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मसीही का जीवन

मसीहियों के लिए, जो स्वर्ग की आशा करते हुए विश्वास जीवन जी रहे हैं, सिर्फ परमेश्वर का वचन जानना ही नहीं, बल्कि उसका अनुकरण करना भी बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि संसार के लोग मसीहियों के प्रति सकारात्मक विचार लेकर पूर्वानुमान लगाते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करने वाला दूसरों से कुछ तो भिन्न होगा। लेकिन जब वे मसीही होने का दावा करने वालों को दुष्ट काम करते देखते हैं, तब वे यह कह कर, "मसीही भी कोई अलग नहीं है" जल्दी निराश हो जाते हैं और ईसाई धर्म के खिलाफ अविश्वास में बातें करते रहते हैं।

यदि सच्चा मसीही हो, तो उसके हर एक शब्द पर और उसके हर एक कर्म पर अधिक ध्यान देना और सावधान होना चाहिए। आपकी छोटी बात या हल्का व्यवहार आसपास के लोगों को स्वर्ग में भी ले जा सकता है और विनाश में भी ले जा सकता है। जब इसे सोचते हैं, हमें जो परमेश्वर से बुलाई गई स्वर्गीय सन्तान हैं, केवल वैसा ही करना है जैसा परमेश्वर ने नमूने में दिखाया और सिखाया है, और आसपास के लोगों के लिए सुन्दर आदर्श बनना है, जिसे देखकर उन्हें भी परमेश्वर पर विश्वास करने की इच्छा हो सके।


मसीही के उपयुक्त कर्म का महत्व

यह कहानी राष्ट्रवादी गांधी जी की है जिसने भारत को अंगे्रजों की गुलामी से आजाद करने के लिए प्रयत्न किया था। गांधी जी ने युवावस्था में एक बार मसीही बनने की कोशिश की थी। उसी समय उसे मसीही के मकान में किराये पर रहने का मौका मिला था। जब वह वहां रहता था, मालिक पति­पत्नी के झगड़ने की आवाज बहुत बार सुन सकता था। यीशु जिसने एक दूसरे से मेल­मिलाप करने को कहा, उसकी शिक्षा से यह बहुत अलग था। हमेशा यीशु पर विश्वास करने वालों में झगड़े और लड़ाई खत्म न होते देखने के बाद, गांधी जी बहुत निराश हुआ और उसने निर्णय किया कि मैं भविष्य में मसीह पर विश्वास तो करूं, परन्तु कभी मसीही नहीं बनूंगा।

इसके जैसी कहानी एक और है। अमरीका के युद्धपोत में एक कप्तान था जो बहुत भक्तिपूर्ण मसीही था। एक दिन संयोग से वह एक निजी सैनिक से मिला। वह युवा सैनिक पहले से परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता था और थोड़ा बहुत बदमाश था। कप्तान साधारण समय में, चाहे किसी से भी मिले, बाइबल पढ़ने की सलाह दिया करता था। उसी दिन भी, उसने अपने सैन्य सहायक को आदेश दिया कि उस युवा सैनिक के पास बाइबल ले आए। तब सैन्य सहायक ने कप्तान से कहा,
"कप्तान! ऐसा करना तो जरूरी नहीं है, क्योंकि वह हमेशा बाइबल के पास रहता है। आपको उसे बाइबल देने की आवश्यकता नहीं है।"

इस पर कप्तान संदिग्ध होकर उसे कारण पूछा, तब उसने इस प्रकार जवाब दिया,
"उसकी बाइबल ही कप्तान है, क्योंकि आपके हर कदम को देखते हुए वह परमेश्वर की शिक्षा को सीख रहा है। यदि आप भविष्य में भी वैसा सफल और सीधा जीवन जीएंगे जैसा कि आप जीते हैं, तो वह एक दिन जरूर मसीही बनेगा। यदि वैसा नहीं हो, तो वह परमेश्वर पर कभी विश्वास नहीं करेगा।"

