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रहस्यों का रहस्य

बाइबल की 66 पुस्तकें पढ़ते समय हमें सबसे बड़ा मुश्किल विषय है कि मसीह को पहचान कर उस पर विश्वास करना है। इसलिए बाइबल कहती है कि मसीह को जानना ही बाइबल का सब से बड़ा रहस्य है।
2,000 साल पहले, इस्राएली रोम के अत्याचार और उत्पीड़न से दुख पा रहे थे। उन्हें एक आशा थी कि बाइबल में भविष्यवाणी किया गया मसीह आकर उन्हें दुखों से छुड़ाए। यह आशा ही उनके जीवन को सम्भाले रखती थी। लंबे समय तक वे उत्सुकता से मसीह का इन्तजार करते हुए रोम के अत्याचार को सहते आए थे। लेकिन जब मसीह यानी यीशु उनके सामने आए तब इस्राएलियों ने मसीह से जिसकी उन्होंने आशा से गहरी प्रतीक्षा की, विद्रोह किया, अंतत: क्रूस पर लटकाया।
इस्राएलियों के लिए परमेश्वर अपने जीवन से कहीं प्रियतर था। चाहे अपने जीवन खोएं तो भी वे विश्वास को नहीं छोड़ सकते थे। परन्तु उन्होंने जो परमेश्वर को अपने जीवन से अधिक बहुमूल्यता से सोचते थे, क्रूस पर लटकाया। यदि हम ठीक रूप से इस कारण को नहीं जानते कि क्यों उन्होंने ऐसी बड़ी गलती की, तो चाहे इस युग में परमेश्वर दूसरी बार आता हो, फिर भी हम एक जैसी गलती को फिर से दुहराएंगे।


मनुष्य के रूप में आए सर्वशक्तिमान परमेश्वर

इस विषय के बारे में जांच करने के लिए सबसे पहले यीशु के बारे में अध्ययन करना है। आइए हम बाइबल के द्वारा जानें कि यीशु मूल रूप से कौन है।

कुल 1:13-18 "... क्योंकि उसी में(मसीह)सब वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की अथवा पृथ्वी की, दृश्य अथवा अदृश्य, सिंहासन अथवा साम्राज्य, शासन अथवा अधिकार-समस्त वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिए सृजी गई हैं।"

यीशु सृष्टिकर्ता परमेश्वर था जिसने संसार में सारी वस्तुओं को सृजा। यीशु वह था जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य के रूप का धारण करके पृथ्वी पर आया।
लेकिन उस समय गहराई से इस्राएल के दिमाग में परमेश्वर के बारे में गलत विचार बैठा हुआ था। उनके विचार में परमेश्वर ऐसा शक्तिशाली था कि यदि सिफ वचन कहे, "उजियाला हो" तो उजियाला होता है, और एक वचन से आकाश और जमीन दो भागों में बांट सकता और तूफान व च:वात चला सकता है।
तथा उनका परमेश्वर था जिसने जब मूसा ने इस्राएलियों को निकाल लाया, अतिमानवीय शक्ति से मिस्रियों के मन को डराया था। इसलिए इस्राएली सोचते थे कि जब परमेश्वर मसीह के रूप में इस पृथ्वी पर आता तब अवश्य उतने महिमामय रूपलेख में आएगा। इस जमाने में भी सभी ईसाई इस तरह से परमेश्वर की कल्पना करते हैं।
प्रेरित यूहन्ना ने यीशु के परमेश्वरत्व के बारे में इस प्रकार लिखा:

यूह 1:1-14 "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था। यही आदि में परमेश्वर के साथ था। सब कुछ उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उसमें से कुछ भी उसके बिना उत्पन्न न हुआ...वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे न पहचाना। वह अपनों के पास आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।... और वचन, जो अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण था, देहधारी हुआ, और हमारे बीच में निवास किया, और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी जैसी पिता के एकलौते(यीशु)की महिमा।"

यीशु के समय के धार्मिक नेताओं ने साहस से पूर्ण विश्वास किया कि यदि जिसने यह कह कर ज्योति को बनाया, "उजियाला हो" सृष्टिकर्ता परमेश्वर मसीह होकर आता तो हम आसानी से जल्दी पहचानेंगे। परन्तु उन्होंने सृष्टिकर्ता परमेश्वर को ग्रहण नहीं किया, बल्कि परमेश्वर से जो अपने संसार में आया, घृणा की, यहां तक कि क्रूस पर मारा।
अगर परमेश्वर असंख्य स्वर्गदूतों के साथ महाराजा होकर आया होता तो उन्होंने यीशु के साथ ऐसा नहीं किया होता। परन्तु इस्राएलियों के दिमाग में प्रतापी परमेश्वर का रूपलेख जमा हुआ था। उनके स्थिर विचार के उलटे ढंग से मसीह स्वर्गदूतों से नीचे रूप में धरती पर आया।

