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नम्रता का गुण

"मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।"
जब मसीह ने राज्य का सुसमाचार प्रचार करना शुरू किया, उसने हम से सब से पहले, मन फिराने पर बड़ा जोर दिया।(मत 4:17) मन फिराव के लिए पहला कदम यह है, स्वयं को पापी मान कर दीन करना। इसलिए स्वर्ग की आशा रखकर, पूर्ण पश्चात्ताप करने के लिए हमें नम्रता का गुण सीखना चाहिए।

नम्रता का विपरित गुण घमण्ड है। जब हम यहेजकेल अध्याय 28 में ‘सूर का राजा'' और यशायाह अध्याय 14 में ‘बेबीलोन का राजा'' के पिछले जन्म की बातें देखें, तब हम जान सकते हैं कि घमण्ड ही पाप का मूल है।

घमण्ड से चूर होकर, हम स्वर्ग में उषाकाल के पुत्र, भोर के तारों के पाप में उलझाए गए थे, जिसके कारण हम धरती पर गिरा दिए गए। स्वर्ग के राज्य में, महिमामय व उच्च पदों पर आसीन हुए स्वर्गदूतों ने घमण्ड के कारण स्वयं को भ्रष्ट किया था, और पाप करके धरती पर निकाल दिए गए। यह तथ्य हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मजबूर करता है कि हमें परमेश्वर के सामने स्वयं को दीन करके नम्र भाव से मसीही जीवन जीना चाहिए।


आइए हम मसीह की नम्रता को सीखें

एक प्रसिद्ध धर्म सुधारवादी मार्टिन लूथर था। उसने विश्वास के प्रति अपनी धारणा पूछी जाने पर, ऐसा कहा, "शुरू में जब मैंने यीशु के बारे में सीखने का विचार किया, तो मैंने उसका चमत्कार सीखने का कोई विचार नहीं किया, बल्कि मैंने सिर्फ यीशु की नम्रता को सीखने का प्रयास किया"।

यीशु ने, जो खोए हुओं को ढूंढ़ने और उनका उद्धार करने आया, चेलों को नम्रता के बारे में अनेक शिक्षाएं दीं, और नम्रता का आदर्श दिखाया। और प्रेरित पौलुस ने भक्तों को मसीह यीशु का स्वभाव रखने का विनयपूर्वक निवेदन किया। जिस पर उसने ज़ोर दिया, वह मसीह का नम्र स्वभाव था।

फिलि 2:3–11 "...परन्तु नम्रतापूर्वक अपनी अपेक्षा दूसरों को उत्तम समझो...।अपने में जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होते हुए भी परमेश्वर के समान होने को अपने अधिकार में रखने की वस्तु न समझा। उसने अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया कि दास का स्वरूप धारण कर मनुष्य की समानता में हो गया इस प्रकार मनुष्य के रूप में प्रकट होकर स्वयं को दीन किया और यहां तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु वरन् क्रूस की मृत्यु भी सह ली। इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान् भी किया...परमेश्वर पिता की महिमा के लिए प्रत्येक जीभ अंगीकार करे कि यीशु मसीह ही प्रभु है।"

यदि कोई मनुष्य मन फिरा कर स्वर्ग वापस जाना चाहे, तो उसे अवश्य ही, मसीह का नम्र स्वभाव रखना चाहिए। जैसे कि पौलुस और लूथर ने कहा, नम्रता एक प्रमुख गुण है जो हमें मसीह से सीखना चाहिए। परमेश्वर ने हम से नम्र होने को कहा, ताकि हमारा घमण्ड, जो पिछले समय सब पापों का कारण बना था, मिटाया जा सके।

लूक 18:9–14 "उसने उन लोगों से जो इस बात के लिए अपने ऊपर भरोसा रखते थे कि हम धर्मी हैं और जो दूसरों को तुच्छ समझते थे, यह दृष्टान्त कहा: "दो व्यक्ति मन्दिर में प्रार्थना करने गए, उनमें से एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेने वाला। फरीसी खड़ा होकर स्वयं इस प्रकार प्रार्थना करने लगा: ‘हे परमेश्वर, मैं तुझे धन्यवाद देता हूं कि मैं अन्य लोगों के समान ठग, अन्यायी व व्यभिचारी नहीं हूं, न इस चुंगी लेने वाले के समान ही हूं। मैं सप्ताह में दो बार उपवास रखता हूं और जो कुछ मुझे मिलता है सबका दसवां अंश तुझे देता हूं।'' परन्तु चुंगी लेने वाला कुछ दूर खड़ा था, उसने स्वर्ग की ओर अपनी आंखें उठाना भी न चाहा, परन्तु छाती पीटते हुए कहा, ‘हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर!'' मैं तुमसे कहता हूं कि यह मनुष्य धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया, न कि वह दूसरा मनुष्य। क्योंकि प्रत्येक जो अपने आप को बड़ा बनाता है, दीन किया जाएगा, और जो अपने को दीन बनाता है, बड़ा किया जाएगा।"

