो सकते हैं जिससे हमारी परीक्षा की जाती है। वास्तव में ये सब हमारे आत्मिक लाभ के लिए सबसे अनुकूल परिस्थिति हैं जिसे परमेश्वर ने तैयार किया है। यदि हम परमेश्वर की ऐसी इच्छा समझकर हज़ारों, लाखों बार परमेश्वर को धन्यवाद दें, तो भी यह कम पड़ेगा।

1थिस 5:9 "क्योंकि परमेश्वर ने हमें प्रकोप के लिए नहीं, परन्तु हमारे प्रभु यीशु के द्वारा उद्धार प्राप्त करने के लिए ठहराया है।"

परमेश्वर ने हमें सिय्योन में बुलाया और उद्धार दिया है। तो हम इससे अधिक क्या चाहेंगे? परमेश्वर ने हमें सब अच्छी चीजें दी हैं। इसलिए हमें सर्वदा आनन्दित रहना, निरन्तर प्रार्थना करना, और प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद देना चाहिए।


धन्यवाद न करें तो कुछ बहुमूल्य चीज खोएंगे

चाहे हम अच्छी परिस्थिति में रहते हों, फिर भी यदि हम किसी चीज की कमी को लगातार सोचें, तो हम धन्यवाद करने को भूल जाएंगे और कुड़कुड़ाने और शिकायत करने लगेंगे। अगली कहानी इसका अच्छा उदाहरण है।

अमरिका में प्रेमी–प्रेमिका का एक जोड़ा था जिसकी सगाई हो चुकी थी। पुरुष ने अपनी मंगेतर को नए साल का अनूठा तोहफ़ा देना चाहा जो वह जीवन भर याद कर सके। उसने अपने पूरे दिल से पांच बॉक्स में तोहफ़े तैयार किए, और भावी दुल्हिन को दिया।

महिला ने धड़कते दिल से पहले बॉक्स को खोला। उसके अन्दर नीला स्वेटर था। इसे देखते ही, वह नाक–भौं सिकोड़ने लगी। इस पर पुरुष ने कहा, "क्या पिछली बार, तुम्हें नीला स्वेटर पसन्द नहीं था? तुम इसे पहिनने बहुत उत्सुक थी"। पुरुष के कहने पर, महिला ने उसे डांटते हुए कहा, "यह पिछले साल का फैशन है। आज के फैशन का रंग तो नारंगी है"।

पुरुष ने उसे दूसरा बॉक्स देते हुए कहा, "ठीक है, तुम यह तोेहफ़ा बिल्कुल पसन्द करोगी, क्योंकि तुम इसे पहले से लेना चाहती थी"। दूसरा तोेहफ़ा हैन्डबैग था जो मगरमच्छ के चमड़े से बना उच्च उत्पाद था। हैन्डबैग के बीच में मगरमच्छ के मुंह का आकार बना दिया गया था। लेकिन महिला को बच्चों सा आकार पसन्द नहीं आया, और उसने उसे एक तरफ़ ढकेल दिया। तीसरे बॉक्स में अंगूठी थी, और चौथे बॉक्स में गले की हार थी। लेकिन हर बार महिला ने कुछ न कुछ दोष ढूंढ़ा और असन्तुष्टता प्रकट किया।

इतने में, पुरुष ने निराश आवाज़ में कहा, "तो मुझे बदलना होगा"। महिला इसे सुनकर अधिक प्रसन्न हुई, और जल्दी से तोहफ़े बदलने के लिए अनुरोध किया। पुरुष ने उदासीन भाव से कहा,

"नहीं, मुझे तोेहफ़े नहीं, पर अपनी प्रेमिका को बदलना है"।

जिसे शिकायत करने की आदत है, चाहे उसे अच्छा तोेहफ़ा मिले, तो भी वह धन्यवाद करना नहीं जानता। इसके विपरित, जो हर बात में सन्तुष्ट रहता है, चाहे उसे ऐसा छोटा और तुच्छ तोहफ़ा मिले जिसे वह पसन्द नहीं करता, फिर भी वह दूसरे के मन को समझ कर, जो उसे बहलाने की कोशिश करता है, धन्यवाद करता है। यदि ऊपर की कहानी में महिला ने धन्यवाद किया होता, तो उसे और अधिक तोेहफ़े मिले होते। यदि महिला तोहफ़ा देनेवाले के दिल से आभारी हुई होती और उसे ऐसा कहा होता कि उसे नारंगी रंग भी पसन्द है, तो अवश्य ही पुरुष ने नारंगी रंग का स्वेटर भी खरीद लिया होता। बहुमूल्य तोेहफ़ा देने पर भी, महिला ने सब को नापसन्द किया। अन्त में उसने अपने प्रेमी को भी खोया। इस तरह, आजकल के लोग उस बात में, जिसमें धन्यवाद देने की जरुरत है, धन्यवाद नहीं कर पाते हैं और जो उनके पास है, उसके मूल्य का अहसास न करने के द्वारा, सच्ची मूल्यवान चीज को खो देते हैं।


