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जब निर्बल है तभी सामर्थी है

परमेश्वर की पूर्व योजना के अनुसार, पूरे विश्व में सुसमाचार प्रचार करने का कार्य बहुत तेजी से पूरा हो रहा है। इसी समय में, हमें इस पर विचार करना चाहिए कि वह विश्वास कैसा होगा जो परमेश्वर हम से चाहता है।

प्राय: हर इंसान, चाहे नास्तिक हो, किन्तु अपनी सहज प्रवृत्ति से परमेश्वर को ढूंढ़ता और उस पर भरोसा करता है जब वह स्वयं को निर्बल व असहाय महसूस करता है। लेकिन जब वह स्वयं को बलवान महसूस करता है, तब वह परमेश्वर को नहीं ढूंढ़ता, बल्कि अपनी शक्ति एंव योग्यता पर भरोसा करता है। ‘जब निर्बल है तभी सामर्थी है’, इस वाक्य का प्रयोग करना अनुचित लगता है। लेकिन विश्वास के जीवन में, जब हम स्वयं को निर्बल महसूस करते हैं, तब ही हम परमेश्वर को ढूंढ़ने लगते हैं और हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सहायता मिल सकती है। सो जब हम निर्बल हैं तभी और सामर्थी हैं।

सुसमाचार का प्रचार करने के दौरान, हम कभी–कभी ऐसा गर्व करते हैं कि ‘मेरे पास बहुत से ज्ञान हैं’, ‘मैं बाइबलका वचन जल्दी ढूंढ़ सकता हूं’, ‘मुझे इस काम में दूसरे से ज्यादा कौशल हैं’। लेकिन ऐसा सोचते हुए, हम धीरे–धीरे ऐसे मूर्ख होते जाएंगे जो सुसमाचार के कार्य में, परमेश्वर पर नहीं, परन्तु अपनी स्मरण शक्ति एंव बोलने की शक्ति पर भरोसा करते हैं।

विश्व में सुसमाचार प्रचार करने का कार्य हमारी सामर्थ्य पर बिल्कुल निर्भर नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर पर निर्भर करता है। सुसमाचार के कार्य की सफलता और विफलता इस पर ही निर्भर करती है कि हम कितना परमेश्वर को ढूंढ़ते हैं और उस पर भरोसा करते हैं।


नम्र मन से परमेश्वर को ढूंढ़ें और उस पर भरोसा करें

राजा सुलैमान का पुत्र, रहूबियाम पिता से शक्तिशाली राज्य प्राप्त करके राजगद्दी पर बैठा। सुलैमान के समय में इस्राएल अति धनी और शक्तिशाली था। इस्राएल ने अनेक स्थानीय राज्यों को पराजित किया था और ावे इस्राएल को कर चुकाते थे। सुलैमान की बुद्धि व न्याय को सीखने के लिए, बहुतेरे लोग सुलैमान से भेंट करने आते थे। इस तरह, यह समय इस्राएल के इतिहास में सब से समृद्ध रहता था।

लेकिन रहूबियाम ने ऐसा शक्तिशाली राज्य विरासत में पाने के बाद, परमेश्वर पर भरोसा नहीं किया और वह परमेश्वर की व्यवस्था को भूल गया। वह सिर्फ राज्य की शक्ति पर निर्भर होकर, राजनीति चलाता था। इसलिए स्वाभाविक रूप से प्रजाएं भी, जैसा राज्य के नेता ने किया, वैसा ही गलत करती थीं।

2इत 12:1–9 “और ऐसा हुआ कि जब रहूबियाम का राज्य स्थिर एंव दृढ़ हो गया, तब उसने यहोवा की व्यवस्था को त्याग दिया। और ऐसा हुआ कि यहोवा के प्रति किए गए उनके विश्वासघात के कारण राजा रहूबियाम के पांचवें वर्ष में मिस्र के राजा शीशक ने एक हज़ार दो सौ रथ तथा साठ हज़ार घुड़सवार लेकर यरूशलेम पर चढ़ाई कर दी। और जो लोग मिस्र से उसके साथ आए, अर्थात् लिबियाई, सुक्किय्यी और इथियोपियाई वे असंख्य थे। ... अत: मिस्र का राजा शीशक यरूशलेम पर चढ़ाई करके यहोवा के भवन और राजमहल का खजाना ले गया। वह सब कुछ ले गया, यहां तक कि उन सोने की ढालों को भी ले गया, जिन्हें सुलैमान ने बनवाईं थीं।”