फरीसी ने स्वयं को बहुत धर्मी दिखाया, पर चुंगी लेने वाले ने स्वर्ग की ओर अपनी आंखें उठाना भी न चाह कर अपने पाप का अंगीकार किया और छाती पीटते हुए मांगा कि उस पर दया की जाए।

जो गर्व करता है और घमण्ड करता है, वह नीचा किया जाएगा। लेकिन चुंगी लेने वाले के समान जो स्वीकार करता है कि वह स्वभाव से पापी है, और जो नम्र भाव से स्वयं को नीचा करता है, वह स्वर्ग में महिमा पाकर ऊंचा किया जाएगा, क्योंकि वह हमेशा परमेश्वर के अनुग्रह के लिए, जिससे वह पाप से बचाया गया, धन्यवाद देता है और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन जीता है।

यीशु मसीह ने स्वयं हमें इसका व्यावहारिक उदाहरण दिखाया। उसने अपने आप को दीन करके नम्रता का गुण रखा और अन्त में वह महिमा पाकर ऊंचा किया गया।


परमेश्वर दीनों पर अनुग्रह करता है

पे्ररित पतरस ने, जिसने यीशु से नम्रता के बारे में शिक्षा पाई, हमें इस प्रकार उपदेश दिया,

1पत 5:5–6 "...तुम सब के सब एक दूसरे के प्रति विनम्रता धारण करो, क्योंकि परमेश्वर अभिमानियों का तो विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है। इसलिए परमेश्वर के सामर्थी हाथ के नीचे दीन बनो, जिससे कि वह तुम्हें उचित समय पर उन्नत करे।"

परमेश्वर अभिमानियों का तो विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है और उसे उचित समय पर उन्नत करता है। यदि हमने जाना कि हम स्वर्ग के पापी हैं, और चुंगी लेने वाले के समान पाप का अंगीकार करने का मन बना लिया है, तो हम कैसे परमेश्वर के सामने स्वयं को धर्मी दिखा सकेंगे? और कैसे सदस्यों को जिद्दी व हठी रवैया दिखाते हुए धौंस देने की हिम्मत कर सकेंगे?

1पत 5:1–4 "...अपने मध्य स्थित परमेश्वर के झुण्ड की रखवाली करो– और यह किसी दबाव से नहीं, पर स्वेच्छा से तथा परमेश्वर की इच्छा के अनुसार, तुच्छ कमाई के लिए नहीं वरन् उत्साहपूर्वक करो। जो लोग तुम्हें सौंपे गए हैं, उन पर प्रभुता न जताओ, परन्तु अपने झुण्ड के लिए आदर्श बनो। जब प्रधान रखवाला प्रकट होगा तो तुम अजर महिमा का मुकुट पाओगे।"

जब हम पूरी तरह से मसीह की इस शिक्षा का अनुकरण करेंगे कि ‘परमेश्वर के झुण्ड के प्रति नम्र रवैया अपनाते हुए आदर्श बनो, कठोर निरंकुश शासक बनने के बजाय, दूसरों को अपने से उत्तम समझते हुए समझौता करो'', तब सुसमाचार सुनने वाले परमेश्वर की अगुवाई में पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे।

परमेश्वर नम्र लोगों के साथ रहता है।(यश 57:15), और नम्र लोगों का उद्धार करता है।(अय 22:29, भज 149:4) वास्तव में कड़े रवैए से नम्र रवैया लोगों पर और ज्यादा प्रभाव डाल सकता है। आइए हम इस तथ्य को मन में रखते हुए मसीह की नम्रता के आदर्श का अनुकरण करेंगे।