सैन्य सहायक की बात सुनने के बाद उसे बहुत महसूस हुआ कि उसका प्रत्येक व्यवहार दूसरों पर ज्यादा प्रभाव डाल सकता है। उसी दिन रात को उसने सोने की कोशिश की, किन्तु उसे नींद नहीं आई।

ऐसी कहानी के द्वारा, हम महसूस कर सकते हैं कि मसीही के रूप में और एलोहिस्ट के रूप में, जो एलोहीम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, हमारी जीवन शैली कितना अधिक आसपास के लोगों को प्रभावित कर सकती है। अब भी आसपास में पती या पत्नी, माँ–बाप, मित्र, पड़ोसी, आदि बहुत से लोग हमारे कर्माें को देख रहे होंगे। इसलिए भक्तिपूर्ण और पवित्र चाल­चलन के साथ, हमें जीवित बाइबल की भूमिका को भली भांति निभाना चाहिए।


मसीह और प्रेरितों का नमूना जिसका हमें पालन करना है

विश्वास के जीवन में हमारे लिए जो सब से सीधा नमूना है वह मसीह है। हमें केवल मसीह की जीवन शैली की आदर्श के रूप में मान कर नकल करने का प्रत्यत्न करना चाहिए।

यूह 13:15 "क्योंकि मैंने तुम्हें नमूना दिया है कि तुम भी वैसा ही करो जैसा मैंने तुम्हारे साथ किया।"

परमेश्वर स्वयं हमारे जैसा शरीर धारण करके धरती पर आया, और उसने हमें सब से खरे पथ को दिखाया, जिस पर मनुष्य को चलना है। यदि ऐसा है, तो हमें अपनी शारीरिक कमज़ोरियों का बहाना तलाशना नहीं, बल्कि मसीह की जीवन शैली की नकल करने के द्वारा, हमारी गलतियों को ठीक करना है और कमियों को दूर करना है।
संसार के लोग परमेश्वर के सत्य और शिक्षाओं को नहीं जानते, इससे वे हमारी निन्दा तो कर सकते हैं, लेकिन हमारे चाल­चलन ठीक न होने से या परमेश्वर की इच्छानुसार कर्म न करने से हमारी निन्दा नहीं होनी चाहिए। वह मार्ग जिस पर स्वर्गीय पिता और माता चले, हमें उसी मार्ग पर चल कर धार्मिक पदचिन्ह पीछे छोड़ना है, ताकि यह अविश्वासियों के लिए भी अच्छा नमूना हो सके।

जब हम प्रथम चर्च के इतिहास को देखते हैं, तब हम उन दिनों के प्रेरित और नबियों को देख सकते हैं जिन्होंने हमें अनेक भागों में अनुग्रहमय नमूने दिखाए।

1कुर 4:6 "हे भाइयो, मैंने इन बातों का वर्णन तुम्हारे लिए दृष्टान्त के रूप में अपने और अपुल्लोस पर लागू किया है, कि तुम हम से यह सीखो कि उन बातों से जो लिखी गई है आगे न बढ़ो, जिससे कि तुम में से कोई एक के पक्ष में दूसरे की उपेक्षा करके घमण्ड न करे।"

जब चर्च में सदस्यों के मध्य फूट होती थी, प्रेरित पौलुस सदस्यों को यह महसूस कराते हुए कि सुसमाचार के कार्य का नेतृत्व करने वाला परमेश्वर है, सारी महिमा और प्रशंसा केवल परमेश्वर को देता था और सदस्यों से घमण्डी न होने का निवेदन किया। इस तरह वह सदस्यों के प्रति अनुग्रहमय नमूना दिखाता था। प्रेरितों के जैसे, हमें भी परमेश्वर को, जो हमें उद्धार देता है, सारी महिमा देते हुए विश्वास का जीवन जीना चाहिए और परमेश्वर के सदृश सुन्दर आचरण से और भले कर्मों से आसपास की अनेक आत्माओं को उद्धार की ओर ले जाना चाहिए।