अहंकार में डूबे रहूबियाम ने परमेश्वर का विरोध करके परमेश्वर के क्रोध को भड़काया। परिणामस्वरूप यरूशलेम पर मिस्रियों ने आक्रमण किया, और वे राजमहल के सब खजाने ले गए, यहां तक कि यहोवा के भवन के सब पवित्र पात्रों को भी ले गए जो सुलैमान ने बनवाए थे। यदि राज्य निर्बल होते हुए और दुश्मन को चढ़ाई करते हुए देखकर रहूबियाम घबरा गया होता, तो उसने परमेश्वर को ढूंढ़ कर उससे सहायता मांगी होती। मगर पहले से अपने पिता से शक्तिशाली राज्य प्राप्त करने के कारण, उसने परमेश्वर की शक्ति पर नहीं, पर सैन्य शक्ति एंव राजकीय धन पर, जो अपने पास रखा था, भरोसा करने की गलती की।

वह अहंकारी होते हुए परमेश्वर की इच्छा और व्यवस्था को तुच्छ समझता था और अपने राज्य की शक्ति पर अत्यन्त विश्वास करता था, जिससे उसे परमेश्वर से सजा मिली और राज्य नष्ट कर दिया गया। यह इतिहास हमें बहुत से शिक्षाएं दे रहा है। हमें रहूबियाम के जो दृष्टिकोण और विचार थे उन्हें कभी नहीं रखना है। चाहे बलवान हों, या निर्बल हों, जो परमेश्वर पर भरोसा करता है और उसका भय मानता है, अति बुद्धिमान और समझदार मनुष्य है।

अधिकांश लोग जब अपनी स्थिति और हालत बेहतर होती है, तब अक्सर बहुत जल्दी ही परमेश्वर को भूलते हैं और उस पर भरोसा नहीं करते हैं। और कुछ लोग तो यह भी सोचते हैं कि केवल अशक्त व्यक्ति में धर्म मानने की प्रवृत्ति होती है, और स्वयं पर उनका अत्यंत भरोसा होता है। उन्हें इसके बारे में बिल्कुल ख्याल नहीं होता कि वे कितने कमज़ोर मनुष्य हैं। चाहे मनुष्य सशक्त हो, कितना सशक्त होगा? चाहे मनुष्य कितना ही समर्थ हो, चाहे उसे कितनी ही भरपूर बुद्धि, ज्ञान और अधिकार हो, क्या वह परमेश्वर के तुल्य हो सकेगा जिसने ब्रह्माण्ड को रचा था?

चाहे हम कितनी ही डींग हाँकते रहें कि परमेश्वर की सहायता के बिना भी कुशलता से जीवन जी सकते हैं, मान लीजिए कि यदि परमेश्वर की सहायता थोड़ी देर तक रुके, तब हमें क्या समस्या आएगी? यदि पानी, हवा, धूप इत्यादि की प्राकृतिक सुविधाएं, जो परमेश्वर ने मनुष्य के लिए दी हैं, उपलब्ध न हों, क्या हम फिर भी अपने आप पर भरोसा करके परमेश्वर को न खोजेंगे?

परमेश्वर की दृष्टि में हम मनुष्य बहुत ही निर्बल और अशक्त है। हमें परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ऐसी सन्तान के पास रहता है जो हमेशा परमेश्वर को खोजती हैं और उस पर भरोसा रखती हैं, और वह उनकी मदद करता है। जब हम बाइबल के इतिहास को देखते हैं, जो परमेश्वर की सहायता नहीं चाहते थे और सिर्फ अपनी योग्यता से कुछ सम्पादित करना चाहते थे, उनका परिणाम हमेशा विफल होता था। हमें नम्र मन से परमेश्वर के सामने झुकना चाहिए, ताकि हम अति सामर्थी परमेश्वर पर प्रत्येक परिस्थिति में भरोसा कर सकें।


परमेश्वर पर भरोसा होने पर सारी आशीषें मिलेंगी

परमेश्वर ने इस संसार में सब से दुर्बलों व कंगालों को चुन कर बुलाया है। क्योंकि उनका भरोसा अपने बल और अधिकार पर नहीं है, पर वे केवल परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं।(1कुर 1:26–29)

व्य 28:1–3 “यदि तू ध्यान से अपने परमेश्वर यहोवा की सुने, तथा उसकी जो आज्ञाएं आज मैं तुझे सुना रहा हूं उन सबका पालन करने की चौकसी करे तो तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे पृथ्वी की समस्त जातियों से अधिक उन्नत करेगा। और यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञा माने, तो ये सब आशीषें तुझ पर आ बरसेंगी। धन्य हो तू नगर में, और धन्य हो तू गांव में।”