नबूकदनेस्सर राजा और शाऊल राजा जो घमण्ड के कारण नीचे किए गए

बाइबल के अधिक भागों में इसका उदाहरण मिलता है कि मनुष्य घमण्ड के कारण नीचा किया जाता है। दानिय्येल अध्याय 4 में लिखा है कि, जब बेबीलेन का राजा नबूकदनेस्सर परमेश्वर को भूल गया था और उसने मुंह से ऐसी घमण्ड की बात कही थी कि मैंने ही अपने बल से सब कुछ कर लिया है, उसी घड़ी उसकी बुद्धि छीन ली गई थी। उसके बाद वह रात की ओस से भींगा करते हुए मैदान के पशुओं की तरह रहने लगा। उसका पूरा अधिकार छीन लिया गया, और वह सबसे नीचा किया गया। उस घटना के द्वारा, अन्त में वह नम्रता सीख सका। जब वह नम्र बना, तब उसकी खोई हुई बुद्धि व ज्ञान और प्रभुत्व पुन:प्राप्त किया गया।(दान 4:24–37)

मनुष्यों में, जिन्होंने स्वर्ग में घमण्ड का पाप किया, घमण्डी होने की प्रवृत्ति बनी रहती है। इसलिए उनकी थोड़ी सी बड़ाई की जाए, तो मन ऊंचा होकर आसानी से भ्रष्ट हो जाते हैं। शाऊल राजा के साथ भी ऐसा ही हुआ।

1शम 15:10–23 "तब यहोवा का वचन शमूएल के पास पहुंचा, "मैं शाऊल को राजा बनाकर खेदित हूं, क्योंकि उसने मेरे पीछे चलना छोड़कर मेरी आज्ञाओं का उल्लंघन किया है।"...तब शमूएल ने शाऊल से कहा..."क्या यह सच नहीं है कि यद्यपि तू अपनी ही दृष्टि में तुच्छ था तो भी तू इस्राएल के कुलों का प्रधान बनाया गया? और यहोवा ने इस्राएल पर राजा होने के लिए तेरा अभिषेक किया, और यहोवा ने तुझे एक विशेष कार्य पूरा करने के लिए भेजकर कहा, ‘जा, उन पापी अमालेकियों को समूल नाश कर डाल, और उनके विरुद्ध उस समय तक युद्ध कर जब तक कि वे सत्यानाश न हो जाएं।'' तब तू ने यहोवा की आज्ञा को क्यों नहीं माना? और तू ने लूट पर टूट कर वह काम क्यों किया है जो यहोवा की दृष्टि में बुरा था?... सुन, आज्ञा पालन बलिदान से बढ़कर और ध्यान देना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है। क्योंकि विद्रोह करना शकुन विचारने के बराबर पाप है और अनाज्ञाकारिता मूर्तिपूजा के समान अधर्म है। इसलिए कि तू ने यहोवा के वचन को अस्वीकार किया है। उसने भी राजा होने के लिए तुझे अस्वीकार किया है।"

शाऊल राजा के इतिहास के द्वारा, हम भली भांति समझ सकेंगे कि परमेश्वर किस व्यक्ति का प्रयोग करता है। परमेश्वर ने शाऊल को तभी इस्राएल का राजा बनाया जब उसने नम्र भाव से अपने आप को तुच्छ समझा। परन्तु जब वह घमण्ड से चूर हो गया, तब परमेश्वर शाऊल को राजा बनाकर खेदित हुआ।

शाऊल में यह विचार आया, "आगे जो दिल चाहता है वही जी भर कर करूंगा, मैं बहुत अच्छा कर सकता हूं", तब से वह घमण्ड का शिकार हो गया, और इतने खतरनाक स्तर पर आया कि उसे परमेश्वर के विचार से अपना विचार सही लगा। ऐसे में, परमेश्वर ने उसे अमालेकियों को समूल नाश करने की आज्ञा देकर भेजा। लेकिन उसने आज्ञा न मानी, और वह भेड़–बकरियों व गाय–बैलों को बाहर लेकर आया। इस पर परमेश्वर ने शमूएल नबी के द्वारा उसे डांटा।

यदि शुरू में जब वह राजा बना, उसे ऊपर की आज्ञा दी होती, तो उसने नम्र होने के कारण परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया होता। परन्तु उसने घमण्ड से भर कर अधिक ऊंचा होने के कारण आज्ञा का उल्लंघन किया। अंतत: वह परमेश्वर से त्यागा जाकर बुरी तरह मर गया।