इस संसार से न सीखो जो धन्यवाद नहीं देता

हमें अपने जीवन में असन्तुष्ट रहने और शिकायत करने की आदत को त्याग देना चाहिए। बाइबल में कहा गया है कि ‘जो भी निकम्मी बात मनुष्य बोलेंगे, न्याय के दिन परमेश्वर उसका

हिसाब लेगा''।(मत 12:36–37) जब हम धन्यवाद दें, तब स्वर्ग की ओर एक कदम आगे जाएंगे, और यदि हम शिकायत करें, नरक की ओर एक कदम आगे जाएंगे।

2तीम 3:1–5 "परन्तु ध्यान रख कि अन्तिम दिनों में कठिन समय आएंगे। क्योंकि मनुष्य स्वार्थी, लोभी, अहंकारी, उद्दण्ड, परमेश्वर की निन्दा करनेवाले, माता–पिता की आज्ञा न माननेवाला, कृतघ्न, अपवित्र, स्नेहरहित, क्षमारहित, परनिन्दक, असंयमी, क्रूर, भलाई से घृणा करने वाले, विश्वासघाती, ढीठ, मिथ्याभिमानी, परमेश्वर से प्रेम करने की अपेक्षा सुख–विलास से प्रेम करने वाले होंगे। यद्यपि ये भक्ति का वेश तो धारण करते हैं, फिर भी उसकी शक्ति को नहीं मानते: ऐसे लोगों से दूर रहना।"

बाइबल शिक्षा देती है कि हमें इस संसार से नहीं सीखना है जो धन्यवाद नहीं देता। मनुष्य में ऐसी प्रवृत्ति होती है कि जब मनुष्य सफल होता है, तब दूसरे के अनुग्रह को आसानी से भूल कर सफलता का सारा श्रेय खुद पर लेता है, परन्तु जब मनुष्य विफल होता है, तब इसका दोष दूसरे पर मढ़ता है। और जब मनुष्य धन्यवाद न करे, तब निरुत्साहित और हताश रहता है। यदि कोई परमेश्वर के अनुग्रह के लिए धन्यवादी न होगा, तब छोटी–छोटी असुविधा होने पर शिकायत करेगा और कुड़कुड़ाएगा। परमेश्वर ने हमें इस तरह के मनुष्य से दूर रहने के लिए कहा है। इसलिए हमें परमेश्वर की शिक्षा के द्वारा, धन्यवाद करना सीखना चाहिए।

यीशु के समय, दस कोढ़ी यीशु के वचन के द्वारा चंगे किए गए थे। उनमें से केवल एक ही यीशु को धन्यवाद करने के लिए लौट आया। इसे देख कर यीशु को बहुत खेद हुआ।(लूक 17:11–19)

आजकल, आर्थिक संकट का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर होने के कारण, कुछ परिवार मुश्किल समय गुजार रहे हैं। लेकिन यदि वे ऐसी परिस्थिति में भी परमेश्वर की इच्छा समझते हुए उसे धन्यवाद करें, तो परमेश्वर अवश्य ही अच्छी स्थिति और आशीष देगा। एक देश में प्राय: लोग ऐसी कम आय पर जी रहे हैं जो कोरियाई की औसत मासिक आय का दसवां भाग बनती है। फिर भी, वहां के लोग अपनी परिस्थिति पर न तो असन्तुष्ट रहते हैं और न ही शिकायत करते हैं। जब मैं इसे सोचता हूं, तो मुझे लगता है कि जो सन्तुष्ट रहना नहीं जानता है, वही सच में गरीब. और अभागा है।

स्वर्ग हमारा इन्तजार कर रहा है, और हमने संसार में सब से मूल्यवान चीज प्राप्त की है। इसलिए छोटी–मोटी परेशानियां आने पर भी, हमें हताश होने की जरुरत नहीं है और हमें कुड़कुड़ाना नहीं है।


जब हम धन्यवाद करें, परमेश्वर ऐसी बातें देगा जिनके लिए हम धन्यवाद करेंगे

परमेश्वर ने अपनी इच्छा के अनुसार हमें अलग–अलग स्थिति में रखा है। जब हम अपनी स्थिति में सन्तुष्ट रहते हैं और पर्याप्त महसूस करते हैं, तब हम परमेश्वर की इस इच्छा का अहसास कर सकेंगे। आइए हम सोचें कि ‘परमेश्वर ने मुझे बचाया, और स्वर्ग की ओर मेरी अगुवाई करने के लिए अपना बलिदान किया है, तो मैं परमेश्वर के लिए क्या कर सकूंगा?