इब्र 2:6-8 "...मनुष्य का पुत्र, कि तू उसकी चिन्ता करता है? तू ने थोड़े ही समय के लिए उसे स्वर्गदूतों से कम किया। तू ने उस पर महिमा और आदर का मुकुट रखा, और अपने हाथों के कामों पर उसे अधिकार दिया है। तू ने सब कुछ उसकी अधीनता में उसके पैरों के नीचे कर दिया है।... "

कैसे इस्राएली परमेश्वर की जो स्वर्गदूतों से निकम्मे रूप में अया, कल्पना कर सके?परमेश्वर स्वयं आया पर उन्होंने परमेश्वर के मुंह पर थूका और उसे घूसों से मारा। वे मंदिर के अन्दर यत्न से परमेश्वर को पुकारते हुए ढूंढ़ते थे पर उस परमेश्वर से, जब उनके विचार के उलटे रूप में आया, पूरी तरह से ठोकर खाई। उन्होंने सोचा कि परमेश्वर स्वर्गदूतों से निकम्मे रूप में कभी नहीं आ सकता। लेकिन जब यीशु स्वर्गदूतों से निकम्मे रूप में आया, भाइयों ने भी विश्वास नहीं किया, यहां तक कि कुटुम्बियों ने यह कह कर पकड़वाना चाहा कि वह पागल है।
इस तरह वे मसीह को विश्वास नहीं कर पाए इसलिए यीशु ने उस समय बहुत बार कहा, "विश्वास करो।" यदि मसीह को विश्वास करना आसान था तो "प्रभु यीशु को विश्वास करो।" कहते हुए, प्रचार करना जरूरी नहीं था। चेले "प्रभु यीशु को विश्वास करो।" कहते हुए प्रचार करते थे, यह दिखाता है कि मसीह को विश्वास करना उतना मुश्किल था। उस समय परमेश्वर का रूपलेख जिसकी लोगों ने मन में कल्पना की, असली में आए परमेश्वर से बहुत अलग था। जब हम इस बात को समझ कर मसीह को स्वीकार करते तो हम युगों और पीढ़ियों से गुप्त रहे रहस्य मसीह को मान सकते हैं।

कुल 1:26-27 "अर्थात्‌ उस रहस्य को जो युगों और पीढ़ियों से गुप्त रहा पर अब उसके पवित्र लोगों पर प्रकट हुआ है।...अर्थात्‌ यह कि मसीह तुम में वास करता है और यही महिमा की आशा है।"

कुल 2:2-3 "...परमेश्वर का रहस्य अर्थात्‌ मसीह को पहिचानना है। उसमें बुद्धि और ज्ञान के समस्त भण्डार छिपे हुए हैं।"

सभी नबियों और सुसमाचार के लेखकों ने साक्षी दी कि मसीह ही सृष्टिकर्ता परमेश्वर है जिसने संसार में सारी वस्तुओं को सृजा।(यश 9:6, कुल 1:16, यूह 1:1)वह परमेश्वर ही धरती पर आकर विश्वासी लोगों के द्वारा मारा गया।
बाइबल में क्यों यह इतिहास लिखा है कि यीशु के कारण लोगों ने ठोकर खाई? बीत गई सब घटनाएं हमारी शिक्षा के लिए लिखी हैं।(रो 15:4) अभी तक संसार के लोगों के मन में यह स्थिर विचार बैठा है कि परमेश्वर स्वर्गदूतों से निकम्मे रूप में कभी नहीं आ सकता, और वे भयभीत और आश्चर्य रूप में प्रकट होने वाले द्वितीय मसीह का इन्तजार कर रहे हैं।
हमें परमेश्वर के प्रति अपने विचार को तोड़ना चाहिए। परमेश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है, इसलिए वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में भी या मनुष्य के रूप में भी आ सकता है, और कुंवारी के शरीर के द्वारा भी या शारीरिक माता-पिता के द्वारा भी आ सकता है। यदि अपने विचार के अनुरूप मसीह को स्वीकार करने लगते तो हम दूसरी बार आने वाले मसीह को स्वीकार कभी नहीं कर सकते।