हर वह बात जो बाइबल में पहले लिखी गई, हमें शिक्षा देने के लिए है। क्यों परमेश्वर घमण्डी लोगों को नीचा करता है, और दीन लोगों को ऊंचा उठाता है? क्योंकि घमण्डी मन मनुष्य को परमेश्वर से दूर करता है, और वह पाप का बड़ा कारण बनता है। इसलिए परमेश्वर ने बार बार नम्रता के बारे में शिक्षाएं दी हैं।


जंगल में रहने के दौरान, परमेश्वर ने इस्राएलियों को नम्र होना सिखाया

यहेजकेल अध्याय 28 में लिखा है, सूर का राजा पहले स्वर्ग में अभिषिक्त करूब था, और उसके सृजे जाने के दिन से लेकर उसके आचरण में वह निर्दोष रहा। लेकिन वह अपनी परिपूर्ण बुद्धि और सुन्दरता का अति घमण्ड करने लगा, जिस से उसका मन बिगड़ कर धीरे–धीरे फूल उठता गया। अन्त में उसने सर्वोच्च परमेश्वर के तुल्य बनने का मूर्ख विचार भी किया। इस तरह, परमेश्वर ने स्वर्ग के पहले पापी के मन की स्थिति को बताया कि वह अति घमण्डी था।

घमण्ड तभी मन में उपन्न होता है जब हम भूल जाते हैं कि हम स्वर्ग में पाप करके इस धरती पर आए हैं। और घमण्ड तभी मन में बढ़ता जाता है जब हम परमेश्वर की सहायता मांगने के बिना, सिर्फ अपने ज्ञान व बुद्धि पर निर्भर करते हैं। इसलिए आइए हम, जो अपने स्वदेश, स्वर्ग में वापस जाने को तरसते हैं, पूरे विश्व में मन फिराने का प्रचार करें, और साथ में अपने मन पर नियंत्रण रख कर, घमण्ड का त्याग करके और अधिक नम्र बनें।

व्य 8:1–6 "...फिर तू उस सम्पूर्ण मार्ग को स्मरण रखना जिस पर इन चालीस वर्षाें तक तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे इस जंगल में से इसलिए ले आया है कि वह तुझ को नम्र करे तथा जांचकर यह जान ले कि तेरे मन में क्या है और कि तू उसकी आज्ञाओं का पालन करेगा या नहीं। उसने तुझ को दीन किया, तुझे भूखा होने दिया...इस प्रकार तुझे अपने मन में जान लेना चाहिए कि जैसे कोई मनुष्य अपने पुत्र को अनुशासित करता है वैसे ही तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे अनुशासित करता आया है। इसलिए तू अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञाओं का पालन करके उसके मार्गों पर चलता रह तथा उसका भय मान।"

परमेश्वर ने इस्राएलियों को 40 वर्षों तक जंगल में रहने दिया, ताकि वे नम्र और दीन होने का अभ्यस्त हो सकें। इस तरह से अब परमेश्वर अपनी सन्तान को शिक्षा दे रहा है, ताकि वे अनन्त स्वर्ग में जाकर उषाकाल के पुत्र, भोर के तारों के जैसे कभी विद्रोह का पाप न दुहराएं। फिर भी, यदि हम, जो विश्वास के आत्मिक जंगल पर चल रहे हैं, अभी तक ऊंचा होना चाहते हों और ऊंचे पद पर बैठने की आशा करते हों, तो यह परमेश्वर, जो हमें नम्र बनाने के लिए प्रयास करता है, उसकी इच्छा की अवहेलना करने के समान है।

परमेश्वर की इच्छा यह है कि हम नम्र स्वभाव रखने वालों के रूप में बदल जाएं। इसलिए उसने बाइबल के द्वारा हमें नम्रता के बारे में अनेक शिक्षाएं दी हैं। जो कोई विश्वास के आत्मिक जंगल पर चलते हुए अपने को नीचा नहीं करता है और चर्च के सदस्यों व पड़ोसियों के साथ अभिमानी व्यवहार करता है, वह आत्मिक कनान, स्वर्ग में कभी प्रवेश नहीं करेगा।

आइए हम अगली कहानी के द्वारा, इस पर विचार करें कि हमें किस तरह का मसीही जीवन जीना चाहिए जिसे परमेश्वर चाहता है।