फिलि 3:17–19 "भाइयो, तुम सब मिलकर मेरा अनुकरण करो, और उन्हें ध्यान से देखो जो इस रीति से चलते हैं जिसका नमूना तुम हम में देखते हो, क्योंकि मैं तुम से पहिले अनेक बार कह चुका हूं और अब भी रो­ रोकर कहता हूं कि ऐसे बहुत हैं जो अपने आचरण से मसीह के क्रूस के शत्रु हैं। उनका अन्त विनाश है, उनका परमेश्वर पेट है, वे अपनी निर्लज्जता की बातों पर गर्व करते हैं और सांसारिक वस्तुओं पर मन लगाए रहते हैं।"

चाहे हमारे असल जीवन में हो या विश्वास के जीवन में हो, यह अति महत्वपूर्ण मुद्दा है कि हमें किस व्यक्ति का अनुकरण करना है। जो सिर्फ सांसारिक वस्तुओं पर मन लगाकर और सांसारिक महिमा के पीछे पड़कर नाश हुए, उन लोगों का नहीं, बल्कि हमें पौलुस के जैसे प्रेरित, जो सिर्फ स्वर्ग की महिमा की अभिलाषा करते हुए कड़ी मेहनत से सुसमाचार के मार्ग पर दौडे., उनका अनुकरण करना है।


आइए हम मसीही बनें जो भले नमूने दिखाते हैं

स्वर्गीय पिता और माता के विश्वासी होने का दावा करने वालों के गलत नमूने उन पर, जो परमेश्वर पर विश्वास करना चाहते हैं, बुरा और अप्रिय असर डाल सकते हैं। सिय्योन परिवार के सदस्य केवल विश्वास के भले आदर्श बनेंगे और संसार की ज्योति व नमक की भूमिका निभाते हुए, अन्धकार में पड़े लोगों को परमेश्वर की ओर ले आएंगे।

तीत 2:7­8 "भले कार्य कर के तू सब बातों में स्वयं आदर्श बन। तेरा उपदेश शुद्ध, गम्भीरतापूर्ण, खरा और दोषरहित हो, जिससे कि विरोधियों को हमारे विषय में कुछ भी बुरा कहने का अवसर न मिले और वे लज्जित हों।"

हम एलोहीम परमेश्वर को ग्रहण करके उनके अनुयायी बने हैं। संसार के लोग सोचते होंगे कि हमारी जीवन शैली और हमारे सभी व्यवहार एलोहीम परमेश्वर की शिक्षाओं पर आधारित हैं। इस वजह से पवित्र और भला, भ्रष्टाचार रहित और दोष रहित व्यवहार से हमें सभी बातों में आदर्श बनना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हमारा प्रत्येक चाल­चलन परमेश्वर की शिक्षाओं से विपरित हो। शारीरिक और आत्मिक रूप में परमेश्वर की शिक्षा के अनुसार किए जाते हमारे भले कर्म, झूठे नबियों या विरोधियों को हमारी निन्दा करने का अवसर नहीं देगा, बल्कि वे अपने कार्य से लज्जित होंगे।

अब तक बहुत सारे सदस्य पिता और माता की शिक्षा और वचन मन में रखकर अनुग्रहपूर्वक जीवन जीने का प्रयास करते आए हैं। इसलिए आज झूठे नबी, चाहे हमारा सत्य उनसे अलग हो, खुद स्वीकार कर रहे हैं कि चर्च ऑफ गॉड के सदस्यों के चाल­चलन भले और खरे हैं। 2 हजार वर्ष पहले, प्रथम चर्च के समय में भी, परमेश्वर ने स्वयं भले काम करके दिखाए थे, और उसका पीछा करके प्रेरितों ने भले काम करके दिखाए थे। और बाद में भक्त, जिन्होने प्रेरितों की शिक्षाएं लीं थी, भले कामों से परमेश्वर को महिमा देते थे, जिसके कारण उस समय में बहुत सारी रुकावटों और बाधाओं में भी चर्च ऑफ गॉड अनेक लोगों से कीर्ति और प्रशंसा पाता था और तेजी से विकसित हो सकता था।