हमारा समस्त जातियों से उन्नत होना हमारी खुद की शक्ति से प्राप्त नहीं होगा। यह तभी पूरा होगा जब हम परमेश्वर पर सम्पूर्ण भरोसा करते हैं।

फिलहाल सुसमाचार बहुत ही तेजी से प्रसारित किया जा रहा है और पृथ्वी के देश–देश से लोग एलोहीम परमेश्वर की महिमा को महसूस करके सिय्योन की ओर उमड़ आ रहे हैं। थोड़ी ही देर में, इस भविष्यवाणी के सच होने का पल भी आएगा कि जाति–जाति के लोग परमेश्वर के सम्मुख घुटने टेंकेंगे, और हम परमेश्वर के कारण पृथ्वी पर जाति–जाति के मध्य कीर्ति और प्रशंसा पाएंगे। हमारी खुद की व्यक्तिगत विद्या, धन–सम्पत्ति, सम्मान और अधिकार के कारण, वे हमारा आदर सत्कार नहीं करेंगे, बल्कि इसलिए क्योंकि परमेश्वर, जो पृथ्वी के सब कुछ का सृजनहार और प्रभु हैं, हमारा पिता और माता हैं। हमारे उनकी सन्तान होने के कारण, पृथ्वी के देश–देश के लोग हमारे सामने घुटने टेक कर हमारी महिमा करेंगे।

व्य 8:11–20 “सावधान, कहीं ऐसा न हो कि तेरे परमेश्वर यहोवा की जिन आज्ञाओं, नियमों तथा विधियों की आज मैं तुझे आज्ञा दे रहा हूं उन्हें न मानने के द्वारा तू उसे भूल जाए, ऐसा न हो कि जब तू भोजन करके सन्तुष्ट हो चुके, तथा अपने लिए अच्छे घर बनाकर उनमें रहने लगे। और जब तेरे गाय–बैल तथा रेवड़ की बढ़ती हो, और तेरा चांदी–सोना बहुत अधिक हो जाए, तथा तेरे पास जो कुछ है उसमें बहुत वृद्धि हो, तब तेरा मन फूल उठे और तू अपने परमेश्वर यहोवा को भूल जाए जो तुझे मिस्र देश, अर्थात् दासत्व के घर से निकाल लाया। उसने उस विशाल और भयानक जंगल में तेरा मार्गदर्शन किया जहां जहरीले सांप–बिच्छू थे तथा जिसकी भूमि जल–रहित और सूखी थी, वहां उसने तेरे लिए चकमक की चट्टान में से जल निकाला। उसने तुझे जंगल में मन्ना खिलाया, जिसको तेरे पूर्वज जानते भी नहीं थे, कि वह तुझको नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा करके अन्त में तेरा भला करे। तू अपने मन में यह न कहने लगे कि मैंने यह सारी सम्पत्ति अपने सामर्थ्य तथा बाहुबल से कमाई है। परन्तु तू अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण रखना, क्योंकि वही तुझको सम्पत्ति प्राप्त करने का सामर्थ्य देता है...”

जब धन–सम्पत्ति की बढ़ती हो, और संसार में किसी भी वस्तुओं का अभाव और जरुरत भी न हो, तब हम मन ही मन घमण्ड से फूल उठेंगे और यह भी सोचेंगे कि परमेश्वर की सहायता के बिना भी हम खुशहाल हैं। जैसे जैसे ऐसा घमण्डी विचार आता है, वैसे वैसे हमें और अधिक सावधान रहना चाहिए।

जब हमारे पास जो कुछ है उसमें बहुत वृद्धि हो, तब हमें ऐसा दुष्ट विचार मन में हो सकता है कि ‘मैं अपनी शक्ति और योग्यता से सब कुछ कर सकता हू, इसके अलावा हम परमेश्वर को भूल सकते हैं। चाहे हमें कंगाल भी होना पड़े, फिर भी सर्वशक्तिमान और सामर्थी परमेश्वर का हमारे साथ रहना और भी भला होगा। परमेश्वर की सहायता तो मनुष्य की सहायता से बढ़कर अतुलनीय है!