नम्र और विनीत भाव से सेवा करना

एक व्यक्ति सपने में स्वर्ग गया। उसने स्वर्ग में असंख्य सिंहासनों को देखा जिस पर राजकीय याजक, परमेश्वर के भक्त, आसीन होंगे। उन सिंहासनों में से एक सबसे ऊंंचा सिंहासन खाली नजर आ गया। वह यह जानने को बहुत ही उत्सुक था कि कौन उस सिंहासन पर आसीन होगा। ऐसे में उसकी बग़ल में खड़े एक स्वर्गदूत ने कहा, "आपका शिक्षक ही उस पर बैठेगा"

सपने से जाग कर उसने सोचा, "असल में, क्या मेरा शिक्षक उस ऊंचे सिंहासन पर बैठने के योग्य है?"। इससे जिज्ञासु होकर, उसने शिक्षक के पास जाकर पूछा, "आप अपना मूल्यांकन कैसे करते हैं?", चेले के प्रश्न पर शिक्षक ने ऐसा उत्तर दिया, "मैं सोचता हूं कि मैं इस संसार में सब से बुरा आदमी हूं"। चेले ने बहुत ही अचकचाकर, इसका कारण पूछा। शिक्षक ने इस प्रकार बताया,
"यदि परमेश्वर ने उस अनुग्रह को, जो मुझे दिया है, दूसरे लोगों को दिया होता, तो हर कोई, जिसने वह अनुग्रह पाया होता, मुझसे बढ़कर महान व्यक्ति बना होता। परन्तु मैं बड़ा अनुग्रह पाकर भी, अच्छा आदमी नहीं बना हूं, और बहुत से लोगों को धार्मिक मार्ग पर नहीं ला सका हूं। इसलिए सोचता हूं कि मैं इस संसार में सब से बुरा आदमी हूं"

हमें भी इस शिक्षक के जैसा भाव रखना चाहिए। वह यह भाव रख कर कि परमेश्वर से बहुत बड़ा अनुग्रह पाकर भी, उसका काम, जो परमेश्वर के लिए वह कर रहा है, बहुत तुच्छ और घटिया है, परमेश्वर को हमेशा खेद प्रकट करता था। ऐसी नम्रता एक सद्गुण है जिसे मसीहियों को अवश्य ही जीवन में लाना चाहिए।

जो हमारे पास है, उसमें से ऐसा कुछ नहीं है जो हमने परमेश्वर से नहीं पाया। इसलिए हम परमेश्वर के सामने कोई घमण्ड नहीं कर सकते।(1कुर 4:6–7 संदर्भ) हमें ऐसा सोचते हुए स्वयं को दीन करना है कि यदि परमेश्वर का अनुग्रह, जो मुझे दिया गया है, दूसरे को दिया गया होता, तो हो सकता है, वह मुझ से और ज्यादा परमेश्वर की महिमा प्रकट करता होता और अच्छे तरीके से परमेश्वर के सुसमाचार का कार्य पूरा करता होता, परन्तु मुझे अनुग्रह देने के कारण, कार्य धीरे–धीरे किया जा रहा है।

प्रेरित पौलुस ने भी अंगीकार किया कि वह सब से बड़ा पापी है।(1तीम 1:15) पौलुस यह सोच कर खेदित होता था कि यदि परमेश्वर का बड़ा अनुग्रह, जो मुझे दिया गया है, दूसरे को दिया गया होता, तो वह मुझ से और अच्छे तरीके से महान कार्य कर सकता, परन्तु मैं अपनी कमी के कारण, थोड़ा कर पा रहा हूं। इसलिए वह भरपूर शक्ति से मसीह के सुसमाचार का पालन करने का और नई वाचा का सेवक बनने का प्रयास करता था, और सुसमाचार के कर्जदार के रूप में सुसमाचार के प्रचार में जुटता था।

कलीसिया के अगुवों से शुरू होकर, आइए हम नम्र और विनीत भाव से सदस्यों की सेवा करते हुए, पिता और माता के मार्ग पर चलें। दृष्टान्त में फरीसी के जैसा, आइए, हम पापी को बड़ा अनुग्रह देने के लिए धन्यवाद देते हुए अपने को दीन बनाएं। मैं आशा करता हूं कि आप, सिय्योन के सदस्य, जैसे मसीह ने उदाहरण दिया है, वैसे ही हमेशा नम्रता रखें, और नम्र भाव से हर रोज़ परमेश्वर व भाइयों–बहनों की सेवा करते हुए अनन्त स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करें।