खरी शिक्षा पर मन लगाओ

चाहे हम पूरी लगन से परमेश्वर पर विश्वास करते हो और चाहे हम विश्वास करने में उत्साहित हो, यदि हमारा चाल­चलन खरा नहीं है, बाइबल सिखाती है कि हम बिल्कुल उद्धार नहीं पा सकते।

मत 5:20 "क्योंकि मैं तुमसे कहता हूं कि जब तक तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो तो तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश न कर पाओगे।"

यदि कोई विश्वासी होने का दावा करता है, परन्तु अपने जीवन में अच्छे कर्म नहीं करते, फिर वे कैसे स्वर्ग जा सकेंगे? वह निश्चय ही पाखण्डी और झूठा नबी है जो अपने खराब मसीही जीवन के कारण, न तो स्वयं स्वर्ग में प्रवेश करता है और न ही प्रवेश करने वालों को स्वर्ग जाने देता है।

परमेश्वर की शिक्षाओं में से छोटी से छोटी शिक्षा को भी, हमें अनदेखा नहीं करना है, बल्कि आज्ञाकारी बनकर संसार की ज्योति और नमक के रूप में, पूरे संसार के लोगों की अगुवाई परमेश्वर की ओर करनी है।

1तीम 6:3­5 "यदि कोई भिन्न प्रकार की शिक्षा देता है और हमारे प्रभु यीशु मसीह के ठोस वचन तथा भक्ति के अनुसार शिक्षा से सहमत नहीं होता, वह अहंकारी है और कुछ भी नहीं समझता। उसे वाद­विवाद और शब्दों पर तर्क करने का रोग है, जिस से ईष्र्या, द्वेष, निन्दा, अश्लील भाषा, बुरे बुरे संदेह, और उन मनुष्यों के मध्य निरन्तर झगड़े उत्पन्न होते हैं जिनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है, जो सत्य से दूर हो गए हैं और जो भक्ति को लाभ का साधन मानते हैं।"

यदि हम परमेश्वर के दिए हुए वचनों पर मन न लगाएं और उनका अभ्यास न करें, तब हमारा विश्वास बिल्कुल नहीं बढे.गा, अत: बुरे मार्ग पर चलना ही पड़ेगा। लेकिन इसके विपरित, जो छोटा कर्म भी वचन के अनुसार करने की कोशिश करता है, उसका विश्वास धीरे धीरे बढ़ता जाएगा, अत: उद्धार पाने के योग्य ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी हो जाएंगे। हम ने परमेश्वर को ढूंढ़ा और उस पर विश्वास करने का निश्चय किया है, तब इस संसार में रहने के लिए सर्वप्रथम हमें परमेश्वर की सारी शिक्षाओं का पालन करना है, जिससे कि सारा संसार स्वीकार करे कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और संसार के सारे लोग एलोहीम परमेश्वर को महिमा देते हुए उनके चरणों में घुटने टेकेंगे। जब तक हम एलोहिस्ट के रूप में सारी पृथ्वी के सामने कीर्ति और प्रशंसा न पाएं तब तक निरन्तर हमें कोशिश करते रहना है कि चाहे छोटा कर्म हो, वह समाज में ज्योति व नमक बन सके।

आशा करता हूं कि आप मसीही के रूप में पूरे समाज में सुन्दर उदाहरण दिखाते हुए विश्वास का बाकी जीवन व्यतीत करें, और ज्योति व नमक की भूमिका अदा करके बहुतों को धार्मिकता की ओर बढ़ाने के द्वारा सदा सर्वदा तारों के समान चमकने वाली परमेश्वर की सन्तान बनें।