संसार का उद्धार परमेश्वर पर निर्भर है

प्रेरित पौलुस को शैक्षिक पृष्ठभूमि, कुलीन जाति, अमीरता, यश आदि हर पहलू पर कुछ घटी नहीं थी। फिर भी उसने अपने पिछले अनुभवों की बातें इस प्रकार की थीं कि सुसमाचार प्रचार करते समय, जब उसे महसूस हुआ था कि ‘मैं अपने आप कुछ भी नहीं कर सकता हूं और मैं बेबस एंव निर्बल हूं.’, वह उसी पल सब से बलवान था और उसी पल परमेश्वर की खोज करके उस पर भरोसा कर सका।

प्रचार की यात्रा के दौरान, जब उसे डाकुओं के खतरे, देशवासियों के खतरे, गै.रयहूदियों के खतरे, इत्यादि विविध खतरों में होना पड़ा, उस समय उसकी उच्च पढ़ाई और उच्च जाति वर्ग उसके लिए कोई सहायक नहीं था, और जब उसने अपनी बुद्धि एंव ज्ञान पर भरोसा करके प्रचार किया, कोई काम सफल नहीं हुआ। परन्तु जब उसने अपनी कमी को महसूस करके मात्र परमेश्वर पर भरोसा किया, तब अद्भुत परमेश्वर का कार्य किया गया।

ऐसे अनुभवों के द्वारा पौलुस को महसूस हुआ कि मनुष्य कितना निर्बल और कमजोर है। अपनी निर्बलता को पहचानते हुए, उसे हर पल शक्तिशाली परमेश्वर की शक्ति का एहसास होता था, और उसकी सहायता पर सम्पूर्ण रूप से भरोसा कर सकता था। ऐसी अनुभूति और विश्वास के साथ, जहां कहीं भी पौलुस जाता था, वहां सुसमाचार का जोश भरता था।

1कुर 9:24–27 “खेल प्रतियोगिता में भाग लेने वाला प्रत्येक खिलाड़ी सभी प्रकार का संयम रखता है। वह तो नष्ट होने वाले मुकुट की प्राप्ति के लिए यह सब कुछ करता है, परन्तु हम नष्ट न होने वाले मुकुट के लिए करते हैं। इसलिए मैं लक्ष्यहीन–सा नहीं दौड़ता, न मैं हवाई–मुक्केबाज़ी करता हूं। परन्तु मैं अपनी देह को यन्त्रणा देकर वश में रखता हूं, कहीं ऐसा न हो कि मैं औरों को प्रचार करके स्वयं अयोग्य ठहरूं।”

यदि वह असावधान होता, तो वह अहंकार में चूर हो सका होता। इसलिए प्रेरित पौलुस हर दिन अपने को डांटता था, और परमेश्वर के अधिकार में होने का प्रयास करता था। ऐसे प्रयासों के परिणाम में, अपने जीवन के अन्तिम समय, वह विश्वास के इतने स्तर तक पहुंच सका कि उसे अटल साहस था कि मेरे लिए धार्मिकता का मुकुट रखा हुआ है।

यदि आप सुसमाचार प्रचार करने का जीवन जीना चाहते हों, तो अपने अहंकार को छोड़ना चाहिए। जिस समय आप अपनी निर्बलता एंव कमी को पूरी रीति से पहचानते हैं, उस समय से आप केवल परमेश्वर पर भरोसा करके पवित्र आत्मा धारण कर सकेंगे।

विदेश में सुसमाचार के बंजर स्थान में गए प्रचारकों का यह कहना है कि जब वे अनजान भाषा एंव रहन–सहन की रीति में अनजान लोगों को सुसमाचार प्रचार करते हैं, तब वे स्वभाविक रूप से परमेश्वर पर भरोसा करने को मजबूर होते हैं। मधुर नहीं, बिलकुल टूटी–फूटी भाषा बोलने पर भी, केवल परमेश्वर पर भरोसा करके उत्साही मन से वचन सुनाने के कारण, परमेश्वर के वचन पूरी तरह से सुनने वालों के मन को छूकर प्रेरित करते हैं, जिससे बहुत अधिक लोग परमेश्वर को ग्रहण करते हैं। यह मनुष्य की शक्ति और सामर्थ्य से कैसे हो सकेगा?

चाहे हमारी सामर्थ्य बहुत हो या कम हो, चाहे हम बलवान हों या निर्बल हों, हमारी स्थिति चाहे कुछ भी हो, हमें केवल परमेश्वर पर भरोसा करते हुए अनुग्रहपूर्ण सुसमाचार का जीवन जीना चाहिए। आप अपने आप ही जानते होंगे कि आप बहुत कमजोर मनुष्य ही हैं, इसलिए शायद सामरिया और पृथ्वी के छोर तक सुसमाचार का प्रचार करने में आपको डर लगा होगा। इस पर भी, आइए हम पिता और माता की सहायता की आशा करें और उसे मांगें, यह सोचकर कि ‘मैं बच्चे के समाान हूं जो बिना माँ–बाप के द्वारा कुछ नहीं कर सकता है’, और पिता और माता से प्रार्थना करें कि पवित्र आत्मा के समस्त अस्त्र–शस्त्र धारण कर सकें।