अपने विचार से परमेश्वर का न्याय न करो

कोरिया के लोग सोचते हैं, मुर्ग "को को डेग को को" बांग देता, कुत्ता "मंग मंग" भौंकता, और बिल्ली "याओं" रोती है। परन्तु अमेरिका के लोग का विचार अलग है। वे सोचते हैं, मुर्ग "खीखीरी खीखी" बांग देता, कुत्ता "बाउ बाउ" भौंकता, और बिल्ली "मियाऊ" रोती है। पशु देश के अनुसार नहीं रोता। फिर भी देश के अनुसार पशु की आवाज अलग होती है। क्योंकि देश के अनुसार लोगों ने बचपन से शिक्षा पाई है और लगातार वैसेे सोचते हुए सुना है।
आइए हम पुंकेसर और स्त्री-केसर को सोचें। कहता है कि चाहे हमारी आंखों में यह पीले रंग में दिखाई देता हो, कुत्ते की आंखों में सफेद में और मधुमक्खी की आखों में लाल रंग में दिखाई देता है। तब हम कह सकते हैं कि हमारी आंखें सच में रंग का पहचान कर रही हैं? और क्या हम अपनी ज्ञानेन्द्रिय पर पूर्ण विश्वास कर सकते हैं?
और पृथ्वी सूर्य की परि:मा करने पर भी हमें कुछ भी महसूस नहीं होता पर पृथ्वी अब भी 1 लाख 8 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रही है। इस तरह से हम महसूस नहीं कर पाते हैं, फिर भी प्राय: लोग उन्हें ठीक सोचते हैं जो अपनी आखों में दिखाई देते, जो ज्ञानेन्द्रिय से महसूस कर सकते हैं, और अपने विचार में उचित है। कितना मूर्ख वह है!
हमारी ज्ञानेन्द्रिय से हम सत्य और झूठ का पहचान नहीं कर सकते, इसलिए परमेश्वर ने कहा, "समय से पहिले किसी बात का न्याय न किया करो, वरन्‌ जब तक प्रभु न आए तब तक ठहरे रहो।" (1 कुर 4:5)ऐसा होने पर भी संसार के लोग अपनी इच्छा से अलग-अलग बाइबल की व्याख्या करते हैं। हर सब जोर डालता है कि मैं सही हूं और तुम गलत हो। इतना ही नहीं, जब परमेश्वर सत्य कहता है, वे मना करते हैं।
कितना चकित बात है! हमें ऐसा विश्वास न करना है कि जो दिखाई देता है वह सच्चा है। हम परमेश्वर से विनती करें कि अपने पूर्वविचार से नहीं बल्कि आत्मिक आखों से बाइबल को सही तरीके से देख सकें। क्योंकि हम अपने विचार से मसीह को पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर सकते।
तब फिर हम किस दृष्टिकोण से मसीह को सही तरीके से जान सकेंगे? विश्वास के प्रतिफल-स्वरूप अपनी आत्माओं का उद्धार प्राप्त करना है। इसलिए हमें जिन्होंने उद्धार पाया उनके दृष्टिकोण से मसीह को देखना है, जिससे हम उद्धार पा सकते हैं। आइए हम जिन्होंने उद्धार पाया उनके दृष्टिकोण से मसीह को देख लें।

प्रक 14:1-5 "फिर मैंने दृष्टि की, और देखो, वह मेमना सिय्योन पर्वत पर खड़ा था, और उसके साथ एक लाख चवालीस हजा.र व्यक्ति थे... नया गीत गा रहे थे। उन एक लाख चवालीस हज़ार के अतिरिक्त जो पृथ्वी पर से मोल लिए गए थे, कोई भी वह गीत नहीं सीख सकता था।"

उद्धार पाने वाले एक लाख चवालीस हजा.र व्यक्तियों के दृष्टिकोण से देखें तो मसीह सिय्योन पर्वत पर खड़ा है। सिय्योन को ढूंढ़ कर और सिय्योन की व्यवस्था को जान कर हम मसीह को खोज सकते हैं। सिय्योन के बाहर रहे व्यक्ति के दृष्टिकोण से हम मसीह को ग्रहण कभी नहीं कर सकते। यद्यपि किसी चर्च में कुछ कहे तो भी हमें उस चर्च के दृष्टिकोण से बाइबल को न देखना है। और व्यक्तिगत मत के अनुसार भी बाइबल को न देखना है।
मधुमक्खी या कीट या पशु की आंखों से नहीं पर मनुष्य की आंखों से जब पुंकेसर और स्त्री-केसर को देखता तब वह पीले रंग में ठीक ठीक दिखाई देता है। बिना यह रहस्य समझे हम परमेश्वर को नहीं जान सकते। यदि हम परमेश्वर की सृष्टि में छिपी उसकी दस करोड़ इच्छाओं में एक भी समझे तब बाइबल को समझ सकते हैं। जिसमें अद्‌भुत युक्ति होती है उस परमेश्वर के वचन को मनुष्य के सीमित विचार या थोड़े ज्ञान से देखने की कोशिश करें तो गलत अर्थ लगाएंगे।


रहस्यों का रहस्य मसीह जो सिय्योन में मिलता है।

प्रकाशितवाक्य अध्याय 14 के वचन में मसीह सिय्योन में रहता है। आइए हम ढूंढ़ें, सिय्योन कहां है? जहां मेमने के साथ उद्धार पाने वाले एक लाख चवालीस हजा.र व्यक्ति खड़े हैं।