यश 14:24 "सेनाओं के यहोवा ने यह शपथ खाई है, "निस्सन्देह जैसा मैंने ठाना है, वैसा ही हो जाएगा और जैसी योजना मैंने बनाई है, वैसी ही वह पूरी हो जाएगी।"

परमेश्वर के हर विचार और योजना का फल, निश्चय ही मिलता है। यह परमेश्वर का विचार है कि हम प्रत्येक परिस्थिति में धन्यवाद दें। इसलिए, धन्यवाद करने वाले को परिणाम मे, ऐसी बात मिलेगी जिसके लिए वह धन्यवाद देगा। और शिकायत करने वाले को परिणाम मे, ऐसी बात मिलेगी जिसके लिए वह शिकायत करेगा। हमें हर प्रकार की परिस्थिति में परमेश्वर के सामने धन्यवाद देने का मन रखना चाहिए।

खुशी संतोष की भावना से उपजती है। शिकायत उत्पन्न होते ही, खुशी व आनन्द मिट जाता है। सिय्योन में, चाहे एक सदस्य भी असन्तुष्ट होता है, तब सिय्योन खुशी व आनन्द से कभी नहीं भर सकता। चाहे सब चीजें पूरी हों या किसी चीज की कमी हो, यदि हम सब हमेशा सन्तुष्ट रहें, तब सिय्योन ऐसा बन सकेगा जिससे परमेश्वर प्रसन्न होगा।

हम तो परमेश्वर के उद्धार के लिए बहुत ही धन्यवादी हैं। परमेश्वर ने इस उद्धार देने के साथ, हमें नई वाचा के सेवक के रूप में नियुक्त भी किया है, तो हमें परमेश्वर को केवल धन्यावाद ही देना चाहिए। अच्छी जगह और बुरी जगह, ऊंचा पद और नीचा पद, सुसमाचार के प्रचार करने में इनका कोई मतलब नहीं है।

जब हम सोचते हैं कि दूसरों की चीजों से मेरी चीज घटिया है, मन में शिकायत भर जाती है। शिकायत लोभ– लालच से उत्पन्न होती है। कहावत है, "निन्यानवे चावल की थौलियां वाला किसान एक चावल की थौली वाले किसान को लूटता है"। अपनी चीजों में सन्तुष्ट रहने से उसे कोई समस्या नहीं है, और वह आनन्द से जी सकता है। इस तरह लालची लोग अपनी चीजों में असन्तुष्ट रहते हैं, और वे ज्यादा लेने के लोभ से, कभी–कभी सोए बिना रात भर बुरी योजना भी गढ़ते हैं।

आइए हम सब बातों में सन्तुष्ट रह कर खुश रहना सीखें। जब हम मुश्किल स्थिति का सामना करें, इसके पीछे परमेश्वर की इच्छा को सोचते हुए धीरज धरेंगे और अधिक धन्यवाद देंगे। नबी योना इतनी बुरी हालत में था कि वह समुद्र में फेंका जाकर महामच्छ के पेट में रहा। उस समय, यदि उसने परमेश्वर को शिकायत की होती, तो उसने महानगर नीनवे में 120,000 लोगों को बचाने की परमेश्वर की इच्छा को पूरा न किया होता। लेकिन वह अपनी गलती को महसूस करके पछताया, और उसने परमेश्वर को, जिसने उसे मृत्यु से बचाया, धन्यवाद दिया। अत: उसने अपने प्राण तक को सकट में डाल कर, परमेश्वर के वचन का प्रचार किया।

जिसे शिकायत करने की आदत है, वह सब परिस्थिति में सिर्फ शिकायत करने की बात ढूंढ़ता है। परमेश्वर ने योना को मुश्किल स्थिति में रखा और सही विश्वास का स्वभाव अपनाने में उसकी मदद की, जिसके द्वारा योना महान कार्य करके स्वर्ग में सदा ईनाम पाने के योग्य बना।