अभी पूरे विश्व में सुसमाचार बहुत ही तेजी से प्रसारित होता जा रहा है, क्योंकि सभी प्रचारक बुरी अवस्था में भी सिर्फ परमेश्वर पर भरोसा करके प्रचार कर रहे हैं। रास्ते पर चलने के समय भी, वचन सुनाने से पहले भी, हर पल उन्होंने प्रार्थना के साथ परमेश्वर को खोजा है और उस पर भरोसा किया है। इसके परिणामस्वरूप, हम चौंकाने वाला नतीजा देख रहे हैं। यह बिल्कुल भूल न जाइए कि जिस क्षण आप को यह एहसास होता है कि ‘मेरे पास कुछ भी नहीं है और मैं अयोग्य हूं’, उसी क्षण से परमेश्वर सब से नजदीक आपके पास है, और आप को पवित्र आत्मा का वरदान व शक्ति मिलेगी।


हमारी सहायता परमेश्वर की ओर से

परमेश्वर अपनी सन्तान को सब कुछ दे सकता है और उसे अच्छी परिस्थिति में पहुंचा सकता है। परन्तु वह हमें कभी–कभी कठिन क्रम में मुसीबत का सामना करवाता है। यह इसलिए है, क्योंकि परीक्षाओं में हमारा विश्वास परखा जाकर खरा और शुद्ध होता है। परमेश्वर की ऐसी इच्छा समझ कर, यदि हम सुसमाचार के सेवक बनें, तब हम किसी भी परीक्षा और दुख पर जयवन्त हो सकेंगे।

भज 121:1–8 “मैं अपनी आंखें पर्वतों की ओर उठाऊंगा, मुझे सहायता कहां से मिलेगी? सहायता तो मुझे यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है। वह तेरे पैर को फिसलने न देगा...यहोवा तेरा रक्षक है, यहोवा तेरी दाहिनी ओर तेरी आड़ है। न तो दिन को सूर्य, न रात को चन्द्रमा तुझे कुछ हानि पहुंचाएगा। यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा, वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा। यहोवा तेरे आने–जाने में तेरी रक्षा अब से सदा तक करता रहेगा।”

भज 41:10–13 “परन्तु हे यहोवा, तू मुझ पर अनुग्रह करके मुझे उठा खड़ा कर, कि मैं उनको बदला दूं। मेरा शत्रु मुझ पर विजयी होकर हर्षनाद नहीं कर पाता, इस से मैं जानता हूं, कि तू मुझ से प्रसन्न है। मुझे तो तू ही मेरी खराई में सम्भाले रहता है, और अपने सम्मुख सर्वदा के लिए स्थिर करता है। इस्राएल का परमेश्वर यहोवा आदि से अनन्तकाल तक धन्य हो! आमीन, फिर आमीन।”

परमेश्वर हमारी सहायता करता है, जिससे अन्तिम दिनों में आत्मिक युद्ध की जीत हमारी होगी। हमें पिता और माता को निरंतर धन्यवाद देना चाहिए जो अदृश्य रूप में हमेशा हमारे साथ रहते हैं, हमारी मदद करते हैं और हमारी आत्माओं की रक्षा करते हैं। प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर की सहायता की लगातार विनती करें कि पवित्र आत्मा अद्भुत कार्य करे। यीशु के स्वर्गारोहण के बाद, पवित्र लोगों ने दिन–प्रतिदिन इकट्ठे होकर प्रार्थना करने के फलस्वरूप, पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर विस्फोटक एंव प्रभावकारी शक्ति को प्राप्त किया था, और बहुतेरे लोगों को बचाया।

हमें भी जो अन्तिम पवित्र आत्मा के आंदोलन का मिशन पा चुके हैं, प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर की सहायता पाकर प्रेम भरे मन से सुसमाचार प्रचार करना है, और हम एक आत्मा की भी, परमेश्वर के सामने पूरी तरह से निर्मल होने तक, बलिदान एंव ईमानदारी से देखभाल करेंगे। यह बात हमेशा मन में रखिए कि जितना ज्यादा हम निर्बल हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर हमारे लिए कार्य करता है। सिय्योन के सभी परिवारों से आशा है कि आप किसी भी परिस्थिति में परमेश्वर पर भरोसा करें और संसार का उद्धार करने के कार्य में लगातार लगे रहें।