यश 33:20-24 "हमारे नियत पर्वों के नगर सिय्योन पर दृष्टि कर... वहां वह महाप्रतापी अर्थात्‌ यहोवा हमारे लिए नदियों और चौड़ी नहरों का ऐसा स्थान होगा... क्योंकि यहोवा हमारा न्यायी, यहोवा हमारा व्यवस्था देनेवाला और यहोवा हमारा राजा है: वही हमारा उद्धार करेगा।"

सिय्योन स्थान है जहां नियत पर्व मनाए जाते हैं। उस सिय्योन में साथ रहने वालों के लिए परमेश्वर न्यायी, व्यवस्था देनेवाला और राजा है। जैसे संसार में राजा और प्रजाओं के बीच में शासन करने के लिए व्यवस्था होती है वैसे ही सिय्योन के राजा परमेश्वर को भी शासन करने के लिए व्यवस्था, नई वाचा होती है।
देश के अनुसार व्यवस्था अलग है, इसलिए विदेशी को उस देश की व्यवस्था के अनुकूल बनाना आसान नहीं है। इस तरह से परमेश्वर की प्रजा के अलावे संसार के लोग परमेश्वर के सिय्योन की व्यवस्था का पालन आसानी से नहीं कर सकते, क्योंकि वे उस देश के निवासी नहीं हैं।
परमेश्वर के सिय्योन में व्यवस्था की घोषणा करने का समय अन्तिम दिन है।(मी 4:1)लिखा है कि अन्तिम दिन में बहुत से लोग उद्धार पाने की रीति खोजेंगे और सिय्योन की ओर उमड़ पड़ेंगे, और न्याय के समय जो सिय्योन की व्यवस्था नहीं जानते उनका न्याय सिय्योन में स्थापित हुई व्यवस्था से जो कि नई वाचा है, किया जाएगा। यदि सिय्योन में न रहता तो वह व्यवस्था मालूम नहीं है। इसलिए वह परमेश्वर के न्याय से नहीं बचा रहेगा।
मन में स्थिर अपने विचार को साफ-साफ हटाकर हमें बाइबल की अगुवाई के अनुसार परमेश्वर से मिलना है जिसकी साक्षी बाइबल देती है। फिर आइए हम देखें कि परमेश्वर सिय्योन में क्या अनुग्रह और आशीष देता है।

भज 132:13-14 "क्योंकि यहोवा ने सिय्योन को चुन लिया है: उसने अपने निवास के लिए इसे चाहा है। "यह तो सदा के लिए मेरा विश्रामस्थान है, मैं यहीं रहूंगा क्योंकि मैंने इसे चाहा है।"

भज 133:1-3 "देखो, यह कैसी भली और मनोहर बात है कि भाई आपस में एक होकर रहें!...यह हेर्मोन की उस ओस के समान है, जो सिय्योन के पहाड़ों पर गिरती है! क्योंकि यहोवा ने वहीं सदा के जीवन की आशीष ठहराई है।"

इस तरह बाइबल भविष्यवाणी कर रही है कि परमेश्वर सिय्योन को चुनकर अपना निवास-स्थान बनाएगा और वहां अनन्त जीवन की आशीष देगा। सिय्योन की प्रजा के दृष्टिकोण से देखने से हम मसीह को जो रहस्यों का रहस्य है, पहचान कर ग्रहण कर सकते हैं। जो सिय्योन के अन्दर रहता है केवल वही अनन्त जीवन की आशीष पा सकता है, क्योंकि परमेश्वर ने जो सिय्योन के अन्दर रहने वालों की आखों से देखा जाता है उसे स्तर बनाया और जो सब सिय्योन के दृष्टिकोण से देखा जाता है उसे सही माना।
जहां हम परमेश्वर के गुप्त रहस्यों का रहस्य मसीह समझ सकते हैं वह स्थान केवल सिय्योन है। परमेश्वर ने हमें जो सिय्योन में ठहरते हैं, अनन्त जीवन की आशीष और स्वर्ग जाने का निमंत्रण-पत्र दिया है। कितना बहुमूल्य और मान्य निमंत्रण-पत्र है!
पूरे विश्व में तितर-बितर हुए भाई और बहनें हैं जिन्होंने अभी तक मसीह को पहचाने की आत्मिक आंखें नहीं लीं। जल्दी हम उन्हें सिय्योन में ले आएं और उनकी आंखों को खोल दें ताकि वे भी परमेश्वर का रहस्य, मसीह देख सकें और हमारे साथ उद्धार पा सकें। आशा है कि आप परमेश्वर का निमंत्रण-पत्र जो स्वदेश, स्वर्ग में बुलाता है, दूसरों को यत्नपूर्वक बांटें ताकि स्वर्ग जाकर परमेश्वर से तारीफ किए जाएं।