लोग जो कुड़कुड़ाए थे, वे नाश किए गए

हमें भी योना के जैसा, आसपास की परिस्थिति से हताश नहीं होना चाहिए, और मुश्किल परिस्थिति में फंसते समय, परमेश्वर के अनुग्रह की याद करके धन्यवाद देना चाहिए।

1कुर 10:4–12 "और सब ने एक ही आत्मिक जल पिया, क्योंकि वे उस आत्मिक चट्टान से पीते थे जो उनके साथ साथ चलती थी, और वह चट्टान मसीह था। परन्तु फिर भी उनमें से अधिकांश से परमेश्वर प्रसन्न नहीं हुआ– वे जंगल में मर कर ढेर हो गए...।न तुम कुड़कुड़ाओ, जैसे कि उनमें से बहुतों ने किया– और नाश करने वाले के द्वारा नाश किए गए। ये बातें उन पर उदाहरणस्वरूप हुर्इं, और ये हमारी चेतावनी के लिए लिखी गईं जिन पर इस युग का अन्त आ पहुंचा है। अत: जो यह समझता है कि मैं स्थिर हूं, वह सावधान रहे कि कहीं गिर न पड़े।"

शिकायत तभी निकलती है जब मनुष्य सन्तुष्टता नहीं, पर कोई कमी महसूस करते हैं। इस्राएली जंगल में, चाहे थोड़ी सी हो, कुछ कमी महसूस करते ही, परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाते थे। "पानी और भोजन की कमी है, छोटे रास्ते से क्यों नहीं चलते?..." इस तरह कुड़कुड़ाने के कारण, अन्त में वे प्रतिज्ञा के देश, कनान में नहीं पहुंच पाए और जंगल में नाश किए गए।

अपनी कमी का अहसास होना, तो अच्छी बात है, परन्तु यदि किसी चीज या सम्पत्ति की कमी का अहसास हो, तो यह शिकायत का कारण बनता है। वे बातें जो इस्राएलियों के साथ जंगल में घटीं, वे हमारे लिए उदाहरण हैं। परमेश्वर की इच्छा के अनुसार, कोई मुश्किल परिस्थिति में और कोई अच्छी परिस्थिति में विश्वास का जीवन जी रहा है। हम सब को अपने प्रति परमेश्वर की इच्छा को समझ कर, सन्तुष्ट रहना है। हमारे स्वर्ग में पहुंचने तक, परमेश्वर भिन्न–भिन्न परिस्थितियों के द्वारा हमारी परीक्षा करके हमें शुद्ध करता है। जब हम परमेश्वर की इस योजना को महसूस करके किसी भी हालत और स्थिति में, परमेश्वर का धन्यवाद करें और खोए हुए भाई–बहन को ढूंढ़ने की याचना करें, तब परमेश्वर हम से प्रसन्न होगा और ज्यादा आशीष देगा।

सब बातों में परमेश्वर की योजना रखी हुई है। हमें उस योजना को देखना चाहिए। शारीरिक तौर पर हम ग़रीब और कमजोर हैं, पर आत्मिक तौर पर हम बहुत अमीर हैं। तो कोई भी परिस्थिति आए आइए हम न घबराएं, बल्कि उससे ऊपर उठ कर सुसमाचार का प्रचार करने में और प्रयत्न करें।

आसपास के लोगों को भी हमेशा धन्यवाद का मन प्रकट करें। जैसे परमेश्वर ने शिक्षा दी है, हम घर से शुरू करके पति और पत्नी को, माता और पिता को, और बच्चों को हमेशा धन्यवाद देने का अभ्यास करेंगे, ताकि ऐसा अभ्यास हमारे पड़ोस में, समाज और देश में, यहां तक कि पूरे विश्व में फैल जाएं। असन्तुष्ट रहने की वजह से, संसार में लोग क्या युद्ध और लड़ाई नहीं करते हैं? हमें आनन्दित संसार बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए जिसमें सभी लोग सन्तुष्ट होते हैं और धन्यवाद करते हैं। ऐसी जगह ही स्वर्ग है।

जब हम कोई कमी का अनुभव करते हैं, तब धन्यवाद करने से और सन्तुष्ट रहने से कमी को पूरा कर लेंगे। परमेश्वर हमें अवश्य ही बहुतायत में फल देंगे। मैं आशा करता हूं कि सिय्योन के सदस्य स्वर्गीय पिता और माता के वचन पर आज्ञाकारी रह कर हर बात में सन्तुष्ट रहेंगे और सारी आशीष पाएंगे।